लोकमंच पत्रिका

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सुमन केशरी का नाटक ‘गांधारी’: महाभारत की स्त्रियों का सामूहिक आर्तनाद- आनंद पांडेय

कोई कथा एक बार एक मुख से एक श्रोता या श्रोताओं को सुनाने की चीज़ नहीं होती बल्कि अनेक मुखों से अनेक श्रोताओं को अलग-अलग देश-काल में बार-बार सुनाने की चीज़ होती है। किसी कथा की शक्ति व लोकप्रियता का प्रतिमान ही यह होता है कि वह कितने लोगों के द्वारा, कितने लोगों के लिए कितनी बार और कितने समय तक सुनाई जाती है। इस प्रक्रिया में कथा में परिवर्तन और परिवर्धन ही नहीं होता है बल्कि देश-काल के अनुरूप उसका अनुकूलन भी होता है। रामायण, महाभारत और पुराणों की कहानियाँ हजारों सालों से कहन व कला की विविध विधाओँ में न जाने कितने रूपों में, कितने स्थानों पर सुनाई जाती रही हैं। लेखक को ‘मति अनुरूप राम गुन गावहुँ’ की रचनात्मक छूट के कारण इन कथाओं के विविध रूप, जिसमें कई बार एक दूसरे की विरोधी बातें भी कही गयी हैं, मौजूद हैं। पौला रिचमैन द्वारा संपादित पुस्तक ‘मेनी रामायनाज’ व एके रामानुजन के लेख ‘थ्री हंड्रेड रामायनाज’ में प्रामाणिक व तथ्यपरक रूप से इस बात को सिद्ध किया गया है कि विभिन्न समयों व देशों में एक ही मूल कथा के सैकड़ों रूप सदियों से प्रचलित रहे हैं।

महाभारत के बारे में भी यह बात काफी हद तक सही है व पुराणों के बारे में भी। कहने वाला केवल पुरानी कहानी को दुहराता नहीं है बल्कि उसके प्रभाव व मूल्यबोध में अपनी ओर से कुछ जोड़ता-घटाता भी है। उसके अपने परिप्रेक्ष्य व परिवेश भी उसी में समाहित हो जाते हैं। इससे उन प्राचीन कहानियों का सामयीकरण और नवोन्मेष सतत रूप से संभव बने रहते हैं। और बनी रहती हैं ये कहानियाँ। यह रचनात्मक अधिकार या छूट ही इन कहानियों की अमरता व निरंतरता का एक बड़ा कारण है। इसलिए, यह कहना गलत न होगा कि रामायण, महाभारत व पुराणों की कहानियाँ सैकड़ों-हजारों साल पहले लिखकर समाप्त नहीं की जा चुकी हैं बल्कि अभी-भी लिखी जा रही हैं। अपने रचना-कालों में ये केवल लिखनी शुरू की गयी थीं। बार-बार लिखी जाने के बावजूद ये अभी पूरी नहीं हुई हैं। अब भी लिखी जा रही हैं तो पूरी करने के लिए नहीं बल्कि नये-नये ढंग से लिखना शुरु करने के लिए लिखी जा रही हैं। हाल में ही प्रकाशित सुमन केशरी का नाटक ‘गांधारी’ इसी अनंत प्रक्रिया का नवीनतम ‘उच्छ्वास’ है।

सुमन केशरी का नाटक : गांधारी, लोकमंच पत्रिका

गांधारी महाभारत के उन पात्रों में से है जो बहुत प्रमुख न होते हुए भी लोकमानस में अपनी विशिष्ट जगह बनाए हुए हैं। महाभारत जनता की सहानुभूति को नायक-खलनायक की रूढ़ पद्धति के हिसाब से विभाजित करता है। युयुत्स, विकर्ण व विदुर को छोड़कर संपूर्ण कौरव पक्ष खलनायक है तो पांडव पक्ष नायक है। लोक में कौरव पाप और अनीति के पर्याय हैं इसलिए उन्हें घृणा मिलती है जबकि पांडव धर्म और नीति के पर्याय हैं इसलिए उन्हें सहानुभूति मिलती है। कौरवों की हार व पांडवों की जीत को अधर्म पर धर्म की विजय के रूप देखा जाता है। जबकि, धर्मवीर भारती के शब्दों में-

टुकड़े-टुकड़े हो बिखर चुकी मर्यादा

उसको दोनों ही पक्षों ने तोड़ा है

पाण्डव ने कुछ कम कौरव ने कुछ ज्यादा

× ×

दोनों ही पक्षों में विवेक ही हारा

दोनों ही पक्षों में जीता अन्धापन

× ×

यह अजब युद्ध है

नहीं किसी की भी जय (अन्धायुग)

नायक और खलनायक के दो ध्रुवों में विभाजित होकर महाभारत का कोई भी पाठ संतुलित नहीं हो सकता है। सभी चरित्रों की अपनी एक विशिष्टता व व्यक्तित्व है लेकिन वे सामूहिक नियति के खिलौने बनने को अभिशप्त हैं। धर्म व अधर्म के खाँचे में बँटे होकर भी वे अपने-अपने ढंग से इस सामूहिक नियति से मुकाबला करते हैं। उनमें द्वंद्व ही नहीं अंतर्द्वंद्व भी हैं। आधुनिक काल में इस विभाजित पाठ के बजाय अलग-अलग पात्रों के चरित्रों के विकास की प्रवृत्ति बढ़ी है। यह शुभ लक्षण है। गांधारी का चरित्र भी इसी विभाजित पाठ के कारण पर्याप्त सहानुभूति नहीं पा सका था।

आधुनिक काल में गांधारी के भी चरित्र के विकास की कई कोशिशें दर्ज हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर के गीति-नाट्य ‘गांधारीर आबेदन’ से लेकर अदिति बैनर्जी के उपन्यास ‘द कर्स ऑफ गांधारी’ तक गांधारी के चरित्र के विकास की क्षीण लेकिन लंबी परंपरा है। सुमन केशरी का नाटक ‘गांधारी’ इस परंपरा की नवीनतम कड़ी है जो कई दृष्टियों से विलक्षण व रेखांकित करने योग्य है। किसी भी औसत भारतीय स्त्री की भाँति गांधारी का जीवन भी पितृसत्ता की संरचना में निबद्ध है। ‘गांधारी’ की गांधारी विद्रोही नहीं है, वह पूर्वनिर्धारित लकीर पर चलती है। पिता का साम्राज्य बचाने के लिए अंधे धृतराष्ट्र से विवाह करती है और हस्तिनापुर के राजकुल की मर्यादाओं का पालन करती है। परंतु, उसके लिए सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य होता है कुंठित, आत्मविश्वासहीन, शक्की व तुनकमिजाज पति धृतराष्ट्र को प्रसन्न रखने का। भीष्म की अपेक्षा थी कि वह अपने अंधे पति की आँखें बने। पर उसका चाक्षुष होना धृतराष्ट्र के लिए ग्रंथि का विषय है।

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गांधारी उनकी इस ग्रंथि को ताड़ लेती है और कहती है, “ओह! अपनी इन्हीं आँखों के कारण मैं आपके मन में पूरी तरह समा नहीं पा रही… ये ही तो बाधा बन रहे हैं न! लीजिए इसी पल मैं देव के इस भेद को मिटा देती हूँ?” (पृ 52) उनकी इस ग्रंथि को गला देने के लिए ही वह आजीवन आँखों पर पट्टी बाँधकर पति के समान ही नेत्रहीन बने रहने का संकल्प लेती है। इससे धृतराष्ट्र न असहमत होते हैं और न ही दुखी बल्कि उसके इस फैसले को सुनने के बाद ‘गदगद’ होते हैं, “धृतराष्ट्र के चेहरे पर विजयी का दर्प और संतोष है। वे गांधारी को तुरंत आलिंगन में भर लेते हैं।” (पृ 53) यद्यपि कि गांधारी अपनी आँखों को हमेशा के लिए ढँकने को ‘स्वेच्छा से दृष्टिहीन’ बनना कहती है लेकिन उसका बड़ा भाई शकुनि समझ जाता है कि इसके लिए धृतराष्ट्र जिम्मेदार है, “अब बहिन ने अपने पति को प्रसन्न करने के लिए आँखों पर पट्टिका बाँध ली… और यह धृतराष्ट्र… जितना मैं उसे जानता हूँ, उसके आधार पर तो यह कह ही सकता हूँ कि उसी दुष्ट ने गांधारी को ताने दिये होंगे…” (पृ 59) और गांधारीॽ उसका मन ही जानता होगा कि कितनी यातना व प्रताड़ना के बाद उसने यह संकल्प लिया होगा! इतने दिन तक अपने मन की बात को उसने मन में ही रखा और पति को प्रसन्न करने का आत्मघाती अभिनय करती रही लेकिन महायुद्ध समाप्त होने के बाद नाटक के दृश्य-16 में शर-शय्या पर लेटे भीष्म से वह आँखों पर पट्टी बाँधने का सत्य अंतत: कह ही देती है, “महाराज मेरे संग जिस तरह का व्यवहार करते थे ऐसे में मेरे पास आँखें मूँद लेने के अलावा चारा भी क्या था…” (पृ 94)।

उस परिस्थिति में गांधारी के लिए यही स्वाभाविक था। उसके चरित्र की महत्ता इसमें नहीं है बल्कि इसमें है कि वह समझौते से भरे स्त्री-जीवन की यातना और त्रासदी के प्रति चेतस है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री द्वन्द्व से ज्यादा अंतर्द्वंद्व में होती है। उसके बाह्य जीवन से ज्यादा उसका भीतरी जीवन अर्थपूर्ण होता है। गांधारी भी बाहर से अधिक अपने भीतर है। द्वंद्व से अधिक अंतर्द्वंद्व में खुलती है। सुमन केशरी ने गांधारी के इस अंतर्द्वंद्व को नाटकीयता और कृत्रिमता से बचाते हुए बड़ी स्वाभाविकता और सहजता से उजागर किया है। यह संयोग नहीं है कि गांधारी नाटक में किसी और पात्र की तुलना में बार-बार ‘स्वगत’ कथन करती है। यानी खुद से बात करती है। गांधारी अपने लिए कुछ नहीं चाहती। वह अपने को पितृसत्ता पर होम कर देती है लेकिन धर्म व नीति के लिए वह लगातार एक मशाल की तरह प्रज्ज्वलित रहती है। वह कभी भी नहीं चाहती कि अधर्म और अनीति के मार्ग पर चलकर उसके बच्चे हस्तिनापुर का सिंहासन प्राप्त करें। राजसभा में द्यूतक्रीड़ा में छल से पांडवों के राज्य इंद्रप्रस्थ का छीनना, द्रौपदी का भरी राजसभा में मानमर्दन और कौरवों का युद्धोन्माद, उसने सबका विरोध किया और सबकी निंदा की।

रवीन्द्रनाथ टैगोर के ‘गांधारीर आबेदन’ की गांधारी विद्रोही है। हस्तिनापुर की राजसभा में द्रौपदी के चीर-हरण प्रकरण के बाद वह विचलित हो जाती है और धृतराष्ट्र से दुर्योधन के परित्याग का ’आबेदन’ करती है। वह जानती थी कि यदि दुर्योधन को ऐसे ही कुछ भी करने की छूट मिलती रहेगी तो कौरव-कुल का विनाश अवश्यंभावी होगा। राजकाज पर दुर्योधन की पकड़, दूसरे राज्यों से उसके सहयोगपूर्ण गठबंधन और धृतराष्ट्र के उसके प्रति अप्रश्नेय पुत्र-प्रेम के चलते दुर्योधन का परित्याग दुष्कर तो था लेकिन असंभव नहीं था। धृतराष्ट्र ऐसा कर सकते थे। गांधारी यही मानकर परित्याग का निवेदन करती है। यदि उसकी बात सुन ली गयी होती तो ‘महाभारत’ की त्रासदी से बचा जा सकता था। सुमन केशरी के ‘गांधारी’ में परित्याग का आवेदन-प्रसंग तो नहीं है लेकिन इसमें भी यह दिखाया गया है कि सत्य व न्याय के लिए वह अपने पुत्रों की जानों की भी परवाह नहीं करती थी। गांधारी युद्ध में अपने पुत्रों को खो देने के बाद शर-शय्या पर लेटे भीष्म को धिक्कारती है कि द्रौपदी के साथ अत्याचार को रोकने के लिए या उसका दंड देने के लिए “आपने दुर्योधन, दु:शासन और कर्ण के सिर धड़ से अलग क्यों न कर दियेॽ” (पृ 95) पर राजकाज पुरुषों का काम था, स्त्रियों की सलाह और शिक्षा की परवाह किसे थी? इस वजह से हस्तिनापुर के तुमुल कोलाहल और पुरुषों के युद्धोन्माद में गांधारी की विवेकसम्मत, नीति और धर्म की रक्षा के लिए उठती चीखें दबती रहीं। जिसकी शिकायत वह भीष्म से करती है,“किंतु हर बार मेरा विरोध हुआ।” (पृ 94)

गांधारी को मालूम था कि दुर्योधन स्वार्थ, प्रतिशोध और अधर्म के रास्ते पर चल रहा है। उसकी विजय की कामना करना धर्म व नीति को तिलांजलि देना है इसलिए महायुद्ध शुरु होने के पहले दुर्योधन के बार-बार निवेदन (…आप हमें मुक्त कंठ से विजयी होने का आशीष क्यों नहीं देतीं…) करने के बावजूद विजयी होने का आशीर्वाद नहीं दिया। केवल यह सीख दी, “बेटा तुम सबसे एक ही बात कहनी है कि अब तक जो हुआ सो हुआ… लेकिन अब तुम लोग युद्ध की नीतियों और मर्यादाओं का पालन करना…”(पृ84) युयुत्सु, गांधारी का सौतेला पुत्र, जो पांडवों के पक्ष से लड़ता है, के साथ अन्य कौरवों की तुलना में लंबे संवाद का विधान करके सुमन केशरी ने महाभारत के युद्ध में सैद्धांतिक स्तर पर पांडवों के प्रति और उससे भी ज्यादा धर्म व नीति के प्रति गांधारी की निष्ठा को व्यक्त करके उसके इस पक्ष को उजागर करके सराहनीय कार्य किया है। इस संवाद से स्पष्ट होता है कि वह सत्य व धर्म के लिए पांडवों की तरफ से लड़ने के युयुत्सु के फैसले से बहुत संतोष महसूस करती है और कहती है, “युयुत्स! तुम्हें नहीं पता कि तुम्हारे इस निर्णय ने मेरे मन को कितना शांत किया है… जानते हो अपनों के विरुद्ध खड़ा होना ही सबसे कठिन काम है… तुममें यह साहस है कि तुम सत्य के लिए अपनों के विरुद्ध खड़े हो सको … मैं चाहते हुए भी कभी ऐसा कर नहीं पाई… बेटा! भले ही तुम मेरी कोख से पैदा नहीं हुए पर तुम ही मेरे सच्चे पुत्र हो…” (पृ 87)

दुर्योधन को इस बात का मर्मांतक कष्ट था कि उसकी माँ धर्म व सत्य के लिए इतना निष्पक्ष है कि वह ‘अपनों के विरुद्ध खड़ी’ हो सकती है। वह गांधारी से कहता है, “मैं कहता न था कि आप सदा पांडवों का साथ देंगी…” (पृ 85) कैकेयी से गांधारी की तुलना करने पर गांधारी के व्यक्तित्व व चरित्र की विशिष्टता व महानता का पता चलेगा। सुमन केशरी ने बड़े रचनात्मक संतुलन साधते हुए तथा नाटकीयता से बचते हुए गांधारी की इस महानता को उभारा और रेखांकित किया है। नामानुरूप यह नाटक महाभारत की गांधारी के जीवन पर आधारित है लेकिन बड़े कौशल से इसमें महाभारत का सार संचित किया गया है। नाटक की विधा ही यह सुविधा बेहतर ढंग से दे सकती है कि एक लंबे कालखंड की घटना-बहुल व पात्र-संकुल कथा को अलग-अलग दृश्यों में बाँटकर कहा जा सके। सुमन जी ने इस विधा के माध्यम से महाभारत का एक ‘संक्षिप्त संस्करण’ ही तैयार कर दिया है। महाभारत में गांधारी का चरित्र एक दीर्घजीवी चरित्र है। महाभारत की सभी महत्वपूर्ण घटनाएँ उसके जीवन-काल में ही होती हैं। इसलिए उसकी कहानी के साथ-साथ महाभारत की कहानी भी आ जाती है।

सुमन केशरी, लोकमंच पत्रिका

‘गांधारी’ में बड़े प्रामाणिक ढंग से कौरव पक्ष का वर्णन मिलता है। पांडव अप्रस्तुत हैं। कौरव प्रस्तुत हैं। नाटक के माध्यम से सुमन केशरी ने कौरवों के भीतर-बाहर की कथा को पूरी नाटकीयता व तनाव के साथ कहा है। धृतराष्ट्र के चरित्र को खोलने में सुमनजी को अदभुत सफलता मिली है। नाटक की मुख्य उपलब्धि है महाभारत के पुरुष-केन्द्रित वीरगाथात्मक, रक्तरंजित सत्ता-संघर्ष, और महायुद्ध की विभीषिका के विशाल अरण्य में आच्छादित स्त्रियों की दुनिया की शिनाख्त और उसका प्रकाशन। हस्तिनापुर के राजकुल की स्त्रियों के इर्द-गिर्द बसी स्त्रियों की इस दुनिया को दिखाना ही नाटककार का केन्द्रीय अभिप्रेत है। नाटक में कुल 26 पात्र हैं। इनमें से केवल 9 पात्र पुरुष हैं जबकि शेष 17 पात्र स्त्रियाँ हैं। जिनमें महारानी से लेकर दासी तक हर स्तर की स्त्रियाँ शामिल हैं। इसमें स्वयंवर व राजकीय भय दिखाकर जीती गयी, अपहृत, खरीदी गयी, स्त्रियों की भरमार है। जाहिर है, इसमें स्त्रियों के चयन के अधिकार व पसंद-नापसंद की स्वतंत्रता की कोई जगह नहीं है। स्त्रियों की यह दुनिया है तो महाभारत की जगद्विख्यात कथा का ही अंग लेकिन नाटक में इस दुनिया को केन्द्र में रखकर नाटककार ने महाभारत का एक क्रिटीक तैयार कर दिया है। जिससे महाभारत की व्याख्या के नये गवाक्ष स्वत: ही खुल जाते हैं।

महाभारत पर समग्रता में सोचते समय यह दुनिया ओझल रह जाती रही है। ‘गांधारी’ नाटक ने इस उपेक्षित को ही अपेक्षित बना दिया है। हल्के में कहें तो यह नाटक एक तरह से दो महाभारतों के अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए बाध्य करता है : एक पुरुष-महाभारत व दूसरा स्त्री-महाभारत। प्रकटत: कौरव-पांडवों की युद्धभूमि कुरुक्षेत्र के समानांतर महाभारत की इन दो दुनियाओं में अप्रकट संघर्ष व तनाव के कुरुक्षेत्र का पता भी नाटक देता है। इस तनाव व संघर्ष को किसी भी स्त्री पात्र के माध्यम से रेखांकित किया जा सकता है। गांधारी, द्रौपदी, माद्री, कुंती, उत्तरा किसी के भी माध्यम से। सबका हाल कमोबेश एक-सा है।‘गांधारी’ नाटक महाभारतकालीन समाज में स्त्रियों की नियति से साक्षात्कार का दस्तावेज है। महाभारत की स्त्रियाँ न स्वतंत्र हैं, न विद्रोहिणी हैं और न ही शासक हैं। पितृसत्तात्मक राजतंत्र में स्त्रियों के लिए तय जगह व दी हुई भूमिकाएँ ही वे अदा करती हैं। उनमें आज की तरह का कोई स्त्रीवादी चिंतन भी नहीं है। लेकिन, इतने गहरे व सुविभाजित लैंगिक भेदभाव में वे अपने नियतिबोध से वंचित होंगी, ऐसा मानना मूर्खता होगी। महाभारत के स्त्री पात्रों से आज के स्त्रीवाद के तर्कों को उसी के मुहावरे व शब्दावली में कहलवाना अस्वाभाविक व बचकानापन ही होता। सौभाग्य से सुमनजी ने ऐसा नहीं किया है। सामयिक स्त्री-विमर्श से आक्रांत न होते हुए महाभारत की स्त्रियों की संवेदना व मुहावरे को पकड़ना निहायत ही कठिन काम है। सुमन जी ने विश्सनीय व स्वाभाविक ढंग से उन स्त्रियों के अस्तित्व व अस्मिताबोध को पकड़ा है। गांधारी का चरित्र इस बोध का निर्वहन करता है।

‘गांधारी-भीष्म संवाद’ में गांधारी क्रोध में भीष्म को धिक्कारती है, “आप इसीलिए चुप्पी साधे रहे क्यों कि एक स्त्री का अपमान हो रहा था… आप सभी के लिए हम स्त्रियाँ केवल स्त्रियाँ हैं…आपने हमें कभी मनुष्य माना ही नहीं! अन्यथा आपने वह दुष्कर्म होने न दिया होता!” (पृ95) महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद कृष्ण गांधारी से मिलने आते हैं। गांधारी ने कृष्ण को महायुद्ध का जिम्मेदार मानते हुए शाप देती है कि जैसे कौरव-वंश का नाश हुआ वैसे ही कृष्ण के अपने यदु-वंश का समूल नाश हो जाएगा। कृष्ण ने गांधारी का अभिशाप स्वीकार किया और गांधारी को याद दिलाया, “माता क्या शाप देने से पहले तुमने यह नहीं सोचा कि मेरे वंश के नाश का दु:ख भी तो स्त्रियाँ ही सहेंगी…! वे यहाँ कुरुक्षेत्र में भी रो रही हैं और वहाँ द्वारका में भी वे ही रोएँगी!” (पृ 91) कृष्ण के यह स्मरण कराने के बाद गांधारी ग्लानि व पाश्चाताप में डूब जाती है, “आह! यह मैंने क्या किया… आह! मेरा शाप तो अंतत: हम स्त्रियों पर ही अभिशाप बनकर फूटेगा…आह!!” (पृ91) गांधारी-कृष्ण संवाद के माध्यम से सुमनजी ने यह रेखांकित किया है कि युद्ध की सबसे बड़ी भुक्तभोगी स्त्रियाँ ही होती हैं। महाभारत की प्रत्यक्ष भुक्तभोगी स्त्रियाँ ही थीं।

इस सत्य को नाटक के अंतिम दृश्य में बहुत मर्मभेदी व पीड़ादायक परिवेश में स्थापित किया गया है। इस दृश्य में कुरुवंश की सभी स्त्रियाँ एक साथ आयी हैं। यह स्वाभाविक है क्योंकि वे एक ही कुल की बधुएँ हैं। उनमें संबंध वैचारिक बहनापे का नहीं, पारिवारिक है। वे एक दूसरे के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप करती हैं। गिले-शिकवे करती हैं। एक दूसरे का सच जानकार अपने मन के मैल धोती हैं। और पाती हैं कि सबकी हालत एक ही है। सब मानती हैं, “इस युद्ध ने तो एक भी कोख नहीं छोड़ी…”(गांधारी) और “इसीलिए तो आज रो रही हैं हम सब…”(द्रौपदी)। कल तक जिन स्त्रियों के श्वसुर-पति-पुत्र एक दूसरे के खून के प्यासे थे उन्हीं पुरुषों की माताएँ-पत्नियाँ-बधुएँ-बहनें मिलकर उत्तरा-अभिमन्यु के पुत्र की कामना करती हैं। परीक्षित पैदा होता है, फिर से कुरुवंश की विधवाएँ व दौपदी कुलदीपक-परीक्षित में अपना व हस्तिनापुर का भविष्य देखने लगती हैं। इसी उम्मीद के साथ नाटक का अंत होता है! महायुद्ध व विध्वंस के बाद सृजन के नवांकुरण के साथ।

किसी नाटक की रंगमंचीयता की संभावना पर विचार किये बिना उस पर कोई भी चर्चा अधूरी रहती है। इसलिए ‘गांधारी’ की रंगमंचीयता पर बात जरूरी है। यद्यपि कि किसी भी अन्य साहित्य विधा की तरह नाटक भी पढ़े जा सकते हैं पर नाटक की असली कसौटी रंगमंच है। रंगमंच पर प्रस्तुतीकरण हर नाटक की अंतर्निहित विधागत मनोकामना होती है। रंगमंच पर मंचित होकर ही कोई नाटक पूर्णता प्राप्त करता है। ‘गांधारी’ की रंगमंचीयता पर प्रामाणिक ढंग से विचार सुलझे रंग-निर्देशक ही दे सकते हैं पर नाटक व रंगमंच की सामान्य समझ रखनेवाले भी यह समझ सकते हैं कि नाटक पाठक को ध्यान में रखकर लिखा गया है कि दर्शक को। इस दृष्टि से ‘गांधारी’ नि:संदेह एक सफल मंचीय नाटक सिद्ध हो सकता है। नाटककार ने अपनी तरफ से निर्देशक व अभिनेता-अभिनेत्रियों की सुविधा के लिए पर्याप्त रंग-निर्देश दिये हैं। एक आकार को छोड़ दें तो इसके सफलतापूर्वक मंचन में कोई अड़चन नहीं दिखायी देती है। वैसे भी रंगमंच की दृष्टि से अत्यंत अव्यावहारिक व असाध्य नाटकों के भी सफल मंचन हो चुके हैं। यानी कि मौलिक व उत्कृष्ट कथा, संवाद, चरित्र-चित्रण जैसे नाट्य-तत्वों से संपन्न पर रंगमंच की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण किसी श्रेष्ठ नाटक की रंगमंचीयता से जुड़ी व्यावहारिक चीजों का समाधान किया जा सकता है। ‘गांधारी’ किसी भी दृष्टि से मंच पर उतारे जाने योग्य है।

सुमन केशरी ने अपनी कल्पना के सहारे ‘महाभारत’ की कथा में कई मौलिक उद्भावनाएँ की हैं। गांधारी के बचपन से उन्होंने पहली बार सबको परिचित कराया है। इसके साथ-साथ शर-शय्या पर मरणासन्न भीष्म से गांधारी के संवाद का प्रकरण भी उनकी कल्पना की उपज है। हस्तिनापुर की पितृसत्ता के संरक्षक ’पितामह’ से उसी कुल की एक उत्पीड़ित नारी समस्त नारियों की ओर से सवाल-जवाब ही नहीं करती है बल्कि धिक्कारती है। इसी तरह नाटक का अंतिम दृश्य भी सुमनजी की कल्प-सृष्टि है। उन्होंने अपनी कल्पना से महाभारत के कई रिक्त स्थानों को भरा है, उसमें स्त्रियों के मनों की बातों को जोड़ा है। फिर भी किसी को ये कल्पना-प्रसूत प्रकरण न खटकते हैं और न ही अखरते हैं। और न ही प्रक्षिप्त लगते हैं, तो इसका कारण महाभारत की कथा के लेखन-पुनर्लेखन की समृद्ध परंपरा व उसका हमेशा नवीन व्याख्याओं और पुनर्प्रस्तुतियों के लिए प्रस्तुत रहना है। इसका कुछ श्रेय सुमन केशरी की पौराणिक कथाओं को रचनात्मक ढंग से काव्य में ढालने की बहुप्रशंसित संवेदनशीलता व कलात्मक साधना को भी जाता है। रचनात्मक कल्पना और उच्च साहित्यिक मूल्यों से संपन्न मौलिक हिंदी नाटकों की परंपरा में ‘गांधारी’ अवश्य समादृत होने का अधिकारी है।

डॉ आनंद पांडेय, लोकमंच पत्रिका

लेखक- डॉ आनंद पांडेय ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में पीएचडी की है। आप वर्तमान में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, पुणे में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

यह लेख राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती के फरवरी 2022 के अंक में प्रकाशित हो चुका है। लेखक से अनुमति लेकर इस लेख को पुनः प्रकाशित किया गया है।

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