लोकमंच पत्रिका

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बिहार पहुंच कर ‘नरभसा’ गए शरद जोशी

दिवंगत शरद जी तो बेजोड़ व्यंग्यकार थे। राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी के घनिष्ठ मित्र थे। पर, बिहार पर यह आइटम लिखने में उन्होंने अलंकार का कुछ ज्यादा ही इस्तेमाल कर दिया है जो अलंकार लगाया, उसका नाम है अतिशयोक्ति अलंकार ! खैर, अलंकर भी साहित्य की शोभा है। अपील है कि बिहारी लोग उसे बाद देकर ही पढ़ें। दिवंगत जोशी जी का 1 अप्रैल, 1990 के नवभारत टाइम्स में बिहार पर एक करारा व्यंग्य छपा था। तब उस पर बिहार में मिलीजुली प्रतिक्रियाएं हुई थीं। मेरे कई मित्रों की वर्षों से यह सलाह रही है कि मैं अपने संदर्भालय से निकाल कर एक बार फिर उस चर्चित व्यंग्य को बांचने का अवसर उन्हें दूं। सो वह यहां प्रस्तुत है- सुरेंद्र किशोर

बिहार महज एक प्रांत नहीं है एक पूरी दुनिया है अपने आप में । भुखमरी है, गरीबी है, लू है, बाढ़ है, कड़कड़ाती सर्दी है, कला और संस्कृति है, इस सबके बीच जिन्दगी है, जिन्दादिली है, इंकलाबी रूह है। व्यंग्यकार शरद जोशी पिछले दिनों बिहार गए तो उन्होंने पाया कि वक्त के साथ बदलते बिहार में आज दिल को लुभाने वाली देसी अंग्रेजी हर तरफ लहलहा रही है। ‘आक्सफोर्ड’ अऊर ‘केम्भ्रिज’ जूनिभर्सिटी के अंग्रेजी विद्वान तथा समस्त बिहार में मिसनरी इस्कूल और अस्पताल के आसपास बने अंग्रेजों के कब्रस्तान में लेटी भूत पलीत आत्माएं आज की डेट में यह सोच कर खुस हो सकती हैं आनेवाली सदियों में अंग्रेजी भाषा का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है। इंग्लैंड में मिलाकर अंग्रेजी भाषा हर कहीं मरे पर वह सदा-सर्वदा के लिए बिहार प्रांत में लोक बोली के रूप में जीवित रहेगी। इसमें हमें सक का कोई गुंजाइश नहीं लगता क्योंकि अंग्रेजी का लगभग सभी वर्ड और मुहावरा फ्रेज आदि जस का तस बिहार की हिंदी में फुल्ली डिजाल्व अर्थात घुलमिल गया है।

अंग्रेजी का वर्ड उपयोग किए बिना बिहार का आदमी अपनी बात हिंदी में समझा ही नहीं सकता और यह गुण बिहार का इलाइट वर्ग में ही नहीं, वहां का कामन मेन तक साफ में साफ नजर आता है। और आज की तरीख में बिहार का इलाइट माने लालू यादव का क्लास का आदमी है जिसका माइंड एकदम इन्टरनेशनल है। जहां से सबसे पहले हिंदी का सवाल उठा था, ठीक वहीं ही नहीं ,अंदर गांव गांव में शब्द दर शब्द अंग्रेजी भाषा हिंदी को फचीट कर आउट कर रही है। सारे अपराधी आजकल कल्प्रिट कहलाते हैं,अपराध की जगह क्राइम हो रहा है।वातावरण में तनाव की जगह टेंसन ने ले ली है। हत्याएं समाप्त होकर मर्डर होने लगे हैं।और समस्या यह है कि के पुलिस को हैंडिंग ओवर करने पर भी एक्सन नहीं लिया जा रहा है।

बिहार में हिंदी भाषा से तात्पर्य बोली और अंग्रेजी का कंबिनेशन है। यदि कोई भला आदमी बिहार में अपनी बात कहने का प्रयत्न करे तो उसके सामने आज भी वहीं समस्या है जो वर्षों पूर्व भगवान बुद्ध के सामने थी जो समझ नहीं पा रहे थे कि अपना प्रथम व्याख्यान किस भाषा में दें जिससे सामने बैठा खैनी मलता बिहारी भाई समझ सके। बड़ा प्राब्लम है। मैं जब पटना उतरा तो मुझसे पूछा गया कि ‘क्या आप टूल डाउन से आ रहे हैं ? ’मैंने हड़ताल के अर्थ में टूल डाउन मुहावरा सुना था इसलिए मुझे यह समझने में बड़ी कठिनाई हुई कि यहां टूल डाउन से तात्पर्य ट्वेल्व डाउन से है जो ट्रेन के लिए कहा जाता है। वहीं कुली के मुख से नरभस शब्द सुना।इन्क्वायरी की खिड़की पर मेरे प्रश्न के उत्तर में बिहारी अंग्रेजी के वाक्य का अर्थ निकालने का प्रयत्न करते हुए बार-बार मेरी नजर अपनी अटैची पर जा रही थी। मुझे डर लग रहा था कि जल्दबाज प्रवृत्ति का वह कुली चल न दे। तब इत्मिनान दिलाते हुए उस कुली ने मुझे कहा , ‘‘आप इतने नरभस क्यों हो रहे हैं ?’’ नरवस शब्द नरभस हो वहां की बोली में समा जाएगा, मैंने सोचा न था। जब मैंने यह किस्सा पटना में एक सज्जन को सुनाया तो उन्हें आश्चर्य नहीं हुआ। वे बोले, आप नरभसाए रहे होंगे, तभी कुली ने देख कर कहा होगा।

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यह सुन अंग्रेजी के सुरक्षित भविष्य को लेकर मेरे मन में कोई संदेह नहीं रह गया। जहां अंग्रेजी का नरवस नरभसाए होकर जीवित है, वहां अंग्रेजी के लिए नरवस होने का सवाल ही नहीं उठता। बिहार बिलकुल बदल गया है। पटना में अब भवन या मंजिल नहीं बनते वहां अब अपार्टमेंट और काम्पलेक्स बन गए हैं। आदमी बहुत व्यावहारिक और स्पष्ट वक्ता हो गया है।अतीत से लेकर भविष्य तक को एक मिनट में गड्डमड्ड करके वह अपनी बात कह सकता है।जैसे उसके मुख से यह वाक्य सुनकर चौंकना नहीं चाहिए कि राम ने रावण का मर्डर किया था।यहां की भाषा में मारना और मर्डर करना एक ही है। मर्डर शब्द भी आम है और यह क्रिया जनजीवन में सामान्य है। मर्डर के आंखों देखे हाल सुनाते हुए जिसमें कहने वाले की स्वयं की भागीदारी प्रायः रहती है, वे किसी किस्म की पीड़ा नहीं पालते। एक प्रकार की संवेदनाशून्य..

कुछ वाक्य मैंने सुने, वे ऐसे थे। ‘‘नौभारत टाइम्स को शुरू में डिफिकल्टी रहा, पर बाद में पब्लिक उसे लाइक करने लगा।’’ ‘‘सी.एम.आजाद बड़े आनेस्ट थे, पर जब वे रांग आदमी का पाइंट ऑफ व्यू सुनने से रिफ्यूज करने लगे तब उन्हें बदलना पड़ा।’’ ‘‘लगता है कि आप प्राब्लम में बहुत इन्भाल्ब हो गए हैं।’’……………………………………………………………………

मुझे लगता है कि यदि मैं अधिक दिनों तक बिहार में रहता तो वहां की भाषा की प्राब्लम में सचमुच बहुत इन्वाल्व हो जाता और यह लेख मुझे अंगेजी में लिखना सरल पड़ता,……………………………………………………

चारों ओर अंग्रेजी शब्दों की बौछार होती रहती है बिहार में …………………………………–चारों ओर अंग्रेजी शब्दों की बौछार होती रहती है। कुली, रिक्शावाला, पानवाला कोई भी बात करे, वह अंग्रेजी शब्द का प्रयोग किए बिना रह नहीं सकता। एक स्थान पर रेल रूक गई। शायद किसी ने जंजीर खींच दी। खिड़की के पास बैठे दूसरे बिहारी यात्री ने वार्तालाप आरंभ किया। ऊपर की बर्थ पर लेटा मैं सुन रहा था। लगता है चेन पुलिंग हुआ है। आसपास कोई भिलेज भी नहीं है एकदम फारेस्ट में आकर चेन पुलिंग करने का का मतलब ?–फिजूल पसिन्जरों को भेस्ट ऑफ टाइम करते हैं ये लोग।–एही से तो टे्रन लेट होती है।–इस तरह चेन पुलिंग होने लगा तो गार्डऊ ससुर का करेगा ।–रेल्वई का अथारिटी खतम हो गया है भाई।–उंह । भेस्ट आफ टाइम। एक बार रूक गया तो स्टाटे नहीं हो रहा है। मैं ऊपर लेटा सोच रहा था, शरद तुमने हिंदी को समझने में कोई बुनियादी भूल तो नहीं की। क्या तुम इस भाषा में लिख सकते हो जो यहां इन दिनों पूरे आत्म विश्वास से बोली और समझी जा रही है।

एकाएक इन वर्षों में बिहार में हिंदी इस तेजी से जगह जगह फट पड़ेगी और उसमें आंग्रेजी शब्द अपने को स्थानीय रंग दे समा जाएंगे, यह मैंने सोचा न था। सच यह है कि मुझे वहां बात करने में कठिनाई होती थी क्योंकि जो मैं बोलता था, वही मुझसे प्रश्न के रूप में पूछा जाता था जिसका मुझे वही उत्तर देना पड़ता था जो मैं पहले कह चुका होता था। जैसे मैंने पटना में डाक बंगला रोड पर पूछा था। नर्मदा अपार्टमेंट कहां है ? नर्मदा अपार्टमेंट ? उसने प्रश्न किया।–जी ।नर्मदा अपार्टमेंट जाना है ? उसने फिर प्रश्न किया। जी नर्मदा अपार्टमेंट ।–देखिए, यहां से स्ट्रेट जाइए। फिर लेफ्ट को मुड़ के वहीं पिटरोल पंप के पास पूछ लीजिए। तभी एक और सज्जन आ गए और पूछने लगे, का बात है ?–इन साहिब को नर्मदा जाना है, दूसरे ने उत्तर दिया। इस पर वे सज्जन मेरी ओर घूमे और बोले–आपको कहां जाना है ?- नर्मदा अपार्टमेंट, मैंने कहा।- क्या नर्मदा अपार्टमेंट जाइएगा ?– जी। इन्होंने बताया कि आगे से लेफ्ट टर्न है। मैंने पिंड छुड़ाकर आगे बढ़ने का प्रयत्न करते हुए कहा।–आपको नर्मदा अर्पामेंट ही जाना है ना ?-जी।–ऐसा कीजिए, आप इहां से सीधे स्ट्रेट चले जाइए और जब लेफ्ट टर्न आए तो मुड़ जाइए। वहीं एक पिटरौल पंप है, वहीं देखिएगा या किसी से पूछिएगा पूछ लीजिएगा कि नर्मदा अर्पाटमेंट कहां है तो वहीं कोई बता देगा।,–हमने बताया इन्हें, दूसरे ने कहा। बताया ना। फिर काहे पूछ रहे हैं ?–आप सीधे चले जाइए।–जी, धन्यवाद। मैं बढ़ने लगा।–क्या नर्मदा अर्पाटमेंट जाना है, एक और आवाज आई। इस बार मैं नहीं रूका। पर पीछे से किसी ने कहा कि स्ट्रेट चले जाइए, फिर लेफ्ट को मुड़ जाइए। मुझे लगता है कि उस तीसरे व्यक्ति को मेरा न रूकना अच्छा न लगा होगा और ताज्जुब नहीं, उसने मुझे अंग्रेजी मिश्रित वाक्य में गाली भी दी हो। डेम फूल ससुर, यहीं है, नहीं जानते नर्मदा अपार्टमेंट कहां है ?…………………………..

मैले कुचैले कपड़ों में झुके हुए बूढ़े, खाली से बैठे पता नहीं किस आशा में टकटकी लगा कर देखते युवक, अपनी आयु से बड़ी लगने वाली कुपोशण और मेहनत से टूट सी गई महिलाओं को देख लगता है कि बिहार आज भी वही और वैसा ही है जैसा गांधी जी ने चंपारण की यात्रा समय देखा था। वही गरीबी और बेकारी जिसे दूर करने की सोचते राजेंद्र बाबू हाथ मलकर रह जाते थे। इतने दिनों बिहार ने अपना भविष्य संवारने की कोशिश में किस्म किस्म के नेता पैदा किए करने और उन्हें पालने, आगे के बढ़ाने अतिरिक्त क्या किया। अब तो नेता भी उत्पन्न नहीं होते क्योंकि गुंडे बदमाश उनकी जगह पहले ही ले लेते हैं। पर नेताओं ने और कुछ न किया हो, बिहार के लोगों को यह भ्रम सफलता से दे दिया कि आधुनिक बन जाना कोई कठिन नहीं है।बस जीवन व्यवहार में अंग्रेजी के शब्द, जुमले आदि अपना लीजिए और बढ़कर जोर देकर बोलिए। जैसे नेता और अफसर अपनी प्रशासन की भाषा में बात करता है और उसी अंदाज में बिहार का अदना आदमी भी बात करने लगा।

उसे इससे क्या मिला वह वे देख ही रहे हैं पिछले माहों में या हो सकता है कि पिछड़ेपन का सारा कांप्लेक्स दूर करने के चक्कर में बिहार अंग्रेजी पर उतर आया है। बिहारी तो अंग्रेज न होगा, न होना चाहेगा पर अंग्रेजी का बिहारीआईजेशनहो रहा है उसे देख चैंक जाना स्वाभाविक है। लोग कहेंगे नरभसा गए बिहार जाकर जोशी इसलिए मैं यह अनुभव किसी को सुना भी तो नहीं सकता।

सुरेन्द्र किशोर लोकमंच पत्रिका
सुरेन्द्र किशोर, लोकमंच पत्रिका

प्रस्तुति- सुरेन्द्र किशोर, वरिष्ठ पत्रकार, पटना, बिहार।

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