लोकमंच पत्रिका

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माकूल सवाल खड़े करता संतोष पटेल का काव्य संग्रह ‘नो क्लीन चिट’- ममता

पुस्तक समीक्षा- ‘नो क्लीन चिट’ , लेखक- डॉ. संतोष पटेल, प्रकाशक- कलमकार पब्लिशर्स प्रा.लि. नई दिल्ली – 110078, प्रथम संस्करण – 2021

    

कवि, आलोचक , गीतकार और अनुवादक के रूप में साहित्यिक जगत में अपनी लगातार उपस्थिति दर्ज करते हिंदी और भोजपुरी भाषा के कवि डॉ संतोष पटेल का नया कविता संग्रह ‘नो क्लीन चिट’ हमारे सामने प्रस्तुत है। वर्तमान समय की घटनाओं को अपनी कविता में उठाना कवि की खासियत रही है। कवि की कविताएं हमें, जागरूक और जुझारु बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत्त दिखती हैं, साथ ही अभिव्यक्ति और डर की सीमाओं में बंधी रचनाओं को हौंसला भी देती है। कवि की कविताएं बोलने, लिखने और सोचने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं जो चुप बैठे दमित, शोषित मनुष्य के भीतर सोई चेतना को जगाने का काम करती हैं। 

‘नो क्लीन चिट’ कविता संग्रह में जातीय घृणा, सामाजिक द्वेष, से लेकर सत्ताधारी वर्ग की चालाकियाँ को पोल खोल और आर्थिक शोषण की मार झेलता आम व्यक्ति के दर्द को बयाँ करती कविताएं शामिल हैं। यह कविता संग्रह कमलकार पब्लिशर्स प्रा. लि. नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। कवि संतोष पटेल ने समसामयिक घटनाओं को अपनी इस कविता में शामिल किया है जो 21वीं सदी में भी जातिवाद की पुष्टि करती हुई दिखती है। संग्रह की कविताओं में प्रमुखता से जातीय घृणा के बिंदुओं को शामिल किया गया है। केरल, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों के उदाहरण यह स्पष्ट करते हैं कि अस्पृश्यता आज भी भारतीय समाज को कलंकित कर रही है और इंसानियता को लगातार शर्मसार।  कवि ने देवभूमि उत्तराखंड को भी आड़े हाथों लिया है जो अपनी धार्मिक पहचान के कारण पवित्र और पूजनीय मानी जाती है परन्तु कवि ने उस पर्दे के पीछे झांकने का प्रयास किया है।

कवि ने उत्तराखंड के महिमा मंडित रूप पर हस्तक्षेप करने का जो साहस दिखाया है वह वाकई बिल्ली की आँख में उंगली करने जैसा है। इस संग्रह में शामिल ‘नहीं है देवभूमि’ कविता में कवि कहना चाहते हैं कि देवभूमि को देवों की भूमि की उपमा मिली है परन्तु देवतुल्य काम यहाँ नहीं हो रहें यहाँ भी देश के अन्य क्षेत्रों की तरह ही जाति आधारित शोषण की घटनाएं लगातार घटित हो रही हैं। कवि धर्मशास्त्रों और देवी-देवताओं को उल्लाहना देते हुए लिखते हैं –

“जब नृशंस हत्या जितेन्द्र दास की

पीट रहे थे उसे सारे निर्ममतापूर्वक

तब सारे शक्तिशाली देवी-देवताएं थे कहाँ?” (पृ.सं 16) 

यह प्रश्न उठता है कि जिसे देवीभूमि कहे जाने के बाद भी उस क्षेत्र में किसी निर्दोष की निर्मम हत्या कर दी जाती है तो वह कैसी देवभूमि। जातिवाद पर कटाक्ष करती कई रचनाएं प्रमुखता से इस संग्रह में शामिल है जिनमें ‘शूल’, ‘मरोड़ पर मरोड़’ आदि प्रमुख हैं। हिमादास के संघर्ष को भी जातिवादी नजरिये से देखा गया। कविता ‘मरोड़ पर मरोड़’ में कवि लिखते हैं-

”एक तो स्त्री ऊपर से दास

यानि उनके लिए एक तो केरल ऊपर से….

इसलिए बधाई देने से पहले

आश्वस्त हो जाना चाहते हैं वे लोग

हिमादास की जाति क्या है?” (पृ.सं 52)

कवि संतोष पटेल बिहार के चंपारन के रहने वाले हैं उनकी शिक्षा दीक्षा पटना में हुई। इस कविता संग्रह में कई कविताएं ‘बिहारी’ होने पर लिखी गई हैं जो अलग-अलग संदर्भो से जुड़ी हुई हैं। पूर्वांचल से क्षेत्रीय जुड़ाव होने के कारण कवि ने उन महत्वकांक्षी राजनीतिक नेताओं के षडयंत्र जाल को समझाने की कोशिश की है कि किस प्रकार क्षेत्रीयता के नाम पर सभी बिहार क्षेत्रवासियों से राजनेता अपना उल्लू सीधा कर रहें हैं। कभी बिहार मेले के नाम पर तो कभी बिहार भवन बनाकर। ‘आधे-अधूरे पहचान’ कविता बिहारी कहलाने या बिहारी की उपमा के पीछे शोषण की मानसिकता को उजागर करती है। ‘घिनौना खेल’ कविता बताती है कि किस प्रकार बिहारियों के साथ राजनीतिक खेल खेला जाता है जिससे उन्हें चुनावी माहौल के लिए साधा जा सके।

कवि ने उन प्रश्नों को भी उठाया है जो सीधे-सीधे कवि से शायद नहीं जुड़े परन्तु एक जागरूक भारतीय नागरिक होने के नाते उन्होंने उठाये हैं। आज यह चर्चा का विषय बन गया है और कई लोग दूसरों की देशभक्ति के सर्टिफिकेट देते फिर रहे हैं। देशभक्त कौन है और कौन देशद्रोही। यह निश्चित करने का हक चंद लोगों ने अपने लिए रख लिया है। ‘हमारी देशभक्ति पर शक क्यों?’ कविता आहत मन की पीड़ा को बयाँ करती है। जो अल्पसंख्यक वर्ग को भी इस देश का हिस्सा होने की वकालत करती है। यह समुदाय भी देश के बलिदान का हिस्सा रहा है और देश की साक्षा संस्कृति को बनाए रखने में इनका भी योगदान है। कवि देश के हाशिये और अल्पसंख्यक समाज के दर्द को महसूस करते हुए राष्ट्रीयता के सवालों को भी कविता में प्रस्तुत करते हुए दिखते हैं।

‘नो क्लीन चिट’ इस कविता संग्रह की प्रमुख रचना है। कविता इतिहास में दलितों के प्रति हुए अन्याय और दलित नरसंहार की यादें ताजा करती है जिसने 90 के दशक के यूपी, बिहार के दलितों की अमानवीय स्थिति की पुन: याद दिला दी जब दलित अपने अधिकारों की मांग कर रहा था जिससे क्रोधित सवर्ण दंबगों ने विरोध के स्वर को दबाने के लिए दलितों की हत्या करना ही सही समझा जिसकी परिणीति में कई दलित घर, परिवार और गाँव उजड़ गए। यह घटनाएं न्यायालय की न्यायिक प्रक्रिया पर भी सवाल उठाती है जहाँ शोषक को बिना सजा दिए बरी कर दिया जाता है। यह बताता है कि न्याय की कुर्सी पर बैठा स्वयं सवर्ण और जातिवादी मानसिकता का व्यक्ति है जिसने दलितों की मौत को मात्र सरकारी आंकडो के रूप में संगृहीत करने के अलावा और कुछ नहीं समझा। 

कवि सतोष पटेल की कई कविताएं उदाहरण के जरिये किसी अन्य को अंकित कर किसी दूसरे को कही गई है ऐसी कई रचनाएं हैं जो सीधे-सीधे नहीं बल्कि इशारों के जरिये व्यंग्य करती है। व्यंग्य कभी-कभी उलझाऊ हो जाते हैं जिनके पीछे गहरी बात तो होती है परन्तु कविता अपना रसत्व खो बैठती है इन कविताओं को आम पाठक और राजनीतिक समझ रखने वाला व्यक्ति सहजता से नहीं समझ सकता। इन कविताओं में ‘मस्त बनाम पस्त’, ‘पिचर प्लॉट’,  ‘ऐसा नहीं है’ जो अपने अंदर गूढ़ वैचारिकी लेकर चलती है।

संतोष पटेल, सुप्रसिद्ध कवि व आलोचक
संतोष पटेल, सुप्रसिद्ध कवि व आलोचक, लोकमंच पत्रिका

कवि विपक्ष की वह कलम है जो मौन साधे नहीं रह सकता। अपना विरोध दर्ज करने और सवाल खड़े करने की कवि की फितरत ही कल्याणकारी राज्य को बेहत्तर बनाने के लिए आवश्यक है। कवि ने सत्तावर्ग की शोषणकारी रणनीतियों की पोल खोलने का प्रयास किया है जिनमें प्रमुखता से शहादत, ज्ञानी, महाचोरी (पृ.सं 78) जैसी रचनाएं शामिल हैं।  

कवि संतोष पटेल के अन्य कविता संग्रहों में भी उन्होंने कई बहुजन नायकों पर आधारित कविताएं लगातार लिखी हैं परन्तु इस संग्रह में बिरसा मुंडा को केन्द्र में रखकर लिखी गई रचना अपने आप में विशेष है। ‘बिरसा में अब भी जगा रखी है मशाल’  कविता में कवि आदिवासी समाज तथा शोषित समाज को अपने अधिकारों की मशाल जलाए रखने की सीख देता है। कवि यहाँ अंबेडकर को शामिल कर संपूर्ण बहुजन परंपरा के उद्देश्य को पुनर्जीवित भी करते हैं। कवि ने शोषक वर्ग की उस मानसिकता को उद्घाटन किया है जो हाशिये के समाज के उत्थान की वकालत करते हैं चाहे वहाँ जाति विनाश की बात करने वाले अंबेडकर हो या चाहे वह पूंजीवाद के जाल से मजदूरों के हक की बात करते हुए लेलिन हो या वह स्त्रियों के अधिकारों के लिए लड़ते ईश्वचंद विद्यासागर । शोषक वर्ग इन सभी समाज सुधारकों की मूर्तियों को तोड़ उनकी समतावादी विचारधारा का विरोध करती है परन्तु कवि देश के युवाओं को चेताकर अपना कवि कर्म निभा रहा है। 

कवि का अंधविश्वास के प्रति विरोध, कवि की प्रतिबद्धता दिखाता है। कवि लगातार धार्मिक अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं को डायन कहकर उसकी हत्या करने की घटनाओं की निंदा करते है ‘अंधकार युग’ इसी तरह की एक कविता है जो निराश करती है। ‘मिड डे मील’ कविता सरकारों की अर्थनीति पर हमला करती है। देश का एक तबका अमीर से अमीर तो दूसरा गरीब और गरीब होता जा रहा है। ‘सी गैप’ कविता भी इसी तरह की एक कविता है। कवि लिखते हैं-

जो रखती है एक वर्ग को शिक्षित

दूसरी व्यवस्था रखती है दूसरे को बंचित शिक्षा से

एक के पास साधन है,

संसाधन है और ज्ञान के प्रति जागरण

दूसरे के पास गरीबी है

मुफलिसी है ।“(पृ.सं 67)

‘झूठा दिलासा’ कविता गरीबी का मज़ाक उड़ाते राजनेताओं के चुनावी जुमलों की याद दिलाता है जिसे कवि गरीबी खत्म करने के तमाम वादों के नाम पर केवल झूठा दिलासा कहकर संबोधित करता है। 

 इतिहास बदलने की होड़ लगी है, किताबें, सिलेबस और जगहों के नाम लगातार बदले जा रहें हैं। इतिहास के बदलते इस रूप में सत्तापक्ष अपने लिए नई राहें बना रहा है। ‘दुरुस्त हो रहा है इतिहास’ कविता में कवि इसी बदलते इतिहास को भाप रहें हैं वे लिखते हैं-

“दुरुस्त हो रहा है इतिहास

हुई है प्रक्रिया शुरू

गुजरात से ही

पूछा गया है प्रश्न एक परीक्षा में

कि गांधी जी ने क्यों की आत्महत्या?” (पृ.सं 85)

कवि के प्रेरणाजनों में ‘अब्राहम लिंकन’, ‘मार्टिन लूथर’, ‘नेल्सन मंडेला’ जैसे लोग है जिन्होंने विश्व को समानता का पाठ पढ़ाया है। कवि भी सभी मनुष्य जाति के साथ एक जैसा मानवता का व्यवहार करने की अपील करता है तथा वसुधैव कुटुंबकम का सही अर्थ बताता है। अंतत: ‘उम्मीद की कविता’ और ‘भारत की बेटी’ चेतना की कविताएं हैं। लेखक के निरंतर आ रहे कविता संग्रहों को पढ़ने पर अवश्य यह लगता है कि वह किसी दायरे में बंधकर नहीं लिख रहें , यह बात उनकी रचनाएं बता रहीं है।

कविता में लय और रस देखने वाले पाठकों को निराशा हो सकती है क्योंकि कवि की तमाम रचनाएं विचार और विवेक के तोल-मोल में अपना पक्ष रखती है। कवि की रचनाएं  न केवल जाति विशेष की बात करती है बल्कि वह हर प्रकार के शोषण के विरुद्ध अपनी अभिव्यक्ति दे रही हैं जो प्रमुखता से राजनीति और प्रशासकीय नीति के खिलाफ लग सकती हैं परन्तु इस दौर में सवाल उठाना जरूरी है ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाया जा सके। कवि का यह संग्रह मुख्य रूप से समाज में घटित हो रही समसामयिक घटनाओं और स्थिति से जुड़े आदमी के सवालों को पूछ अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा है। 

डॉ ममता, लोकमंच पत्रिका

डॉ ममता

जन्म स्थान पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड

शिक्षा- बी.ए (प्रोग्राम) दिल्ली विश्वविद्यालय, एम.ए. (हिंदी) इग्नू. बी.एड ( गुरू गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, एम.फिल (हिंदी) चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय तथा दलित कथा साहित्य में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक चेतना’ विषय से इम्नू से पीएच.डी उपाधि प्राप्त की।

प्रकाशित लेख. “अछूत समाज की समस्याएं और सामाजिक चेतना’, ‘कांच और दायरा कहानी में सामाजिक और आर्थिक चेतना का द्वंद्व”, “हिंदी सिनेमा में परिवर्तन का दौर और दलित समाज की फिल्में’, ‘दलित स्त्री अस्मिता और उनसे जुड़े प्रश्न’, ‘जारी है लड़ाई में दलित चेतना का स्वर तथा ‘वर्तमान दौर में आधुनिकता के मायने और विज्ञापन जैसे विषयों पर शोधपरक तथा समीक्षात्मक लेख विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

ईमेल-  mamtar35@gmail.com

                                                                                                                            

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