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हिन्दी साहित्य का आदिकाल- अरुण कुमार

यूजीसी नेट हिन्दी के अभ्यर्थियों के लिए उपयोगी

हिन्दी साहित्य के इतिहास में लगभग 600 वर्षों अर्थात 8 वीं शताब्दी से 14 वीं शताब्दी के बीच के काल को ‘आदिकाल’ कहा जाता है। इस काल की समय सीमा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार संवत 1050 से 1375 संवत तक है। ‘आदिकाल’ के नामकरण को लेकर विद्वानों में मतभेद है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे आदिकाल कहा है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘वीरगाथा काल’, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने ‘वीरकाल’, मिश्रबन्धु ने ‘प्रारम्भिक काल’, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘बीजवपन काल’, डॉ रामकुमार वर्मा ने ‘चारण काल’  गणपति चन्द्र गुप्त ने ‘प्रारम्भिक काल’ और राहुल सांकृत्यायन ने ‘सिद्ध-सामंत’ काल नाम दिया है। 

आदिकालीन साहित्य की प्रवृत्तियां-

1. आदिकाल के साहित्य में युद्धों का सजीव वर्णन मिलता है। उस समय के कवि राजाओं के दरबारों में रहते थे और रणभूमि में भी साथ जाते थे। 

2. आदिकालीन साहित्य में ऐतिहासिकता की रक्षा नहीं की गई है। 

3. आदिकालीन साहित्य के समय में छोटे-छोटे राज्यों का अस्तित्व था और सभी केवल अपने राज्य के बारे में सोचते थे। अतः आदिकालीन साहित्य में राष्ट्रीयता की भावना का अभाव है।

4. आदिकाल का साहित्य तथ्यपरक न होकर कल्पनापरक है। इसमें पात्रों के नाम तो ऐतिहासिक मिल जाते हैं लेकिन उनके साथ भी कल्पना मिश्रित हो गयी है। 

5. आदिकालीन साहित्य में श्रृंगार व वीर रस का सबसे अधिक प्रयोग हुआ है। 

6. आदिकाल के साहित्य में डिंगल-पिंगल भाषा का प्रयोग हुआ है विशेषरुप से रासो साहित्य में। अपभ्रंश और राजस्थानी भाषा के मिले-जुले रूप को डिंगल कहते हैं और अपभ्रंश व ब्रजभाषा के मिले-जुले रूप को पिंगल कहते हैं। 

आदिकाल का साहित्य मुख्यतः निम्नलिखित रूपों में मिलता है– 

1. सिद्ध साहित्य और नाथ साहित्य

2. जैन साहित्य

3. चारण साहित्य

4. प्रकीर्णक साहित्य

5. लौकिक साहित्य

सिद्ध साहित्य और नाथ साहित्य

बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के अनुयायी सिद्ध कहलाते हैं और उनके द्वारा रचित साहित्य को सिद्ध साहित्य कहते हैं। इस साहित्य की रचना उस समय हो रही थी जब हिन्दी भाषा अपभ्रंश से हिन्दी की ओर विकसित हो रही थी। सिद्धों की संख्या 84 मानी गयी है जिनमें सरहपा (सरोजपाद या सरोजभद्र) प्रथम हैं। इनके अलावा शबरपा, लुइपा, डोम्भीपा, कन्हप्पा, कुक्कुरिपा आदि सिद्ध साहित्य के प्रमुख कवि हैं। ये कवि अपनी वाणी का प्रचार जनभाषा में करते थे। सिद्ध साहित्य की प्रमुख रचनाओं में सरहपा की दोहा कोश, शबरपा की चर्यापद, डोम्भीपा की डोम्बिगीतिका, योगचर्या, अक्षरद्विकोपदेश आदि प्रसिद्ध हैं। 

सिद्ध साहित्य के अंतर्गत अपभ्रंश के दोहों तथा चर्यापदों को लिया जाता है। सिद्धों ने अपने साहित्य में स्त्री को योगिनी, महामुद्रा एवं शक्ति के रूप में दिखाया है। इनका प्रमुख वाक्य था- जोई जोई पिंडे सोई ब्रह्मन्डे। नाद, शशि, रवि, पवन, षट्चक्र, तरुवर, बिन्दु, पंचमकार इनके प्रतीकात्मक शब्द थे। इनके साहित्य में योनि की पूजा का भी उल्लेख मिलता है। 

सिद्धों की प्रतिक्रिया में नाथ सम्प्रदाय का उदय हुआ। नाथ साधु हठयोग पर विशेष बल देते थे। वे योग मार्गी थे। वे निर्गुण निराकार ईश्वर को मानते थे। कई प्रसिद्ध सिद्ध और नाथ साधु तथाकथित निम्न जातियों से थे। नाथ सम्प्रदाय में गोरखनाथ सबसे प्रसिद्ध हुए। उनके अलावा चौरंगीनाथ, गोपीचंद, भरथरी आदि नाथ सम्प्रदाय के प्रमुख कवि हैं। गोरखनाथ की प्रमुख रचनाएं निम्नलिखित हैं- सबदी, पद, प्राण संकली, सिवयादरसन, नरवैबोध, रोमावली आदि। 

परवर्ती संत साहित्य पर सिद्धों और विशेषरूप से नाथों का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। इनके काव्य में गुरु महिमा, इन्द्रिय निग्रह, प्राण साधना, वैराग्य, कुंडलिनी जागरण, शून्य समाधि आदि का वर्णन मिलता है। इन्होंने जप-तप, शास्त्र तथा तीर्थों की जगह आत्मशुद्धि पर विशेष जोर दिया। इनके साहित्य में इड़ा, पिंगला, इंगला, सुरति, निरति, नाद, बिंदु, शून्य, पवन, निरंजन, चन्द्र आदि पारिभाषिक शब्दों का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है। सामान्यतः नाथों का समय सिद्धों और संतों के बीच 11 वीं से 13 वीं सदी के बीच माना जाता है। इन्होंने सिद्धों की अश्लील साधना से समाज को अलग कर हठयोग  के मार्ग पर चलकर ईश्वर तक पहुंचने को प्रेरित किया। 

जैन साहित्य

जैन कवियों ने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु जिस साहित्य की रचना की उसे जैन साहित्य कहते हैं। जैनों का संबंध मुख्यतः राजस्थान और गुजरात से रहा है, इसीलिए अनेक जैन कवियों की भाषा प्राचीन राजस्थानी ही है। जैन कवियों ने आचार, रास, पाश, चरित, फागु , आदि विभिन्न शैलियों में साहित्य लिखा है। जैन साहित्य का सर्वाधिक लोकप्रिय रूप ‘रास’ ग्रंथ माने जाते हैं। ‘रास’ एक प्रकार का गेय रूपक है। जैन मंदिरों में रात्रि के समय श्रावक लोग ‘रास’ का गायन करते थे। रास में मुख्यतः जैन तीर्थंकरों के जीवन चरित, वैष्णव अवतारों की कथाएँ और जैन आदर्शों को गाया जाता था। हिन्दी में रास काव्य का प्रवर्तन शालिभद्र सुरि द्वारा रचित भरतेश्वर बाहुबली रास’ से माना जाता है।  स्वयंभू प्रमुख जैन कवि माने जाते हैं। उनके द्वारा रचित ‘पउम चरिउ’ में रामकथा को आधार बनाया गया है। इसके अलावा पुष्पदंत, धनपाल आदि प्रसिद्ध जैन कवि हैं। गुजरात के प्रसिद्ध जैनाचार्य हेमचन्द्र भी लगभग इसी समय के हैं। जैन कवियों ने बाह्याचार का विरोध कर मन की पवित्रता के लिए आंतरिक साधना पर बल दिया। उन्होंने शांत रस को रसराज के रूप में अपनाया है। 

फागु काव्य– रासो परंपरा की तरह जैन कवियों ने फागु रचनाएं भी की हैं। काव्य का यह प्रकार जैन कवियों से पहले संस्कृत, प्राकृत एवं अपभ्रंश में भी नहीं मिलता है। आज भी इन लोकगीतों को फागुन के महीने में बड़े आदर के साथ गाया जाता है। जैन कवियों ने इन गीतों के माध्यम से अपने महापुरुषों के जीवनचरित का प्रचार किया। 

जैन साहित्य की प्रमुख रचनाएं- 

रचना रचनाकार

भरतेश्वर बाहुबली रास- शालिभद्र सुरि

बुद्धि रास- शालिभद्र सुरि

स्थूलिभद्र रास- जिनि धर्म सुरि

जीव दया रास – आसगु

जिनि पदम् सुरि रास- सारमूर्ति

गौतम स्वामी रास- उदयवन्त

पंच पांडव चरित रास- शालिभद्र सुरि

श्रावकाचार – देवसेन

चंदन बाला रास- आसगु

रेवंतगिरि रास- विजय सेन सुरि

नेमिनाथ रास- सुमति गणि

रासो साहित्य

आदिकाल में रासो साहित्य की मुख्यतः तीन प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं- 

1. वीरगाथात्मक- पृथ्वीराज रासो, हम्मीर रासो, परमाल रासो

2. धार्मिकता- भरतेश्वर बाहुबली रास

3. श्रृंगारिकता- संदेश रासक

इस काल के अधिकांश ग्रंथों के नाम के अंत में ‘रासो’ शब्द जुड़ा है जो ‘काव्य’ शब्द का पर्यायवाची है। ‘रासो’ शब्द की उत्पत्ति के सम्बंध में विद्वानों में मतभेद है। फ्रेंच इतिहासकार गार्सा द तासी ने इस शब्द की उत्पत्ति राजसूय यज्ञ से मानी है और आचार्य रामचंद्र शुक्ल इस शब्द की उत्पत्ति ‘रसायण’ से मानते हैं। उनका कहना है कि कुछ लोग इस शब्द का संबंध ‘रहस्य’ से जोड़ते हैं पर बीसलदेव रासो’ में काव्य के अर्थ में ‘रसायण’ शब्द बार बार आया है। अतः यही ‘रसायण’ शब्द बाद में चलकर ‘रास’ हो गया है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ‘रासक’ को एक शब्द भी मानते हैं और काव्य भेद भी। उनके अनुसार जो काव्य रासक छंद में लिखे जाते थे, वे ही हिन्दी में ‘रासो’ कहलाने लगे। 

रासो साहित्य की प्रमुख रचनाएं- 

1. खुमाण रासो- 

रासो काव्य परंपरा की प्रारंभिक रचनाओं में ‘खुमाण रासो’ का स्थान सर्वोपरि है। इसके रचनाकार दलपति विजय हैं। शिव सिंह सेंगर ने सबसे पहले अपने ग्रंथ ‘शिवसिंह सरोज’ में इसका उल्लेख किया था। पांच हजार छंदों में रचित इस ग्रन्थ में चित्तौड़ नरेश खुमण द्वितीय के युद्धों का सजीव वर्णन किया गया है। 

2. परमाल रासो

जगनिक रचित ‘परमाल रासो’ को ‘आल्ह खण्ड’ भी कहते हैं। जगनिक महोबा के राजा परमर्दिदेव के दरबारी कवि थे। इस ग्रंथ में महोबा के दो वीर पुरुषों आल्हा और ऊदल के जीवन को चित्रित किया गया है। डॉ ग्रियर्सन न माना है कि ‘परमाल रासो’ अपने समय का सबसे लोकप्रिय ग्रन्थ है। 

3. हम्मीर रासो

अपभ्रंश के ‘प्राकृत पैग़लम’ नामक एक संग्रह ग्रंथ में हम्मीर विषयक 8 छंदों को देखकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे एक स्वतंत्र ग्रन्थ मान लिया था। प्रचलित धारणा के अनुसार इस ग्रन्थ के रचयिता शारंगधर माने जाते हैं। इसमें हम्मीर देव और अल्लाउद्दीन खिलजी के बीच के युद्ध का वर्णन है। यह अभी तक एक स्वतंत्र ग्रन्थ के रूप में उपलब्ध नहीं हो पाया है। 

4. विजयपाल रासो

मिश्रबन्धुओं ने अपने ग्रंथ ‘मिश्रबन्धु विनोद’ में ‘विजयपाल रासो’ का उल्लेख किया है। इसके रचनाकार नल्हसिंह भाट माने जाते हैं। इसमें विजयपाल सिंह और बंग राजा के युद्ध का वर्णन किया गया है। इस ग्रन्थ में केवल 42 छंद हैं। 

5. बीसलदेव रासो

बीसलदेव रासो के रचयिता नरपति नाल्ह माने जाते हैं जो अजमेर के चौहान राजा बीसलदेव (विग्रहराज चतुर्थ) के समकालीन थे। इसमें अजमेर नरेश बीसलदेव और उनकी पत्नी राजा भोज की पुत्री राजमती के विवाह, कलह, विरह और मिलन की कथा है। यह ग्रंथ प्रेम के मधुर, मार्मिक और संवेदनशील रूप का अमर चित्र है। इसका प्रधान वर्ण्य विषय विप्रलम्भ श्रृंगार है। यह चार खंडों और 125 छंदों में है। 

6. पृथ्वीराज रासो

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘पृथ्वीराज रासो’ को हिन्दी का प्रथम महाकाव्य और इसके रचयिता चंदबरदाई को हिन्दी का प्रथम कवि माना है। चंदबरदाई दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान के प्रमुख सामंत, सलाहकार, मित्र और राज कवि थे। 

चारण साहित्य

चारण कवि मुख्यतः राजाओं के दरबार में रह कर अपने आश्रयदाताओं की अतिरंजित प्रशंसा करते थे। श्रृंगार और वीर इनके मुख्य रस थे। सौराष्ट्र, गुजरात और पश्चिमी राजस्थान में चारणों का तथा ब्रज क्षेत्र, दिल्ली तथा पूर्वी राजस्थान में भट्टों की प्रधानता रही है। चारणों की भाषा राजस्थानी रही है और भट्टों की ब्रज। इन भाषाओं को डिंगल और पिंगल भी कहा जाता है। इस काल की प्रमुख रचनाओं में चंदबरदाई की पृथ्वीराज रासो, दलपति की खुमाण रासो, नरपति नाल्ह की बीसलदेव रासो, जगनिक की आल्ह खण्ड आते हैं। 

प्रकीर्णक साहित्य

अमीर खुसरो और विद्यापति की रचनाओं को मुख्यतः प्रकीर्णक साहित्य के अंतर्गत माना जाता है। अमीर खुसरो खड़ी बोली में रचना करते थे। उनकी पहेलियां और मुकेरियां प्रसिद्ध हैं। विद्यापति मैथिली में कविता करते थे। उन्हें उनके मधुर पदों के कारण ‘अभिनव जयदेव’ भी कहा जाता है। विद्यापति की रचनाएं मैथिली के अलावा अवहट्ट में भी मिलती हैं। इनकी पदावली का प्रधान रस श्रृंगार है। अब्दुल रहमान की संदेश रासक’ भी इसी समय की रचना है। इस प्रेम संदेश काव्य की भाषा अपभ्रंश है। 

आदिकालीन लौकिक साहित्य

ढोला मारू रा दुहा, बीसलदेव रासो, बसंत विलास, राउलवेल, उक्ति व्यक्ति प्रकरण, वर्ण रत्नाकर, अमीर खुसरो की रचनाएं तथा विद्यापति की पदावली से आदिकालीन साहित्य के समय में प्रचलित लोक साहित्य का पता चलता है। 

आदिकालीन साहित्य का पहला कवि-

1. राहुल सांकृत्यायन ने 7 वीं शताब्दी के कवि सरहपाद को हिन्दी का पहला कवि माना है। 

2. डॉ शिवसिंह सेंगर ने 7 वीं शताब्दी के पुष्य या पुण्य को हिन्दी का प्रथम कवि माना है।

3. डॉ गणपति चंद्र गुप्त ने शालिभद्र सुरि को हिन्दी का प्रथम कवि माना है।

छंदों और अलंकारों का प्रयोग- 

आदिकालीन साहित्य छंदों के प्रयोग की दृष्टि से अत्यंत सम्पन्न है। इस काल का प्रमुख छंद दोहा है। इसके अलावा सोरठा, चौपाई, गाहा, छप्पय, अरिल्ल, ब्रोटत, तोमर, गाथा, पद्वरि, रोला, उल्लातला, धनाक्षरी सवैया, कुंडलिया, कवित्त, आल्हा, हरिगीतिका आदि छंदों का खूब प्रयोग हुआ है। पृथ्वीराज रासो में छप्पय छंद का अधिक प्रयोग हुआ है इसीलिए चंदबरदाई को ‘छप्पयों का राजा’ भी कहते हैं। पृथ्वीराज रासो को ‘छंदों का अजायबघर’ कहते हैं। इस काल के साहित्य में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, श्लेष, यमक, अनुप्रास, अतिशयोक्ति, संदेह आदि अलंकारों का सुन्दर प्रयोग हुआ है।

कथानक रूढ़ियों का प्रयोग

आदिकालीन साहित्य में कथा कहने का एक नया ढंग भी विकसित हुआ जिसे कथानक रूढ़ि कहते हैं। शुक, दूती व दैवी शक्तियों के माध्यम से इन कथानक रूढ़ियों का प्रयोग किया गया है। आदिकाल में घटनाओं को आगे बढाने के लिए कथानक रूढ़ियों का खूब प्रयोग हुआ है। जैसे- कथा कहने वाला सुग्गा, स्वप्न में प्रियदर्शन, चित्र दर्शन, कीर्ति श्रवण से अनुराग, मुनि का शाप, रूप परिवर्तन, परकाया प्रवेश, आकाशवाणी, षडऋतु, बारहमासा, हंस, कपोत से संदेश कथन आदि।

लेखक- डॉ अरुण कुमार, संपादक: लोकमंच पत्रिका, 8178055172, 9999445502, lokmanchpatrika@gmail.com