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लाचित बोड़फुकन : पूर्वोत्तर का शिवाजी- अरुण कुमार

यह आलेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 25 नवंबर 2022 को प्रकाशित हो चुका है।

24 नवम्बर को 17 वीं शताब्दी के महान योद्धा अहोम सेनापति लाचित बोड़फुकन की 400 वीं जयंती है। जिस रूप में राजस्थान में महाराणा प्रताप को, महाराष्ट्र में शिवाजी को और पंजाब में गुरु गोविंद सिंह को याद किया जाता है उसी रूप में असम के लोग लाचित बोड़फुकन को भी याद करते हैं। लाचित बोड़फुकन एक ऐसा योद्धा जिसने अपनी जान की बाजी लगाकर भी अपनी जन्मभूमि की रक्षा की। असम में जब भी वीरगाथाओं की चर्चा होती है तो सरइघाट के युद्ध की चर्चा जरूर होती है, इसी युद्ध के महानायक थे लाचित बोड़फुकन। मुगलों की विशाल सेना को सीमित संसाधनों, वीरता, देशभक्ति और युद्ध कौशल के बल पर हराने का महान कार्य लाचित ने कर दिखाया था। इसी कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें भारत की ‘आत्मनिर्भर सेना का प्रतीक’ कहा है। भारतीय इतिहास लेखन की भेदभावपूर्ण नीति के कारण इस योद्धा को इतिहास की किताबों में वह स्थान नहीं मिल पाया जिसका वह हकदार था। अब असम और केंद्र सरकार की पहल पर लाचित बोड़फुकन की वीरता, युद्ध कौशल और देशभक्ति की भावना से पूरे देश के लोगों का परिचय कराने के उद्देश्य से कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।

लचित बोरफुकन, लोकमंच पत्रिका

असमिया भाषा में ‘ल’ का अर्थ ‘रक्त’ और ‘चित’ का अर्थ ‘सना हुआ’ होता है अर्थात ‘लाचित’ शब्द का अर्थ हुआ रक्त से सना हुआ। लाचित के बारे में जनश्रुति है कि वे मोमई तामुली को छः महीने की अवस्था में एक पेड़ के नीचे रक्त से सने हुए मिले थे। मोमई ने उन्हें गोद ले लिया और रक्त में सने होने कारण बालक का नाम लाचित रखा। जन्म के समय से ही इस बालक का रक्त से ऐसा संबंध जुड़ा कि वह जीवन भर शत्रुओं के रक्त से नहाता रहा और अपनी जन्मभूमि की रक्षा करता रहा। ‘बोड़फुकन’ अहोम सेना के सेनापति को कहा जाता था।

असम या आसाम पूर्वोत्तर भारत का एक बेहद खूबसूरत, उपजाऊ और महत्वपूर्ण राज्य है। चारों ओर सुरम्य पर्वत श्रेणियों से घिरे इस राज्य पर 1225 ई से लेकर 1826 ई तक अहोम साम्राज्य का शासन था। अहोम साम्राज्य की स्थापना म्यांमार के शान प्रान्त से आए छोलुंग सुकफ़ा नामक राजा ने की थी। 1826 में यांडाबू की संधि के साथ ही अहोम साम्राज्य का शासन समाप्त हुआ और यह क्षेत्र ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन आ गया। इस साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में मानस नदी तक और पूरब में पटकई पर्वत तक फैला हुआ था। उस समय असम की बहुसंख्यक जनता हिन्दू थी इसलिए अहोम राजा ने हिन्दू धर्म के सिद्धांतों के अनुरूप ही शासन किया। अहोम राजाओं ने हिन्दू धर्म को अपनाया था और वे अपने आदिवासी देवताओं के साथ-साथ हिन्दू धर्म के देवताओं की भी पूजा करते थे। उन्होंने कवियों और विद्वानों को भूमि दान दी थी इसलिए उनके काल में असमिया संस्कृति, साहित्य और भाषा का खूब विकास हुआ। अहोम राजाओं ने संस्कृत ग्रंथों का असमिया भाषा में अनुवाद कराया था। अहोम राजाओं के शासन काल में जनता काफी खुशहाल थी।

असम के वीरों ने हमेशा अपनी जन्मभूमि पर हुए बाहरी आक्रमणों का डटकर मुकाबला किया है। बख्तियार खिलजी एक विशाल सेना लेकर दिल्ली से निकला तो नालंदा विश्वविद्यालय को जलाते हुए बंगाल को जीता फिर असम पर आक्रमण किया लेकिन असम के वीरों से हारकर वह वापस लौट आया। सन 1639 में मुगल सेनापति अल्लाह यारखां ने भी असम पर आक्रमण किया। अहोम राजाओं की आपसी फूट के कारण वह पश्चिमी असम पर कब्जा करने में सफल हुआ लेकिन कुछ ही समय बाद
राजा जयध्वज सिंह ने पश्चिमी असम से मुगलों को खदेड़ दिया। जब औरंगजेब राजा बना तो उसने अपने सेनापति मीर जुमला को विशाल सेना के साथ असम पर आक्रमण करने के लिए भेजा। 1662 में मीर जुमला ने वहां के सेनापति को घूस देकर असम को जीत लिया। 1663 ई में अहोम राजाओं और मुगलों के मध्य संधि हुई। संधि की शर्तों के अनुसार अहोम राजा मुगलों को हर वर्ष कुछ लाख रुपए और कई सौ हाथी भेजने को राजी हुए। अहोम राजा की राजकुमारी का विवाह औरंगजेब के बेटे के साथ हुआ और उसका धर्म परिवर्तन कराकर उसका नाम रहमत बानो रखा गया। अहोम साम्राज्य की जनता और राजा जयध्वज के स्वाभिमान को इस संधि से काफी धक्का लगा और वे इस संधि को तोड़कर मुगलों से बदला लेना चाहते थे।

अहोम साम्राज्य के स्वाभिमान का बदला लेने की जिम्मेदारी उसके सेनापति अर्थात लाचित बोड़फुकन को सौंपी गई। 1667 ई में लाचित बोड़फुकन ने गुवाहाटी को मुगलों से छीन लिया। औरंगजेब को जैसे ही इसका पता चला उसने आमेर के राजा राम सिंह की अगुवाई में एक बड़ी सेना अहोम पर आक्रमण करने के लिए भेजा। 1671 ई में गुवाहाटी के पास ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर सरइघाट में मुगलों और अहोम के बीच भीषण युद्ध हुआ। इतिहास में इस युद्ध को ‘सरईघाट का युद्ध’ कहते हैं। मुगलों की विशाल सेना को पराजित करने के लिए लाचित बोड़फुकन ने ठोस रणनीति बनाई। उसने युद्ध से पहले शत्रुओं की सही स्थिति का आकलन करने के लिए उनकी शिविरों में जासूस भेजा। ये जासूस तांत्रिकों के भेष में शत्रु शिविरों के आसपास जाते थे और अहोम सेना की विशालता और बहादुरी के बारे में बढ़ा चढ़ाकर बताते थे। ये जासूस यह भी बताते थे कि अहोम सैनिकों पर कामाख्या माई का आशीर्वाद है इसीलिए वे बहुत वीर हैं। यह भी खबर फैलाई गई कि अहोम सेना की तरफ से राक्षस भी युद्ध करते हैं। इन तांत्रिकों ने मुगलों की सेना को मानसिक रूप से कमजोर बनाने में मदद की।

छत्रपति शिवाजी की सेना की तरह अहोम सैनिक भी गुरिल्ला युद्ध में विशेषज्ञ थे। लाचित बोड़फुकन की युद्ध नीति भी शिवाजी की तरह ही थी यही कारण है कि लाचित को पूर्वोत्तर का शिवाजी भी कहा जाता है और यह केवल संयोग नहीं है कि औरंगजेब को दोनों से हार का सामना करना पड़ा। लाचित बोड़फुकन शत्रु सेना को अपनी सीमा में प्रवेश करने देते थे फिर आगे और पीछे से आक्रमण करते थे। अहोम सेना ने ब्रह्मपुत्र नदी पर नाव के पुल बनाने की तकनीक भी सीखी थी। इस तकनीक के कारण उनकी नौसेना काफी मजबूत हो गई थी जिसने मुगलों पर विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लाचित की युद्ध नीति
का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वहाँ की आम जनता थी। अहोम सेना में बड़ी संख्या में आम जनता को प्रशिक्षित कर शामिल किया गया था। जनता और सैनिकों के आपसी सहयोग के कारण अहोम सेना की शक्ति काफी बढ़ गई थी। युद्ध के निर्णायक दिन लाचित को ‘आखोई फुटा’ नामक बुखार था। इस बुखार में शरीर का तापमान इतना अधिक बढ़ जाता है कि चावल का दाना भी संपर्क में आने पर मुरमुरा बन जाता है। इसके बावजूद लाचित न केवल युद्ध में बहादुरी से लड़े बल्कि अपने सैनिकों को जन्मभूमि के लिए कुर्बान हो जाने के कर्तव्य को याद दिलाते रहे। वे चिल्लाते रहे ‘लाचित जियाइ थका माने गुवाहाटी एरा नाइ’ अर्थात जब तक लाचित जीवित है तब तक हमसे कोई भी गुवाहाटी नहीं छीन सकता। ये सुनकर असमिया वीरों का जोश चार गुना बढ़ गया और उन्होंने शत्रु सेना को पराजित कर दिया।

लाचित बोड़फुकन के पराक्रम और सरायघाट के युद्ध में असमिया सेना की मुगलों पर विजय का स्मरण करने के लिए असम में प्रति वर्ष 24 नवम्बर को ‘लाचित’ दिवस मनाया जाता है। लाचित बोड़फुकन से हमें भारतीय नौसेना को मजबूत करने, अंतर्देशीय जल परिवहन को पुनर्जीवित करने और नौसेना की रणनीति से जुड़े बुनियादी ढांचे के निर्माण की प्रेरणा मिलती है। राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के सरश्रेष्ठ कैडेट को लाचित बोड़फुकन स्वर्ण पदक प्रदान किया जाता है। सेना को बोड़फुकन की वीरता, रणनीति और त्याग से प्रेरित करने के उद्देश्य से यह पदक प्रदान किया जाता है।

लेखक- डॉ अरुण कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, लक्ष्मीबाई कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, संपर्क- 8178055172, 9999445502, ईमेल- lokmanchpatrika@gmail.com