लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
हिन्दी के पाठ्यक्रमों में हों बदलाव- अरुण कुमार

यह लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित हो चुका है।

हिन्दी भाषा की स्थिति पर बात करने वाले दो तरह के विद्वान  हैं। विद्वानों के एक वर्ग का मानना है कि हमारी हिन्दी की स्थिति अच्छी नहीं है। वह या तो खत्म हो रही है या उसमें अंग्रेज़ी के शब्द इस तरह से शामिल हो रहे हैं कि उसका मूल स्वरूप समाप्त हो रहा है। विद्वानों का दूसरा वर्ग मानता है कि हमारी हिन्दी लगातार बढ़ रही है। वे आंकड़े प्रस्तुत करते हैं कि दुनिया के लगभग 20 से अधिक देशों में हिन्दी बोलने वालों की संख्या लाखों में है व इंटरनेट पर सबसे अधिक मांग हिन्दी की है। अपनी-अपनी जगह पर दोनों बातें सही भी हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के पक्ष में जो आंकड़े प्राप्त हुए हैं उनके अनुसार विदेश में हिन्दी भाषा सीखने और जानने वालों की संख्या में गुणात्मक वृद्धि दर्ज की गई है। इसके ठीक विपरीत हमारे अपने देश में स्कूलों और कॉलेजों के छात्र हिन्दी का नाम सुनकर ही नाक-भौं सिकुड़ने लगते हैं। ऐसा क्यों होता है यह जानने या समझने की कोशिश विद्वानों के दोनों वर्गों ने नहीं की। यह भी कहा जा सकता है कि हिन्दी की वृद्धि  के पक्ष में जो भी आंकड़े हमें उत्साहित करते हैं वे मीडिया, सिनेमा या बाजार की अन्य शक्तियों से प्राप्त होते हैं। स्कूलों और कॉलेजों में हिन्दी की स्थिति को देखकर केवल परेशान हुआ जा सकता है

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दुनियाभर के भाषा वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि हिन्दी भाषा अपने उच्चारण और लिपि के आधार पर सबसे अधिक विज्ञानसम्मत और शुद्ध भाषा है। हिन्दी में एक अक्षर से एक ही ध्वनि निकलती है और एक बिन्दु (अनुस्वार ) का भी अपना  महत्व है। दूसरी भाषाओं यहां तक कि अंग्रेज़ी में भी यह वैज्ञानिकता नहीं पाई जाती। इसके बावजूद तमाम स्कूलों में हिन्दी की जगह अंग्रेजी सिखाने के अधिक  प्रयास चल रहे हैं। इसका दुष्परिणाम यह है कि कॉलेज में भी पहुंचकर छात्र हिन्दी में मात्राओं और उच्चारण की सामान्य  गलतियां करते हैं। हिन्दी के अंकों जैसे उनसठ, उनहत्तर, उन्यासी को अधिकांश छात्र नहीं समझ पाते।

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ऐसी स्थिति लिए बड़ी जिम्मेदारी स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाये जाने वाले हिन्दी के  पाठ्यक्रमों की हैं। स्कूल से लेकर कॉलेज तक के पाठ्यक्रम इस तरह से तैयार किए गए हैं कि छात्रों में हिन्दी के प्रति आकर्षण  पैदा नहीं हो पा रहा  है। हिन्दी के पाठ्यक्रम समय के साथ चलने में बिल्कुल असमर्थ हैं क्योंकि वे वर्षों पहले तैयार किए गए हैं।  तीसरी कक्षा की कविता की एक पंक्ति है- जिस पर चरण दिए हम उस मातृभूमि की रज को..सात वर्ष के छात्र को यह कविता पढ़ाकर यदि हम सोचते हैं कि उसके मन में राष्ट्रभाषा के प्रति आकर्षण बढ़ेगा तो शायद हम गलत सोच रहे हैं। हिन्दी के अखबारों में अक्सर बच्चों की कविताएं प्रकाशित होती हैं। यदि उन कविताओं को ही  पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया  जाए तो भी हिन्दी का भला हो सकता है। ‘मछली जल की रानी है’, ‘पहली बारिश’ या ‘इब्नबतूता’ आदि कविताओं के अलावा पूरे स्कूली पाठ्यक्रम में एक भी कविता या कहानी ऐसी नहीं मिलेगी जो छात्रों की जुबान पर झट से चढ़ जाए।

दसवीं कक्षा में रामधारी सिंह दिनकर की कविता पढ़नी है- परिचय। इसकी पंक्ति है- ‘मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का/चिता का धूलिकण हूं, क्षार हूं मैं’ इस कविता की पंक्तियों को दसवीं के छात्रों को समझाना बहुत ही मुश्किल है। राष्ट्रकवि  ने बहुत सी सरल  कविताएं भी लिखी हैं जिन्हें ‘परिचय’ की जगह पढ़ाई जा सकती है। उन्हीं  की एक कविता है – मेरे नगपति मेरे विशाल। इस कविता को पढ़ाना ज्यादा आसान है। महाराष्ट्र बोर्ड की कक्षा बारहवीं में पढ़ाई जाने वाली एक कविता की पंक्ति है- लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे चिन्ह निरंतर/ छोड़ रहे हैं जंग के विक्षत वक्षस्थल पर। यह प्रसिद्ध छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत की ‘निष्ठुर’ शीर्षक कविता है। बहुत अच्छी कविता है लेकिन जिन्हें यह कविता पढ़ाई जा रही है उसका ध्यान पाठ्यक्रम बनाने वाले ने नहीं रखा है। पंत जी को पढ़ाना ही है तो इस कविता को स्नातकोत्तर के पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है  और उनकी किसी आसान कविता को बारहवीं के बच्चों को पढ़ाया जाए । पंत जी की ही एक अन्य कविता है- ‘मनुज प्रेम से जहां रह सके, मानव ईश्वर। इन पंक्तियों को बारहवीं कक्षा के छात्र अच्छी तरह पढ़ सकेंगे।  पाठ्यक्रम बनाने वाले दसवीं, ग्यारहवीं या बारहवीं में ही छात्रों को हिन्दी का पूरा समृद्ध साहित्य यहां तक कि रीतिकाल और छायावाद तक को क्यों पढा देना चाहते हैं?

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दिल्ली विश्वविद्यालय के बीए और बीकॉम प्रोग्राम के छात्रों को भूषण की कविता ‘इन्द्र जिमि जम्भ पर’ और बिहारी की ‘भलौ भलौ कहि छोड़िए, खोटैं ग्रह जपु दानु’ पढ़नी है। ये पंक्तियां उन बच्चों को पढ़नी हैं जिन्होंने केवल दसवीं कक्षा  तक हिन्दी पढ़ी है। यही छात्र  जनकवि नागार्जुन की कविता ‘ बादल को घिरते देखा है’ भी पढ़ते हैं। जबकि जनकवि ने ‘अकाल और उसके बाद’ जैसी कई  कविताएं लिखी हैं जो बहुत ही सरल हैं। 

दिल्ली विश्वविद्यालय के यही छात्र गद्य भाग में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का ‘उत्साह’, बालकृष्ण भट्ट का ‘साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है’ और विद्यानिवास मिश्र का निबन्ध ‘मेरे राम का मुकुट भींग रहा है’ पढ़ते हैं। ये निबन्ध निश्चित रूप से ज्ञानवर्धक हैं लेकिन इन्हें उन बच्चों को पढ़ाना ठीक नहीं है जिन्होंने बारहवीं तक ही हिन्दी पढ़ी है। दिल्ली विश्वविद्यालय के बीए और बीकॉम प्रोग्राम के वे बच्चे जिन्होंने केवल आठवीं तक हिन्दी पढ़ी है उन्हें भी रीतिकालीन कवि घनानंद की कविता ‘अति सूधो सनेह को मारग है जहां नेकु सयानप बांक नहीं’ और बिहारी की ‘ कहत नटत रीझत मिलत खिलत लजियात’ पढ़नी है। यह कविता पढ़ाते समय बच्चे शिक्षक को बड़ी ही कातर दृष्टि से देखते हैं। 

ऐसे में हिन्दी के पाठ्यक्रमों में बड़े स्तर पर बदलाव करने की जरूरत है। हिन्दी भाषा को अगर वाकई हम आगे बढ़ते देखना चाहते हैं तो नर्सरी राइम्स से लेकर स्नातकोत्तर तक के पाठ्यक्रमों में बड़े स्तर पर बदलाव की जरूरत है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो बच्चों में अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति सम्मान का भाव या आकर्षण पैदा करना दिन-प्रतिदिन मुश्किल होता जाएगा। हिन्दी के पाठ्यक्रमों को यदि छात्रों की मानसिकता और समय के अनुरूप नहीं बदला गया तो धीरे-धीरे स्कूलों और कॉलेजों से हिन्दी विस्थापित होती चली जाएगी। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को अपनी भाषा के बारे में गंभीरता से विचार करने की जरूरत है क्योंकि लोकतंत्र का भाषा से घनिष्ठ सम्बन्ध है।

लेखक- डॉ. अरुण कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। सम्पर्क- 08178055172, 9999445502 ईमेल- arunlbc26@gmail.com