लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
गोपाल मोहन मिश्र की कविता- मां सरस्वती

अर्चना के पुष्प चरणों में समर्पित कर रहा हूँ ,

मन हृदय से स्वयं को हे मातु अर्पित कर रहा हूँ I

मूढ़ हूँ मैं अति अकिंचन सोच को विस्तार दो ,

माफ़ कर मुझ पातकी को ज्ञान से तुम वार दो I

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लोभ, स्वार्थ, दम्भ और घमंड काट दो हे मातु तुम,

स्वच्छ निर्मल भाव की सौगात दो हे मातु तुम I

कर सकूँ आक्रमण तम पे, कलम में वो धार दो माँ,

बस सकूँ बन प्रिय हृदय, शब्द का संसार दो माँ।

हो मेरा निर्मल चरित्र,उज्जवल धवल तेरे वस्त्र सा,

कर लेखनी को सशक्त, वह आघात कर दे शस्त्र साI

तोड़ डाल अंकुर तुरत हे माँ, कलम के व्यापार का,

पुत्र आकाँक्षी है माता, बस तुम्हारे प्यार का।

मैं स्वयं संग कुटुंब के, तेरे गुण प्रवर्तित कर रहा हूँ,

अर्चना के पुष्प चरणों में समर्पित कर रहा हूँ I

मन हृदय से स्वयं को हे मातु अर्पित कर रहा हूँ I

गोपाल मोहन मिश्र, कमला हेरिटेज, ब्लॉक – ‘ए’ फ्लैट नंबर – 201, बरहेता ,पी.ओ. – लहेरियासराय, दरभंगा (बिहार) पिन- 846001, मोबाइल नंबर – 9631674694

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14,407 thoughts on “गोपाल मोहन मिश्र की कविता- मां सरस्वती

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