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लोकनाट्य: अवधारणा, इतिहास और स्वरूप- अरुण कुमार

हिन्दी ऑनर्स के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी

‘लोक’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की ‘लोकृ दर्शने’ धातु में ‘धञ’ प्रत्यय जोड़ने से हुई है। ‘लोकृ दर्शने’ का अर्थ होता है- देखना। अतः ‘लोक’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘देखना’ होता है, परन्तु व्यवहार में ‘लोक’ शब्द का अर्थ ‘सम्पूर्ण जनमानस’ के लिए होता है। ऋग्वेद में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग ‘जन’ के पर्यायवाची शब्द के रूप में हुआ है। भरतमुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग करते हुए लिखा है कि – इस शास्त्र की रचना लोक मनोरंजनार्थ की जा रही है। यहां ‘लोक’ शब्द से भरतमुनि का आशय साधारण जनता से ही है।

अंग्रेज़ी के ‘फोक’ शब्द का प्रयोग अशिक्षित, अर्द्धशिक्षित, असभ्य, अर्द्धसभ्य वर्ग के लिए किया जाता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अंग्रेज़ी के ‘फोक’ शब्द से हिन्दी के ‘लोक’ शब्द का भिन्न अर्थ लगाते हैं। वे लिखते हैं- – “लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है बल्कि नगरों और गांवों में फैली हुई वह समूची जनता है जिनके व्यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियां नहीं हैं। ये लोग नगर में परिष्कृत रुचि सम्पन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रुचि वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारता को जीवित रखने के लिए जो भी वस्तुएं आवश्यक होती हैं उनको उत्पन्न करते हैं। ( हिन्दी साहित्य का वृहत इतिहास, षोडष भाग , प्रस्तावना, पृष्ठ 3 ) 

सामान्यतः हिन्दी में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग ‘जन’ शब्द के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। वासुदेव शरण अग्रवाल ने ‘जन’ शब्द का प्रयोग ‘ग्राम्य’ के अर्थ में किया है। हिन्दी साहित्य में भी ‘लोक’ शब्द का प्रयोग ‘सामान्य जनता’ के अर्थ में होता रहा है। गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग करते हुए ‘लोक’ और ‘वेद’ दोनों की अलग-अलग सत्ता स्वीकार की है-

‘लोकहु वेद सुसाहिब रीती।

विनय सुनत पहिचानत प्रीती।।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी ‘लोक मंगल’ और ‘लोकरंजन’ को श्रेष्ठ काव्य की कसौटी मानते हुए ‘लोक’ शब्द का कई बार प्रयोग किया है। डॉ कृष्णदेव उपाध्याय ने ‘लोक’ शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि जो लोग संस्कृत या परिष्कृत वर्ग से प्रभावित न होकर अपनी पुरातन स्थितियों में ही रहते हैं, वे ‘लोक’ कहते हैं।

समग्र रूप में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग उस जनसमूह के लिए किया जाता है, जो साज-सज्जा, ऊपरी दिखावा, सभ्यता एवं शिक्षा आदि से दूर आदिम मनोवृत्तियों से युक्त होता है।

लोकनाट्य का इतिहास

भारतीय नाट्य परंपरा के उद्गम की ओर जब हमारी दृष्टि जाती है तब हम सर्वप्रथम वेदकालीन ग्रंथों की जांच पड़ताल करते हैं। ऋग्वेद को विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथों की सूची में रखा जाता है। ऋग्वेद में भी लोकनाट्य की उपस्थिति का प्रमाण मिलता है। ऋग्वेद में नृत्यकला का इतना प्रचार हो चुका था कि उषा का वर्णन करते हुए उसकी उपमा एक नर्तकी से की गई है। नाटक के मुख्य अवयव संवाद का उल्लेख भी ‘पुरुरवा-उर्वशी संवाद’, ‘यम-यमी संवाद’, ‘इन्द्र-इंद्राणी संवाद’ आदि में उपलब्ध है। सोमपान के अवसर पर एक लघु अभिनय का भी प्रसंग ‘कात्यायन श्रौतसूत्र’ में मिलता है। ‘यजुर्वेद’ की ‘वाजसनेय संहिता’ के तीसवें अध्याय में शैलूष जाति का उल्लेख है जो व्यवसाय के रूप में नाटक करती थी। इन्हीं कुछ दृष्टान्तों के आधार पर प्रोफेसर मैक्समूलर ने अनुमान लगाया है कि भारतीय नाट्य के आदि श्रोत वेदों में उपलब्ध कर्मकांड के मंत्र हैं। प्रोफेसर लेवी ने भी मैक्समूलर के मत का समर्थन करते हुए कहा है कि वैदिककालीन भारत में नृत्य और संगीत कला उन्नत अवस्था में थी। 

रामायण के रचयिता वाल्मीकि ने राम के राज्याभिषेक के समय अयोध्यावासियों द्वारा मनाए जा रहे उत्सवों का वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि नटों, नर्तकों और गायकों द्वारा प्रस्तुत वचनों को जनता सुन रही थी। राम को कुश और लव ने सीता की कथा सुनाई थी उसके संबंध में कुछ विद्वानों की राय है कि कुश और लव नट ही थे। इससे इतना तो सिद्ध हो जाता है कि रामायण काल तक नाटक का अस्तित्व बना हुआ था। रामायण के बाद महाभारत में दो नाटकों का उल्लेख है- रामायण नाटक और कौबेर-रंभाभिसार नाटक। ऐतिहासिक दृष्टि से ये दोनों नाटक बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। कौबेर-रंभाभिसार में कौन व्यक्ति ने किस पात्र का अभिनय किया है, इसका भी विवरण मिलता है। इसी प्रकार बौद्धकाल में लोकनाट्य के अस्तित्व का प्रमाण ‘विनयपिटक’ से मिलता है। विनयपिटक के चुलवग्ग में एक कथा मिलती है कि एक बार अश्वजित और पुनर्वसु नामक दो बौद्धभिक्षु  किटागिरी में नाटक देखने जाते हैं। नाटक के बाद वे दोनों इतने प्रभावित हुए कि संघाटी फैलाकर नर्तकी के साथ मधुर आलाप करने लगे। इसकी सूचना पाकर विहार के महास्थविर ने दोनों को संघ से निकाल दिया। 

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पतंजलि ने दो धार्मिक नाटकों-कंस वध और बालि वध का उल्लेख किया है। कंस वध के संबंध में कुछ विद्वानों का मानना है कि कृष्ण और कंस के बीच के युद्ध को नट अपने चेहरे को रंगकर प्रदर्शित करते थे। डॉ कीथ का मानना है कि पतंजलि के समय तक नट केवल नर्तक ही नहीं रह गए थे बल्कि संगीत तथा अभिनय कर नाटक करते थे। कीथ ने आगे लिखा है कि संस्कृत नाटक ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी से प्राचीन नहीं तो उससे अधिक अर्वाचीन भी नहीं हैं। और इनकी प्रेरणा महाकाव्यों के गायन तथा कृष्ण जीवन की उन घटनाओं से प्राप्त हुई जिनमें बालक कृष्ण अपने शत्रुओं से संघर्ष करते हैं और उन पर विजय प्राप्त करते हैं। ये नाटक विभिन्न अवसरों पर खेले जाते थे। विशेष अवसरों के अतिरिक्त प्रसिद्ध पर्व-त्योहारों पर राजा द्वारा नियुक्त नटों द्वारा नाटक खेले जाते थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, ऐसे नाटक केवल सरस्वती मंदिरों तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि इनका मंचन अन्य देव मंदिरों में भी होता था। शादी-ब्याह, पुत्र-जन्म, या अन्य आनन्द व्यंजक अवसरों पर नागरिक रंगशाला और नाचघर बनवा लेते थे।” उस समय पारिवारिक स्तर पर भी मनोरंजन के लिए लोकनाट्यों की व्यवस्था की जाती थी। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि उस समय भी लोकनाट्य परंपरा मौजूद थी। यह परम्परा आज तक ग्रामीण क्षेत्रों में चली आ रही है। आज भी शादी-ब्याह या अन्य अवसरों पर नौटंकी, रसप्रिया या लोकगीतों का आयोजन कर लेते हैं।

अपभ्रंश काल में भी लोकनाट्यों की मौजूदगी के प्रमाण मिलते हैं। अपभ्रंश  में प्राप्त ‘रास’ या ‘रासउ’ काव्य इसके पुष्ट प्रमाण हैं। रास एक गीत-नृत्य परक गेय काव्य है, जिसे गायक अभिनयपूर्वक गाकर सुनाता था। इसका स्पष्ट उल्लेख अद्दहमाण रचित ‘संदेश रासक’ में मिलता है। ‘रामायणु अहिणवियइ कत्थवि कयवरिहि’ अर्थात कहीं मायावी नट रामायण का अभिनय करते हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि पालि, प्राकृत और अपभ्रंश काल में लोकनाट्य प्रचलित थी। 

लोकनाट्य का स्वरूप

‘लोकनाट्य’ शब्द ‘लोक’ और ‘नाट्य’ दो शब्दों के योग से बना है। ‘लोक’ की कृति जब नाट्यरूप में संवादों के माध्यम से किसी कथा को प्रस्तुत करे तो उसे ‘लोकनाट्य’ कहते हैं। इसे आकर्षक और प्रभावी बनाने के लिए नृत्य, संगीत, अभिनय तथा वेशभूषा आदि का प्रयोग किया जाता है। डॉ श्याम परमार ने ‘लोकनाट्य’ की परिभाषा देते हुए लिखा है कि- “लोकनाट्य से तात्पर्य नाटक के उस रूप से है, जिसका संबंध विशिष्ट शिक्षित समाज से भिन्न सर्वसाधारण के जीवन से हो और जो परंपरा से अपने-अपने क्षेत्र के जनसमुदाय के मनोरंजन का साधन रहा हो।” डॉ श्याम परमार आगे लिखते हैं- “लोकनाट्य लोक-रंजन का आडम्बर हीन साधन है, जो नागरिकों के मंच से अपेक्षाकृत निम्न स्तर का, पर विशाल जन के हर्षोल्लास से संबंधित है। ग्रामीण जनता में इसकी परंपरा युगों से चली आ रही है। चूंकि लोक में ग्रामीण एवं नागरिक जन सम्मिलित हैं, अतः लोकनाट्य एक मिले-जुले जन समाज का मंच है। परिष्कृत रुचि के लोक के लिए जिन नाटकों का विधान है, उसकी आधारभूमि यही लोकनाट्य है।

जगदीश चंद्र माथुर ने बड़े व्यवस्थित ढंग से लोकनाट्य की विशेषताओं के बारे में बताया है-

1 लोकनाट्य समूह या समाज की अनुभूतियों, भावनाओं एवं प्रवृत्तियों की अभिव्यंजना करता है, किसी व्यक्ति की कल्पना और अनुभावों की नहीं। लोक की स्वाभाविक भाषा पद्य होती है तथा लोकनाट्य के संवाद पद्यात्मक होते हैं।

2 इसके पात्र प्रवृत्ति विशेष या समूह विशेष के द्योतक होते हैं।

3 खुला रंगमंच, दृश्य परिवर्तन का अभाव (प्रायः एक पर्दा सबसे पीछे टँगा रहता है।

4 अभिनय में संकेत, नृत्य के हाव-भाव युक्त अभिनय

5 धार्मिक, पौराणिक, सामाजिक, ऐतिहासिक तथा प्रेम पर आधारित कथा। बीच-बीच में विदूषक का आगमन जो मर्मस्पर्शी अभिनयों के बीच में आदर्श उपदेश या सम सामयिक विषमताओं का दुखड़ा रोना या उच्च वर्ग पर छींटे कसे जाते हैं।

6 कथानक का महत्व कम, रसानुभूति द्वारा तृप्ति का महत्व क्योंकि कथाएं प्राय: परिचित होती हैं।

7 नाटक मंडली का प्रत्येक सदस्य आवश्यकतानुसार प्रत्येक कार्य- विदूषक, नायक, निर्देशक सभी कार्य कर सकता है।

8 लोक जीवन के रीति-रिवाज या उत्सवों का उल्लेख आवश्यक है। उसमें लोक प्रचलित गीत एवं कहावतों का समावेश भी अवश्य रहता है।

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लोकनाट्य में मंच सामान्यतः खुला होता है। किसी मंदिर के प्रांगण में या किसी खाली मैदान में बांस और तख्तों से मंच तैयार कर लिया जाता है। किसी चौपाल के चबूतरे का भी उपयोग मंच के रूप में कर लिया जाता है। इसमें पर्दों का भी प्रयोग नहीं होता। दृश्य परिवर्तन की अपेक्षा न होने के कारण पात्रों के प्रसाधन के लिए अलग स्थान या प्रेक्षागृह की भी व्यवस्था करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। लोकनाट्य में सभी पात्र एक साथ मंच पर आ जाते हैं और नाटक के अंत तक वहीं रहते हैं।

लोकनाट्य में प्रकाश की व्यवस्था पारंपरिक संसाधनों के माध्यम से ही होती है। लोक जीवन में जहां बिजली या गैस की सुविधा नहीं है वहां लालटेन, पेट्रोमैक्स या मशाल जलाकर प्रकाश की व्यवस्था की जाती है। यदि लोकनाट्य का प्रदर्शन जाड़े की रात में किया जा रहा है तो अलाव जलाकर भी प्रकाश की व्यवस्था की जाती है।

लोकनाट्यों में पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे हारमोनियम, सारंगी, मृदंग, नगाड़ा, ढोलक, ढफली, झांझ, मंजीरा आदि का ही प्रयोग किया जाता है।

भरतमुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में अभिनय के चार प्रकार बताए हैं- आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक। इनमें से केवल आंगिक और वाचिक का प्रयोग ही लोकनाट्य में होता है। आंगिक अभिनय के अंतर्गत ही हावभाव और मुद्राएं आती हैं। लोकनाट्य में अभिनय के साथ-साथ गीत, संगीत एवं संगीत का समन्वय होता है।

लोकनाट्यों के आरम्भ की शैली अत्यंत रोचक होती है। सबसे पहले निर्देशक मंच पर आकर नाट्य का परिचय और उसके महत्व के बारे में बताता है। उसके बाद भगवान गणेश या अन्य किसी देवता की वंदना की जाती है। इसके बाद लोकनाट्य की विधिवत शुरुआत होती है। इसके पूर्वार्द्ध में कथानक की गति धीमी होती है लेकिन उत्तरार्द्ध में तीव्र हो जाती है। लोकनाट्यों का अंत प्रायः सुखांत होता है। नाट्य के प्रदर्शन के बाद स्थानीय देवी-देवता के नाम का जयकारा लगाया जाता है। रामलीला के अंत में हनुमान को आदरपूर्वक विदा करने की परंपरा है। यह मान्यता है कि जहां भी रामलीला का प्रदर्शन होता है वहां हनुमान जी जरूर देखने आते हैं। इसी कारण रामलीला के समाप्त होने पर हनुमान जी को विदा किया जाता है।

डॉ अरुण कुमार, लोकमंच पत्रिका
डॉ अरुण कुमार, लोकमंच पत्रिका

लेखक- डॉ अरुण कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, लक्ष्मीबाई महाविद्यालय व संपादक, लोकमंच पत्रिका। सम्पर्क- 8178055172, 9999445502, arunlbc26@gmail.com

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