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डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना में गीतों में जीवन की अभीप्सा- देवीदत्त मालवीय

आज 1 फरवरी 2022 को हिन्दी-भोजपुरी के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना का जन्मदिन है। लोकमंच पत्रिका परिवार अपने प्रिय साहित्यकार को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ प्रेषित करता है। पढ़ें, उनके गीतों पर यह आलेख- संपादक।

डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना, लोकमंच पत्रिका, फ़ोटो साभार नवजागरण प्रकाशन

जीवन जीने की इच्छा शक्ति मानव को कठिन से कठिन परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है वहीं जीने की कामना जीवन के प्रत्येक बाधाओं से लड़ने हेतु बल देती है, क्योंकि उसमें सकारात्मक ऊर्जा होती है जो जिजीविषा को प्रबल तो करती ही है वहीं जीवन जीने की सार्थक अभिलाषा कवि डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना के गीतों में देखने को मिलती है। जब व्यक्ति भावावेशित होता है तब अपने उद्गारों को काव्य की भाषा में प्रकट करता है फिर गीत का जन्म होता है। व्यक्ति के व्यक्तित्व और उसकी आंतरिक अनुभूतियों तथा भावों को जीवंत भाषा में व्यक्त करने की क्षमता गीतिकाव्य की विशिष्टता होती है।

गीतकार की अनुभूतियों की तीव्रता और व्यक्तिगत भाव, गीत में रागात्मकता के तत्त्व भर देते हैं। संवेदनाओं को झंकृत करने वाले गीत दीर्घकाल तक मानस पटल पर अपनी झंकृतियाँ छोड़ जाते हैं और कभी-कभी तो एक गीत व्यक्ति के संपूर्ण जीवन में ही परिवर्तन ला देता है यही कारण है कि सूर तुलसी और मीरा द्वारा रचित भक्तिपरक गीत आज़ भी मानव जीवन के उदात्त विचार तथा सुकोमल संवेदनाओं को प्रभावित किये हुए हैं।

डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना, लोकमंच पत्रिका
डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना, लोकमंच पत्रिका

समय के साथ जीवन मूल्य बदलते हैं तो गीतकार का नजरिया बदलता है, मानवीय संवेदनाओं के स्तर परिवर्तित होते रहते हैं और इन सबमें बदलाव के कारण रसिक श्रोताओं एवं पाठकों की मानसिक अवधारणाएँ भी बदल जाती हैं। सुप्रसिद्ध पाश्चात्य आलोचक ‘एबरक्रॉम्बी’ ने गीति काव्य में संगीतात्मकता को महत्वपूर्ण माना है, जो अर्थ को चमत्कृत कर दे।(1)और ऐसे ही डॉ मस्ताना के गीतों को पढ़ना संगीत के साथ आगे बढ़ना है।

सच्चा गीतकार वही होता है, जो समाज का पथप्रदर्शक बन समाज में नया स्वर भर दे, नयी चेतना जगा दे। हारे थके उदास अंतर में नया प्राण भर दे। गीतकार डॉ. मस्ताना भी एक पथ-प्रदर्शक गीतकार हैं। इन्होंने मानवीय जीवन में आनेवाले सुख और दुःख दोनों को अंगीकार करते हुए जीत में सुख और दुःख दोनों ही के बारे में लिखा। केवल सुख के बारे में नहीं, केवल दुःख के बारे में भी नहीं। समकालीन गीतकारों में डॉ. मस्ताना की अपनी एक अलग पहचान है।

ओज का प्राकट्य उनके गीतों की विशेषता है। उन्होंने गीतों में नवाचारों का प्रयोग करते हुए भारतीय दर्शन से उसे जोड़ा है। गीतों में नये-नये आयामों का बोध कराते हुए गीतों को ऊँचाई दी है। इनके गीतों में संयोग-वियोग, धूप-छाँव की रागात्मक अनुभूतियाँ परिलक्षित होती हैं। उनके गीतों में प्रकृति नये रंग-रूप, नई उमंग के साथ दिखाई देती है।

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डॉ. मस्ताना के गीतों में आत्मविश्वास एवं दर्द के प्रति पूरी सहानुभूति तो दिखाई देती है, साथ ही गीतों के भावों को अनुभव की ताजगी से पूरे उमंग के साथ प्रस्तुत किया है और यही कारण है कि इनके गीत पाठकों को आकृष्ट तथा श्रोताओं को वाह वाह कहने पर मजबूर कर देते हैं। तभी तो वरिष्ठ गीतकार दिनेश भ्रमर डॉ मस्ताना के हिंदी गीत संग्रह ‘ रेत में फुहार ‘ का आमुख लिखते हुए कहते हैं कि “डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना आज के समय में एक सर्वमान्य सर्व स्वीकृत गीतकार के रूप में स्थापित गीतकार हैं। अभाव में जन्म लेकर संघर्ष से आगे बढ़ने अदम्य इच्छाशक्ति लिए शिक्षा के क्षेत्र में त्रिकालदर्शिता से साक्षात्कार कराया और गीत कविता के क्षेत्र में अपनी सक्षम भागीदारी से उन्होंने अपने आप को स्थापित किया है।”(2)

डॉ० गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ जैसे गीतकार का निर्माण अभाव और संघर्षों की जमीन से होता है। व्यवहार से सरल और स्वभाव से विनम्र तथा गुणग्राही डॉ० ‘मस्ताना’ अपनी निरंतर काव्य-साधना की बदौलत ही अपनी अमिट छाप छोड़ देते हैं। इनके गीत इनके व्यक्तित्व तथा कवित्व के लंबे जीवन अनुभवों, संघर्षों, संवेगों, सरोकारों और व्यापक सामाजिक संदर्भों को रूपायित करने वाले हैं। गीतकार के गीत-संग्रह ‘गीत मरते नहीं’ का आरंभ ‘रागदरबारी’ शीर्षक गीत से होता है, जो मर्मस्पर्शी होने के साथ प्रांजल तथा आकर्षक बन जाता है-

“आँसू की खेती होती है, मेरी चारदीवारी में

जीवन को जीना पड़ता है, जीने की लाचारी में धरती का श्रृंगार आदमी

सुरभित मलय बयार आदमी

नील गगन का प्यार आदमी

प्रकृति का उपहार आदमी

यही आदमी काट रहा है, एक-एक पल दुश्वारी में।”3

डॉ० ‘मस्ताना’ के गीतों में हृदय की भावुकता का निर्बाध स्रोत फूट पड़ा है। अपनी कुशल गीति कला का परिचय देते हुए उन्होंने अपनी समृद्ध विविध रंगी कल्पना का योग कर उनको और अधिक मनोहारी बना दिया है। उनकी सामाजिक चेतना अपनी गीत-सृष्टि के माध्यम से जागरण का उद्घोष करती है। उनकी एक कविता ‘काव्य-चिंतन’ की पंक्तियां दृष्टव्य है-

“भाव में हो नभ की ऊँचाई

हृदय में सागर की गहराई

तब कविता लिख ।

लगे हीर में पीर पराई

शब्द क्रांति जब ले अंगड़ाई

तब कविता लिख । (4)

बदले वैश्विक परिवेश की चिंता कवि की राजनीतिक चेतना को उद्बोधित करती है। उनका ‘प्रलय’ शीर्षक यह गीत प्रासंगिक है-

“हम खड़े हुये हैं विश्व युद्ध की कगार पर

कुन्डियां बजा रही है मृत्यु द्वार द्वार पर

मुंड झुंड रक्त कुण्ड जीभ लपलपा रहे

रोम-रोम भयाकृत, हड्डियाँ कँपा रहे

नित प्रलय विहँस रहा विनाश की कगार पर। (5)

आज देश की सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्था कपट, व्यभिचार एवं प्रपंचों से भरी पड़ी है। लोकतंत्र के नाम पर लूट-खसोट का बोलबाला है। ऐसे में गीतकार का यह परम कर्त्तव्य हो जाता है कि वह गीतों के माध्यम से सच के आईने में इन प्रपंचियों का असली चेहरा दिखाये। डॉ० गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ ने अपने इस कर्त्तव्य का निर्वहन बखूबी किया है। उनकी कविता ‘कर्णधार’ में उपरोक्त भाव स्पष्ट हो रहा है –

“कर्णधारों देश के जागो निरेखो

राष्ट्र भ्रष्टाचार मे औधा पड़ा है।

अनसुना है न्याय का आग्रह निरन्तर

शोषकों अन्यायियों का दल खड़ा हैं।” (6)

डॉ. मस्ताना के गीतों में उनका आत्मालोचन और आत्मानुसंधान की प्रवृत्ति देखने को मिलती है जो गीतों को संबल बनाती है। गीतकार आत्म-संतोष और सम्मान का जीवन जीना चाहता है, उधार और किसी का कृपा पात्र बनकर ऐश्वर्य की चाह नहीं रखता। ‘मुखौटा’ नामक कविता में डॉ. मस्ताना ने सत्तासिनों की असलियत को उजागर किया है –

“दरपन दरपन देख लिया,

सबके सब चेहरे काले हैं।

दोनो हाथों लूट रहे घर,

जो घर के रखवाले हैं

राजमार्ग पर चलने वाले राजधर्म को भूले

जनगण धूल धूल में, वे अम्बर झूले में झूले

जिनके पग-पग में विचलन,वे सत्ताडोर संभाले है। (7)

गोरख प्रसाद मस्ताना
गोरख प्रसाद मस्ताना, लोकमंच पत्रिका

राष्ट्र के प्रति प्रेम और समर्पण प्रत्येक नागरिक का परम कर्त्तव्य होता है। गीतकार भी इसका अपवाद नहीं होता। गीतकार ने जगह-जगह राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति भी की है।

“जनता का गौरव हिन्दुस्तान, देश है पावन तीर्थ महान

शंखनाद जयघोष मध्य मुस्काता है दिनमान

गंध सुगंध सुमन का प्रतिपल

निर्झरणी का कलकल छलछल

पवन चंदनी सुरभित शीतल

खग विहगों का कलरव कोमल

गंध सुगंध सुमन का प्रतिपल। 8

निश्चित रूप में इनके गीत राष्ट्रीयता एवं देश-प्रेम के भावों से संपुष्ट है। डॉ० गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ के गीतों का धरातल आत्मकेन्द्रित नहीं है, अपितु प्रतिनिवेदन के साथ जीवन के कटु एवं विकट सत्यों को आधुनिक संवेदना से जोड़कर पेश करता है। वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. रामदरश मिश्र गीत मरते नहीं के बलर्ब पर लिखते हैं – ‘मस्ताना के गीतों का सस्वर पाठ हृदय के तारों को झंकृत कर देता है कारण छंद की सहजता और सुरों की लयात्मकता है।’

डॉ. मस्ताना के गीतों की विशेषता है कि इसमें गेयता, संक्षिप्तता, आत्मभिव्यंजकता, अनुभूति प्रवणता, भावोच्छ्वास की सहजता, प्रभावान्विति, अंतर्निहित संगीतात्मकता और सशक्त भाषा शैली उपस्थित है इसलिए उनके गीतों को पढ़ने के बाद जाफ्राय की बात याद आती है कि आत्मनिष्ठा सहज आत्म प्रेरणा और भावावेश की तीव्रता ही गीतिकाव्य के स्वरूप को निर्धारित करती हैं। इस काव्य-रूप का एकमात्र उद्देश्य जीवन की आशा- निराशा, वेदना-आल्हाद, हर्ष-उन्माद, रहस्य आदि को उद्घाटित करना है। पिट्सबर्ग, संयुक्त राज्य अमेरिका से प्रकाशित द्विभाषिक पत्रिका ‘सेतु’ के फरवरी अंक 2020 में डॉ गोरख मस्ताना का ललित गीत बहुत ही प्रभावशाली है-

“पतझड़ मेरे नाम से लिख दे,

बसंत अपने पाले रख

तम बयनामा कर दे मुझको,

खुद सुरमयी उजाले रख

मेरा क्या मैं मरूं भले,

मुस्कान से अपनी डंस दे

मेरा रहना क्या रहना बस,

बांह से अपनी कस दे

छाले मेरे पांव में भर दे,

स्वयं को सुमन हवाले रख।” (9)

पाश्चात्य विद्वान बैन ने लिखा है कि गीतिकाव्य कवि का स्वलाप है यानि ‘स्व’ की अभिव्यक्ति है जिसको डॉ मस्ताना की कविता संपुष्ट करती है। उनकी एक कविता ‘ अपना सूरज’ उल्लेख करने योग्य है –

“मैने निज सूर्य उगाया है पर उससे प्रकाश कण लिया नहीं,

दुःख अभाव का विष है अपना, दूजे का अमृत पिया नहीं।”(10)

डॉ मस्ताना की रचनाएं गीत प्रधान हैं और उनमें विचारों की एकरूपता (uniformity)है साथ ही आत्मपरकता के लक्षण मौजूद हैं।

डॉ मस्ताना के इस को गीतों पढ़ने के बाद प्रो एस टी लॉड की कही बात याद आती है-
उन्होंने गीतिकाव्य को हिंदी रहस्यवादी कवियों की भांति आध्यात्मिकता से संबंध माना है। वे Outlines of Aesthetics का अनुवाद करते लिखते हैं कि ‘… The lyric, a movement of fancy by which the spirit strives to life itself from limited to the universal….’ (P-99)

डॉ. मस्ताना के दूसरे काव्य संग्रह ‘रेत में फुहार’ में संकलित कविता ‘ स्तुति क्यों?’ में रहस्यवाद और आध्यात्मिकता का भाव दिखता है-

“मृत्यु अगर सत्य है साथी फिर जीवन की स्तुति क्या?

सशक्त कर जो पल समक्ष है बीते क्षण की स्मृति क्या?

वे जो सदा स्वर्ग के इच्छुक, डरते हैं पग पग पर

यथार्थवादी कहते कुछ भी, अपना नहीं यहां पर

जब कुछ नहीं यहाँ अपना तो,

फिर सपनों से संगति क्या? 12

अंत में यह उद्धृत करता आवश्यक है कि डॉ मस्ताना के संपादन में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘अक्षर अक्षर बोलेगा ‘ में प्रकाशित उनकी रचना ‘धुँधला वर्तमान’ जीवन के धुंधलके में भी परिवर्तन की अपेक्षा रखती है और अपनी आशावादिता को अक्षुण बनाए रखती हैं और यही कवि को, जीवन के प्रति अभीप्सा को सिद्ध करता है –

वर्तमान के धुँधलेपन में, कई पड़े हैं लोग

यहां भविष्य की चिन्तामय उलझन,

लाइलाज है रोग यहां

परिवर्तन का कृणांगन, अपनी वसुधा का आँगन

द्वेष दर्प गूंगे होंगे, हरषेगा पुनः सुरांगन

रहे आदमी, सदा आदमी बनकर हो उत्योग यहां। (13)

वस्तुत: गीत जीवन-संघर्ष की कोख से ही जनमता है और इस संघर्ष में जीवट अभाव और पीड़ा के क्षणों में भी गुनगुना लेता है। यही जीवटता उसके जीने की उत्कट चाह को दर्शाती है और यही चाह शब्दों में ढल कर डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना के गीतों में अंकित हो गई है।

देवीदत्त मालवीय, लोकमंच पत्रिका

लेखक– देवीदत्त मालवीय, शोधार्थी, हिंदी विभाग, बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय , मुजफ्फरपुर, बिहार।

संदर्भ:

1″The poet relies, indeed, on his music for the full expression of what he has to say, but the importance of the music depends on the meaning of the words.” Lascelles Abercrombie; Poetry: its Music and Meaning, Oxford University Press, P-49

  1. रेत में फुहार, हिंदी गीत संग्रह, डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना, जेबीएस पब्लिशर्स इंडिया, नई दिल्ली, वर्ष 2017
  2. गीत मरते नहीं, हिंदी गीत संग्रह, डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना, शारदा पुस्तक मंदिर, नई दिल्ली, 2014, पृष्ठ संख्या 19
    4.वही, पृष्ठ संख्या 30
  3. वही, पृष्ठ संख्या 39
  4. वही, पृष्ठ संख्या 92
  5. वही, पृष्ठ संख्या 98
    8.वही, पृष्ठ संख्या 86
  6. सेतु, मासिक हिंदी पत्रिका, फरवरी अंक 2020, कविता खंड, पिट्सबर्ग, संयुक्त राज्य अमेरिका।
    10.गीत मरते नहीं, हिंदी गीत संग्रह, डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना, शारदा पुस्तक मंदिर, नई दिल्ली, वर्ष 2014, पृष्ठ 105
    11.Outlines of Aesthetics, पृष्ठ 99
    12.रेत में फुहार, हिंदी गीत संग्रह, डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना, जेबीएस पब्लिशर्स इंडिया, नई दिल्ली, वर्ष 2017,पृष्ठ 36
  7. अक्षर अक्षर बोलेगा, साझा काव्य संग्रह, संपादक डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना, नवजागरण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृष्ठ 25
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