लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
कहीं तुम्हें मेरी नज़र न लग जाए…

मिलन और मेघना की आज़ शादी की पांचवी सालगिरह है। घर पर शाम को एक बहुत बड़ी पार्टी का आयोजन किया है। बड़ी धूमधाम के साथ मेहमान नवाजी होने वाली है।

मिलन- “मेघना, आज़ मन करता है कि तुम्हारी इन लंबी काली-काली जुल्फों में उलझ जाऊं और लाल रंग के फूलों का यह ब्रोच लगाऊं।”

मेघना- “बहुत खूब! आज़ बड़े रोमांटिक मिज़ाज में लग रहे हैं!”

मिलन- “मैं चाहता हूं कि आज़ शाम पार्टी में तुम अपने लंबे काले बालों में लाल फूलों का ब्रोच लगाओ। बड़े प्यार से इसे बाज़ार से खरीद कर लाया हूं। यह ब्रोच मेरी ओर से तुम्हें प्यार का तोहफ़ा समझो।”

मेघना- “आप कमरे की सजावट कीजिए। समय बहुत कम है। अभी मेहमान आ जाएंगे। मैं अपने कमरे में तैयार होने के लिए जा रही हूं।”                

मिलन ने अकेले रंग-बिरंगे पताकों, गुब्बारों और फूलों से पूरे कमरे को सजाया। कमरे की सजावट में उसे पूरे  दो घंटे लग गएं।

मेघना ने अपने कमरे से आवाज़ लगाई- “सुनते हो जी! अब मैं तैयार हो गई हूं। ज़रा मेरी साड़ी में ये पीने लगा दीजिए।”                   

मिलन तुरंत मेघना के कमरे में पहुंचा और देखा कि मेघना सज-धज कर तैयार हो गई है। मेघना के कहने के मुताबिक मिलन में उसकी साड़ी में पीन लगा दी।

मेघना- “मिलन, देखो यह काले रंग की गोल्डन बॉर्डर वाली साड़ी मुझे कितनी जच रही है! यह साड़ी मेरी मां ने भेजी है। यह पेंडल सेट देखो जो मेरी दीदी ने अहमदाबाद से भेजा है। मुझे बेहद पसंद आया। ये चूड़ियां देखो जो मेरी मौसी ने भेजी है। मैं कितनी सुंदर लग रही हूं!”

मिलन- “बहुत सुंदर लग रही हो! तुम्हारी सुंदरता को चार चांद लग जाते यदि तुमने……”

मेघना- “मतलब?”

मिलन- “कुछ भी नहीं। बहुत सुंदर लग रही हो। तुम्हें देखकर ऐसा लगता है कि जैसे पूरी कायनात ज़मीन पर उतर आई हो!”

मेघना- “अरे! आप पीछे क्यों मुड़ गए?”

अपनी व्यथा को दिल में दबा कर मिलन बोला- “बस, इसलिए कि कहीं तुम्हें मेरी नज़र न लग जाए।”

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लेखक- समीर उपाध्याय ‘ललित’, मनहर पार्क- 96/एचोटिला: 363520 जिला: सुरेंद्रनगर, गुजरात भारत, मोबाइल- 9265717398 ईमेल- s.l.upadhyay1975@gmail.com

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