लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
मनीषा झा की तीन कविताएँ

1. परिवार

घर छोटा हो या बड़ा आपस में प्यार होना चाहिए

पैसा भले ही थोड़ा हो पर एक दूसरे की भावनाओं का  ख्याल होना चाहिए

हर दिल में एक दूसरे के लिए प्यार होना चाहिए

सबके अंदर मुहब्बत लगातार होना चाहिए

चाहिए परिवार में अमन, चैन, सुकून की ही बात हो

कभी टकराओ पूर्ण नहीं बात होनी चाहिए

कर्तव्य निभाए तभी अधिकार होना चाहिए

पतझड़ नहीं हर परिवार में खुशियों की बहार होना चाहिए

हर व्यक्ति में मानवता का संचार चाहिए

बस आपस में प्रेम भरा व्यवहार चाहिए

चाहिए भावना संवेदना का ज्वार परिवार के हर व्यक्ति के दिल में

चाहिए नैतिकता से हर किसी का लगाव

हर व्यक्ति के जीवन से दूर हो संकट

नफरत की ना हो कोई जगह ऐसा परिवार होना चाहिए।

कभी ना टूटे परिवार के लोगों में वो विश्वास वो ऐतबार चाहिए

भरी हुई रिश्तों के बीच नहीं कोईदरार चाहिए।

एक छत तले बसता पूरा परिवार चाहिए

चाहिए हमको मुहब्बत से भरपूर पूरा परिवार चाहिए

स्वर्ग से भी सुंदर हो ऐसा परिवार चाहिए।।

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2 मुस्कुराने की वजह

मुस्कुराने की वजह वो ढूंढ लेती हैं

कहीं छुपी हो जिंदगी वो ढूंढ लेती हैं।।

अपनी कथा में बेजुबान होती हैं

करती नहीं जो गुनाह फिर भी गुनेहगार होती हैं।।

स्त्री प्रेम नहीं करती पूजा करती हैं

उस पुरुष का जो उससे सम्मान देता है।।

स्त्री नफरत करती हैं उस पुरुष से

जो उसके आस्तित्व को ठेस पहुंचाता है।।

जिंदगी जीने का नजरिया अलग हैं स्त्री का

वो गैरों में भी अपनों को ढूंढ लेती है

सुबह से शाम तक जद्दोजहद में जमाना की

हंसने का बेबाक बहाना ढूंढ लेती हैं।।

हां ये स्त्री ही है जो हर मुश्किल में

परिवार को थामे रखती हैं बिखरने नहीं देती है।।

परवरदिगार ने बनाया होगा बड़े अरमानों से

खुदा के लिए स्त्री खुश रहने का बहाना ढूंढ लेती है।।

3. बहसी भेड़िया 

डरते हैं हम नन्हीं कलियां, कहीं बाहर निकलने से,

डरते हैं हम बहसी दरिंदो से अपनी आंखे खोलने से

इंसान के रूप में भेड़ियों के घूरने से हम कांप जाते

उनके गंदे इरादों को वो भाप जाते

हमारा चहकना उसे अच्छा नहीं लगता

बेजान तितलियों सी पंख वो मसल देता है

हम नन्ही चिड़िया बेखौफ हमें उड़ने दो

हमें मचलने दो हमें भी फूलों की तरह खिलने दो

हम तक जो हाथ पहुंचे वो हाथ जल जाए,

न्यायाधीश इन्हें फांसी पर लटका दो

उन भेड़ियों से कह दो अब हम अबला और कमजोर नहीं

हमें छू सकते उन बाजुओं में अब वो जोर नहीं

मनीषा झा, लोकमंच पत्रिका

कवयित्री – मनीषा झा, सिद्धार्थ नगर, उत्तर प्रदेश

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