लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
साक्षात्कार: गीत जीवन की अनिवार्यता है- डॉ शान्ति सुमन 

हिन्दी साहित्य में कविता और गीत विशेषत: नवगीत के सशक्त हस्ताक्षरों में बड़ी ही श्रद्धा और एहतराम से लिया जाने वाला एक नाम डॉ शान्ति सुमन जी का है, जो एक लंबे समय से अपनी अनुभूतियों, अनुभवों, विचारों और संघर्ष के हिस्सों को शब्द देने के लिये प्रयासरत हैं। डॉ शान्ति सुमन एमडीडीएम कालेज, मुजफ्फरपुर (बिहार) के हिन्दी विभागाध्यक्ष पद से सेवा निवृत्त होने के बाद इन दिनों जमशेदपुर में निवास कर रही हैं। इन्हें गीत बहुत प्रिय हैं। वे कहती हैं ” मैं मानती हूँ कि गीत जीवन की अनिवार्यता है जब तक जीवन है जीवन की रागात्मकता है, गीत की प्रासांगिकता अक्षुण्ण है। लौकिक जीवन में ऐसा कोई भी  सामाजिक कार्य नहीं है जिसमें गीत की जगह नहीं होती। यह श्रमशक्ति को संघटित और गतिशील करता है साथ ही यह श्रमशक्ति के ह्रास से उपजे तनाव और थकान को कम करने का सबसे कारगर तरीका है “।

डॉ शांति सुमन, लोकमंच पत्रिका

डॉ रेवती रमण के अनुसार डॉ सुमन जी के गीतों में जयदेव भी हैं, विधापति और शुरुआती दौर के नागार्जुन भी हैं। प्रस्तुत है डा शान्ति सुमन से उनकी रचना प्रक्रिया, सृजन के विभिन्न पहलुओं, उनकी कृतियों, उनके संघर्ष और भविष्य की योजनाओं पर एक लंबी बातचीत- राजेश कुमार सिन्हा।

राजेश कुमार सिन्हा- सबसे पहले तो आपसे यह जानना चाहूँगा कि आपके लेखन की शुरुआत कैसे हुई?

डॉ शांति सुमन- आपके इस सवाल के जबाब के मैं आपको अपने बचपन की स्मृतियों के बारे में बताना चाहूंगी जिसका संबंध मेरे लेखन से जुड़ा हुआ है। दरअसल जिस वातावरण में मैं पल रही थी उसमें कविता की अशेष सम्भावनायें भरी पड़ी थीं, आस पास दिखती गरीबी,अशिक्षा एक ओर लाल फूल तितली, पोखर में खिलते उजले, लाल कमल साथ में चलती मछलियाँ यानी इस दृश्य से रुबरु होते मेरे मन में कहीं न कहीं सृजन के बीज पनप चुके थे जो धीरे धीरे आकार लेने लगे और  मैट्रिक (उन दिनों की दसवीं की पढ़ाई) में पहुँचते-पहुँचते मैं बकायदा कवितायें और गीत लिखने लगी थी। कॉलेज में आने के बाद मैं स्थानीय और बाहर की गोष्ठियों में भाग लेने लगी और अपने गीतों के सस्वर पाठ में मुझे नाम और यश भी मिलने लगा था। उन्हीं दिनों मुझे एक बड़े काव्य समारोह के अवसर पर “भिक्षुक” सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया गया। “भिक्षुक” दरअसल वहाँ (मुजफ्फरपुर) का एक साप्ताहिक पत्र था जिसे एक अति साधारण और विपन्न सम्पादक अपने स्वाभिमान और स्वतंत्र सचेतन मानसिकता के बल पर निकालते थे। यह सम्मान मेरे आगामी सम्मान और पुरस्कार का आमुख था। एक श्रमजीवी-संघर्षधर्मी स्वतंत्र चेतना संपन्न सम्पादक की शुभचिंताओं की रौशनी लेकर मैं भविष्य के रास्ते पर आगे बढ़ती चली गई।

राजेश कुमार सिन्हा- हर रचनाकार की यह ख्वाहिश होती है कि उसका अपना संग्रह प्रकाशित हो, जाहिर है आपकी भी रही होगी। अत: इसी संदर्भ में कृपया यह बतायें कि आपके संग्रहों के प्रकाशन का सिलसिला कब शुरू हुआ?

डॉ शांति सुमन- बिलकुल सही कहा आपने कि हर रचनाकार यह ज़रुर चाहता है कि उसके अपना संग्रह प्रकाशित हो और बेशक इससे उसकी हौसला अफजाई तो होती ही है साथ ही बहुत खुशी भी होती है। मेरा पहला नवगीत संग्रह “ओ प्रतीक्षित” 1970 में इलाहाबाद से छ्पा था। उसके बाद मेरा उपन्यास “जल झुका हिरन” भी इलाहाबाद से ही छपा, “सुलगते पसीने” और “पसीने के रिश्ते” बीज प्रकाशन, पटना से छपा। पुन: “मौसम हुआ कबीर” भी इलाहाबाद से छपा। मुझे लगता है कि अब तक कुल मिला कर मेरे चौदह नव गीत और जनवादी गीत संग्रह प्रकाशित हैं। एक उपन्यास और एक आलोचना की पुस्तक भी है। मैने महाकवि जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य “कामायनी” का मैथिली में अनुवाद किया है जो साहित्य अकादमी से प्रकाशित है। इसके अलावा मैने दिल्ली से निकलने वाली पत्रिका “भारतीय साहित्य” और “कन्टेमपररी इन्डियन लिटरेचर”(अंग्रेजी) का सहसम्पादन तथा पटना से प्रकाशित होने वाली नवगीत को समर्पित अनिश्चितकालीन पत्रिका “बीज” का भी सम्पादन किया है, और थोड़े में मैं इतना ही कहना चाहती हूँ कि मेरी अथक रचना यात्रा अभी भी जारी है।

लोकमंच पत्रिका
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राजेश कुमार सिन्हा- आपकी अब तक प्रकाशित पुस्तकों में से आपको सर्वाधिक प्रिय कौन कौन सी पुस्तकें हैं? वैसे किसी साहित्यकार के लिए यह कहना कठिन होता है फिर एक अनुरोध है मेरा आपसे 

डॉ शांति सुमन- राजेश जी, यह अत्यंत कठिन और निर्वैयक्तिक होने का क्षण है कि मैंने जिन गीत संग्रहों को अपनी सांसों के रथ पर उतारा उनमें से किसी एक के सर्वाधिक प्रिय होने की बात कहूँ, हाँ अब तक मेरे चौदह नवगीत और जनवादी गीतों के संग्रह प्रकाशित हैं जिनमें पाँच नवगीत-जनवादी गीत संग्रहों के बाद ‘तप रहे कचनार’ ‘भीतर भीतर आग’, ‘पंख पंख आसमान ‘  ‘एक सूर्य रोटी पर’, ‘धूप रंगे दिन’, ‘नागकेसर हवा’, ‘लय हरापन की’, ‘लाल तहनी पर अड़हुल ‘ के साथ ‘मेघ इन्द्रनील’ नाम से एक मैथिली नवगीत-जनवादी गीतों का संग्रह भी है। मेरी दो नई कविताओं के संग्रह भी हैं- ‘समय चेतावनी नहीं देता’ और ‘सूखती नहीं वो नदी’। यह सच है कि जनवादी गीत संग्रहों में “मौसम हुआ कबीर”आज भी मुझमें उर्जा भरते हैं। मैं आपको यह बताना चाहती हूँ कि इस संग्रह के कई गीत आज भी जन संगठनों मेँ गाये जाते हैं। इतना ही नहीं खेत खलिहानों से लेकर कल कारखानों तक भी ये गीत पहुँच गये थे। अब नवगीत संग्रहों में आपको जो प्रिय लग जाये वही मुझको भी प्रिय होगा।

राजेश कुमार सिन्हा, लोकमंच पत्रिका
राजेश कुमार सिन्हा, लोकमंच पत्रिका

राजेश कुमार सिन्हा- आपने बहुत सारी कवितायें लिखी हैं/गीत/नव गीत लिखे हैं पर उनमें से किन एक दो रचनाओं को आप अपने दिल के बिलकुल करीब पाती हैं मानों उन्होनें वहाँ अपना घर बना लिया हो?

डॉ शांति सुमन- आपका सवाल फिर से बहुत कठिन है पर कोशिश करती हूँ। पहले दिल का एक ही कोना होता था तो कोई एक गीत उसमें आकर बैठ जाता था पर अब दिल के कई कोने हैं और हर कोने में कोई एक गीत और किसी कविता ने जगह बना ली है, किनको कहाँ से हटायें सबके दावे सही लगते हैं। फिर भी सवाल है तो उत्तर भी होगा। दुख रही है अब नदी की देह, बादल लौट आ! गीत मुझे कई कारणों से प्रिय था। उसमें प्रेम का उच्छ्वास था तो रोजी रोटी कमाने की खातिर परदेश गये पति से लौटने का अनुनय भी। इसमें किसान जीवन की पीड़ा भी है। जिसका गावँ घर बाढ़ के इलाके में हो चौमासे में घर छाने से लेकर घर की पूरी व्यवस्था ठीक करने की चिंता भी इस गीत में है। यह ऋतु कथा होकर भी केवल वही नहीं है। एक गीत है “माँ की परछाईँ सी लगती गोरी दुबली पतली शाम “निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के सुख दुख, ह्रास रूदन, उसके पूरे पारिवारिक यथार्थ को इसमें बनने का प्रयास है। संबंधों सुखों को भी इसमें बड़ी आत्मीयता से देखा गया है। सबसे अलग उपर यह कि यह गीत मेरे पति को बहुत पसंद था, कहीं भी काव्य मंच पर जाते हुए वे यह कहना नहीं भूलते थे कि इस गीत को ज़रुर सुनाना।घर की दुखती आमदनी के बीच भी संबंधों की खुशी मलिन नहीं होती थी। इस गीत का सकारात्मक पक्ष उन्हें बहुत अच्छा लगता था। “केसर रंग रँगा मन”, “अंतरंग बातें”, और “इन्तजारों में बुना साया” आदि नवगीत तो युवा मानसिकता में ऐसे घर बना चुके थे कि काव्य मंचों पर कभी कभी मैं अपने मन का गीत नहीं सुना पाती थी। “गमला करोटन का”, “खूशबू के आखर”, “पूरी पृथ्वी  माँ” और “एक प्यार” आदि गीत गोष्ठियों से मंचों तक इतने जमते थे कि मैं नवगीत के आकाश का एक चमकता सितारा बन गई थी। एक और गीत जो मुझसे निकल कर श्रोताओं का नवगीत बन गया था वह था “दरवाजे का आम आंवला घर का तुलसी चौरा। इसीलिये अम्मा ने अपना गावँ नहीं छोड़ा” आपको एक सच बात बता दूँ कि इस गीत के तीसरे अवतरन में मेरी माँ, मेरे पिता और मेरा घर भी शामिल है। इस गीत के सस्वर पाठ के बाद मैंने मंच से श्रोताओं की भरी आँखें देखी हैं, उन्हें आँखें पोंछ्ते देखा है क्योंकि शायद इस गीत की संवेदना सीधे लोगों के मर्म तक पहुँचती थी।

राजेश कुमार सिन्हा- मैंने भी आपको गीतों का सस्वर पाठ करते हुए सुना है, ऐसा लगता है मानो आपने संगीत का भी विधिवत प्रशिक्षण लिया हो।

डॉ शांति सुमन- जी नहीं, मैने कभी संगीत नही सीखा और मुझे सरगम का ज्ञान एकदम नहीं है बस अपनी बनी बनाई लय-धुन में अपने गीतों को स्वर देती आई हूँ। एक संस्मरण साझा करना चाहूंगी आपसे। मेरा एक गीत है “तुम मिले तो बोझ है कम, बहुत हल्की पीठ की गठरी” इसे मैं जब भी मंचों पर सस्वर गाती थी कि श्रोता तालियाँ बजाने लगते थे जिससे मुझे पाठ करने में तकलीफ़ होती थी तब मैने श्रोताओं से अनुरोध करना शुरु कर दिया कि वे मेरे पाठ के बीच ताली बिलकुल नहीं बजायें  और सही में उन्होनें मेरा मान रखा था और पाठ पूरा होने पर मंच से उतरने के बाद तक तालियों का शोर गूंजता रहता था।

राजेश कुमार सिन्हा- आप गीत से नवगीत की यात्रा की साक्षी रही हैं साथ ही अपने उस पूरे कालखण्ड को बड़े ही करीब से देखा है, कृपया इस यात्रा के बारे मे कुछ बतायें?

डॉ शांति सुमन- राजेश जी आपने बड़ा ही अच्छा सवाल पूछा है, बिलकुल मैं इस कालखण्ड की साक्षी रही हूँ। मेरे रचनाकाल के प्रारम्भिक दिनों में गीत से नवगीत की यात्रा शुरु हो गई थी। उस नई प्रवृति को मैने गीत की सशक्त परिणति के रूप में देखा। अपनी अन्तर्वस्तु और प्रभावी शिल्प की सकारात्मक सम्भावनाओं के कारण उन दिनों रचनाकार नवगीत ही लिखता था।नवगीत ने जिस तरह अपना होना प्रभावित किया था, नवगीतकार भी अपना होना प्रभावित कर रहे थे। कई-कई अवतरणों में लिखे जाने वाले गीत अब तीन अवतरणों में लिखे जाने लगे थे।अनेकोनेक बिम्ब तो पहली बार नवगीत में ही सामने आये। लोक संवेदना से भरे कथ्य की भाषा लोक मुहावरों से रंगने लगी। नवगीत में आत्मीय भावों और मानवीय विचारों का नये शिल्प में समावेश हुआ और नवगीत ने एक विधा के रूप में अपनी जगह बनाई।

डॉ शान्ति सुमन जी इसी परिप्रेक्ष्य में एक सवाल पैदा होता है कि नवगीत के साथ साथ जनवादी गीतों की परम्परा भी शुरु हुई थी क्या यह नवगीत से अलग कोई विधा थी या उसी का विस्तार?
मेरे रचना काल के मध्यान्तर में अथार्त सत्तर के दशक में नक्सलबाड़ी आन्दोलन और किसान आन्दोलन के कारण नवगीत जनगीत में बदलने लगा। अब जनवादी गीत में किसान-मजदूर और विपन्न वर्ग के जीवन यथार्थ रचना की विषयवस्तु बनने लगे। श्रमरत-संघर्षजीवी जन गीतों के केंद्र में आये। शोषक और शोषित वर्ग का वर्ग-संघर्ष सामने आया। वर्ग शत्रुओं की पहचान भी हुई। किसान के फसल उगाने और मजदूरों के कारखानों में औजार गढ़ने की तरह जनवादी गीतकारों ने अपने गीतों में क्रांति के बीज बोये। समाज और व्यवस्था को बदलने का शंखनाद किया। कदाचित अब शोषण और दमन के रवैये बदल गये हैं या सबकुछ “पॉलिश्ड” रुप मे होता है इसीलिये जनवादी गीत हिंसक और आराजक भी नहीं होते। हथौड़ा ठन ठन बजाकर शोषण को नहीं सहने वाला अब कोई जनवादी प्रवक्ता गीतकार नचिकेता नहीं होता। नक्सली क्रांति के दिन अब चले गये। सपनों और मधुमासों का खून बहाने वाला कोई नक्सली गीतकार अब नहीं होता। अनुभवों की यही जमीन-वैश्विक मनुष्यता और करुणा रचनाकार को पूर्व के रचनाकारों से भिन्न बनाती है। शिक्षा और संस्कृति की नई पहुँच के कारण बदल रहे समाज से भी यह बदलाव आया है।

राजेश कुमार सिन्हा- आज बाजारवाद हमारी जिंदगी में इस तरह शुमार हो चुका है कि जीवन का कोई भी पहलू इससे अछूता नहीं रहा है, ऐसे में क्या हमारा साहित्य भी इससे प्रभावित हुआ है? आपकी राय जानना चाहता हूँ।

डॉ शांति सुमन- आपने बहुत प्रासांगिक सवाल किया है राजेश जी। सच यही है कि आज के बदले हुए परिवेश में बाजारवाद और उपभोक्तावाद के बघनखे किसी भी काव्य विधा को खरोंचने के लिए तत्पर नजर आते हैं पर मेरा मानना है कि ऐसे माहौल में भी गीत, नवगीत और जनवादी गीत अपनी अस्मिता को बचाये रखने में सफल हैं। गीतों ने अपने पूर्व के अनुभवों से बहुत कुछ सीखा है। अपनी विधा में जो जहाँ सकारात्मक है, विचार का बिन्दु वही हो सकता है।किसी ठहरी हुई रचना, रुके हुए मूल्य बोध की अनुभूतियों और नितांत व्यक्तितता के लिए अब सोचने का समय नहीं है। आज हम जिस हिंसक, अराजक और निर्मम समाजार्थिक समय में जी रहे हैं वहाँ हमारे अन्तर्मन की नदी सूखती जा रही है।

राजेश कुमार सिन्हा- तो क्या यह मान लिया जाये कि यह बाजारवाद हमारे कवियों को भी प्रभावित कर रहा है?

डॉ शांति सुमन- मुझे लगता है कि इस बदली हुई समाजार्थिक परिस्थितियों में बदलते जन जीवन के साथ कवियों की जीवन स्थिति भी बदली है। वर्तमान विश्व राष्ट्रीयता वाले समय में जन संसार के प्रसार ने बाजारवाद को विस्तार दिया है। आज तो स्थिति यह है कि घर में ही बाजार का प्रवेश हो गया है। बाजार की संस्कृति युवाओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र हुआ करती थी और अब भी होती है। हमारे यहाँ के पढ़े लिखे लोग भी अपने यहाँ के इत्र को छोड़कर विदेशी परफ्यूम के दीवाने नजर आते हैं। रचनाकार भी इसी समाज का एक हिस्सा होता और उसकी जीवन शैली भी एक सामान्य व्यक्ति की तरह होती है तो भला वह इससे कैसे अछूता रह सकता है।

राजेश कुमार सिन्हा – सृजन के क्रम में मिलने वाले पुरस्कारों की अपनी अलग अहमियत होती है, आपको भी कई पुरस्कार मिले हैं जाहिर है इनसे हौसला-अफजाई होती हैं पर कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि “राजनीति” ने यहाँ भी अपनी जगह बना ली है। इस संबंध में आपकी राय जानना चाहता हूँ।

डॉ शांति सुमन- देखिए, सम्मान और पुरस्कार की अहमियत को इन्कार नहीं किया जा सकता है, बेशक इनसे सृजन को बल मिलता है। पर यह विषय बड़ा पेचीदा है और इसके कई पहलू हैं। हम छोटे शहरों में रहने वाले रचनाकारों के लिए दिल्ली सुलभ, सुगम्य नहीं होती। दिल्ली  के अपने तर्क, कारण और विशेषतायें होती हैं और उन तर्कों, कारणों और विशेषताओं पर सभी खरे नहीं उतरते। हम छोटे परिवेश में रहने वाले उन तर्कों, कारणों और विशेषताओं को समझ कर भी भूल जाते हैं। क्योंकि संघर्ष के जिस खुरदरे रास्ते पर चलते हुए हम समाज और देश के लिए जितनी आत्मीयता और संवेदनशीलता  से जुड़ते हैं, प्रतिदान में मेरे जैसे रचनाकार समाज और पुरस्कार की स्पर्धा में बहुत कम ही आगे आ पाते हैं। हमारे सपने में हमारा समाज, हमारे लोग होते हैं और हम उनके सपने में ही अपने सपने को शामिल कर लेते हैं। फिर भी स्थितियाँ उदास करने वाली नहीं हैं बस इतना हुआ है कि मुझसे बड़े अंतराल पर लिखना शुरू कर, मुझसे बेहतर भी नहीं लिख कर और बहुत कम लिख कर बहुत से रचनाकार आगे निकल जाते हैं। मेरी कोई लॉबी नहीं है, न कोई दल है बस एक जुनून है और उसकी बदौलत यहाँ तक का सफ़र तय किया है। मुझको इस बात का सुख है कि अपनी रचना दृष्टि की प्रतिबद्धता को बचा कर चल रही हूँ। इसमें जो भी सम्मान पुरस्कार मिले हैं, उनसे मुझको हौसला मिला है, आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली है। सच तो यह है कि रचना को जनता का अपनापन और सम्मान चाहिए, पुरस्कार के द्वारा रचना के मान  मूल्य का निर्धारण कौन करता है।

राजेश कुमार सिन्हा- आप एक वरिष्ठ रचनाकार हैं इस दृष्टिकोण से नये रचनाकारों, विशेषकर कवियों से आप क्या कहना चाहती हैं। उन्हें क्या संदेश देना चाहती हैं।

डॉ शांति सुमन- मैने कुछ दिनों पहले एक पत्रिका के लिए साक्षात्कार दिया था जिसमें मैने ऐसे ही सवाल का जबाब दिया था जिसे मैं पुन:प्रस्तुत करना चाहती हूँ।” नयी पीढ़ी के संदेश देने का काम अब स्थगित होना चाहिए। अब जो नयी पीढ़ी आ रही है वह इतनी सजग और सचेत है कि वह अपना निर्णय खुद ले रही है। उसको संदेश क्यों चाहिए जबकि उसको पता है कि समय ने उसको कितना चौकन्ना बना दिया है।इनकी सोंच में जो उर्जा और सकारात्मकता है वह मुझको अन्यत्र नजर नहीं आती। अब नये रचनाकारों का पहला गीत संग्रह, कविता संग्रह या कथा संग्रह भी इतना मँजा हुआ होता है कि लगता नहीं कि वह उसका पहला संग्रह है। इनकी रचनायें इतनी अनुभव सिद्ध होती हैं कि यह कहना पड़ता है कि समय ने इनको कितना समझदार और बड़ा बना दिया है।”

राजेश कुमार सिन्हा- और अब अंतिम सवाल – जीवन के इस मुकाम पर आप खुद को कहाँ पाती हैं? और क्या  क्या लिखने की इच्छा है? क्या कुछ और रचने को शेष रह गया है?

डॉ शांति सुमन- राजेश जी,आपने अंतिम प्रश्न  बहुत कठिन पूछ लिया है फिर भी कोशिश करती हूँ। इस एक  प्रश्न में तीन प्रश्न हैं। पहला कि आज मैं खुद को कहाँ पाती हूँ? यह कितना बड़ा असमंजस है मेरे लिए। यह तो दूसरे लोगों के कहने की बात है। समीक्षकों, पाठकों, श्रोताओं ने महीयसी महादेवी से मेरी तुलना कर दी तो क्या मैं महादेवी हो गई? यह तुलना और इस तरह मेरे बारे में सोचना मुझे थोड़ा भी ठीक नहीं लगा। एक तो उनका वह गौरान्वित, गर्वित काव्य प्रतिमान और मैं तो उनकी पासंग भर भी नहीं हूँ। दूसरा कि उनकी रचना प्रक्रिया और मेरी रचना प्रक्रिया भिन्न है। उनकी अन्तर्मुखता दीखती है जबकि मैं अपनी रचनाधर्मिता में बहुत बहिर्मुख हूँ। उनके काव्य मूल्य और मेरे काव्य मूल्य एक नहीं हैं, इस तरह देखा जाये तो अनेक अन्तर्विरोधी तत्व सामने आयेंगे। मैं लोगों की भावना समझती हूँ। एक पूरे काव्य युग को महादेवी जी की रचना प्रतीकित करती है। मेरे गीतों के प्रशंसक मुझमे वही उँचाई देखना चाहते हैं। वैसे जब रचना स्थगित होने लगती है तब “कहाँ  होने का विचार आता है। अभी रहने दीजिए तबतक एक गजलकार मित्र का शेर सुन लीजिए “लुटे हैं काफिले कितने जियादा रहे मंजिल में, इरादा है, सफ़र अपना हमेशा मुख्तसर रखना “बस अभी सफ़र में हूँ बाद में कहाँ होने की बात स्वयं जान लीजियेगा। आपका दूसरा प्रश्न-क्या क्या लिखने की इच्छा है? दरअसल मैं उन सबको लिखना चाहती हूँ  जो मेरी अनुभूतियों, अनुभवों, विचारों और संघर्ष के हिस्से हैं। अभिव्यक्ति की बेचैनी का एहसास हमेशा होता है। प्रत्येक रचनाकार अपनी रचना का, जीवन का श्रेष्ठ लिखना चाहता है और अभी वह लिखना शेष है। मैं चाहती हूँ कि समय मिले और मैं लिखूँ। और आपका तीसरा प्रश्न- अभी  तो बहुत कुछ लिखना शेष है, एक हो तो कहूँ। उन सभी की कल्पनायें, स्वप्न और बिम्ब मन में हैं, देखिए कागज पर कब उतरते हैं।

प्रस्तुति: राजेश कुमार सिन्हा, बान्द्रा (वेस्ट), मुंबई -507506345031

डॉ शान्ति सुमन जी के कुछ चर्चित नवगीत 

(१) एक सूर्य रोटी पर

यह भी हुआ भला 

कथरी ओढ़े  तालमखाने

चुनती शकुन्तला ।

कन्धे  तक  डूबी

सुजनी की देह गड़े काँटे ।

कोड़े से बरसे दिन

जमा करे किस-किस खाते

अँधियारी रतनार प्रतीक्षा

बुनती चन्द्रकला

मुड़े  हुए  नाखून

ईख-सी  गाँठदार  उँगली

टूटी बेंट  जंग से लथपथ

खुरपी  सी  पसली

बलुआही  मिट्टी  पहने

केसर  का  बाग   जला

बीड़ी  धुकती  ऊँघ  रही

पथराई  शीशम  आँखें

लहठी-सना  पसीना

मन में  

चुभती  गर्म सलाखें

एक  सूर्य  रोटी पर  औंधा

चाँद   नून-सा   गला ।

कथरी ओढ़े  तालमखाने

चुनती शकुन्तला

(२) आग बहुत है

भीतर-भीतर आग बहुत है

बाहर तो सन्नाटा है।

सड़कें सिकुड़ गई हैं भय से,

देख ख़ून की छापें।

दहशत में डूबे हैं पत्ते,

अँधकार में काँपें।

किसने है यह आग लगाई

जंगल किसने काटा है।

घर तक पहुँचानेवाले वे,

धमकाते राहों में।

जाने कब सींगा बज जाए,

तीर चुभें बाहों में।

कहने को है तेज़ रोशनी,

कालिख को ही बाँटा है।

कभी धूप ने, कभी छाँव ने,

छीनी है कोमलता।

एक कराटेन वाला गमला,

रहा सदा ही जलता ।

ख़ुशियों वाले दिन पर लगता,

लगा किसी का चाँटा है।

(३) गाँव नहीं छोड़ा

दरवाजे का आम-आँवला 

घर का तुलसी-चौरा।

इसीलिए अम्मा ने अपना

गाँव नहीं छोड़ा।           

पैबन्दों को सिलते-

मन से उदास होती ।

भैया के आने की खुशबू-

भर से खुश होती ।

भाभी ने कितना समझाया

मान नहीं तोड़ा ।   

कभी-कभी  बजते  घर में ,

घुंघरू से पोती-पोते ।

छोटे-छोटे  बँटे बताशे ,

हाथों के सुख होते।

घर की खातिर लुटा दिया सब

रखा न कुछ थोड़ा ।

गहना  बनने वाले दिन में 

खेत खरीद लिये ।

बाबूजी के कहे हुए ,

सपने संग लिए ।

सह न सकी जब खूँटे पर से

गया बैल जोड़ा ।

इसीलिए अम्मा ने अपना

गाँव नहीं छोड़ा ।

(४) एक प्यार सब कुछ

मुझमें अपनापन बोता है,

रोशनदान बाँटते ढेर उजाले।

धूपों के परदे में-

खिल-खिल उठते हैं ,

खिड़की के जाले ।

चिड़ियों का जैसे खोता है ,

झिन–झिन बजता है कोई स्वर ।

एक हँसी आँगन से उठती ,

और फैल जाती तारों पर ।

मन की सारी बात लिखी हो ,

जैसे उजली दीवारों पर ।

एक प्यार सब कुछ होता है ,

जिससे डरते हैं सारे डर।

दरवाज़े पर साँकल माँ की ,

आशीषों से भरी उँगलियाँ ।

पिता कि जैसे बाम–फूटती ,

एक स्वप्न में सौ–सौ कलियाँ।

जहाँ परायापन रोता है ,

लुक-छिप खुशी बाँटती मन भर।

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