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कश्मीर का राजनीतिक इतिहास- अंकित जायसवाल

कश्मीर का इतिहास आदिमानव से ही शुरू हो जाता है क्योंकि यहाँ से लाखों वर्षों पहले रहने वाले मानव जैसे प्राणियों के अस्थिअवशेष मिले हैं। कश्मीर को एक विशिष्ट पहचान नवपाषाण कालीन स्थलों बुर्जहोम और गुफ़्कराल (दोनों झेलम घाटी में, 5000 वर्ष पूर्व) से मिलती है जहाँ सीढ़ियों वाले घर (गड्ढों में) मिलें हैं। अगर हम बात करें कश्मीर के लिखित इतिहास की तो यहाँ से सम्राट अशोक द्वारा श्रीनगर की स्थापना और उसके पुत्र जलौक के शासन का जिक्र मिलता है। कुषाण साम्राज्य में भी ये एक प्रान्त था जहाँ कुण्डलवन में कनिष्क ने चौथी बौद्ध संगीति बुलाई थी। गुप्तकाल में हूण शासक मिहिरकुल, गुप्तनरेश बालादित्य से पराजित होकर कश्मीर की ओर भागा था जहाँ उसे शरण मिली लेकिन उसने वहाँ के शासक की हत्या कर खुद शासक बन गया। सातवीं सदी में दुर्लभवर्धन ने कश्मीर के छोटे-छोटे शासकों को संगठित कर कार्कोट वँश की स्थापना किया और वहाँ के पहले के राजवँश गोनंदवंश से सत्ता हथिया लिया, कार्कोट वँश खुद को प्राचीन नागवंश से जोड़ता है। ह्वेनसांग के अनुसार उसके शासनकाल में तक्षशिला, सिंहपुर, उरशा, पूंछ और थोड़ा सा राजपुताना कश्मीर का अंग था।

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कश्मीर के स्वतंत्र शासकों में ललितादित्य मुक्तापीठ (724-760 ई0) सर्वाधिक पराक्रमी शासक था जिसने कश्मीर राज्य को एक साम्राज्यवाद में बदलने का सफल प्रयास किया था। यहाँ तक कि ललितादित्य ने तत्कालीन शक्तिशाली कन्नौज शासक यशोवर्मन को पराजित कर और उससे संधि करके तिब्बतियों/चीनियों को भी हराया था। 733 ई0 में उसने चीन के सम्राट को अपना दूतमण्डल भी भेजा। कम्बोजो और उस समय के शक्तिशाली अरबी/तुर्क सेनानायकों को भी इसने पराजित किया। अरबों और तुखारों (तुर्कों) पर उसकी विजय की कहानियाँ अलबरूनी के आने तक लोकप्रचलित थीं। कन्नौज की सीमा तक उसका साम्राज्य फैल चुका था। कल्हण उसके दिग्विजय का वर्णन कुछ इस प्रकार करते हैं :- ललितादित्य कन्नौज जीतने के बाद पूर्वी समुद्र/बंगाल की खाड़ी से होता हुआ कलिंग तक पहुँच गया था जहाँ गौड़ नरेश (बंगाल का शासक) ने उसकी अधीनता स्वीकार की (थोड़ा अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन)। विजेता के साथ वह एक महान निर्माता भी था, कश्मीर को भव्य नगरों, मंदिरों, और मूर्तियों से सजाने के काम उसने बखूबी किया। सूर्य का प्रशिद्ध मार्तंड मंदिर के अवशेष इसकी कहानी आज भी कहते हैं

कल्हण, लोकमंच पत्रिका

अवन्तिवर्मा ने कश्मीर में 855-883 तक राज्य किया जिसका सबसे महत्वपूर्ण योगदान है अपने इंजीनियर सुय्य के सहयोग से कश्मीर में उन्नत जल-तकनीकी और सिंचाई की लाभकारी योजनाओं का विकास करना। इसके बाद शंकरवर्मा आता है जिसने युद्ध में तो प्रसिद्धि प्राप्त की लेकिन मंदिरों से धन लूटने के कारण वह खलनायक के रूप में प्रसिद्ध हुआ। लगभग 958 ई0 के आसपास कश्मीर में एक अति महत्वाकांक्षी रानी दिद्दा का शासन आता है जिसने अपने नाम के सिक्के भी जारी करवाये थे। कुछ समय में उसने प्रभावशाली मंत्रियों/ विद्रोही नेताओं का सफाया करवाकर और अपने ही नाती (जो नाममात्र का राजा था) को मरवाकर एक स्वतंत्र शासक की तरह 23 वर्षों तक राज्य करने लगी (ध्यान दें कि इसका समय रजिया सुल्ताना के तीन सौ साल पहले ही आता है, मैं पहले ही एक लोग को जवाब दे चुका कि रजिया भारत की पहली स्वतंत्र शासिका नहीं है)। हालांकि दिद्दा एक अति महत्वाकांक्षी और स्वेच्छाचारणी शासिका था इसलिए विद्रोहों और ब्राह्मणों के उपवासों ने (विरोध में) इसे हमेशा परेशान रखा।

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दिद्दा चरित्र से कुटिल और षड्यंत्रकारी होते हुए भी राजनीतिक सूझ-बूझ वाली एक बुद्धिमान महिला थी। आज भी कश्मीरी अपने बड़ी बहन को दिद्दा बोलते हैं, जो कहीं न कहीं दिद्दा रानी से ही प्रभावित शब्द है। अपने प्रभावशाली और शक्तिशाली व्यक्तित्व के कारण ही उसने अपने मायके के पक्ष वाले भतीजे (संग्रामराज) को अपना युवराज घोषित किया जिसने आगे चलकर कश्मीर में लोहार वँश की स्थापना की। ग्यारहवीं सदी में सुल्तान महमूद गजनवी के आक्रमणों ने कश्मीर को लूट और तोड़फोड़ से परेशान किया लेकिन ठंड और कश्मीर के भूगोल ने उसे बहुत आगे न बढ़ने दिया। लोहार वँश के ही राजाओं में राजा हर्ष का समय 1083 ई0 से शुरू होता है, इसी के आश्रित कवि और इतिहासकार थे कल्हण, जिन्होंने अपनी किताब राजतंरगिणी में कश्मीर का सुव्यवस्थित इतिहास लिख छोड़ा है (सही मायने में इसे भारत का पहला विशुद्ध ऐतिहासिक रचना माना जाता है)। कल्हण लिखते हैं कि हर्ष अपनी विद्वता के कारण विदेशी राज्यों में भी प्रसिद्ध था लेकिन शासक के रूप में वह क्रूर और अत्याचारी था। अपनी फिजूल शानो-शौकत के कारण उसने प्रजा पर भारी कर लगाए, उसने मंदिरों और मठों पर भी भारी कर लगाये और उनकी संपत्ति लूटी। इसी कारण कल्हण दुखी होकर उसे तुरुष्क (मुसलमान आक्रमणकारियों का नाम) कहते हैं। अंत में असंतुष्ट प्रजा से मिलकर डामरों (वहाँ के जमींदार) ने श्रीनगर में हर्ष का राजमहल जला दिया, हर्ष इस गृहयुद्ध में मारा गया।

जयसिंह कल्हण की राजतरंगिणी में आने वाले अंतिम कश्मीरी शासक हैं, जिसके शासनकाल में राजतरंगिणी लिखी गयी (1148-50 ई0)। जयसिंह ने अपने शासनकाल में शांति स्थापित करायी और कई निर्माण कार्य और नष्ट इमारतों का मरम्मत कार्य पूरे करवाये। जयसिंह के बाद लगभग 200 वर्षों तक कश्मीर पर उसके उत्तराधिकारियों और छोटे-छोटे देशी राजाओं का शासन चलता रहा, अंततः 1339 ई0 में मंगोल आक्रमण और एक प्रभावशाली शैव संत के अदूरदर्शिता के कारण एक लद्दाखी शरणार्थी ने इस्लाम धर्म कबूल कर कश्मीर में मुस्लिम-सत्ता स्थापित किया।

मार्तंड मंदिर के अवशेष, अनंतनाग, कश्मीर, लोकमंच पत्रिका

कश्मीर में मध्य युग की शुरुआत 1320 में मंगोल आक्रमणों के साथ होता है जब मंगोल सेनानायक दलूचा के नेतृत्व में मंगोल सेनाओं ने कश्मीर पर आक्रमण कर नरसंहार किया था। तत्कालीन राजा सुहादेव मंगोलों से घबड़ाकर बिना युद्ध किये ही भाग गया। मीरकासिम और महमूद गजनवी के बाद कश्मीर पर यह तीसरा जबरदस्त बाहरी प्रहार था। सुहादेव के पहले 1286 में सिंह देव ने एक नये हिन्दू राजवँश की स्थापना की थी, जिसका शासनकाल 1301 ई0 तक चला। सिंह देव के बाद उसका भाई सुहादेव गद्दी पर बैठा जिसके शासनकाल में तीन शरणार्थी कश्मीर में आये थे। पहला था रिंचन जो कि लद्दाख के एक राजवँश से सम्बंधित था, दूसरा था लंगर जो कि दर्रीस्तान से आया था और तीसरा था शाहमीर। मंगोलों के वापस जाने के बाद रिंचन ने कश्मीर में फैली अव्यवस्था का लाभ उठाकर खुद को शासक घोषित कर लिया। उसने वहाँ के भौटा सैनिकों की सहायता से सुहादेव के मंत्री और सेनापति रामचंद्र की हत्या करवा दी। रिचंन ने रामचंद्र की बेटी से विवाह कर लिया जो कि कोटारानी के नाम से प्रसिद्ध हुयी। रिंचन ने सांठगांठ करके शाहमीर को अपना वजीर बना लिया जो कि राजसिंहासन के लिए उसका एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी साबित हो सकता था।

रिंचन ने खुद को लोकप्रिय शासक साबित करने के लिए कुछ अच्छे कार्य भी शुरू किये और उसका झुकाव भी तत्कालीन बहुसंख्यक हिन्दू जनता की तरह हिन्दू धर्म की तरफ था लेकिन शैव धर्म के एक प्रभावशाली संत दावास्वामी ने उसे हिन्दू समाज मे सम्मानित पद न दिया क्योंकि वह भौटा समाज से था। इस वजह से तथा कुछ अन्य कारणों से भी उसने इस्लाम धर्म कबूल करना स्वीकार किया। कुछ समय बाद सुहादेव के चचेरे भाई उदयनदेव ने अपने समर्थकों के साथ विद्रोह कर दिया और एक संघर्ष में रिंचन बुरी तरह घायल होकर मारा गया।

उदयनदेव का शासनकाल (1323-29 ई0) कश्मीर में त्रिपक्षीय सत्ता संघर्ष के लिये जाना जाता है। जिसमें शाहमीर सबसे मजबूत उम्मीदवार बनकर उभरता है। उदयनदेव ने विधवा कोटा रानी से विवाह कर लिया, जो कि एक महत्वाकांक्षी महिला थी। कोटा रानी अपने पूर्ववर्ती कश्मीरी महिला शासकों दिद्दा और सुगंधा से प्रेरणा प्राप्त कर रही थी क्योंकि वह भी सत्ता की चाभी अपने पास रखने में सफल रही। उदयनदेव वैसे भी एक असफल शासक था कि इसी बीच मंगोलों ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। उदयनदेव, कोटा रानी को छोड़कर लद्दाख भाग गया। कोटा रानी ने इस समय अपनी योग्यता और सूझ-बूझ का परिचय देते हुये शाहमीर की मदद से मंगोलों को कश्मीर से खदेड़ दिया। शाहमीर ने इस युद्ध में जबरदस्त साहस दिखाया जिससे कश्मीरी जनता के बीच वह लोकप्रिय हो गया। इस स्थिति का फायदा उठाकर उसने शासक बनने का भी प्रयास किया लेकिन कोटा रानी ने खुद को शासिका घोषित कर लिया। शाहमीर से संघर्ष के दौरान ही एक दिन कोटा रानी को इंदरकोट के किले में घेर लिया गया और उसे शाहमीर के साथ विवाह करने के लिये बाध्य होना पड़ा। फ़ारसी स्रोतों के अनुसार एक रात अपने शयनकक्ष में ही कोटा रानी ने आत्महत्या कर लिया।

शाहमीर, सुल्तान शमसुद्दीन के नाम के साथ कश्मीर पर शासन करने लगा जो कि कश्मीर में मुस्लिम सत्ता का प्रारंभ था। शाहमीर के शासन ने कश्मीर के अव्यवस्था का अंत कर दिया क्योंकि उसने कश्मीर से सामंती व्यवस्था का अंत कर अपने हिन्दू और मुस्लिम दोनों सेनानायकों को इकताएँ बांटीं। कृषि-करों में उसने प्राचीन भारत में प्रचलित उपज के छठे भाग को ही लिया। पर मात्र 3-4 साल के शासन के बाद ही उसकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष शुरू हो गया। 1356 में शहाबुद्दीन सुल्तान बना जिसने पूरे कश्मीर को संगठित कर अपना शासन कायम किया। उसे लद्दाख के कशग़री मंगोलों पर भी विजय का श्रेय प्राप्त है।

1389 में कुतुबुद्दीन का बेटा सिकंदर कश्मीर का सुल्तान बना जो कि कश्मीर का सर्वाधिक धर्मांध शासक था। मंदिरों-मठो और अधिसंख्यक मूर्तियों को तोड़ने तथा गैर-मुस्लिम प्रजा के प्रति उसके पक्षपात पूर्ण रवैये के कारण इतिहास में वह बुतशिकन (मूर्तिभंजक) के नाम से कुख्यात है। प्रसिद्ध मार्तंड मन्दिर इसी के समय तोड़ा गया था। उसने गैर-मुस्लिम प्रजा पर जजिया कर लगाया और धार्मिक विद्वेष के कारण सती प्रथा पर भी रोक लगा दिया। सिकन्दर शाह के धर्मांधता के पीछे उसके मंत्री सुहाभट्ट का भी हाथ था जो कि एक कश्मीरी ब्राह्मण था लेकिन उसने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया था। इस्लाम धर्म कबूल करने के बाद वह हिंदुओं का कट्टर विरोधी बन गया, हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ा दिये गये। इसी के सुझाव पर सुल्तान सिकन्दर ने ये आदेश जारी किया कि उसके राज्य के हिन्दू या तो इस्लाम धर्म कबूल करें या फिर कश्मीर छोड़कर चले जायें। इस्लाम कबूल न करने पर मृत्युदंड भी दे दिया जाता था। उसने बलपूर्वक धर्मांतरण के कई सारे उपाय अपनाये। उसने ललाट पर चंदन लगाना प्रतिबंधित कर दिया, सोने-चाँदी के मूर्तियों को गलवाकर उसके सिक्के बनवाये।

महत्वपूर्ण है कि इसी के शासनकाल में तैमूर ने कश्मीर आक्रमण किया लेकिन सुल्तान सिकन्दर के कूटनीतिक दूरदर्शिता के कारण तैमूर के विध्वंस से कश्मीर को बचा लिया गया।सिकन्दर ने तैमूर के आक्रमणों से विस्थापित हुये अनेक ईरानियों और मध्य एशियाई मुसलमानों को श्रीनगर में शरण दिया। इन्हीं शरणार्थियों में सूफी संत सैय्यद मोहम्मद हमदानी भी थे जिनका खानकाह सिकंदर ने बनवाया। सिकन्दर के मरने के बाद उसके अल्पायु पुत्र अलीशाह का संरक्षक सुहाभट्ट को बनाया गया। कुछ समय बाद सिकन्दर का छोटा पुत्र शाही खाँ सुहाभट्ट के मरने के बाद वजीर बना जिससे दोनों भाईयों में सत्ता संघर्ष शुरू हो गया। शाही खाँ ने खोखरों की सहायता से अलीशाह को हराकर राजगद्दी प्राप्त किया और अपने भाई सुल्तान अलीशाह को मरवाकर सुल्तान जैनुल-आबदीन के नाम से शासक बना। अपनी सम्पूर्ण प्रजा के प्रति उदार नीतियों के कारण लोग उसे बुडशाह (महान राजा) कहते थे। उसका शासन 1417 से 1467 के लंबे काल तक चला जिसमें उसने एक उदार और धर्मनिरपेक्ष शासक की भांति राज्य किया। जजिया कर समाप्त कर दिया, कश्मीर में गोहत्या पर प्रतिबंध लागू हुआ, अनेक हिंदुओं को शासन में उच्च स्थान दिए गए, निर्वासित कश्मीरी को (विशेषकर कश्मीरी ब्राह्मणों को) को वापस कश्मीर घाटी में बसाया गया, मंदिरों का पुनर्निर्माण कार्य शुरू हुए, उसने हिन्दू राजकुमारियों से विवाह किया। संगीत में उसकी गहरी रुचि थी, इसी के समय संस्कृत ग्रन्थों का फ़ारसी में अनुवाद कराया गया, राजतरंगिणी का विस्तार किया गया। वह कई मामलों में अकबर का पूर्वगामी था इसलिए उसे कश्मीर का अकबर तथा मूल्य-नियंत्रण प्रणाली के कारण कश्मीर का अलाउद्दीन खिलजी कहा जाता है।

अंकित जायसवाल

लेखक- अंकित जायसवाल (प्रवक्ता इतिहास), रिसर्च स्कॉलर प्राचीन इतिहास विभाग, दीनदयाल उपाध्याय, गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर।

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