लोकमंच पत्रिका

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शब्दों के साथ असहनीय युद्ध के बीच, ग्रहण और त्याग के विवेक के द्वंद्वों के मध्य लिखी कविता -“मुसलमान”- अनिल अनलहातु

इधर हाल के दिनों में देवी प्रसाद मिश्र की बहुश्रुत और बहुख्यात कविता “मुसलमान” एक बार फिर चर्चा में है । जैसा कि जाहिर है, हिंदी का एक तथाकथित तबका इस कविता पर उठी हर उंगली को तोड़ने को उद्धत हो उठता है। कारण आप सुधी पाठक जानते ही हैं , बताने की जरूरत नहीं। बहरहाल इस खाकसार ने बगैर किसी वाद-विवाद में पड़े सिर्फ और सिर्फ कविता को उसके पाठ द्वारा समझने की चेष्टा की है। सबसे पहले तो यह कि देवी प्रसाद मिश्र को ‘मुसलमान’ पर ही कविता लिखने की आवश्यकता (रचनात्मक-काव्यात्मक दबाव) क्यों पड़ती है? क्योंकि, धार्मिक अल्पसंख्यकता के आधार पर तो मुसलमानों से कहीं ज्यादा अल्पसंख्यक ईसाई, बौद्ध, जैन और सिक्ख मतावलंबी हैं, फिर क्या कारण है कि वे मुसलमान पर ही कविता लिखते हैं ? और दूसरा यह कि यह कविता किसको संबोधित है ?

मेरी समझ में हिंदी पट्टी के विद्वान बुद्धिजीवियों को शुरू से लगता रहा है (और दरअसल यह उनका एक गढ़न्त है ) कि मुसलमान इस देश में सबसे अधिक अरक्षित, असुरक्षित, दलित, दमित, शोषित और निरीह प्राणी हैं और एक लेखक-कवि को जाहिरन दलित, शोषित, पीड़ित मानवता के पक्ष में खड़ा होना चाहिए तो हमारे अति उत्साही साहित्यकार बंधु अपनी चपलता, त्वरा और अति उत्साह में मुसलमानों के पक्ष में कविताएं रचने लगते हैं। लेकिन एक तरफ तो वे गंगा- जमनी तहजीब की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, और मानते हैं कि हिंदू-मुसलमान सदियों से इस देश में एक साथ परस्पर भाईचारे प्रेम और बंधुत्व के साथ रहते आ रहे हैं तो दूसरी तरफ नितांत विभाजनकारी सोच के साथ उनको एक अलग संप्रदाय, धर्म और कौम का बताने लगते हैं।

यह बड़ा विचित्र और विरोधाभास पूर्ण द्वैध है, क्योंकि जब हम एक कौम को धार्मिक पहचान के रूप में, एक समुदाय/सम्प्रदाय के रूप में चिन्हित कर रहे होते हैं, तो यकीन मानिए हम उन्हें एक पूरे देश-काल से, एक इंटीग्रेटेड समाज से काटकर अदर(Other) या “दूसरे” के रूप में प्रस्तुत कर रहे होते हैं, जैसा कि इस कविता में देवी प्रसाद मिश्र ने किया है-

‘कहते हैं वे विपत्ति की तरह आए

कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले वे व्याधि थे

ब्राह्मण कहते थे वे म्लेच्छ थे।

“वे मुसलमान थे।”

“कहते हैं ” (इट्स सेड) से कवि यह कहना चाहता है कि उनके बारे में भारतीय बहुसंख्यक जनमानस की यह अवधारणा है कि “वे विपत्ति की तरह आए, कि वे प्रदूषण की तरह फैले, कि वे व्याधि थे।” जैसा कि आप प्रिय पाठकों को विदित ही होगा कि “कहते हैं” यह पदबंध (Phrase) एक मुहावरे या कहावत की तरह इस्तेमाल होता है, जो एक वृहत्तर आम जन समुदाय की लोक आस्था, मान्यता या धारणा को निरूपित करता है। वृहत्तर जन समुदाय के बीच सदियों से चले आ रहे विश्वासों, धारणाओं और मान्यताओं को ही हम “कहते हैं” इस पदबंध के रूप में अभिव्यक्त /अभिहित करते हैं।

पाठक बंधुओ! क्या वाकई आपको लगता है कि बहुसंख्यक भारतीय जनमानस मुसलमानों को इसी रूप में देखता है? मेरा अपना अनुभव इसके विपरीत है। अधिसंख्य आम भारतीय जनमानस न तो उन्हें विपत्ति की तरह देखता है ना प्रदूषण की तरह और न ही व्याधि की तरह। यह अलग बात है कि कुछ खास लोग अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु मुसलमानों के बारे में इस तरह के दुष्प्रचार करते रहते हैं। तब प्रश्न उठता है कि कुछ स्वार्थी तत्वों की बातों या विचार को बहुसंख्यक जनता पर आरोपित कर एक समुदाय को अदर (Others) या दूसरे या बाहरी के रूप में चित्रित करते हुए विक्टिमाइजेशन कार्ड खेलना क्या सेक्टरीयन या कम्युनल सोच नहीं है ? जब कवि व्यंग्य करते हुए यह कहता है कि-

“उन्होंने

‘बड़ी जाति को उन्होंने बड़ा नाम दिया

नदी का नाम दिया ।” तो क्या यह व्यंग्य बहुसंख्यक हिंदू समाज पर नहीं है? क्या यहां कवि एक समुदाय की धार्मिक पहचान (रिलिजियस आईडेंटिटी) को मुकम्मल और सही ठहराते हुए दूसरे की आइडेंटिटी पर व्यंग नहीं कर रहा ? कवि आगे मुसलमानों के बारे में बात करते हुए कहता है कि वे

“प्रतिपक्षी के खून में घुटनों तक और अपने खून में कंधों तक

वे डूबे होते थे

उनकी मुट्ठियों में घोड़ों की लगामें

और म्यानों में सभ्यता के

नक्शे होते थे।”

न ! मृत्यु के लिए नहीं

वे मृत्यु के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे।

क्यों? क्योंकि वे मुसलमान थे।

तब प्रश्न उठता है कि प्रतिपक्षी के खून में घुटनों तक डूबे हुए और म्यानों में पूरे विश्व को जीतने के लिए सभ्यताओं के नक्शे भरे हुए वे लोग युद्ध किसके लिए कर रहे थे? कवि यहां (Selective ) मौन हो जाता है। युद्ध, मृत्यु और विध्वंस के लिए नहीं होता है तो क्या जीवन और निर्माण (सृजन) के लिए होता है? बगदाद ,बसरा, कुस्तुनतुनिया, नालंदा, दिल्ली और सोमनाथ पर मुसलमानों का आक्रमण किस निर्माण हेतु हुआ था ? कवि आगे बताता है कि

“वे फ़ारस से आए

तूरान से आए

समरकन्द, फ़रग़ना, सीस्तान से आए

तुर्किस्तान से आए

वे बहुत दूर से आए

फिर भी वे पृथ्वी के ही कुछ हिस्सों से आए

वे आए क्योंकि वे आ सकते थे।

“वे मुसलमान थे ।

गौर करें, कवि यहां लिखता है कि “वे आए ,क्योंकि वे आ सकते थे क्योंकि वे मुसलमान थे।“ यहां पर भी वह बहुसंख्यक जनमानस पर व्यंग करता प्रतीत होता है। प्रकारांतर से कवि यह कहना चाहता है कि तुम हिंदू हो, तुम तो अपने देश से बाहर विजय अभियान पर नहीं निकले और न निकल सकते थे, लेकिन वे मुसलमान थे, वे निकल सकते थे, इसलिए वे आए क्योंकि वे आ सकते थे। कवि की नियत और मंतव्य साफ है। वह मुसलमानों के पक्ष में खुलकर और स्पष्ट तौर पर खड़ा है। मुसलमानों के प्रति अपनी सहानुभूति और पक्षधरता में कवि इस कदर लीन हो जाता है कि अपने ‘व्यक्तिगत मंडल’ से ऊपर उठ जाता है। अपने स्व से ऊपर उठकर, खुद की घेराबंदी को तोड़ते हुए अन्य के मर्म में प्रवेश करना मनुष्यता का सबसे बड़ा लक्षण है।

काव्य रचना को एक सांस्कृतिक प्रक्रिया भी इसीलिए कहा गया है कि कवि अपनी शिक्षा, संस्कार और परंपरा से परिष्कृत भाव-समुदाय को “निज-विशिष्ट भूमि” से ऊपर उठाकर “सर्व-विशिष्ट” बना देता है। मुक्तिबोध अपने लेख “काव्य एक सांस्कृतिक प्रक्रिया” में कहते भी हैं कि “वह सांस्कृतिक प्रक्रिया इसलिए भी है कि लेखक जाने-अनजाने अपने अंतःकरण में संचित भावावेगों के साथ जीवन-मूल्य भी प्रकट करता है। शुक्ल जी ने ‘व्यक्तिगत मंडल’ से ऊपर उठकर ‘लोक हृदय में लीन होने’ को रसदशा कहा है। रसदशा यानी सृजन का क्षण।

इस रस दशा तक पहुंचने के लिए कवि को तीन चरणों से होकर गुजरना होता है: पहला – वैयक्तिक संबंधों से जुड़ी संवेदन स्तर की अनुभूति; दूसरा- उस अनुभूति का व्यक्तिगत मंडल से मुक्त होकर लोक हृदय में लीन होना तथा तीसरा- शब्द विधान- उस सामान्यीकृत अनुभूति को उपयुक्त शब्दावली में ढालना। पहला स्तर- व्यक्ति-संबंधों या व्यक्तिगत मंडल का स्तर, मनोवेगों का स्तर है। एक हद तक नितांत वैयक्तिक। ज्ञान और कल्पना की सहायता से कवि मनोवेगों की उस दुनिया से ऊपर उठता है और वैयक्तिक अनुभव को लोक-अनुभव से जोड़ता है ताकि वह निर्वैयक्तिक हो सके और उसकी रचना में संप्रेषणीयता का गुण आ सके। संप्रेषणीयता के लिए वैयक्तिक अनुभूति का निर्वैयक्तिक या सामान्यीकृत होना जरूरी है।

‘लोक-हृदय में लीन होना’ एक प्रकार का सामान्यीकरण ही तो है। प्रस्तुत कविता में दिक्कत यहीं आ गई । ज्ञान और कल्पना की सहायता से कवि अपने मनोवेगों की दुनिया से तो ऊपर उठता है किंतु अपने वैयक्तिक अनुभव को ‘लोक-अनुभव’ (व्यापक जनसमुदाय के अनुभव) से जोड़ नहीं पाता और इसीलिए निर्वैयक्तिक नहीं हो पाता। इसलिए मुसलमानों की बात करता हुआ निर्वैयक्तिकता का निर्वहन उससे नहीं हो पाता और इस क्रम में, दोनों ही समुदायों , बहुसंख्यक हिंदू समाज और अल्पसंख्यक मुसलमान समाज के प्रति उसके पूर्वग्रह सामने आ जाते हैं (जैसा कि कवि खुद कहता है और कविता भी इंगित करती है)। मुसलमानों के बारे में उसकी सोच, ‘वृहत्तर जनमानस’ और ‘लोक-जीवन मूल्यों’ से तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाती। कवि की यह सोच एक खास और सीमित वर्ग द्वारा अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु किए गए दुष्प्रचार से निर्मित हुई है, इसीलिए इसमें उदात्तता नहीं है, एक किस्म का एकांगीपन है।

मुसलमानों के मूल या आदि प्रदेशों की चर्चा करता हुआ कवि कहता है कि वे बहुत सुदूर प्रदेशों ईरान, तूरान, समरकन्द, फरगना, सीस्तान और तुर्किस्तान से आए। हां! यह कथन सत्य तो है किंतु अर्द्धसत्य है, या सीमित अर्थों में सत्य है या आज के संदर्भ में यह कथन असत्य ही अधिक प्रतीत होगा। ईरान, तूरान, समरकंद, फरगना,सीस्तान और तुर्किस्तान से इस देश में मुसलमान, विजेता और शासक बन कर आए। वे अलग नस्ल और रेस के थे । किंतु आज के परिप्रेक्ष्य में जिन मुसलमानों के पक्ष में हुंकारा लगाता हुआ कवि चीख रहा है और जिनकी नागरिकता पर उमड़ रहे आसन्न खतरे से आशंकित होकर कविताएं लिख रहा है वे ह मुसलमान, क्या ईरान, तूरान, समरकंद, फरगना, सीस्तान और तुर्किस्तान से आए हैं?

प्रिय पाठक गण! अपने आस-पड़ोस में गांव-घर में नजर दौड़ाइए, क्या आपको अलग वर्ण, रेस का ईरान, तूरान, समरकंद, फरगना, सीस्तान और तुर्किस्तान से आया हुआ मुसलमान दिखता है? देवी भाई! इस देश में रह रहा गरीब, मजलूम, पसमांदा किसान, कारीगर, श्रमिक और मजदूर अधिसंख्य मुसलमान कहीं बाहर किसी ईरान, तूरान, समरकंद, फरगना, सीस्तान और तुर्किस्तान से नहीं आया है, वह हमारे इसी समाज से हिंदू, आदिवासी और अन्य धर्म समुदायों से धर्मांतरित होकर मुसलमान हुआ है और जिसकी संख्या मुसलमानों की कुल आबादी के 80% से कहीं अधिक है।

देवी प्रसाद मिश्र, लोकमंच पत्रिका

तो क्या यह मान लिया जाए श्रीमान कि आपकी कविता देसी (देशी) मुसलमानों के लिए / देशी मुसलमानों के पक्ष को नहीं रखती? क्या आपकी कवि की चिंता के दायरे में वही मुसलमान आते हैं जो ईरान, तूरान, समरकंद, फरगना, सीस्तान और तुर्किस्तान से आए हैं ? तो प्रभु! उन मुसलमानों की चिंता करना छोड़ दें, क्योंकि एक तो उनमें से अधिकांश सक्षम मुसलमानों ने अपने लिए एक अलग देश बना लिया और चले गए और जो बचे हुए हैं, वह भी शासक, सुल्तान और नवाब परिवारों से आने के कारण इस देश की सत्ता से जुड़कर सुखी-संपन्न और सुरक्षित हैं। क्यों ? क्योंकि “वे फ़ारस से आए तूरान से आए समरकन्द, फ़रग़ना, सीस्तान से आए तुर्किस्तान से आए वे बहुत दूर से आए फिर भी वे पृथ्वी के ही कुछ हिस्सों से आए वे आए क्योंकि वे आ सकते थे। “वे मुसलमान थे । “हाँ ! चिंता उनकी करनी है जो बाहर के मुल्कों से नहीं आए। जो ऐतिहासिक और सामाजिक-आर्थिक दबावों में पिसते हुए अपने अस्तित्व के रक्षार्थ मुसलमान हो गए और जिनकी नागरिकता और पहचान दायरे अभी शक के दायरे में है और जो अभी भी उतना ही दीन-हीन, प्रताड़ित, शोषित, दलित और दमित हैं जितना तब थे, जब वे मुसलमान बने थे।

कहना न होगा कि अपनी पक्षधरता में कवि बहुत सेलेक्टिव है, उसकी चिंता के दायरे में बाहरी मुल्कों से इस देश पर शासन करने आए अशरफ, सवर्ण मुसलमान हैं, “नोमान खान” हैं न कि “नोमान अंसारी”। यह अशरफ प्रेम उनकी एक अन्य इसी तरह की कविता से भी प्रकट होता है। अपनी कविता “मुसलमान होने में इसलिए हिंदू होने में थोड़ी दिक्कत तो है” में कवि “नोमान खान” के लिए हिंदू समुदाय की तरफ से अपोलोजेटिक (Apologetic) होता दिख पड़ता है- “अब जिन दिन ऑरलैंडो में कइयों को उमर सादिक मतीन ने मार दिया तो दफ्तर में काम करने वाले नोमान खान अचानक क्षमा प्रार्थी दिखने लगे। कि जैसे उसमें उनकी भी कोई भूमिका हो ।“ कहना न होगा कि देवी प्रसाद मिश्र इन कविताओं में मुस्लिम समुदाय के प्रति एक अपोलोजिस्ट (Apologist) की भूमिका में खुद को रखते हैं। बहुसंख्यक हिंदू जन समुदाय की तरफ से अपोलोजेटिक (Apologetic) होते हुए वे एक दूसरे संप्रदाय ( इस्लाम के प्रति) के विश्वासों, धारणाओं की वकालत करते नजर आते हैं और अपने इस कोशिश में इन समुदायों/ संप्रदायों के खिलाफ अपने पूर्वाग्रह को छिपा नहीं पाते।

उसी कविता में आगे हिंदू संप्रदाय के खिलाफ अपने पूर्वग्रह का प्रदर्शन करते हुए हिंदू संप्रदाय को ‘कम मनुष्य’ या ‘कमतर मनुष्य’ कहते हैं –

“मैंने कहा कि वह तो हर सदी में थी मतलब कि मुसलमान होने

की दिक़्क़त और ईसाई होने की दिक़्क़त और यहूदी होने की

दिक़्क़त।

मैंने कहा कि सदियों से ज्यादा हिन्दू होना कम मनुष्य होने की

दिक़्क़त है।“

अब कवि का लोकेशन (Location) और गेज़ (Gaze) देखने की चेष्टा करें तो हम पाते हैं कि उसकी लोकेशन (स्थिति ) तो स्पष्टत: आभिजात्य, विदेशी मुल्कों से आए अशरफ या सवर्ण मुसलमानों के साथ है। गरीब, दबे-कुचले पसमांदा मुसलमान कवि की लोकेशन के बाहर हैं तथा उसकी गेज़ (नजर) बहुसंख्यक हिंदू जनमानस पर है, जिस पर लगातार पूरी कविता में व्यंग्य करता / Mocking करता, मॉकिंगली मजे लेता चलता है। लेकिन यहां गौरतलब यह भी है कि जिस बहुसंख्यक हिंदू जनमानस पर, उनकी मुसलमानों के प्रति दुर्भावनापूर्ण सोच का आरोप लगाता, वह व्यंग्य करता चलता है , दरअसल वह पूर्वाग्रहपूर्ण सोच, बहुसंख्यक हिंदू जनमानस का है ही नहीं। यह तो कवि की खुद की ही सोच है जो उसके परिवेश से उपजी है, किंतु मुसलमानों की पक्षधरता के अतिरिक्त प्रदर्शन में अतिउत्साही बालक की भांति अनर्गल और बेतुकी पूर्वग्रहपूर्ण बातों को भी बहुसंख्यक हिन्दू समाज पर लादकर उसका मजाक बनाता है। इन पंक्तियों को देखें- “वे मुसलमान थे कि या ख़ुदा उनकी शक्लेंआदमियों से मिलती थीं हूबहूहूबहू” इसमें यह व्यंग्य अंतर्निहित है कि कवि को या नैरेटर को तो मुसलमानों की शक्ल आदमियों से मिलती दिखती हैं किंतु वृहत्तर भारतीय समाज उनको मनुष्य नहीं मानता ऐसा कवि/ नैरेटर सोचता हुआ उनका उपहास उड़ाता प्रतीत होता है।

कविता में आगे कवि मुसलमान शासकों व अशरफों के भारतीय संगीत, स्थापत्य, गंगा-जमनी तहजीब, साहित्य और कला के क्षेत्र में किए गए योगदान और अवदानों को गिनाता चलता है जिस पर न सिर्फ मुसलमानों (क्या इसमें अशरफ के अलावा पसमांदा भी शामिल हैं ?) को बल्कि पूरे हिंदुस्तान को फख्र है।

“वे न होते तो लखनऊ न होता

आधा इलाहाबाद न होता

मेहराबें न होतीं, गुम्बद न होता

आदाब न होता

मीर मक़दूम मोमिन न होते

शबाना न होती

वे न होते तो

उपमहाद्वीप के संगीत को सुननेवाला

ख़ुसरो न होता

वे न होते तो पूरे देश के गुस्से से

बेचैन होनेवाला कबीर न होता

वे न होते तो भारतीय उपमहाद्वीप के दुख को

कहनेवाला ग़ालिब न होता

मुसलमान न होते तो अट्ठारह सौ सत्तावन न होता”

वह बताता है कि अगर बाहर से ये अशरफ मुसलमान शासक न आए होते तो आज लखनऊ नहीं होता, आधा (पता नहीं क्यों आधा, पूरा क्यों नहीं?) इलाहाबाद नहीं होता, स्थापत्य के क्षेत्र में मेहराबें और गुंबद नहीं होते, आदाब की तहजीब न होती, मीर, मकदूम, मोमीन और शबाना नहीं होतीं, खुसरो, ग़ालिब ना होते और तो और कबीर भी नहीं होते। तो क्या विदेशी आक्रांता शासकों के हिंदुस्तान आने और शासन करने से कबीर का होना जुड़ा है? क्या कबीर मुसलमान थे? जिस व्यक्तित्व को उत्तर और मध्य भारत का सारा हिंदू-मुस्लिम समाज किसी धर्म, जाति और कौम से ऊपर उठकर अपना मानता है, जिसकी शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर दलित-दमित वर्ग कबीर पंथ के नाम से एक अलग पंथ बना लेते हैं, उस कबीर को अशरफ/सवर्ण मुस्लिम समाज की देन और उपलब्धि घोषित करना क्या सांप्रदायिक सोच नहीं है?

और देवी भईया! आपको किसने बता दिया कि अशरफ मुसलमान शासक न होते, बहादुरशाह जफर न होते तो तो 1857 भी न होता। भाई साहब! मुसलमान नहीं भी होते हैं तब भी 1857 होता और हुआ भी था। बैरकपुर, मेरठ, शाहाबाद, झांसी, काल्पी, बिठूर, गाजीपुर होते हुए ही अठारह सौ सत्तावन विद्रोह दिल्ली तक पहुंचा था, बहादुरशाह जफर न भी होते तो भी होता। जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि कवि की चिंता के केंद्र में विदेशी नस्ल वाले तुर्क-अफगान और मुगल-पर्शियन अशरफ मुसलमान हैं न की हलालखोर, मोची, पासी, भाँट, भटियारा, पमरिया, नट, नलबंद, धोबी, साईं, रंगरेज, चीक, मिर्शीकार और दर्जी जातियां जिन्हें साधारण भाषा में कहें तो पसमांदा, वे पिछड़े (शुद्र) व दलित (अतिशूद्र) जातियां जिनके पूर्वजों ने सदियों पहले जातिगत विभेद व अत्याचार और अनाचारों से मुक्ति के लिए इस्लाम अपना लिया था। क्योंकि अगली पंक्तियों में कवि बताता है कि –“वे मुसलमान थे और हिन्दुस्तान में थेऔर उनके रिश्तेदार पाकिस्तान में थे वे सोचते थे कि काश वे एक बार पाकिस्तान जा सकते वे सोचते थे और सोचकर डरते थे इमरान ख़ान को देखकर वे ख़ुश होते थे वे ख़ुश होते थे और ख़ुश होकर डरते थे।“

अब पाठकगण खुद तय करें कि कितने हलालखोर, मोची, पासी, भाँट, भटियारा, पमरिया, नट, नलबंद, धोबी, साईं, रंगरेज, चीक, मिर्शीकार और दर्जी जातियों के रिश्तेदार पाकिस्तान चले गए या पाकिस्तान में रहते हैं और इनमें से कितने हैं जो पाकिस्तान जाने का ख्वाब देखते हैं ? पाठक खुद तय करें कि कितने हलालखोर (सर पर मैला ढोने वाले), नट, मोची, पासी, भटियारा, धोबी और दर्जियों के रिश्तेदार पाकिस्तान चले गए और इनमें से कितने हैं, जो पाकिस्तान जाने का ख्वाब देखते हैं ? और इन दलित-दमित, पिछड़े और शूद्र, पसमांदा मुसलमानों में से कितने हैं, जो 1989-90 में ( जो टीवी मध्य व संभ्रांत घरों की शोभा होते थे) टीवी पर इमरान खान को क्रिकेट खेलते देखकर खुश होते थे और दूसरी बात यह कि कवि कहता है कि –“वे मुसलमान थे और हिन्दुस्तान में थे और उनके रिश्तेदार पाकिस्तान में थे वे सोचते थे कि काश वे एक बार पाकिस्तान जा सकते वे सोचते थे और सोचकर डरते थे इमरान ख़ान को देखकर वे ख़ुश होते थे वे ख़ुश होते थे और ख़ुश होकर डरते थे”

इमरान खान को देखकर वे खुश होते थे और खुश होकर डरते थे, अब प्रश्न उठता है कि हिंदुस्तान में रहने वाले मुसलमान इमरान खान को खेलते देख कर क्यों खुश होते थे? इमरान खान से उनका लगाव किस राष्ट्रीय भावना के तहत था ? और खुश होकर डरते क्यों थे? क्या वे समझते थे कि खुश होना सही नहीं है? राष्ट्रविरोधी है? क्या एक अच्छे खिलाड़ी के रूप में हम इमरान खान को पसंद नहीं कर सकते? क्या उसके लिए भी मुसलमान होना जरूरी है ? आगे कवि एक बार फिर उस अज्ञात और अदृश्य बहुसंख्यक जनमानस पर व्यंग्य करता हुआ कहता है कि-

“वे मुसलमान थे लेकिन

दमिश्क उनका शहर नहीं था

वे मुसलमान थे

अरब का पैट्रोल उनका नहीं था

वे दज़ला का नहीं यमुना का पानी पीते थे

वे मुसलमान थे”

गोया बहुसंख्यक हिंदू समाज यही मानता है कि भारतीय मुसलमानों का अपना शहर दमिश्क है, कि अरब का पेट्रोल उन्हीं का है और कि उन्हें यमुना का नहीं दजला का पानी पीना चाहिए। यह कैसा व्यंग्य है जो यथार्थ के धरातल पर खड़ा नहीं है ? कवि देश के अखबारों पर भी तंज कसता हुआ कहता है कि

“देश के ज़्यादातर अख़बार यह कहते थे

कि मुसलमान के कारण ही कर्फ़्यू लगते हैं

कर्फ़्यू लगते थे और एक के बाद दूसरे हादसे की

ख़बरें आती थीं”

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क्या वाकई नब्बे के दशक में लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ अपनी इस दुरवस्था को प्राप्त हो चुका था, जो झूठा और पूर्वग्रहपूर्ण खबरें ही छापता था? कवि के मंतव्य के अनुसार जाहिरन इन सब घटनाओं में मुसलमानों का होलोकास्ट किया जाता था, क्योंकि “उनकी औरतें बिना दहाड़ मारे पछाड़ें खाती थीं बच्चे दीवारों से चिपके रहते थे वे मुसलमान थे वे मुसलमान थे इसलिए जंग लगे तालों की तरह वे खुलते नहीं थे” उनकी औरतें बिना दहाड़ मारे पछाड़ खाती थीं और बच्चे दीवारों से चिपके रहते थे क्योंकि वे मुसलमान थे। मुसलमानों की निरीहता, लाचारी और बेबसी का यह अद्भुत बिम्ब है, जो पाठकों की चेतना पर जबर्दस्त प्रहार करता है। लेकिन गजब का विरोधाभास है इस कविता में कि एक तरफ तो कवि उनको विजेता, शासक, बड़े-बड़े नगरों, शहरों और बड़े स्थापत्य वाली इमारतों का निर्माता बताता है तो दूसरी तरफ उनकी निरीहता और बेबसी पर सिर भी धुनता है या शायद यह भी उस बहुसंख्यक समाज पर व्यंग है कि हे बहुजनो! तुमने एक योद्धा जाति को अपने कपटाचरण से किस कदर निरीह और बेबस बना डाला है कि उनकी औरतें अपने आत्मीय-स्वजनों की मौत पर डर के मारे दहाड़ मारकर रो भी नहीं सकतीं ती और बच्चे भी चीखते-चिल्लाते नहीं बल्कि दीवारों से चिपके रहते हैं। और कवि कहता है कि “वे मुसलमान थे इसलिए जंग लगे तालों की तरह वे खुलते नहीं थे”

वे जंग लगे तालों की तरह थे जो खुलते नहीं थे, जंग लगे तालों के बिंब द्वारा कवि मुसलमानों के समाज को दकियानुस, परंपरावादी, ऑर्थोडॉक्स और फंडामेंटलिस्ट बताना चाहता है जो नए और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की (ताली) चाबी द्वारा नहीं खुलते हैं। कवि कहता है कि-

“वे अगर पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे

तो उससे कई गुना ज़्यादा बार

सिर पटकते थे

वे मुसलमान थे”

वे (मुसलमान) अपने धार्मिक विश्वासों और रूढ़ियों में इस कदर आबद्ध थे कि वे पांचों बार की नमाज पढ़ते थे और उससे भी कई गुना ज्यादा बार सर पटकते थे कि वे यहां यानी हिंदुस्तान में क्यों रह गए, जहां बहुसंख्यक हिंदुओं में उनका जीना हराम कर रखा है?इसीलिए वे अपने पूर्वज शासकों, नवाबों, सुल्तानों और बादशाहों से पूछना चाहते थे कि

“वे पूछना चाहते थे कि

इस लालकिले का हम क्या करें

वे पूछना चाहते थे कि

इस हुमायूं के मक़बरे का हम क्या करें

हम क्या करें इस मस्जिद का जिसका नाम

कुव्वत-उल-इस्लाम है

इस्लाम की ताक़त है”

अब इस लाल किले का क्या करें? हुमायूँ के मकबरे की भव्यता का क्या करें? 27 जैन और हिंदू मंदिरों को तोड़कर उन्हीं की सामग्री से बनाए गए कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद यानी इस्लाम की ताकत मस्जिद जो भारत में मुसलमानों के विजय के प्रतीक रूप में बनाई गई है उसका क्या करें ? कवि मुसलमानों की इस दुर्दशा पर आठ-आठ आंसू बहाता है। हा! हतभाग्य! जो कभी इस देश के सुल्तान और बादशाह थे, जिन्होंने लालकिले, हुमायूँ का मकबरा जैसे अद्वितीय स्थापत्य बनाएं, जिन्होंने इस देश को इस्लाम की ताकत का एहसास कराया, उन्हीं मुसलमानों की यह दुर्दशा, दुरवस्था कि “वे सोचते थे कि कहीं और चले जाएँ लेकिन नहीं जा सकते थे वे सोचते थे यहीं रह जाएँ तो नहीं रह सकते थे वे आधा जिबह बकरे की तरह तकलीफ़ के झटके महसूस करते थे”

वे सोचते थे कि कहीं और चले जाएं लेकिन जा नहीं सकते थे, वे यह भी सोचते थे कि यहीं रह जाए लेकिन नहीं रह सकते थे। उनकी इस भयानक, दर्दनाक दुरवस्था को बताने के लिए कवि एक ज़िबह किए जा रहे बकरे का बिंब गढ़ता है। वह कहता है कि इस देश में मुसलमान आधा ज़िबह किए गए बकरे (भाई! आधा और पूरा ज़िबह नहीं होता है, ज़िबह में गले को आधा या उससे कम ही काट कर तड़पते हुए मरने को छोड़ दिया जाता है, ज़िबह में पूरा गला नहीं काटते हैं) की तरह तकलीफ के झटके महसूस करते थे और इस देश में इस तरह रह रहे थे जैसे तूफान में फंसा जहाज और इसीलिए तूफ़ान में फंसे जहाज के मुसाफिरों की तरह एक दूसरे को भींचे थे-

“वे मुसलमान थे

इसलिए

तूफ़ान में फँसे जहाज़ के मुसाफ़िरों की तरह

एक दूसरे को भींचे रहते थे”

और कविता के आखिर में अंततः कवि चीख ही पड़ता है कि-

“कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि

उन्हें फेंका जाए तो

किस समुद्र में फेंका जाए

बहस यह थी

कि उन्हें धकेला जाए

तो किस पहाड़ से धकेला जाए”

“कुछ लोग” यह बहस चलाए थे। पहले बहस तो इसी बात पर होनी चाहिए कि कवि स्पष्ट करे कि “कुछ लोग” कहने से उसका ईशारा किन लोगों की तरफ है। कौन हैं वे “कुछ लोग” जो यह बहस चलाए हुए थे कि उन्हें फेंका जाए तो किस समुद्र में फेंका जाए या फिर उन्हें धकेला जाए तो किस पहाड़ से धकेला जाए? 1989 में जब यह कविता छपी है तो तय है कि कवि के मस्तिष्क में यह कविता काफी समय से चल रही होगी। मैं जानना चाहता हूं कि नब्बे के दशक में इस भारतवर्ष में वे “कुछ लोग” कौन थे जो इतने शक्ति-संपन्न और पावरफुल थे कि वे एक पूरी कौम को किसी समुद्र में फेंकना या पहाड़ से धकेलना चाहते थे?

प्रिय पाठको! कविता छापने के 30 वर्ष गुजर जाने के बाद भी किसी एक मुसलमान को आप में से किसी ने समुद्र में फेंके जाते या पहाड़ से धकेले जाते देखा है? और सबसे खतरनाक और भयावह बात जो भविष्य में सच होनेवाली थी और जिसकी भविष्यवाणी 30 वर्ष पूर्व ही कवि ने कर दी थी। वह यह कि कवि पूरे हिंदुस्तान को सावधान करते हुए कहता है कि-

“सावधान!

सिन्धु के दक्षिण में

सैंकड़ों सालों की नागरिकता के बाद

मिट्टी के ढेले नहीं थे वे’

यहां उन्होंने 1989-90 में ही सावधान किया था कि मुसलमान मिट्टी के ढेले नहीं हैं। मिट्टी के ढेले नहीं हैं, तो क्या हैं ? यह प्रश्न उठता है। उत्तर 30 वर्षों बाद कश्मीर की वादियों से मिलता है । (हिन्दी के एक कवि के कविता संग्रह का नाम ही है- “पत्थरबाज़” ) इस तरह मुसलमानों की विरुदावली गाते-गाते उनकी दुर्दशा पर आठ-आठ आंसू बहाता कवि अचानक एक तरफ तो मुसलमानों को उकसाता है कि तुम मिट्टी के ढेले नहीं ( पत्थर) हो और दूसरी तरफ बहुसंख्यक जनमानस को चेतावनी देते हुए डराता है कि वे मिट्टी के ढेले नहीं हैं। कवि की नीयत और सोच को बगैर प्रश्नांकित किए हुए तथा उसे असंदिग्ध मानते हुए भी यह कहने को विवश होना पड़ रहा है कि इस कविता द्वारा मुसलमानों के पक्ष में गढ़ा गया नरेटीव अंततः मुसलमानों के खिलाफ ही जाता है, क्योंकि यह नरेटीव बताता है कि मुसलमान विदेशी आक्रांता, आक्रमणकारी थे, जो घोड़ों के साथ सोते थे और चट्टानों पर अपने वीर्य बिखेर देते थे, कि वे फारस, तूरान और मध्य एशिया के देशों से आए थे कि वे इमरान खान को देख कर खुश होते हैं और पाकिस्तान जाने का ख्वाब उनकी आंखों में मचलता रहता है, कि वे मिट्टी के ढेले नहीं थे । मैंने बस यह किया है कि कविता की पंक्तियों की ओट में छिपे कवि की असली मंशा और मंतव्यों को सहसा सबके सामने प्रकट कर दिया है। भाषा के पास भी हंस की भांति नीर-क्षीर विवेक होता है । जरूरत होती है जरा क्लोज रीडिंग की । कवि, लेखक या रचनाकार लाख चतुराई करे, शब्दों की बाजीगरी और कला बाजियां दिखाता हुआ होशियारी बरते, भाषा ही है जो उसको उसके नग्न रूप में पाठकों के सामने प्रत्यक्ष कर देती है, आपकी काव्य भाषा ही आप ही कविता का मंतव्य और भवितव्य है।

अनिल अनलहातु, लोकमंच पत्रिका

अनिल अनलहातु प्रसिद्ध कवि, चिंतक, लेखक और आलोचक हैं। आपकी शास्त्रीय संगीत-नृत्य, पेंटिंग, बौद्ध दर्शन, गणित, पाश्चात्य-दर्शन में रुचि है।

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