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हसन इमाम की पुस्तक “बिहार में भूमि संघर्ष” की समीक्षा- भगवान प्रसाद सिन्हा

बिहार सबल्टर्न स्टडीज़ सीरीज़ के अंतर्गत हसन इमाम द्वारा लिखित पुस्तक “बिहार में भूमि संघर्ष” एक समकालीन दस्तावेज़ के रूप में मेरे समक्ष प्रस्तुत है। जानकी प्रकाशन पटना ने इसे प्रकाशित किया है। पुस्तक लिखने में लेखक द्वारा किया गया श्रम इसके व्यापक फ़लक़ पर बिखरे तथ्यों, आँकड़ों, चश्मदीदों की ज़ुबानी कहानी, विभिन्न मौलिक और सेकेंडरी स्रोतों के इस्तेमाल जिसमें अधिकारिक विद्वानों के उद्धरण भी शामिल हैं, जयप्रकाश नारायण समेत संघर्षों में भाग लेने वाले विभिन्न नेताओं के वक्तव्यों, सरकारी मुवक़्क़िफ़ के रेकॉर्ड्स से साबित होता है। संघर्ष की हर छोटी बड़ी कहानियों ने कई अज्ञात नायकों को ढूंढ निकाला है और  किसान मुक्ति आंदोलन के  लिए उनके त्याग, तपस्या बलिदान, आत्मबलिदान को नई पीढ़ी के सामने ला खड़ा करने के महती दायित्व का निर्वाह किया है।

हसन इमाम की पुस्तक: बिहार में भूमि संघर्ष, लोकमंच पत्रिका

पश्चिम चंपारण के बलराम यादव मास्टर से लेकर मधुबनी के संतु महतो एवं साथियों , बेगूसराय के गंगानंद राय, देव कुमार, भासो कुँवर, समेत सैकड़ों लालझंडाधारी नौजवानों , पूर्णिया के हमारे नेता कॉमरेड अजीत सरकार तथा समस्तीपुर के कॉमरेड रामनाथ महतो समेत दर्जनों साथियों की शहादतों के दास्तान बेतिया से लेकर किशनगंज और भागलपुर से लेकर रोहतास तक के किसान आंदोलन के तारीख़ के स्वर्णिम पन्ने तैयार कर रहे हैं। 

पुस्तक सात अध्यायों में बंटा है। शुरू के अध्याय प्रस्तावना में भूमि-अधिकार का विस्तृत इतिहास प्राचीन भारत से लेकर समकालीन भारत तक प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने अपनी प्रस्थापना के लिए जिस तरह और जितना भारतीय वांग्मय के साहित्यिक स्रोतों से प्रचूर सामग्रियों का इस्तेमाल किया है उतना ही और उसी अनुरूप आधुनिक व समकालीन दस्तावेज़ीय स्रोतों का भी इस्तेमाल किया है ताकि वह अपने मुवक़्क़िफ़ को अधिकारिक लेखन के रूप में प्रस्तुत करने में सक्षम हो सके। मेरी दृष्टि में लेखक इसमें बहुत हद तक सफल हुआ है। जो कुछ भी प्रस्तुत है सबका  ऑथेंटिक सबूत फुटनोट्स में दर्ज़ है। साहित्यिक के अलावे लिखित ऐतिहासिक स्रोतों का भी आवश्यकता पड़ने पर पुरजोर उपयोग किया गया है। ख़ासकर पूर्व मध्यकाल और  उत्तर मध्यकाल एवं आधुनिक काल पर पेशेवर इतिहासकारों की टिप्पणियों का समुपयुक्त विवेचना के साथ लेखक ने भूमि संबंधित समस्याओं की जबरदस्त जानकारी जुटायी है। यह आवश्यक भी था।

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इस ऐतिहासिक आईने में मौज़ूदा भूमि संघर्ष के औचित्य को समझने में जबरदस्त आधार मिलता है। इसी अध्याय से संघर्ष के सेनानियों और उसके कतिपय पर्यवेक्षकों को यह आश्चर्य नहीं होगा कि वर्गीय चेतना ही वह मूल और एकमात्र चेतना थी जिसने पिछली शताब्दी में, ख़ासकर आज़ादी मिलने की पूर्व बेला से लेकर उसके उत्तर काल तक, भूमि संघर्ष के महाबलिदानी संग्राम को जन्म दिया, पुष्पित, पल्लवित और विकसित किया जिसके फलस्वरूप अनचाहे या अनमने भाव से या राजनीतिक रूप से विवश होकर भूमिसुधार के किसानपरस्त कतिपय क़ानून बनाने पड़े। तथ्यों और आँकड़ों से इस पुस्तक में स्पष्ट कर दिया गया है कि ज़मीन का सवाल सामाजिक न्याय की मूल परिधि से जुड़ा था जिसे कम्युनिस्ट पार्टी और दूसरी वामपंथी पार्टियों ने अपने एजेंडे में मुख्य रूप से शामिल किया। सामाजिक न्याय के उस मिथक को तोड़ता है कि यह केवल ग़ैर सवर्ण तबक़ों द्वारा संचालित और सरकारी कारोबार एवं नौकरियों द्वारा ही संभव है।

ब्रिटिश काल में  लगभग सारे ज़मींदार सवर्ण जातियों से आते थे और बिहार में ख़ासतौर पर उन ज़मींदारों की ज़मीन पर रैयतों, जिनमें लगभग सभी ग़ैर सवर्ण जातीय समूह से थे, के हक़ की लड़ाई लड़ने वाले अधिकांश नेता उसी सवर्ण समुदाय से थे जिस समुदाय के ज़मींदारवर्ग के लोग थे। स्वामी सहजानन्द, कार्यानंद शर्मा, भोगींद्र झा, रामानंद तिवारी, सूरज नारायण सिंह, यदुनंदन शर्मा, किशोरी प्रसन्न सिंह, पीताम्बर सिंह, गणेश शंकर विद्यार्थी, बी के आज़ाद, चंद्रशेखर सिंह, इंद्रदीप सिंह, सूर्य नारायण सिंह, नंद किशोर शुक्ल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। अपवाद में पूर्णिया, कोशी, कटिहार, भागलपुर और कुछ दीगर इलाक़े हैं जहाँ रैयतों के तबक़े नेतृत्व उभर कर ज़मीन की लड़ाई में लाल झंडा थामकर आगे बढ़े। इस अध्याय में त्रिवेणी संघ का ज़िक्र नहीं मिला वह आश्चर्य लगा। प्रसन्न चौधरी  ने इस पर विस्तार से काम किया है। मुझे इसकी जानकारी सीपीआई माले के नेता प्रभात कुमार एवं वरिष्ठ पत्रकार निर्भय झा से मिली थी। 

बिहार में भूमि संघर्ष वाले अध्याय में बेगूसराय में लेखक के पिता शमीम अहमद, पूर्णिया-कटिहार-अररिया-किशनगंज-सुपौल-मधेपुरा-सहरसा -नौगछिया आदि में सर्वकॉमरेड नक्षत्र मालाकार, बजरंग सर्राफ़, नागेन्द्र नंदन साहा, बलराम यादव, तारिणी यादव, खगड़िया के आनंदी सिंह, बक्सर के सूरज प्रसाद, समस्तीपुर के रामदेव वर्मा, नालंदा के विजय कुमार यादव, नवादा के प्रेम प्रदीप, गया के शाह जोहैर, आदि ऐसे रहनुमा हुए जिन्होंने वर्गीय चेतना के आधार पर संग्राम में शामिल होकर संघर्ष को अर्थवत्ता प्रदान की । 1969-75 के बीच मुशहरी मुज़फ़्फ़रपुर का किसान आंदोलन जो नक्सालबाड़ी प्रवृत्ति के नेता राजकिशोर के नेतृत्व में शुरू हुआ था, उसका इस पुस्तक में उल्लेख क़ाबिलेज़िक्र है। जयप्रकाश नारायण उसके शमन में सीधे मुलविज्ज थे। कहना न होगा कि मुशहरी मुज़फ़्फ़रपुर आंदोलन दर्जनों शहादत का गवाह रहा है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया था। 

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पुस्तक में कहीं कहीं विसंगतियां भी। बेगूसराय में सबसे महत्वपूर्ण किसान आंदोलन नावकोठी किसान आंदोलन था। उसे बिहार का तेलंगाना कहा गया था। उस पर और अधिक जानकारी इकट्ठी करने की दरकार थी। बछवारा और बाजिदपुर पर जितनी जानकारी दी गई है उससे भी अधिक जानकारी पाठक के लिए, ख़ासकर नई पीढ़ी की के पाठकों के लिए ज़रूरी है। यही संघर्ष वह बुनियाद थी जिसपर “बेगूसराय के लेनिनग्राद” की बुलंद इमारत खड़ी हुई थी। यहाँ तक कि उस आंदोलन के कुछ नायकों के नाम मसलन कॉमरेड बी के आज़ाद, राजदेव ईश्वर वग़ैरह के छूट गए हैं। 

दूसरा महत्वपूर्ण आंदोलन बखरी सलौना महंत की ज़मीन पर हुआ जो बाद में नावकोठी के साथ जुड़कर बखरी का जनाधार बना और बिहार एसेम्बली में  बक़ौल “द सर्चलाइट” अख़बार “पहला लाल सितारा” कॉमरेड चंद्रशेखर सिंह के रूप में भेजा था। बखरी, फ़रक़िया, खगड़िया का किसान आंदोलन के हीरोकॉमरेड बी के आज़ाद ही थे। बेगूसराय के बाजिदपुर -दौलतपुर का भूमि संघर्ष, ख़ासकर सीपीआई के नेतृत्व से सीपीआई (एम) के नेतृत्व में शिफ़्ट करने के घटनाक्रम की वास्तविकता की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी कॉमरेड भगवान प्रसाद सिन्हा और भगीरथ प्रसाद राय से जुड़ती है। यह कड़ी तब से जुड़ी है जब 1978 में ज़मींदार के संहारक हमले के बाद स्थिति शून्य में चली गई थी और इन्हीं दोनों के प्रयास के फलीभूत कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत, राज्यसभा में पार्टी के नेता, इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया और बीबीसी की टीम के साथ अचानक बाजिदपुर गाँव में धावा बोला था और पहली बार लगभग सात दिनों बाद दुनिया और देश तक इस वीभत्स कांड की ख़बर पहुँची। नतीज़तन, मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को ख़ुद पटना से बाजिदपुर आना पड़ा और नुकसान के कुल अनुमानित आँकड़े से लगभग डेढ़ गुना राशि गाँव का फ़राह किया गया।  फ़ील्ड बुझारत के लिए गाँव में सदर एस डीओ के नेतृत्व में कैंप लगा, और मुंगेरी लाल कमीशन का गठन हुआ जिसमें बतौर सदस्य सीपीआई (एम) के तत्कालीन राज्य सचिव कॉमरेड सियावर शरण श्रीवास्तव को किसानों की तरफ़ से शामिल किया गया। 

उत्तरी भागलपुर में मणिराम गुरुजी और प्रभु नारायण सिंह कम्युनिस्ट पार्टी के दो विधायक 1957 में चुनकर आए तो वह साहू परबत्ता, सैदपुर तथा नारायणपुर के ज़मींदारों के विरुद्ध सफल किसान आंदोलन का परिणाम था। पूर्णिया प्रक्षेत्र के भूमि संघर्ष में  गुलाबी सोनार का नाम रामानंद सिंह, बजरंग सर्राफ़, अजीत सरकार ,नागेंद्र नंदन साहा आदि से आगे रहना चाहिए। 

यद्यपि साठी किसान आंदोलन में सोशलिस्ट नेता रामानंद तिवारी  ( मान्यवर शिवानंद तिवारी  उनके यशस्वी पुत्र हैं) और मधुबनी में सूरज बाबू की वाज़िब चर्चा है लेकिन दरभंगा प्रक्षेत्र के किसान आंदोलन का ज़िक्र कर्पूरी ठाकुर के बिना पूरा नहीं हो सकता है। उसी तरह नक्षत्र मालाकार  के बिना बिहार के किसान आंदोलन की कहानी अनकही रह जा सकती है। स्वामी सहजानन्द सरस्वती के बाद किसान आंदोलन का कोई दूसरा सबसे लोकप्रिय और प्रेरणादायक नायक हुआ तो वह थे कॉमरेड नक्षत्र मालाकार। कॉमरेड नक्षत्र मालाकार का नाम यूँ ही नहीं मिथक व किंबंदतियां बन गया था। पुस्तक में अंग्रेजी में दस्तावेजीय उद्धरण बहुत सारे हैं जो निहायत ही बहुत क़ीमती हैं। इन्हें साथ साथ हिंदी में तर्ज़ुमा बहुत आवश्यक था क्योंकि पुस्तक हिंदी के पाठकों के लिए लिखी गई थी। अगले संस्करण में इस कमी को दूर कर लिया जाएगा यह अपेक्षा होगी। 

पुस्तक में, इन सबके बावज़ूद, लेखक ने भूमि संघर्ष के वर्गीय चरित्र से कहीं तनिक भी अपने महरूम होने नहीं दिया। यह वास्तविक नज़रिया है। इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण है कि सामाजिक न्याय आंदोलन के नेताओं ने सत्ता पाने के बाद भूमि संघर्ष को जिस तरह ख़ारिज़ किया उस तरह से अतीत में ज़मींदारों  और सरकारी जोर ज़ुल्म से भी ख़ारिज़ नहीं हुआ था। इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि अमीर दास कमीशन और डी बंद्योपाध्याय कमीशन की रिपोर्ट, उपसंहार में  जिसका सही ज़िक्र लेखक ने भी किया है, को ठंढे बस्ते में डाल दिया ( देखें, प्रोफेसर डॉक्टर लाल नारायण शर्मा, पॉलिटिक्स एंड गुड गवर्नेंस: ए स्टडी ऑफ चीफ़ मिनिस्टर्स ऑफ बिहार, फ़्रॉम एस के सिन्हा टू नीतीश कुमार, रीगल पब्लिकेशन) 
भूमि संघर्ष पर प्रस्तुत इस वृहत शोधपरक पुस्तक में, इसीलिए, वर्गीय नेतृत्व को सही अहमियत दी गई है। ऐसा करने के पीछे न केवल वस्तुपरक तथ्य व आँकड़े की गवाही है बल्कि लेखक की अपनी वर्गीय प्रतिबद्धता भी है जो उसे विरासत में मिली है। पुस्तक में  उसने ख़ुद प्रसंगवश ज़िक्र कर विरासत को याद करते हुए सही लिखा है- “अब्बा ग़रीबों की लड़ाई लड़ रहे हैं। पता नहीं मारे गए या ज़िंदा हैं। हमलोग (ज़फ़र और हसन) भी बड़ा होकर उसी लाल झंडे वाली पार्टी में जाएंगे और अब्बा की लड़ाई को आगे बढ़ायेंगे। मैंने (लेखक ने) हाँ में सर  हिलाया….! घर से निकलते समय पिता जी की साइकिल में लाल झंडा बाँधने का काम करते हुए उस लाल झंडा से अपनापन तो पहले से ही था लेकिन उस क्षण वैचारिकी से हमदोनों भाइयों का जो भावनात्मक मोहब्बत हुई उसे मेरे कम्युनिस्ट पिता और गहरा करते चले गए… “तमाम वामपंथी पार्टी के जुझारू नेताओं व कार्यकर्ताओं तथा कथित  सामाजिक न्यायवादियों को भी इस पुस्तक के आईने में वर्तमान को झांकने की ज़रूरत महसूस करनी चाहिए। भूमि संघर्ष की बिसात पर ही संकीर्ण जातिवादी-सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की सयासत को मात दी जा सकती है और नवधनाढ्य नव सामंत तथा पुराने सामंत व बड़े पूंजीपतियों के बने गठजोड से सत्ता के विनाशकारी समीकरण से आम जनता को मोक्ष दिलाया जा सकता है।। हसन इमाम को बधाई व आशीष

लेखक भगवान प्रसाद सिन्हा एक प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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