लोकमंच पत्रिका

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मुक्ति की राह में अकेली पड़ती स्त्री- रश्मि रावत

प्रख्यात साहित्यकार अर्चना वर्मा की कहानियों पर हमारे समय की प्रसिद्ध आलोचक रश्मि रावत का यह आलेख कथादेश पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है।

पिछली पीढ़ियों की रचनात्मकता में स्त्री-व्यक्तित्व की जो यात्रा शुरू हुई, अर्चना वर्मा की कहानियों में उसका अगला चरण और विकास देखने को मिलता है। विभिन्न दिशाओं में सामाजिक गतिकी ने संबंधों और संस्थाओं को अलग-अलग तरह से प्रभावित किया। यह समझा जाने लगा, यद्यपि पूरे तौर पर नहीं, कि स्त्री-पुरुष सम्बंधों और सामाजिक-पारिवारिक संरचनाओं का उसी ढब से चलते रहना सम्भव नहीं रह गया है, जैसे वे अब तक चलती आई हैं। समाज का आधा हिस्सा, जो सदियों से एक सीमित, अधूरी जिंदगी जीने को बाध्य था, आधुनिक चेतना के विकास के साथ क्रमशः विकसित हुआ और सामाजिक समीकरण बदले। अर्चना वर्मा की कहानियों में इस विकास और बदलाव की समझ और उसका विवेकसम्मत स्वीकार जिस सूक्ष्मता के साथ आये हैं, वैसा अन्यत्र कम ही दिखता है। बदलते यथार्थ को तन-मन और चेतना की बारीक से बारीक तहों में उद्घाटित किया गया है। परंपरा के दबावों तले एक स्त्री की पूरी जिंदगी बेमानी किस्म के रिवाजों और कायदों-कवायदों में ही होम हो जाती है। साहित्य की प्रचलित कसौटियां इन्हें जिंदगी की वास्तविकताओं से दूर वायवीय, साधनसम्पन्न स्त्रियों के ‘शगल’ की श्रेणी में डालकर दरकिनार कर देती हैं।

अर्चना वर्मा, लोकमंच पत्रिका

अर्चना वर्मा की भाषा पर जटिलता का आरोप लगता रहा है। दरअसल वह जटिलता न होकर उनके पर्यवेक्षणों और विश्लेषणों का नयापन और सूक्ष्मता थी। उन्होंने घर के भीतर-बाहर की उन सच्चाइयों को कहानियों में साकार किया, जिन्हें जीवन में अनसुना कर दिया जाता है। जब असल जीवन में ही उन आवाजों के लिए संवेदना कम पड़ जाती है तो उन्हें उकेरने वाले शब्दों की समझ कहाँ से पैदा होती ? अपने भीतर झाँकने और खुद को पीड़ित की आँखों में पहचानने की जिम्मेदारी से बचने का सबसे आसान तरीका है, सवालों को ही दरकिनार कर देना या उनसे कतरा कर निकल जाना । अर्चना वर्मा की अधिकतर कहानियाँ पढ़े-लिखे मध्यवर्ग से सम्बन्ध रखती हैं । एक तरह से इन कहानियों के पाठक ही उनकी विषय-वस्तु हैं। जिन सच्चाइयों की अवहेलना और उपेक्षा कर वे अपने विशेषाधिकार कायम रखते हैं, वे सामने आकर एक टकटकी में घूरने लगें तो इससे असुविधा तो होगी ।

अनिल यादव की ‘गौसेवक’ कहानी में एक पंक्ति है कि “आदमी हो या चीजें अगर बहुत दिन तक लगातार उपेक्षित होती रहें तो अंततः एक जिद्दी किस्म का सौंदर्य पा जाती हैं। उन्हें देखने में पुरानी आँखें काम नहीं आतीं। उन्हें उनकी शर्तों में समझा जा सकता है।” अनदेखी सच्चाइयों के उद्घाटन का यही सौंदर्य उनकी कहानियों की ताकत है । उनके भावबोध को समझने के लिए नई आँखों की जरूरत है । शायद यह उम्मीद की जा सकती है कि 60-70-80 के दशक में लिखी गई इन कहानियों के लिए अब कई जोड़ी नई आँखें पैदा हो गई होंगी । रचनाकाल के शुरुआती दौर में 1969 में लिखी ‘अब और नहीं’ एक परिपक्व कहानी है । एक प्रेमी युगल के आपसी रिश्तों के ताने-बाने से आधुनिक समाज में पुरुषों की स्थिति और मानसिकता को बखूबी समझा जा सकता है । घर में उसके पारिवारिक दायित्व निभाने में खुद को होम करती पत्नी है जिसकी जिंदगी की वह एकमात्र धुरी है । बाहर एक उन्नत, संवेदनशील, पढ़ी-लिखी प्रेमिका, जिसके साथ मूसलाधार बारिश में भीगा जा सकता है, ओस में नंगे पाँवों चला जा सकता है, जुगनुओं के आलोक से दिप दिप दमकती हथेलियों को मुलायमियत से चूमा जा सकता है ।

आधुनिकता और परम्परा, दोनों पुरुष की दासियाँ हैं । वह दोनों का इस सुरक्षित अंदाज में दोहन करता है कि उसे किसी बात का दोष देना तक सम्भव नहीं रह जाता । दूसरी ओर स्त्रियाँ दोफाँक हो जाती हैं । एक का होना दूसरे के अस्तित्व में सेंध लगाता है । धोखा खाकर ही सही, इन अनुभवों से स्त्री का आत्मबोध विकसित होता है और वह लिजलिजी भावुकता से बाहर आकर संयम और समझदारी बनाए रखती है । प्रेमी यह तुष्टि पाने के लिए कि स्त्री उसके जाल में है, उसकी आँखों में दयनीय कातरता देखना चाहता है और वह न पाकर बेचैन हो जाता है । स्त्री के मन और जीवन से बेदखल होना उसे बरदाश्त नहीं होता । उसकी जिंदगी में कौन किस तरह शामिल रहे, यह फैसला वह अपने पास ही रखना चाहता है । यह सब समझ कर नायिका के भीतर ठंडा प्रतिहिंसक गुस्सा पैदा होता है, लेकिन वह उसे अंधा नहीं करता, और अधिक सतर्क और चौकन्ना बनाता है ।

अर्चना वर्मा की कहानियों की यह स्त्री पराश्रयता को पार कर आई है । उसने वे आँखें अर्जित कर ली हैं जो पहले के विभ्रमों और प्रवंचनाओं का पर्दा चाक कर आंतरिक सत्य तक पहुँच सकें । यह आत्मविश्वासी, स्व-निर्भर स्त्री पुरुषों के पारम्परिक दाँव-पेंच बखूबी समझती है और विषम से विषम स्थिति से संयत ढंग से निपट सकती है । फिर भी ये स्त्रियाँ जुझारू या युयुत्सु विद्रोही नहीं हैं । रोते हुए, छिपने की आड़ खोजते कातर पुरुष से खुद को निर्ममता से काट कर अलग कर लेने का बूता अभी उसके पास नहीं । कहानी की नायिका कहती भी है कि पुरुष अपनी दुर्बलता में कितना सुंदर हो उठता है, कितना कमनीय लगता है । अंजुलियाँ खुलते ही जुगनू की रोशनी निकल भागती है । कहानी के अंत में “टेस्ट्स सो गुड, इट्स फन टु बी थर्स्टी” विज्ञापन पर आँखें जमाए हुए नायिका अलग और मुक्त खड़ी रह जाती है । क्या यह ज़रूरी है कि स्त्री को आत्मविश्वास से भरपूर, गरिमामय जिंदगी सन्नाटे की गूँज के साथ ही मिले ? प्रेम हमेशा एक अप्राप्य स्वप्न रहे, एक असंभव आकांक्षा ? उसे कमोबेश या आधी-अधूरी मुक्ति या आज़ादी तो मिले लेकिन उदासी और एकाकीपन में लिपटी हुई, तो उसका क्या अर्थ है ? उत्तरोत्तर मुक्त होती, आत्म-बोध हासिल करती स्त्री के सम्मुख पेश अनेकानेक चुनौतियों का सूक्ष्म विश्लेषण इन कहानियों में हुआ है ।

पुरुष उसी अनुपात में आधुनिक नहीं हो पा रहा है तो स्त्री अपने समकक्ष मनमीत कहाँ से पाए ? समाज की संरचनाएँ और मानसिकता अभी आज़ादख्याल स्त्री के लिए कदाचित अनुकूल नहीं हैं । ऐसे में क्या वह अपने भीतर की दीप्ति को मंद कर किसी के साथ चलना मंजूर करे ? इस स्थिति में गृहस्थ-रस सूखने लगता है जिससे घर का हर सदस्य प्रभावित होता है । या वह अकेली जीने के लिए बाध्य होती है और कैरियर या व्यवसाय या सार्वजनिक जीवन को ही जीवन का ध्येय बना लेती है । एक मुकाम तक पहुँचकर यह सब उसे निरर्थक, नीरस लगने लगता है । पितृसत्तात्मकता एक मानसिकता है और इसका दायरा घर तक सीमित नहीं है । सार्वजनिक संस्थाओं में भी इसकी व्याप्ति है । पूँजीवाद ने पितृसत्ता से बखूबी तालमेल बना लिया है । उसकी संरचनाएँ, तौर-तरीके बदले भर हैं, ढीले नहीं पड़े । इसलिए स्त्रियों की चुनौतियाँ अब कहीं अधिक जटिल और अनेक-आयामी हैं । इस समय की अपेक्षाकृत मुक्त और समर्थ स्त्री सामंतवादी ढाँचे को समझने और उससे उबरने का बोध रखती है, लेकिन अब उसको कसने वाले शिकंजों का स्वरूप बदल चुका है । उसकी भाषा, तौर तरीके और भंगिमाएँ बहुस्तरीय हैं ।

पितृसत्ता सतह पर नजर नहीं आती इसलिए उससे लड़ने के नए टूल्स विकसित करने की जरूरत है । आधुनिकता का बाना धरे शोषक वृत्तियाँ सम्बंधों का रस सोख लेती हैं । ‘वृत्तान्त’ कहानी में पति-पत्नी-बेटे की छोटी सी गृहस्थी है, जिसमें तमाम सुविधाओं के बावजूद उनके आपसी सम्बंध निर्जीव, सूखे हुए हैं और वे खुद को और दूसरों को आहत करते रहते हैं । तीनों के नजरिए से घर के भीतर के माहौल को दिखाया गया है । पत्नी ने परम्परा द्वारा महिमामंडित मूल्यों के अतिरिक्त महत्त्व से खुद को मुक्त कर लिया है । कहती भी है वह “मातृत्व की भी शायद कोई आदत होती होगी। बार-बार के दोहराने से शरीर के साथ मन को भी पड़ जाती होगी।” स्त्री ने सार्थकता अर्जित करने के पारम्परिक मूल्यों से कमोबेश मुक्ति पायी । किंतु स्त्री के नए होने के साथ पुरुष और परिवार नए न हों तो घर में कैसी घुटन व्याप जाती है, इस स्थिति को कहानी में बड़ी सजीवता से उकेरा गया है ।

तीन लोग तीन पृथक द्वीप हैं जिनमें आपस में न कोई संवाद है न आवाजाही । पति जतिन के शब्द हैं “इन दो शब्दों से उसे घृणा है। प्यार और ईमानदारी।…छोटी-छोटी इच्छाएँ लेकिन अनंत और असम्भव। हर क्षण किसी-न-किसी अनकही उम्मीद का बोझ वह अपने मन पर महसूस करता रहता है। हर क्षण प्यार की कसौटी होती है। हर बात प्यार की परीक्षा। सविता खाना-कपड़ा-गहना नहीं माँगती। माँगती है अपने जीवित और स्वतंत्र इकाई होने की पहचान। पहचान का प्रमाण? कि दूसरा अपनी इकाई खो दे। प्यार माने हर क्षण पर दावा और हर साँस पर दखल।…आदमी चाहिए पूरा। लो पूरा आदमी सँभाल सकती हो? दम है? उसके सच? उसके झूठ? उसकी कमजोरियाँ? नहीं साहब आदमी चाहिए पूरा, मेड टू ऑर्डर। लम्बाई-चौड़ाई, रंग-रोगन, नाक-नक्श-दुरस्त।” पत्नी सविता सोचती है “जो दुख रहा है उसकी दवा तुम्हारे पास नहीं है।…ओफ, ऐसे मत देखो जतीन। ऐसे अथाह धीरज और अंतिम क्षमा से जैसे कोई किसी पागल को देखता है या मरणासन्न को। जबरदस्ती अपराधी घोषित कर देने वाली यह निर्दय क्षमा जो अपने बचाव में लड़ने की इजाजत भी नहीं देती। सिर्फ जतीन को बहुत बड़ा और समझदार और सहनशील होने का दर्प देती है।”

बेटे सुनील की आँखों से “सुबह पापा बाहर वाले कमरे में अधलेटे मिले थे और माँ का दरवाजा खुला नहीं था। लक्षण वह पहचानता था। घर पहुँचने तक वह पूरी तरह अनमना हो चुका था। इतना कि भीतर घुसने का मन ही नहीं हुआ। दरवाजे के हैंडिल से किताबों का बैग लटका कर वह दो-दो सीढ़ियाँ फलांगता हुआ छत पर चढ़ गया। तीन पतंगों की लड़ंत देखता रहा।“ अंतिम पंक्ति है “पतंग बिजली के खम्भे में अटक कर रह गई और फड़फड़ाने लगी। फटकर चिथड़ा होने तक फड़फड़ाती रहेगी।” इन पंक्तियों से साफ है कि कोई भी सुकून से साँस नहीं ले पा रहा है । आधुनिक जिंदगी के साथ मानसिकता में जो बदलाव आने चाहिए थे वे भली भाँति नहीं आए तो जिंदगी को सार्थक बनाने वाले नए मूल्य नहीं विकसित हो पाए । एक तरह का निरर्थकता बोध घेरे रहता है । दूसरे से अपेक्षाएँ बदल जाती हैं पर अपने भीतर छिपे हुए संस्कारों का एहसास नहीं है। उनसे निपटने से पहले कोई और किसी को मुक्ति का, पहचान का बोध कैसे दे सकता है?

“बूमरैंग” कहानी में भी सुनील की तरह एक बंटी है जो मम्मी-पापा के अलगाव से प्रभावित है और मोहरा बनाया जा रहा है। वह धीरे-धीरे ऐसी व्यावहारिक चालाकियाँ सीख लेता है कि काम करने के लिए मम्मी और चीजें दिलवाने के लिए पापा । कहानी उसी की दृष्टि से लिखी गई है और समस्या को प्रभावी ढंग से उद्घाटित करने में सक्षम है। “अब यहाँ कोई नहीं रहता” कहानी में एक प्रौढ़ दम्पत्ति के पारिवारिक जीवन के सूक्ष्म विवरण हैं । एक ही परिदृश्य को पति और पत्नी के कोण से दिखा कर स्थिति की गहन मनोवैज्ञानिक पड़ताल की गई है। दोनों के लिए घर और एक-दूसरे का साथ इस कदर बेगाने हैं कि सुकून के कुछ पल भी दुर्लभ हैं । घर के इस अनमने से माहौल से कहानी बनती है । घटना इतनी ही है कि ऑफिस बस छूट जाने के कारण पति को शाम की जगह सुबह ही घर वापस लौटना पड़ रहा है । घर लौटने का तनिक भी मन न होने के कारण उस पल को अधिकाधिक पीछे खिसकाना चाहता है ।

अंततः वह घड़ी आ ही जाती है जहाँ वे आमने-सामने हैं और दोनों ही इस मुठभेड़ से बेहद असहज हो जाते हैं । हर पल गोली की तरह छूटने या धसक पड़ने को इस तरह तैयार सा रहता है कि उसे छूने में भी दोनों को डर लगता है, इसलिए कतरा कर निकल जाते हैं । दोनों के बीच कोई संवाद नहीं हो पाता । सायास कोई कुछ कहता भी है तो अन्य तक पहुँच कर उसका मतलब कुछ से कुछ और हो जाता है । पति सोचता है कि क्या इतने लम्बे वैवाहिक जीवन में कभी पत्नी ने सही समय पर कुछ सही कहा है ? जब तक समस्या ऐन सामने न हो, तब तक पत्नी को समझने की जरूरत ही शायद किसी पति को नहीं पड़ती – और ऐसा होने पर भी वह सिर्फ बाहरी आचरण से ही उसे समझने की कोशिश करता है । दूसरी बात यह कि परिवार की चली आ रही व्यवस्था में सब कुछ ठीक-ठीक है, ऐसा मानकर पत्नी के व्यवहार के कारणों की तलाश की जाती है । जो चल रहा है, वही सही है, बस पत्नी ही उस सही के साथ ताल-मेल नहीं बना पा रही ।

विज्ञान की टॉपर रही मेधावी पत्नी अब दीवारों की तरह घर का हिस्सा है । अस्तित्व का, सार्थकताबोध का कोई बुनियादी प्रश्न उसके इस व्यवहार का कारण हो सकता है, यह उसके दिमाग में ही नहीं आता । पूरी जिंदगी घर को सजा-सँवरा, करीने से रखने में ही उसने निकाल दी है । अब बच्चे बड़े हो कर नौकरियों के लिए बाहर चले गए हैं। अब चीजें बिगड़तीं ही नहीं तो वह सँवारे क्या ? अब वह अपनी तरह से जीना चाहती है । हर वक्त घर पर दीवारों की तरह उपलब्ध नहीं रहना चाहती और अपने आवेगों को छूट देना चाहती है । अब उसे खुद अपनी तलब लगी है । इस तलब को पूरा करने का रास्ता खोजने के लिए उसे निजी स्पेस चाहिए, पर यह बात किसी को समझ नहीं आती । वे सोचते हैं कि जिस स्त्री के दिल में पहले पूरी दुनिया समाई थी, अब वह इतनी संकीर्ण है कि उसमें पड़ोसी की चाबी रखने के लिए भी जगह नहीं । पति के लिए यह सोच और कल्पना के परे है कि उस छुटकी सी चाबी में पत्नी का पूरा दिन कैद हो जाएगा और उसे लगी तलब की राह पाने की संभाव्यता ही खत्म हो जाएगी । “अपनी ही तलब से जिंदगी भर का डर। अब तो सब देना पावना चुक गया। अब भी नहीं तो फिर कब? सब चीजों को बिखराकर देखना कि यहाँ कोई रहता है। और फिर सँवार कर महसूस करना कि जैसे यहाँ कोई रहता नहीं हो।…..इसी तरह क्या वह अपने को विश्वास दिलाती है कि वह है। साबुत। सही सलामत। मौजूद। भीतर का रस अब वह खुद पीना चाहती है अपने आप। अकेले। किसी दूसरे के ओठों के बिना वह कैसे पिया जाएगा। इसका रास्ता खोजना है बस। खोज नहीं पा रही है।”

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पत्नी के भीतर जो बदलाव आए हैं, उनके बाद उसे देखते हुए भी पति को डर लगता है और वह कभी आँखें मूँद कर, कभी नज़रें फेर कर काम चलाते हैं । पुरुष को स्त्री रहस्यमयी इसीलिए लगती है कि वह उसे समझना ही नहीं चाहता । प्रगतिशील पुरुषों के लिए भी एक अध्ययनरत, विचारशील, अपने ही सोच में एकाग्र स्त्री कैसी असुविधा होती है, इसके हवाले यदा-कदा मिलते ही रहते हैं । जहाँ सभी सामान्यीकरण पुरुषों के हिसाब से तय होते हों, वहां निर्णायक भूमिकाएँ भी उन्हीं के पास हैं । निर्णयकारी भूमिकाओं में अभी तक स्त्रियों का हिस्सा नहीं के बराबर ही है । चंद भूमिकाएं उन स्त्रियों के हाथ आती हैं जो सत्ता के साथ पुरुषों जैसा सम्बंध बनाने में कामयाब हो जाती है । पितृसत्ता इन सक्षम स्त्रियों को शेष के प्रति भेदभाव जारी रखने में टोकन की तरह इस्तेमाल करती है । बाहर निकलने पर भी स्त्री के लिए रूप, गंध, स्पर्श का उतना वितान नहीं खुलता जितना एक पुरुष के लिए, और वह कुंठित सी होकर रह जाती है। जिंदगी टुकड़ों में मिले तो सार्थकता का एहसास कैसे हो ? हर व्यक्ति अपने भीतर एक पूरा विश्व समेटे होता है और भरे-पूरे जीवन के लिए जिंदगी के हर आयाम को जीने की दरकार होती है । मगर स्त्री के साथ अब तक यह स्थिति बदली नहीं है कि जिंदगी का एक पहलू पकड़ो तो दूसरा छूट जाता है।

‘अब और नहीं’ और ‘बेहद’ कहानियों में प्रेम में छली गई स्त्रियाँ हैं । ‘बेहद’ की नायिका इसलिए आत्महत्या करती है कि उसे गर्भवती होने के बाद पता चलता है कि उसने जिससे प्रेम विवाह किया वह पहले से विवाहित है । न वह अपने घर में यह बताने का साहस कर पाती है और न पूर्वपत्नी के अधिकार लेना चाहती है । विवाह के अवैध होने पर वह बच्चे को समाज में क्या स्थान दिलवा पाएगी ? भावनात्मक आघात को वहन करने लायक मजबूती उसमें थी पर संतानोत्पत्ति का हक हमारे समाज में सिर्फ पुरुष का साथ रहने पर ही मिलता है । इस समस्या का कोई उत्तर उसके पास नहीं है । वह यह कहकर “मैं तुझे कुछ नहीं दे सकती मेरे बच्चे, जन्म भी।” अपने जीवन का अंत कर लेती है । उसे लगता है कि ताले (खुद) को तोड़ कर उसने चाबी (दीपन) बेकार कर दी । सत्ता और ताकत के सूत्र हाथ में होने के कारण पुरुष इस स्थिति में है कि स्त्री उसके कृत्यों की मार झेलने के लिए विवश हो । पर ऐसी विवशता कि न संतान को साँसें दे सके, न अपनी साँसें ही बचा सके, हमें सोचने को विवश करता है कि हम कैसा समाज या मनुष्य रच रहे हैं ।

चाबी व्यर्थ करने के लिए ताले के विनाश के रूपक को जाने-अनजाने स्त्रियाँ कई संदर्भों में प्रयुक्त करती रहती हैं और उनके जिंदापन के अनेकानेक पहलुओं की क्षति होती रहती है । प्रतिपक्ष को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन स्त्री कभी देह को जड़ बना लेती है, कभी भावनात्मक ठंडापन अख्तियार कर, एक पाषाण सरीखी सख्ती को अपनी जीवन-शैली बनाकर आगे का विकास खुद ही अवरुद्ध कर लेती है । जकड़े हुए दरवाजे दीवार का ही हिस्सा होते हैं । इस तरह स्त्री तन-मन की दीवारों के भीतर कैद होती जाती है और प्रेम करने की, साथ ही रचनात्मकता की अपनी क्षमता को कुंद करती जाती है। जहाँ सत्ताशील लोग इस तरह की अदृश्य चाबियाँ लेकर घूम रहे हों हैं वहाँ स्त्री के लिए कदम-कदम पर जोखिम हैं । पर गिरने के डरने से चलना बंद तो नहीं किया जा सकता । अर्चना जी की कहानियों में ऐसे जिक्र बार-बार आए हैं जहाँ भीत स्त्री खुद को निष्क्रिय, निर्जीव करते हुए क्रमश: जीना ही छोड़ देती है ।

बदलते समाज में प्रेम, मातृत्व, काम या किसी सामाजिक सरोकार को जीने के लिए स्त्री को जो कीमत देनी पड़ती है, उसका तो उनकी कहानियों में सजीव चित्रण मिलता ही है पर सपने टूटने से आँखें सपने देखना न छोड़ें, यह भी उनके सरोकार का विषय है । आज की स्त्री अपनी मुक्ति का मोल चुकाने का हौसला रखती है । एक ही समय में लोग विकास के अलग-अलग चरणों पर होते हैं, इसलिए सबका सत्य एक सा नहीं हो सकता । किंतु वर्तमान में खुद को ‘एसर्ट’ करने वाली, अपनी अस्तित्वगत विशिष्टताओं को जीने और उनकी कीमत अदा करने वाली स्त्रियों की तादाद भी कम नहीं । स्त्री के काम या रचनात्मक आकांक्षाओं के साथ घर-परिवार की सही संगति के प्रश्न को कभी स्त्री के कोण से कभी पुरुष के कोण से कई कहानियों में उकेरा गया है। ‘स्थगित’ में अस्तित्व की सार्थकता के सवाल का सूक्ष्म विश्लेषण है । व्यक्ति का मनोविज्ञान होता है “आदमी की जिंदगी की मजबूरी है कि जो चीज उसे जितनी प्रिय होती है, जितनी ही ज्यादा उसके अपने- आपका अंश, उसे वह उतना ही टालता है। उसी एक का सामना करने से बचकर आदमी अपना सामना करना से कतराता रहता है। जिंदगी का सारा क्रम उसी एक को स्थगित करते जाने का एक बहाना है।……मौके-बेमौके ऐसा कोई न कोई जुमला जरूर हाथ लग जाता है जिसकी आड़ लेकर हर उपस्थित प्रश्न से वह कतरा भी लेते हैं और गैरजिम्मेदार भी नहीं ठहरते।”

परिवार की पितृसत्तात्मक संरचना व्यक्तियों का विकास बाधित करती है, लेकिन हम अपने भीतर के मनोविज्ञान, कमजोरियों से भी संचालित होते हैं । इसलिए ईमानदार आत्म-विश्लेषण का कोई विकल्प नहीं । हमारे ‘स्व’ का धागा ही हमें शेष विश्व से जोड़ता है, इसलिए सही स्व-बोध और उसका ईमानदार क्रियान्वयन व्यक्ति की खुशी के लिए आवश्यक है । इस कहानी का पुरुष पात्र जो दर्शन का प्रोफेसर है, आजीवन पत्नी और बच्चों को एहसास कराता रहता है कि वह तो दर्शन और विचारों की दुनिया में विचरने के लिए बना था मगर परिवार उसके सरोकारों के आड़े आता रहा । उसे अपनी विचार यात्राओं के लिए वांछित वक्त नहीं मिला । पारिवारिक दायित्व निभाए तो आधी-अधूरी ऊर्जा से मगर उनका एहसास दोहरा-तिहरा हो कर सदस्यों तक पहुँचा । बाद में बेटी और पत्नी की मृत्यु के बाद जब उसके पास बेशुमार समय है, तब … “कलम उठाई ही थी कि शुरू करने से पहले ही अप्रत्याशित घट गया। हुआ यह कि साक्षात्कार के जिस क्षण को पकड़ पाने की कोशिश में वे अगल-बगल, दायें-बायें फंदा फेकतें और निशाना चूकते रहे थे वह घूमकर भरपूर उनके सामने आकर खड़ा हो गया। बिना किस पूर्व-सूचना या चेतावनी के। बिल्कुल अचानक। उसकी पैनी धार ने भीतर तक चीरकर उन्हें उनका अपना आपा दिखा दिया। यह महज शुरूआत नहीं थी। यही तो अंत था। शून्य। अपना कहकर जीने-लायक उनके पास जिंदगी में बिल्कुल कुछ भी नहीं था। और दूसरों को उन्होंने खो दिया था।”

उन्हें एहसास होता है कि वे अब तक अपने आप से छुपने या खुद को अपने आपसे बचाने के लिए परिवार के लोगों को आड़ की तरह इस्तेमाल करते रहे थे । वे कोरे शब्दों के जाल में जिंदगी की सच्चाइयां पकड़ना चाहते थे । उन्हें मुगालता था कि वे बहुत उदार, आजादख्याल हैं और सबकी आजादी के कायल हैं । बच्चों को जिंदगी के निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता दी है । जबकि ‘बेहद’ कहानी की बेटी रितु की नजरों से देखें तो वह आजादख्याली नहीं, उसके लबादे में जिम्मेदारियों से कन्नी काटना था । यह पापा की उनसे छुट्टी भर थी । आधुनिक शिक्षित स्त्री के साथ बने परिवार के भीतर की स्थितियों का रेशा-रेशा इन कहानियों में उजागर होता है । जब तक हमारे परिवारों में लोकतंत्र न आए, देश-समाज में वास्तविक लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती । कहानी उन कारकों के मूल तक जाती है जो परिवार में व्यक्ति के विकास को बाधित करते हैं । आज के समय में सच्चा आत्म-विश्लेषण दुर्लभ है । स्वयं की सही पहचान से वाकिफ होने के स्वर कहानियों में जगह-जगह पर मिलते हैं। बुनियादी अस्तित्वगत सवाल निष्पक्ष और खुली दृष्टि से और संवेदनापरक ढंग से विभिन्न कोणों से उठाये गए हैं इसलिए ये कहानियां एकांगिता के दोष से मुक्त हैं । मातृत्व, प्रेम और समर्पण आदि के अतिरंजित, कृत्रिम आवरणों को झटक कर उन्हें सहजता से, अधिक मानवीय ढंग से जीने की बात की गई है।

‘शिकायत’ कहानी में एक बहू अपनी पति और सास के अनुरूप खुद को ढालते-ढालते जिंदगी का रस ही खो बैठती है । कोई रोक-टोक, कोई अन्याय उसके साथ नहीं होता । सिर्फ इतना ही है कि जवानी में ही विधवा हुई उसकी सास की स्वाद के प्रति विरक्ति और उसके संघर्ष और वंचनाओं का खूब गौरवगान किया जाता है । बहू की आकाक्षाओं, इच्छा-अनिच्छा को जरा भी स्पेस नहीं मिल पाता । मानो उसके लिए सिर्फ पत्नी की पदवी काफी हो और सारा सोच-विचार विधवा सास के इर्द-गिर्द होना चाहिए । नतीजतन उसके भीतर के उद्वेग और चाहनायें रीत जाती हैं । वह ‘उत्सर्ग’ के लिए, अपनी चाहनाओं के दमन के लिए उद्यत होती है यह सोचकर कि जब घर के माहौल के कारण त्याग करना ही है तो उसका ही श्रेय उसे मिले । भरपूर जीने की आकांक्षा समर्पण की होड़ में बदल जाती है । पितृसत्ता इसी तरह स्त्रियों को व्यर्थ की कवायदों में उलझाए रखती है । अपने पति के लिए उसके इस उद्गार के साथ कहानी का अंत होता है “और कुछ नहीं दे सकते थे तो ठीक वक्त से मर ही जाते।”

परम्परा में पुरुष ही केंद्र में होता है पर अगर वह व्यक्तित्व को संकुचित करने लगे तो उसकी अनुपस्थिति की कामना जगना भी संभव और स्वाभाविक है । बलात्कार और शारीरिक, मानसिक अत्याचार की समस्या को बेहद संवेदना से उठाने वाली लंबी कहानी ‘जोकर’ में भी पति की मृत्यु के बाद स्त्री के व्यक्तित्व में निखार और जिंदगी में खुलापन आता है, जिसके कारण वह लोगों की चर्चा का विषय बनती है। उसके साथ किसी अनजान द्वारा की गई बलात्कार की कोशिश की घटना के बाद उसका पति उसके साथ सहज नहीं रह पाता – जबकि बहन के साथ हुए अत्याचार की घटना से व्यथित होकर उसने एक संस्था खोली हुई है जो ऐसी पीड़िताओं को संरक्षण देती है ।

सार्वजनिक जीवन में स्त्री प्रश्नों से संवेदित होने वाला पुरुष भी निजी दायरे में ऐसी संकीर्ण मानसिकता रख सकता है । समस्या की कई रंगतों के अलावा पुरुष की इस दोहरी मानसिकता को भी उद्घाटित किया गया है । घर जो समाज की महत्वपूर्ण इकाई होती है, को जिंदगी के फलने-फूलने के लिए अनुकूल बनाना उनकी अनेक रचनाओं का विषय बना है लेकिन इन स्त्रियों के सरोकार घर की देहरी तक सीमित नहीं हैं । इन कहानियों की नायिकाएं खुले आकाश में उड़ने के लिए पंख उगाने वाली स्त्रियाँ हैं और कहानियां बताती हैं कि इसके लिए उन्हें क्या कुछ करना, क्या कुछ खोना पड़ेगा – मगर यह ध्यान रखते हुए कि संघर्षों की रगड़ से उड़ने का हौसला न खो जाए । अगर गिरने के डर से जीना छोड़ देने पर कुछ मिलता भी है तो वह अपनी बड़ी कीमत वसूल करता है। अस्तित्व के बुनियादी प्रश्न स्त्री-पुरुष दोनों के दृष्टिकोण से उठाए गए हैं । सत्ता के साथ व्यक्ति के स्वस्थ सम्बंधों की प्रस्तावना इन कहानियों में मिलती है । सूक्ष्म विश्लेषण के लिए एकदम अनुकूल सक्षम और सुथरी भाषा इन कहानियों की ताकत है।

रश्मि रावत, लोकमंच पत्रिका

रश्मि रावत हमारे समय की प्रसिद्ध टिप्पणीकार और आलोचक हैं। वर्तमान में आप दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक हैं।

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