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सिनेमा की भाषा – अरुण कुमार

शब्द, वाक्य और संवाद साहित्य की भाषा के अंग होते हैं। सिनेमा की भाषा में इनके अलावा भी बहुत कुछ ऐसा होता है जिनके माध्यम से किसी फिल्म का निर्देशक दर्शकों तक संदेशों का सम्प्रेषण करता है। सिनेमा एक दृश्य-श्रव्य माध्यम है इसलिए इसकी भाषा में संवाद के अतिरिक्त भी कई आयाम होते हैं। यही कारण है कि साहित्य और सिनेमा की समीक्षा की कसौटी भी अलग-अलग होती है। सिनेमा की भाषा वह भी है जिसे निर्देशक कैमरे से, प्रकाश से, नृत्य से, शारीरिक हाव-भाव और ध्वनि से अभिव्यक्त करता है। फिल्म निर्देशक कैमरे के एंगल, उसकी गति (मूवमेंट्स), संगीत, गीत, प्रकाश, ध्वनि, अभिनय, रंग, ड्रेस, लोकेशन आदि कई माध्यमों से अपना संदेश दर्शकों तक संप्रेषित करता है। संवाद उसका एक हिस्सा होता है लेकिन उसका स्थान बहुत बाद में आता है। सिनेमा की भाषा के रूप में संवाद का महत्व बॉलीवुड में अधिक है जबकि हॉलीवुड की फिल्मों में संवाद कम होते हैं। हिंदी सिनेमा इतिहास की कई फिल्में ऐसी हैं जिनमें संवाद की तुलना में अन्य माध्यमों से सम्प्रेषण का प्रयास अधिक किया गया है। साहित्य में जो बात कई पन्ने रंग कर कही जाती है उसी बात को सिनेमा कुछ दृश्यों के माध्यम से आसानी से ही कह देता है।

मुग़ल-ए-आज़म’ फ़िल्म का एक दृश्य जिसमें संवादों के माध्यम से कम और ध्वनि व कैमरे के एंगल से बहुत कुछ कहा गया है। फिल्म के इस दृश्य में अनारकली और शाहज़ादा सलीम बगीचे में बैठे हैं। उसी समय बादशाह अकबर के आने की घोषणा होती है। बादशाह अकबर के आने की खबर सुनकर अनारकली एक डरी हुई हिरणी की तरह बाहर भागती है और सामने बादशाह को देखकर वापस आती है। वह सलीम की मोतियों की माला पकड़कर झूलती हुई बेहोश हो जाती है। मोतियों के टूटकर बिखरने की ध्वनि बहुत कुछ कहती है। मोतियों की माला का टूटकर बिखरना अनारकली के सपनों का टूटकर बिखरना है। मोतियों के टूटकर बिखरने से जो सन्देश मिलता है उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता और यदि उसे शब्दों में व्यक्त किया भी जाए तो दर्शक पर भी अधिक प्रभाव नहीं पड़ेगा। सलीम, अनारकली और अकबर के चेहरे के भावों का वर्णन साहित्य शब्दों के माध्यम से कर सकता है लेकिन सिनेमा उन्हें दिखाता है।

‘मुग़ल-ए-आज़म’ फ़िल्म के इस दृश्य में पार्श्व में चलता संगीत भी दृश्य को और अधिक जीवन्त बना देता है। पार्श्व में चलते संगीत के कारण दर्शक अनारकली के दुख को और भी अधिक तीव्रता से महसूस करता है। संगीत सिनेमा का अनिवार्य अंग होता है। सिनेमा में संगीत दृश्य के मूड को अभिव्यक्त करता है। यही सिनेमा की शक्ति भी है। यह सिनेमा की भाषा की शक्ति है जो प्रकाश, ध्वनि, रंग, लोकेशन, कैमरे का एंगल व मूवमेंट, ड्रेस, अभिनय तथा गीत-संगीत द्वारा अत्यंत प्रभावपूर्ण ढंग से अपना संदेश दर्शक तक पहुंचाता है। एक सफल निर्देशक अपनी बात को संवाद से अधिक अन्य सिनेमाई माध्यमों से अभिव्यक्त करता है। 

पहली बोलती फिल्म आलम आरा
पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’

2019 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘आर्टिकल 15’ के प्रारंभ में एक दृश्य है। फ़िल्म के नायक को एक रास्ते की जानकारी देते हुए उसका ड्राइवर कहता है – ‘यहां से राइट जाएंगे तो अयोध्या, सीधे चले गए तो लखनऊ और कहीं लेफ्ट मुड़ गए सर, तो ये हाइवे सीधा कलकत्ता। इस दृश्य में ड्राइवर भले ही रास्ता बता रहा है लेकिन वह अयोध्या को दक्षिणपंथी, लखनऊ को मध्यममार्गी और कलकत्ता को वामपंथी राजनीति का केन्द्र बता रहा है। एक तरह से फ़िल्म के निर्देशक ने पूरी भारतीय राजनीति के स्वरूप को समझा दिया है। इस संवाद से सामान्य अर्थ का नहीं बल्कि विशेष अर्थ का बोध होता है।

1975 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘शोले’ में रामगढ़ गांव के लोग गब्बर सिंह के खिलाफ बगावत पर उतर आते हैं। उसी समय गब्बर सिंह के डाकू रामगढ़ के एक नौजवान को उठाकर लाते हैं। रामगढ़ पर अपना खौफ जमाने के लिए गब्बर सिंह उस नौजवान की हत्या कर देना चाहता है, पर यह बात वह शब्दों में नहीं कहता। इसके लिए वह एक दृश्य का सहारा लेता है। अपने हाथ पर रेंग रहे एक कीड़े को वह मसल देता है। उसके साथी डाकू समझ जाते हैं और अगले दृश्य में नौजवान की लाश रामगढ गांव में पड़ी हुई दिखाई जाती है। हम यहां देखते हैं कि निर्देशक ने आधी बात संवाद से और आधी बात दृश्य से कहा है।

ऋषिकेश मुखर्जी भारतीय फिल्म उद्योग के एक सफल निर्देशक के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने घर के छोटे मुद्दों से लेकर समाज के संवेदनशील मुद्दों को अत्यंत सफलता के साथ चित्रित किया है। ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म ‘मिली’ का एक दृश्य है जिसमें दुनिया से नकारा गया नायक शराब के नशे के कारण बीमार हो जाता है। नायिका उसका इलाज करती है। नायक कहता है – ‘तुम मुझे नहीं जानती, मैं बहुत बुरा आदमी हूं।’ नायक की बातों का जवाब देते हुए नायिका कहती है – ‘आप बीमार हैं और बीमार सिर्फ अच्छे होते हैं।’ फ़िल्मकार ने बहुत कम शब्दों में कई बातें कहने का प्रयास किया है। नायक की निराशावादी मानसिकता के समक्ष आशावादी नजरिए की इस प्रस्तुति में हम देख सकते हैं कि ‘अच्छा होना’ के दो अर्थ हैं – एक शारीरिक रूप से स्वस्थ होना और दूसरा बेहतर इंसान होना। एक ही पंक्ति के संवाद से कई अर्थ प्रस्तुत करना एक सफल निर्देशक की विशेषता है। श्लेष अलंकार का उपयोग साहित्य में होता रहा है लेकिन राही मासूम रजा ने सिनेमा में इसका शानदार उपयोग किया है।

आर्टिकल 15, लोकमंच पत्रिका
आर्टिकल 15, लोकमंच पत्रिका

फिल्म में ट्रैक, पैन और जूम आदि तकनीक के कारण कैमरा एक कलाकार की भांति व्यवहार करता है। वह पात्रों के साथ-साथ घूमता है और दौड़ता भी है। वह जूम इन होकर पात्र के चेहरे पर जाकर उसके गुस्से-प्यार आदि मनोभावों को दिखाता है। प्रकाश और ध्वनि का उपयोग कर भी कभी-कभी पात्र की मानसिक स्थिति का भी चित्रण किया जाता है। फ़िल्म को क्लासिक का दर्जा तब मिलता है जब फ़िल्म में बात कहने के लिए दृश्य संयोजन या संकलन, फोटोग्राफी, गीत, नृत्य, अभिनय जैसे फ़िल्म माध्यम के तमाम व्याकरणों का उसमें उपयोग किया जाता है। इन सभी माध्यमों से जब बातें कही जाती हैं तो फ़िल्म अधिक आकर्षक हो जाती है।

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अब हम हिन्दी फिल्मों के संवाद की भाषा पर बात करते हैं। पहली बोलती फ़िल्म ‘आलम आरा‘ 14 मार्च 1931 को बम्बई के मैजेस्टिक सिनेमा हॉल में प्रदर्शित हुई थी। ‘आलम आरा की भाषा हिन्दी और उर्दू मिश्रित है। इसकी भाषा में हिन्दी के वाक्य और उर्दू के शब्दों का प्रयोग किया गया है। इस फ़िल्म का गाना ‘दे दे खुदा के नाम पे बंदे ताकत है गर देने की’ है। इस गाना में वाक्य तो हिन्दी का है लेकिन खुदा, ताकत, बंदे आदि शब्द उर्दू के हैं। इस समय की कई फिल्में पुराणों और धार्मिक ग्रंथों के चरित्रों पर आधारित थीं। इन फिल्मों की भाषा हिन्दी है जिसमें संस्कृतनिष्ठ शब्दों का अधिक प्रयोग किया गया है। जब ऐतिहासिक विषयों पर फिल्में बनने लगीं जिनका विषय मुगल काल की घटनाओं पर ही अधिक था, उनकी भाषा हिन्दी है लेकिन उस पर उर्दू का प्रभाव अधिक है। प्रारंभ में हिन्दी सिनेमा पर पारसी रंगमंच का सीधा प्रभाव रहा है। पारसी रंगमंच के हिन्दू धर्म विषयक नाटकों के पात्र भी हिन्दुस्तानी भाषा का प्रयोग करते थे अर्थात उर्दू मिश्रित हिन्दी। हिंदुस्तानी भाषा अर्थात जिसमें व्याकरण तो हिन्दी का है लेकिन शब्द प्रचलित अरबी या फारसी के होते हैं।

चूंकि पारसी थियेटर के नाटक समाज के किसी भी समूह की भावनाओं को आहत किए बगैर उनका मनोरंजन करते थे। उनके नाटकों में धार्मिक और पौराणिक विषय होते हुए भी एक सामाजिक सौहार्द का संदेश होता था। उनके नाटकों की भाषा भी आम भारतीय मानस के अनुरूप होती थी। इस प्रकार हिन्दी सिनेमा पर पारसी थियेटर का भाषायी संस्कार बना रहा। जवरी मल्ल पारख ने लिखा है – “पारसी थियेटर ने हिन्दी-उर्दू विवाद से परे रहते हुए बोल-चाल की एक ऐसी भाषा की परंपरा स्थापित की जो हिन्दी और उर्दू की संकीर्णताओं से परे थी और जिसे हिंदुस्तानी के नाम से जाना गया। यह भारतीय उपमहाद्वीप के एक बड़े हिस्से में सम्पर्क भाषा के रूप में विकसित हुई थी। हिन्दी सिनेमा ने आरम्भ से ही भाषा के इसी रूप को अपनाया। इस भाषा ने ही हिन्दी सिनेमा को गैर हिन्दी भाषी दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाया। यह द्रष्टव्य है कि भाषा का यह आदर्श उस दौर में न हिन्दी वालों ने अपनाया न उर्दू वालों ने। साहित्य की दुनिया में इसे प्रेमचन्द ने ही न सिर्फ स्वीकार किया बल्कि इस भाषा का रचनात्मक और कलात्मक परिष्कार भी किया। बाद में साहित्य के प्रगतिशील आंदोलन ने भाषा के इस आदर्श को अपना वैचारिक समर्थन भी दिया और उसका विकास भी किया। लेकिन यहां यह रेखांकित करना जरूरी है कि हिन्दी-उर्दू सिनेमा का भाषायी आदर्श इसी पारसी थियेटर की परंपरा का विस्तार था और इसी वजह से जिसे आज हिन्दी सिनेमा के नाम से जाना जाता है उसे दरअसल हिन्दुस्तानी सिनेमा ही कहा जाना चाहिए। ( समयांतर, जुलाई 2012)

पारसी रंगमंच का एक दृश्य, लोकमंच पत्रिका
पारसी रंगमंच का एक दृश्य, लोकमंच पत्रिका

प्रारंभ से ही हिंदी सिनेमा किसी भी तरह की भाषायी संकीर्णता से दूर रहा है।इस प्रकार सत्तर के दशक तक की अधिकांश फिल्मों की भाषा ‘हिन्दुस्तानी’ ही रही- हुमायूं ( 1945 ), अनमोल घड़ी ( 1946 ) , अनोखी अदा ( 1948 ), झांसी की रानी (1952 ), देवदास ( 1955 ), अमानत ( 1955 ), प्यासा ( 1957 )मधुमती ( 1958 ), सुजाता ( 1960 ), बन्दिनी ( 1963 ) या दो दूनी चार ( 1968 )। प्रसिद्ध फिल्म ‘प्यासा‘ का एक संवाद है जिसे सत्तर के दशक तक की हिन्दी फिल्मों की भाषा का उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसमें एक प्रकाशक शायर विजय के बारे में कह रहा है – “उन्हें शोहरत का ताज पहनाना चाहती है, उन्हें गरीबी और मुफ़लिसी की गलियों से निकालकर महलों में राज कराना चाहती है।” हिन्दी फिल्मों की भाषा को हिन्दी-उर्दू- हिन्दुस्तानी अथवा अंग्रेज़ी के झगड़े से दूर जाकर सोचें तो यह नजर आएगा कि यह एक बहुभाषी दुनिया है। यह भी नजर आएगा कि हिन्दी फ़िल्म की भाषा एक भाषा के आवरण में बहुभाषा को समेटने वाली भाषा है। हिन्दी सिनेमा के संवाद कथा में आए पात्र को ध्यान में रखकर लिखे जाते हैं। ‘मुग़ल-ए-आज़म’ फ़िल्म का वह संवाद याद आता है। फारसी तहजीब में पला-पढ़ा शाहज़ादा सलीम कहता है- ‘मुझपे ज़ुल्म ढाते हुए आपको जरा सोचना चाहिए कि मैं  आपके जिगर का टुकड़ा हूं कोई गैर या गुलाम नहीं।’ तो उसके सामने खड़ी राजस्थान के संस्कार वाली जोधा कहती है- ‘नहीं सलीम नहीं, तुम हमारी बरसों की प्रार्थनाओं का फल हो।’ मुगल-ए-आज़म में ‘जब रात है ऐसी मतवाली तो सुबह का आलम क्या होगा’ के साथ ‘मोहे पनघट  पर नन्दलाल छेड़ गयो रे’ जैसे दोनों तरह की भाषाओं का सुन्दर उपयोग किया गया है।

मुगल-ए-आजम, लोकमंच पत्रिका
मुगल-ए-आजम, लोकमंच पत्रिका

चूंकि सिनेमा की भाषा हमेशा से ही अपने देशकाल, व्यावसायिकता, कथानक और पात्रों के अनुकूल ही गढ़ी जाती रही है। हिन्दी सिनेमा ने अपने जरूरत के अनुसार हिन्दी क्षेत्र की विभिन्न बोलियों के शब्दों को भी अपनाने में कोई कोताही नहीं की। प्रसिद्ध निर्देशक महबूब खान ने सामाजिक सुधार पर कई फिल्में बनाईं जिनमें धार्मिक कुरीतियों और कुप्रथाओं पर कडा प्रहार किया गया। 1940 में महबूब खान ने ‘औरत’ फ़िल्म बनाई जिसमें एक शहरी महिला के संघर्ष का चित्रण किया गया था। इसकी भाषा शहरों में बोली जाने वाली भाषा थी। बाद में उन्होंने एक ग्रामीण महिला के संघर्ष पर आधारित ‘मदर इंडिया’ फ़िल्म बनाई जिसकी भाषा भोजपुरी मिश्रित हिन्दी थी।

प्रारंभ में ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली फिल्मों में हिन्दी और भोजपुरी मिश्रित भाषा का ही अधिक प्रयोग होता था। इसका एक प्रमुख कारण यह था कि बम्बई तथा अन्य बड़े शहरों में बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों की खूब संख्या थी। किसानी छोड़कर मजदूर बने व्यक्ति की कहानी पर विमल राय ने ‘दो बीघा जमीन’ जैसी कालजयी फ़िल्म बनाई। इसमें बलराज साहनी मुख्य भूमिका में थे। इस फ़िल्म की और उसके गीतों की भाषा भी भोजपुरी मिश्रित हिन्दी थी। यही नहीं इस फिल्म के संगीत और वाद्य यंत्र भी भोजपुरी लोक संगीत से ही प्रभावित थे। गुरुदत्त की फ़िल्म ‘आर-पार’ में पात्र के अनुसार संवाद हैं। फ़िल्म में टैक्सी ड्राइवर की भूमिका निभा रहे गुरुदत्त मध्यप्रदेश के एक गांव से है। वह हीरोइन के पिता से बोलता है – ‘बखत-बखत की बात है लाला जी। आज यारों का बखत ढीला है।’ यहां ‘वक्त’ की जगह ‘बखत’ शब्द का प्रयोग किया गया है जो संवाद को खूबसूरत भी बना देता है और सहज भी। पारसी की भूमिका निभा रहे जॉनी वॉकर कहते हैं- ‘मैं तुमसे पहलेइच बोला था, इधर से चलो करके. यहां ‘करके’ एकदम मुम्बइया भाषा है।

1990 के बाद भी कई फिल्में प्रदर्शित हुईं जिनमें भारत की कई क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग किया गया था। पान सिंह तोमर, उड़ता पंजाब, तन्नू वेड्स मन्नू , गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी फिल्मों ने हिन्दी सिनेमा में भाषा के ट्रेंड को बदला है। इन फिल्मों में हिंदी के साथ ही क्षेत्रीय भाषाओं का भी उपयोग बड़ी सफलता से किया गया या फिर अलग-अलग क्षेत्रों में हिन्दी बोलने के अंदाज़ को अपनाया गया।  ‘तन्नू वेड्स मन्नू’ की भाषा हरियाणवी है तो ‘बाजीराव मस्तानी’ की मराठी, ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की भोजपुरी, ‘उड़ता पंजाब’ की पंजाबी तो ‘पानसिंह तोमर’ की ब्रजभाषा है। हिन्दी फिल्मों में क्षेत्रीय भाषाओं के प्रभाव से हिन्दी भी समृद्ध हुई है और क्षेत्रीय भाषाएं भी एक बड़े समूह तक पहुंची है और दर्शकों ने इसे स्वीकारा भी है। 1980 के बाद हिन्दी सिनेमा की भाषा में बम्बइया पुट भी आने लगा था। खासकर टपोरी भाषा के शब्द । इसका प्रभाव गानों पर भी खूब पड़ा। 

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पान सिंह तोमर, लोकमंच पत्रिका

1990 के बाद की फिल्मों की भाषा पर कई सिनेमा समीक्षकों की राय है कि इस पर अंग्रेज़ी का बोलबाला है। आज अंग्रेज़ी के लोग हिन्दी फिल्मों की पटकथा लिख रहे हैं जबकि हिन्दी या उर्दू का उन्हें समुचित ज्ञान नहीं है। सरल हिन्दी में लिखी गई पटकथा में भी अंग्रेज़ी के शब्दों का खूब प्रयोग किया जा रहा है। जैसे आज कुछ लोगों को हिन्दी सिनेमा की हिन्दी पर अंग्रेजी का प्रभाव अधिक दिखता है वैसे ही साठ के दशक में कुछ लोग हिन्दी सिनेमा की हिन्दी पर उर्दू के प्रभाव को स्वीकार नहीं कर पाते थे। हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकार साहिर लुधियानवी ने बिहार के एक मुशायरे में कह दिया था कि हिन्दी फिल्मों की भाषा 97 फीसदी उर्दू है। उस समय साहिर के इस वक्तव्य का खूब विरोध हुआ। फिल्मी पत्रिका ‘माधुरी’ ने तो एक अभियान ही चलाया था।

नब्बे के दशक में भारत में वैश्वीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई जिसे प्रचारित और प्रसारित करने का जिम्मा भाषाई रूप से अंग्रेज़ी पर है। दूसरे शब्दों में वैश्वीकरण का भाषाई ब्रह्मास्त्र अंग्रेज़ी है। इस कारण नब्बे के बाद की हिन्दी फिल्मों की हिन्दी पर अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ा और उर्दू का प्रभाव धीरे-धीरे कम हुआ है। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ का प्रदर्शन 1995 में हुआ था जो ‘डीडीएलजे’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस फ़िल्म की भाषा हिन्दी में अंग्रेज़ी के शब्द उतने नहीं मिलते हैं लेकिन जितने मिलते हैं उससे यह माना जा सकता है कि यह भाषाई रूप से फिल्मों के बदलने की शुरुआत है। यह फ़िल्म हिन्दी सिनेमा की भाषा के बदलने हिन्दुस्तानी से हिंग्लिश होने की सूचना देती है – “हाउ डे यू टच मी…… तुमने मुझे छुआ कैसे …… व्हाट द ब्लडी हेल यू।” यह संवाद साबित करता है कि हिन्दी सिनेमा की भाषा में अंग्रेज़ी किस तरह से बढ़ रही है।

दिलवाले दुल्हिनिया ले जाएंगे, लोकमंच पत्रिका
दिलवाले दुल्हिनिया ले जाएंगे, लोकमंच पत्रिका

अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग ऐसा नहीं है कि ‘डीडीएलजे‘ में पहली बार हुआ था। घायल ( 1991 ), लम्हें ( 1992 ), जो जीता वही सिकन्दर ( 1993 ), हम हैं राही प्यार के (  1994 ), हम आपके हैं कौन ( 1995 ) जैसी कई फिल्मों में अंग्रेज़ी के शब्द मिलते हैं लेकिन ‘डीडीएलजे’ उनसे आगे बढ़ गई। कभी-कभी व्यावसायिकता, प्रसिद्धि और पुरस्कार से भी एक विशेष प्रचलन और दौर की शुरुआत हो जाती है। यह प्रचलन भाषायी, तकनीकी, शैली या आंदोलन जैसे किसी भी रूप में हो सकती है। इस दृष्टि से भी ‘डीडीएलजे’ को भाषा की दृष्टि से हिन्दी फिल्मों में ‘हिंग्लिश’ के प्रचलन की शुरुआत करने वाली फ़िल्म माना जाता है। इस फ़िल्म ने सिनेमा की भाषा में अंग्रेज़ी शब्दों का प्रचलन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई क्योंकि इसके बाद आने वाली जितनी भी प्रसिद्ध फिल्में हैं उसमें हिन्दी के साथ प्रयोग किए जा रहे उर्दू और फ़ारसी के शब्दों का जो भी बचा हुआ स्थान था उसे अंग्रेज़ी ने छिन लिया। 

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वैश्वीकरण के दौर की फिल्मों में भाषा के साथ-साथ तकनीकी स्तर पर भी बड़े बदलाव दिखाई देते हैं। हॉलीवुड का बॉलीवुड से सम्पर्क बढा है जिसके कारण फिल्में अब देसी कम ग्लोबल ज्यादा हैं। कई फिल्मों की पृष्ठभूमि ग्लोबल है। कई फिल्मों की पूरी की पूरी कहानी लन्दन या न्यू यॉर्क में घटित हो रही है। ‘माई नेम इज खान‘, ‘लन्दन ड्रीम्स‘, ‘पटियाला हाउस’,अनजाना-अनजानी‘ ऐसी कई फिल्में हैं जिनकी शूटिंग भी विदेश में हुई है और कहानी भी विदेश की है। फिल्मकारों ने उन प्रवासी भारतीयों को ध्यान में रखकर फिल्में बनाई हैं जिनकी संख्या विदेशों में काफी बढ़ी है। पहले हिन्दी फिल्मों में भोजपुरी या पुरबिया बोली का जितना उपयोग होता था अब उनके स्थान पर पंजाबी और गुजराती भाषा के शब्दों का अधिक प्रयोग होने लगा है। इसका कारण है कि विदेशों में पंजाबी और गुजराती भाषी लोग अधिक हैं। ये फिल्में आम हिंदुस्तान की फिल्में नहीं हैं बल्कि ‘न्यू इंडिया’ की फिल्में हैं इसलिए इनकी भाषा पर भी अंग्रेज़ी का प्रभाव अधिक है। बात हिन्दी पर उर्दू या अंग्रेज़ी के प्रभाव की हो लेकिन सभी यह मानकर चलते हैं कि नाम अगर हिन्दी सिनेमा है तो जो कथा दर्शक को दिखाई जा रही है उसमें बोली जाने वाली भाषा का रूप जरूरी तौर पर उसी दर्शक के अनुरूप होगा। इसी भाषा को कोई हिन्दी कहता है तो कोई उर्दू और कोई अंग्रेज़ी के प्रभाव वाली हिन्दी। हिन्दी एक ऐसी भाषा है जिसे सब अपनी तरह इस्तेमाल करते हैं और वह होती जाती है। उसके इस उदार रवैये ने ही इसे बचा कर रखा हुआ है। हिन्दी सिनेमा में हर तरह की हिन्दी के लिए जगह है।

लेखक – डॉ अरुण कुमार, सम्पादक, लोकमंच पत्रिका व असिस्टेंट प्रोफेसर, लक्ष्मीबाई कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय। सम्पर्क – arunlbc26@gmail.com, 8178055172.

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