लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
गोपाल मोहन मिश्र की तीन कविताएँ

1) आदमी

आदमी से बड़ा दुश्मन, आदमी का कौन है ?

गम बढ़ा सकता जो लेकिन, गम घटा सकता नहीं।

हड़प सकता हक जो, औरों का भी अपने वास्ते,

काट सकता सर कई, पर खुद कटा सकता नहीं।

बेवजह, बिन बात समझे, बिना जाने वास्ता,

जान ले सकता किसी की, जान दे सकता नहीं।

कर जो सकता वारदातें, हर जगह, हर किस्म की,

पर किसी को, माँगने पर प्यार दे सकता नहीं।

चाह कर भी मन के जिसकी, थाह पाना है कठिन,

हँस तो सकता है, मगर खुल कर हँसा सकता नहीं।

नीयत गंदी, नजर पैनी, चलन में जिसके दगा,

बातें ऐसी घाव जिनका, दर्द जा सकता नहीं।

सारी दुनिया में यही तो, कबड्डी का खेल है,

पसर जो पाया जहाँ पर, फिर सिमट सकता नहीं।

कैसे हो विश्वास ऐसे, नासमझ इन्सान पर,

जो पटाने में माहिर है सबको,खुद पट सकता नहीं।          

लोकमंच पत्रिका
लोकमंच पत्रिका

2) मुझे नहीं आता है

लिखता तो हूँ, पर विवाद में पड़ना मुझे नहीं आता है,

सीधी सच्ची बातें आती, गढ़ना मुझे नहीं आता है।

देखा है बहुतों को मैंने,पल-पल रंग बदलते फिर भी,

मुझे प्यार अच्छा लगता है, लड़ना मुझे नहीं आता है।

लगातार चलना आता है, अड़ना मुझे नहीं आता है,

फल पाने औरों के तरू पर,चढ़ना मुझे नहीं आता है।

देखा औरों की टांगे खींच, स्वयं बढ़ते बहुतों को,

पर धक्के दे गिरा किसी को, बढ़ना मुझे नहीं आता है।

अपने सुख हित औरों के सुख, हरना मुझे नहीं आता है,

अपना भाग्य सजाने श्रम से, डरना मुझे नहीं आता है।

देखा है देते औरों को, दोष स्वयं अपनी गल्ती को,

पर अपनीे भूलें औरों पर, गढ़ना मुझे नहीं आता है।

3) हर खुशी आज अतीत हो गई

नये जमाने की अचानक, पुराने पे जीत हो गई,

क्योंकि भटकी भावना,सद्बुद्धि के विपरीत हो गई।

शांति-सुख लुट गये घरों के, हर तरफ बेचैनियाँ हैं,

नासमझदारी समय की शायद, प्रचलित रीति हो गई।

स्वार्थ के संताप में तप, झुलस गये रिश्ते पुराने,

काम के संबंध पनपे, मन की पावन प्रीति खो गई।

भाव-सोच-विचार बदले, सबों के आचार बदले,

गहन चिंतन-मनन गये, उथले चलन से प्रीति हो गई।

सादगी सद्भावना शालीनता, गुम से हो गये हैं सब,

मौजमस्ती, मनचलेपन, नग्नता की जीत हो गई।

पुरानी संस्कृति चली मिट, मान-मर्यादायें मर्दित,

चुलबुलापन, चपलता, नई सभ्यता की रीति हो गई।

साँस है साँसत में, अब हर दिन दुखी रातें अपावन,

रो रहा हर बुढ़ापा, जब से जवानी गीत हो गई।

नई हवा जब से चली है, बढ़ रहे झोंके झकोरे,

प्यार ममता की मधुर अभिव्यक्ति, आज अतीत हो गई।

कवि – गोपाल मोहन मिश्र। कमला हेरिटेज, ब्लॉक – ‘ए’ फ्लैट नंबर – 201, बरहेता, पी.ओ. – लहेरियासराय, दरभंगा (बिहार) 846001 मोबाइल नंबर – 9631674694

Leave comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *.