लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
‘गीता महाबोध’ का दर्शनिक स्रोत- हरेराम सिंह


भारतीय संस्कृति एवम् समाज में कृष्ण न सिर्फ एक नायक हैं बल्कि वे दार्शनिक भी हैं। उनकी उपस्थिति मन को ही नहीं बल्कि पूरे लोकजीवन को रोमांस व खुशी से भर देने वाली है। जहाँ कृष्ण हैं वहाँ उमंग है, प्रेम है, भ्रातृत्व है और प्रकृति के साथ तादात्म्य है। कृष्ण का जीवन हमारा आनुषंगिक है, प्रेरणा स्रोत है। कृष्ण ने जहाँ तक संभव हो पाया है कृषि-संस्कृति को अपने जीवन का अंग बना लिए और इसे बचाने हेतु, कृषकों, पशुपालकों, पशुओं आदि की हिफाजत के लिए, पर्वतों, वनों के प्यार के लिए, अपने गाँव के लिए इंद्र जैसे बड़े शासक से टकराते हैं। अपने मामा कंस से माँ और पिता के लिए, पंगा लेते हैं। अन्याय व अत्याचार को वे पूरे समाज से मिटाकर ‘रास शैली’ पर बल देते हुए पूरे जीवन को आनंदोत्सव बना देते हैं, अर्थवान बना देते हैं। उनके जीवन की आधारशिला रचती हैं एक ओर ‘मइया’ और दूसरी तरफ ‘गइया’!

प्रोफेसर ललन प्रसाद सिंह की पुस्तक गीता महाबोध का लोकार्पण, लोकमंच पत्रिका

कृष्ण का जीवन संघर्षों, अभावों और तनाओं से भरा पड़ा है। वे कभी भी ‘आराम’ नहीं करते हैं। आए दिन और हर घड़ी उन पर आफत ही आफत है। और तो और पशुपालक, किसान और सामान्यजन का प्रतिनिधित्व करना, उन्हें समझाना, मनाना आसान नहीं हैं। जो गँवार हैं उनके लिए और उनके जीवन के लिए खुद को समर्पित कर देना कृष्ण के बूते की ही चीज है। कृष्ण बाँसुरी वादक हैं और राधा से उन्हें असीम मुहब्बत है। प्रेम ही उनके जीवन के केंद्र में है। वे अपनों के लिए निश्छल हैं। पर दुश्मनों के लिए चतुर भी। वह एक रणनीतिकार हैं। रण करना जानते हैं। पर कई को वे चकमा भी देते हैं- इसलिए वे रणछोड़ भी हैं। मतलब यह कि वे युद्ध बंधी-बंधाई परिपाटी पर नहीं करते। उनमें सजगता है और शत्रु को पहचाने और उसे पछाड़ने की कला भी है।

उनमें युद्धकला से लेकर कामकला की गहन जानकारी है। वे संभोग के लिए बदनाम नहीं हैं पर सारी अहीरिनें उन पर मरती हैं जान लुटाती हैं। वे निडर भी हैं और मृदुभाषी भी। इसलिए वे शत्रु के शत्रु और प्रेमी के प्रेमी हैं। उनका बचपन अपने माता-पिता के प्यार से वंचित रह गया इसलिए वे यशोदा व नंद जी के प्यार को कभी भूले नहीं और अपने पूरे चरित्र से यह साबित करने की कोशिश की है कि जो तुम्हें अपना मान लिया है उसका तुम हमेशा के लिए हो जा। इस प्रकार वे क्षत्रिय रहते हुए भी अपने को डी-क्लास किया है। वे सर्वहारा के नायक हैं। उनमें राम भी नजर आते हैं, और बाद के बुद्ध और अशोक भी। वे दरिद्रों पर दया बरसाते हैं। सुदामा इसके प्रमाण हैं। यह अलग बात है कि सुदामा की पीढ़ी कृष्ण की पीढ़ी को बोली-वचन से कितना इज्जत करती है!

कृष्ण को ‘वर्क’ चूनने में और इसे करने में शर्म नहीं आती है। ‘महाभारत’ के असल नायक वे ही प्रतीत होते हैं। वे सबकुछ जान रहे हैं। वे दूरदर्शी हैं, ज्ञानी हैं, बुद्धिवाले हैं। इसलिए ऐसे महान पुरुष का अभिभाषण सुनना भला किसे पसंद न होगा! कुरुक्षेत्र में अर्जुन को मोह से दूर ले जाना आसान काम न था। और यह बताना कि जब अपने अधर्म व अनीति के मार्ग पर चल पड़ते हैं तो ऐसे जन को मोह और माया त्यागकर इन्हें दंड देना या ऐसे से युद्ध करना महान् व धर्म का कार्य है। यहाँ कृष्ण की न सिर्फ दंड नीति बल्कि न्यायपरकता का भी बोध होता है। डॉ. ललन प्रसाद सिंह का ‘गीता महाबोध’ (2021) कृष्ण के इसी रूप से परिचित कराता है और उनका यह रूप कुरुक्षेत्र में उभरकर सामने आया था।

कुरुक्षेत्र का मैदान जंग का मैदान नहीं; बल्कि ज्ञान की तपोभूमि नजर आता है जहाँ कृष्ण जैसा गुरु दुनिया को दूसरा कोई दिखाई नहीं पड़ता! कारण कि कृष्ण पूरे जीवन दर्शन को वहाँ निचोड़कर रख देते हैं। ताकि अर्जुन वास्तविक दुनिया को समझ पाएँ। डॉ. ललन प्रसाद सिंह अपने इस पोएट्री-ग्रंथ में तीन आलेख ‘द गीता इज अ गाइड’, ‘दर्शन-दृष्टि’, ‘गीता-कमेंट्री अर्थात् भाष्य’ के द्वारा भारतीय चिंतन पद्धति, विश्व दर्शन की समाजवादी व्याख्या के द्वारा कृष्ण और गीता के औचित्य पर इस कदर फोकस डालते हैं कि इसके आगे वे तमाम लोग व दर्शन बौने नजर आते हैं जो शोषक के पक्ष में कहीं न कहीं भूमिका निभाते हैं। केवल मार्क्स व बुद्ध को छोड़कर और आमजनों की जो सोचते हैं उन्हें छोड़कर सभी आउट नजर आते हैं।  ‘गीता’ को देखने व उसका अवगाहन करने से ऐसा लगता है कि यह भारतीय चिंतन-मनन की सार इकाई है या तत्त्व है। इसलिए वे इस बात को उद्धृत करने से बाज नहीं आते जिसमें यह कहा गया है कि ” भगवदगीता में उपनिषद-रूपी गउओं का दुग्ध श्री कृष्ण द्वारा दुहकर एकत्रकर दिया गया है।”

कृष्ण इस दुग्ध को अर्जुन को पिलाकर उसके चिंतन को पुष्टकर रहे हैं और भ्रम का निराकरण भी। इसीलिए डॉ.ललन प्रसाद सिंह उपनिष्दों की व्याख्या व परिचय भी ‘दर्शन दृष्टि’ आलेख में करवाते हैं। ‘गीता’ ऊर्जा को केंद्रित करने की कला भी सिखाती है। इसलिए डॉ. ललन प्रसाद सिंह ने ‘ द गीता इज अ गाइड’ आलेख में लिखते हैं कि “The person, whose psyche is not concentrated and calm, does not achieve the new knowledge.” आगे वह यह भी उद्धृत करते हैं- “प्रेमा पुमर्थो महान।” और इस तरह सचमुच गीता को, गीता के महत्त्व को प्रतिपादित कर देते हैं। पर, डॉ. ललन प्रसाद सिंह की महान उपलब्धि यह है कि वे संपूर्ण गीता को नया जीवन दे दिया है! यह नया जीवन क्या है जो गीता को इन्होंने बड़ी ही मधुरता व प्रेम से दिया है वह है- लोक भाषा यानी आम बोलचाल की हिंदी में पद्यानुवादकर उसकी पहुँच आमजन तक बढ़ा दिया है! मिट्टी के घर, झोपड़ी के वाशिंदों के लिए इन्होंने गीता को सहज बना दिया है। यह काम कभी तुलसीदास ने बाल्मीकिकृत रामायण की कथा को अवधी में ‘रामचरितमानस’ लिखकर सहज बना दिया था। और बनाते वक्त एक कवि की हैसिसत से बहुत कुछ खुद के विरच डाले थे।

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डॉ. ललन प्रसाद सिंह ने ‘गीता’ जैसे दर्शन को न्याय दिलाने के लिए अपना कुछ अलग से विचार नहीं डाला। बल्कि वे इतना किए हैं कि लोकाकांक्षा, जनभाषा का ख्याल करते हुए भारत की प्रसिद्ध भाषा हिंदी में इसे अवतरित कर इसे दीर्घजीवी बना दिया है। ऐसा कभी विश्व साहित्य में इतालियन कवि व साहित्य सिद्धांतकार दान्ते (1265-1321) ने अपने ‘डिवाइन कॉमेडी’ को देशज इतालियन में लिखकर किया। इस तरह डॉ. ललन प्रसाद सिंह ने गीता-महाबोध के द्वारा गीता के मूल दर्शन को सही मायने में घर-घर पहुँचाने का काम किया है और इन्होंने सदियों की इक खास भाषा के वर्चश्व व उसके द्वारा उत्पन्न गतिरोध को भी तोड़ा है:

अर्जुन उवाच-

समाधिस्थ स्थिरबुद्धिवान का, केशव क्या है लक्षण।

कैसे भाषन कैसे बैठन, कैसे उसका ब्रजन।। (54)

श्री भगवानुवाच-

जब वह त्याग देता है, अपने मन की सर्व कामना।

संतुष्ट हुआ करता है, तब आत्मेन ही आत्मना।

स”साधत-साधत जब वह, थिर बुद्धि हो जाता है।

वही पुरुष हे अर्जुन स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।(55)

जिसका मन उद्वेगरहित है।

दुख पाने में शांतिचित्त है।

सुख मिलने में नहीं स्पृहा।

विगत हुए भय क्रोध अरू मोहा।

मननशील जो ऐसा रहता। स्थिर बुद्धि वही कहाता।।(56)

डॉ.ललन प्रसाद सिंह का ‘गीता महाबोध’ उत्कृष्ट साहित्यिक रचना है। साहित्य की कसौटी पर वह खरी उतरती है। विश्व मानव को चेतना सम्मपन्न बनाने के साथ-साथ वह उन्हें तर्कशील, विवेकवान, ज्ञानी, परिपक्व, संवेदनशील व मानवीय बनाती है। ‘गीता’ मनुष्यता के पक्ष में सदैव खड़ी रही है। जिस तरह राम ने अपने जीवन को उत्सर्जित कर रावण जैसे शक्ति से टकराते हैं और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्तियों के सहारे न केवल लंका विजय पाते हैं बल्कि उनसे मित्रता का संबंध बना यह संदेश देते हैं कि ‘अस्पृश्यता’ निम्न विचार वाले व्यक्तियों के मस्तिष्क की उपज है। जबकि सच है कि मानव मानव एक समान है और उस मानव में अपार शक्ति है जिसके बदौलत वे न सिर्फ दुसाध्य से दुसाध्य कार्य आसानी से कर पाते हैं बल्कि उस कार्य के महत्त्व से सबको चौंधिया देते हैं। छठी ईसा पूर्व शाक्यकुलभूषणम् गौतम बुद्ध ने भी अपने आचरण, दर्शन व त्याग से क्या राजा, क्या किसान, क्या व्यापारी, क्या शूद्र( अछूत) सबको जीत लिया था और उनके लिए नया दर्शन का द्वार खोल दिया था जहाँ किसी तरह के भेवभाव न थे। बाद में स्त्रियों को भी उन्होंने ‘संघ’ में जगह देकर समानता का शंखघोष किया।                                                             

कृष्ण ने जो गीता का संदेश दिया है शायद उस युग के लोग उनके इस विराट रूप का दर्शन कभी कर पाए हों! खुद अर्जुन भी कृष्ण को उतना नहीं जान पाया था। निरंजन कुमार’ निर्भय’ ने “गीता संवाद” काव्य पुस्तक की अपनी भूमिका में महर्षि व्यास को उद्धृत किया है जिसमें वे गीता के संबंध में कहते हैं – गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्र विस्तरै। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनि:सृता और ‘गीता’ में स्वयं श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है – मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।।                        (गीता 9.32)

हे अर्जुन! स्त्री, शूद्र तथा पापयोनि चाण्डालादि जो भी मेरे शरण होकर परमगति को ही प्राप्त होते हैं। पर, यह देखने लायक है कि उसी ‘गीता’ में अर्जुन का वह दारुण रूप व किंकर्तव्यमूढ़ की स्थिति भावक को उस स्थिति में लाकर खड़ा कर देता है जहाँ ‘नाट्यशास्त्र’ के गुणों की तरह वह सोचने पर बाध्य हो जाता है कि न जाने अर्जुन अपने गांडीव का इस्तेमाल करेगा या भी नहीं? डॉ. ललन प्रसाद सिंह काव्यकला के साधारणीकरण के सिद्धांत से प्रेरणा ग्रहण करते हुए भावक या पाठक को वहाँ और उस स्तर पर ले जाते हैं जहाँ कोई भी कुशल कलाकार ले ले जाना चाहेगा। वे गीता के प्रथम अध्याय के 30-31 वाँ श्लोक का पद्यानुवाद इस तरह प्रस्तुत करते हैं-

मम हाथे गांडीव गिरंता।

अंग-त्वच अति जलंता।।

भ्रमित होत जात मेरो मन।

स्थित रहन समर्थ न तन।।

हे केशव! लक्षण विपरीता।

कुलजन हन्ते नहीं देखी हिता।।

डॉ. ललन प्रसाद सिंह ने अष्टादश अध्याय के अंत में यानी 78 वाँ श्लोक के पद्यानुवाद में जो तरलता दिखाई है और उससे जो समवेत् राय बनी है वह भी बड़ी अद्भुत है-

जहाँ श्रीकृष्ण योगेश्वर हैं।

जहाँ पार्थ धनुर्धर हैं।।

वहीं विजय श्री व विभूति।

वहीं मेरो अचल है नीति।।

कृष्ण योगेश्वर क्यों हैं? क्योंकि वह न सिर्फ योग-दर्शन के महान पंडित हैं बल्कि उनका पूरा जीवन योग से प्लावित व योगमय है! उन्हें उपनिषदेश्वर कहिए या सांख्येश्वर अतिशयोक्ति न होगी। और इसी कारण कृष्ण सबके प्रिय हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि श्री कृष्ण बचपन से ही स्त्रियों और बाद में स्त्री सखा की बदौलत ही कूटनीति व चतुराई का पाठ सहजता से पढ़ लिया। कृष्ण के लिए स्त्रियाँ सदा पाठशाला की तरह रही हैं और इसी वजह पुरुष रहते हुए भी उनमें पूर्ण मानवीय गुणों का विकास हुआ है। उनका यह कहना-” मईया मोरी मैं नहीं माखन खायो।” जीवन को आह्लाद से भर देता है! डॉ. ललन प्रसाद सिंह अपने “गीता महाबोध” में उस आह्लाद को पूरी तरह जी रहे हैं इस कामना के साथ कि आमजन का जीवन भी आह्लादमय हो। इसके लिए वे ‘भक्ति’ से ज्यादा ‘कर्म’ पर बल देते हैं। गीता का दर्शन ‘कर्म’ को केंद्र में स्थापित करता है। ध्यान से देखें तो गीता परजीवी लोगों को बड़ी दृढ़ता के साथ विरोध करता है। गीता के इस पद्यानुवाद से उस दृढ़ता व विरोध को बल मिला है। न्याय निमित लड़ना प्रत्येक मनुष्य का धर्म (फर्ज) है! और यही गीता का महान् संदेश भी।…………..

हरेराम सिंह, लोकमंच पत्रिका
डॉ हरेराम सिंह, लोकमंच पत्रिका

लेखक- डॉ हरेराम सिंह, ग्राम+पोस्ट: करुप ईंगलिश, भाया: गोड़ारी, जिला: रोहतास (बिहार), पिन- 802214, मोबाइल: 8298396621

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