लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
पलायन की पीड़ा और छठ की याद – अरुण कुमार

यह लेख प्रभात खबर के राष्ट्रीय संस्करण में दिनांक 09 नवम्बर 2021 को प्रकाशित हुआ है।

हम बिहारी दुनिया के किसी कोने में रहें लेकिन जैसे ही ‘उ जे केरवा जे फरले घवध से, ओपर सुगा मेड़ड़ाय’ गीत कानों में घुलता है, आंखों से झर-झर आंसू बहने लगते हैं। ये आंसू हमारे बारह-पन्द्रह साल तक के बच्चों को अजीब लगते हैं। वे हमारी आंखें, हमारे चेहरे पढ़ने लगते हैं। वे सोचने लगते हैं कि बादशाह, हनी सिंह के जमाने में इस गाने में ऐसा क्या है जिससे सुनते ही पापा अपने आंसुओं को नहीं रोक पाते हैं। छठ उनकी जेहन में नहीं है लेकिन हमारी पीढ़ी तक के लोगों ने तो छठ को जीया है। हमारे लिए छठ केवल एक पर्व भर नहीं है। यह तो हमारी आत्मा, हमारे संस्कार तक से जुड़ा हुआ है। छठ में घर जाना उस पूरे जीवन को एक बार फिर से जी लेने जैसा है जिससे दूर निकल आए हैं। कार्तिक का महीना शुरू होते ही जान-पहचान वाला हर बिहारी मित्र जरूर पूछता है- छठ में घर जा रहे हैं? घर न जाने की असमर्थता जाहिर करते ही उनके मुंह से ‘च्च’ निकल जाता है। वे एक तरह से चिढ़ाते हुए कहते हैं हम तो जाएंगे दिवाली के कल होकर। पूछने पर कि टिकट मिला या नहीं तो हमेशा यही जवाब होता है टिकट मिले या न मिले जाना तो है ही। हर साल सरकार द्वारा ‘पूजा स्पेशल’ ट्रेनों की व्यवस्था की जाती है लेकिन हर साल घर जाने वालों की संख्या अधिक हो जाती है। सबको टिकट नहीं दे पाती सरकार। हमारे लिए सब पुल्लिंग है, टिकट भी, रेलगाड़ी भी, बस भी, सवारी भी, भीड़ भी, सरकार भी। सरकार न दे टिकट लेकिन छठ में घर जाने से नहीं रोक सकती। दिवाली के छह दिनों के बाद छठ होता है। बिहार में दिवाली पर घर रहें न रहें, छठ में जरूर रहना है। माँ जब भी फोन करती है यही पूछती है- छठ में आवे के बा नू?

कार्तिक का महीना शुरू होते ही जान-पहचान वाला हर बिहारी मित्र जरूर पूछता है- छठ में घर जा रहे हैं? घर न जाने की असमर्थता जाहिर करते ही उनके मुंह से ‘च्च’ निकल जाता है। वे एक तरह से चिढ़ाते हुए कहते हैं हम तो जाएंगे दिवाली के कल होकर।

एक आम बिहारी छठ में सशरीर घर जाए या न जाए यादों में जरूर जाता है। छठ में बेटे के घर आने के भी कई सन्दर्भ हैं। यदि बेटा कुंवारा है तो छठ के बाद उसकी शादी कर देनी है। छठ के अगले दिन यानी परना के दिन से विवाह के लिए वर-वधु की खोज शुरू हो जाती है। बेटा यदि कमा कर लाएगा तो छप्पर बनवाना है, गाय खरीदनी है, चापाकल गड़वाना है, कर्ज चुकाना है आदि। बेटा आएगा तो नए कपड़े, रजाई आदि खरीदेंगे। बहन की शादी भी बेटा ही आकर तय करेगा। इन सबके अलावा मां की तो आस यही है कि जिसके लिए छठ कर रही है वह आकर छठी मैया का आशीर्वाद ले लेता तो उसका हृदय भी जुड़ा जाता। एक मां का सबसे बड़ा सुख यही है कि उसका बेटा उसकी आँखों के सामने रहे। वह दरअसल छठी मैया के नाम पर अपने लिए अपने बेटे को घर बुला रही होती है। छठ में घर जाने पर बचपन के सभी संगी-साथी से भी तो मिलना है। छठ में बेटी भी मायके जाएगी। मां से सहेलियों से ढेर सारी बातें करेगी।

छठ पूजा

हम बिहारियों के साथ घर को लेकर भी अजीब संवेदना है। हम ‘घर’ उसी को कहते हैं जो विरासत में मिला है या जहां मां छठ करती है। उस घर को छोड़कर शहर आए तो शहर वाले ‘घर’ को ‘डेरा’ कहते हैं। ‘डेरा’ से भी ‘घर’ जाने की लालसा हमेशा बनी रही। जब डेरा छोड़कर दिल्ली आए और मकान लिया चाहे वह किराए का हो या अपना, उसे क्या कहें आज तक समझ नहीं पाया। कभी रूम कहते हैं तो कभी फ्लैट तो कभी अपार्टमेंट, अभी तक इस ‘मकान’ को नाम न दे पाए। इस मकान में मां-बाबूजी के लिए जगह ही नहीं है। जब भी ‘घर’ से ‘डेरा’ और ‘डेरा’ से ‘मकान’ में शिफ्ट हुए माता-पिता छूटते चले गए। हम बिहारियों की यह अलग पीड़ा है जिसे हम जितनी शिद्दत से महसूस करते हैं उतना शायद ही कोई करता होगा।

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सब पूछते हैं ‘छठ’ में घर जा रहे हो’ तो मन दौड़कर उसी घर में पहुंच जाता है जिसे छोड़कर कब का आ गए थे। वह घर लेकिन मन से निकला नहीं है। बच्चों और पत्नी को लेकर बिहार से बाहर क्या आए सब कुछ धीरे-धीरे छूटता जाता है। रोटी की खोज सब कुछ छुड़ा देती है। भिखारी ठाकुर का ‘बिदेसिया’ बन जाता है आदमी। सब कुछ छोड़ जाता है भिखारी ठाकुर का ‘बिदेसिया’। लेकिन भिखारी ठाकुर को केवल प्यारी सुन्दरी का दुःख दिखाई देता है उसके माता-पिता का नहीं। बेटे के वियोग का दुःख कहाँ किसी साहित्यकार को दिखता है। आदिकवि बाल्मीकि को दिखा था। उन्होंने पिता दशरथ का वियोग देखा था। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास भी पिता दशरथ को पुत्र राम के वियोग में तड़पते हुए दिखाते हैं। दशरथ अपने मंत्री सुमंत से कहते हैं- सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना।

खैर, शारदा सिन्हा का छठ गीत कानों में घुला और मन उसी घर के आंगन में दौड़कर पहुंच गया। वहां दिवाली के बाद परिवार के सदस्यों की व्यस्तताएं बढ़ गई हैं। सब छठ की तैयारियों में लगे हैं। यह पर्व सामूहिकता, सामाजिकता और संयुक्त परिवार की अवधारणा को बल देता है। यह पर्व अकेले नहीं कर सकते, होगा ही नहीं। माई को बड़की माई की मदद लेनी होगी। बड़की माई दादी को खोजेगी ही। एक का काम दूसरे के बिना नहीं चल सकता। बाबूजी बड़का बाबूजी से पूछेंगे ही कि केला कहाँ सस्ता मिल रहा है? नारियल, संतरा, तेल, घी, गुड़, सुथनी, दउरा, सुपली अकेले कहां खरीद पाएंगे? बड़का बाबू जी को भी बाबू जी की मदद चाहिए ही। वह दृश्य बार-बार आंखों के सामने घूम जाता है जिसमें बाबूजी बड़का बाबू जी से निहोरा कर रहे हैं- ‘चलिए न जल्दी बाजार में भीड़ हो जाएगा।’ दोनों भाई एक ही साथ एक ही साइकिल पर बाजार जा रहे हैं। रोज कुछ-कुछ खरीदना है तभी छठ के दिन तक पूरी व्यवस्था हो पाएगी। इधर बाबूजी साइकिल से निकले और उधर मां को याद आया कि एक ही झोला लेकर बाजार चले गए। सब्जी वाला झोला तो लेकर गए ही नहीं। किसी बच्चे को दूसरा झोला लेकर दौड़ाया गया। पहले बच्चे भी दौड़कर बाबू जी को झोला दे ही आते थे। दउरा, सुपली, मिट्टी के हाथी, घोड़े, बर्तन आदि के लिए समाज की मदद लेने में संकोच कैसा ? मिट्टी का चूल्हा बगल वाली चाची बनाएंगी तो मेरा भी बना देंगी। मेरा बेटा उनके लिए भी मिट्टी ले आएगा। सब मिलकर एक दूसरे के घर जाएंगे और गीत गा आएंगे।

छठ पर्व पर सूर्य को अर्ध्य देती महिलाएँ, लोकमंच पत्रिका

छठ के अलावा ऐसा कोई त्योहार नहीं जिसकी तैयारी में बच्चे भी बड़े मनोयोग से भिड़े होते हैं। छठ घाट बनाने की जिम्मेदारी बच्चों और युवाओं पर ही होती है। यह प्रकृति के प्रति मनुष्य के प्रेम का भी पर्याय है। नदी के किनारे जमा साल भर का कूड़ा सभी मिलकर कुछ घण्टों में साफ कर चमका देते हैं। केले का थम, रंगीन कागज आदि से घाट को सजाकर ऐसे निहारते हैं जैसे कोई अपना महल निहारता है। गेहूं सूखाने और कौए से उसे बचाने की जिम्मेदारी तो बच्चे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। सभी भाई-बहन वहां से तब तक हिलते नहीं जब तक दादी आकर न कह दे कि गेहूं सूख गया है। ‘खरना’ का प्रसाद और ठेकुआ तो दौड़-दौड़ कर बांटते हैं। छठ के समय जगा इनके अंदर का आज्ञाकारी भाव सालों भर रह जाता तो कितना अच्छा होता!

कहते हैं कि महिलाएँ छठ बेटे के जन्म की खुशी में करती हैं लेकिन छठ करने वाले पुरुषों की संख्या भी कम नहीं है। बिहार के अधिकांश लड़के छठी मैया के ही तो दिए हुए हैं। मांगने वाले बेटी भी मांगते हैं। तभी तो घाट पर यह गीत भी छठव्रती महिलाएं खूब गाती हैं- रुनुकी झुनुकी बेटी माँगिले, घोड़वा चढ़न के दामाद हे छठी मैया।’ कुल मिलाकर संतान की कामना छठी मैया से की जाती है और पूरा होने पर व्रत करते हैं। हालांकि नौकरी, सुख, धन, स्वास्थ्य जो कुछ भी कमी है सब छठी मैया से ही तो मांगते हैं। वही देती हैं। एक यही ऐसा पर्व है जिसमें भक्त सीधे अपने भगवान से मांगता है। भक्त और भगवान के बीच कोई नहीं होता। छठी मैया सबकी सुनती हैं।

डॉ अरुण कुमार, लोकमंच पत्रिका
डॉ अरुण कुमार, लोकमंच पत्रिका

लेखक- डॉ अरुण कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। सम्पर्क- 8178055172, arunlbc26@gmail.com

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