लोकमंच पत्रिका

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कार्यालय क्रियाविधि – अरुण कुमार

दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘कार्यालयी हिन्दी’ पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए उपयोगी

कार्यालय में जब कोई सरकारी पत्र आता है तो उस पत्र पर जो कार्रवाई की जाती है उस प्रक्रिया को ‘कार्यालयी क्रियाविधि’ (Office Procedure) कहते हैं। कार्यालय क्रियाविधि से जुड़ी कई प्रक्रियाएं होती हैं जिन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है।

पंजीयन (Registration)

प्रत्येक कार्यालय में एक ‘पंजीयन विभाग’ या ‘इन्वेर्ड सेक्शन’ होता है। इस विभाग का कार्य कार्यालय में आने वाले सभी संचरणों (Communication) को स्वीकार करने, उनका पंजीयन करने और उन्हें संबंधित अनुभागों को भेजना होता है। ‘संचरण’ को कार्यालय की भाषा में ‘आवती’ या ‘प्राप्ति’ कहते हैं। किसी भी कार्यालय में संचरण तीन प्रकार से होता है- डाक से (By Post), हाथ से (By Hand) और हरकारे से (By Courier)

कार्यालय-समय के अनुसार सारे संचरण ‘पंजीयन विभाग’ द्वारा प्राप्त किए जाते हैं। ‘संचारण’ की स्वीकृति से ही ‘कार्यालय क्रियाविधि’ प्रारम्भ होती है। किसी अधिकारी के नाम पर आने वाले पत्र उस अधिकारी द्वारा स्वयं प्राप्त किए जाते हैं या उनके आदेश से उनके सहायक भी प्राप्त कर सकते हैं। पत्र प्राप्ति की रसीद (Receipt) भी हस्ताक्षर के साथ देनी पड़ती है। अवकाश के समय कार्यालय में आने वाले पत्रों को ‘ड्यूटी लिपिक’ स्वीकार करता है। यदि पत्र किसी अधिकारी के नाम से आया है तो ‘ड्यूटी लिपिक’ उस पत्र को अधिकारी के आवास पर भी पहुंचा सकता है। यदि पत्र पर ‘अविलंब’ लिखा हो तो उसे यथाशीघ्र संबंधित अधिकारी या कर्मचारी तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाती है। यदि पत्र पर ‘अविलंब’ न लिखा हो तो उसे ‘पंजीयन विभाग’ में ही रख लिया जाता है और अगले कार्य-दिवस’ पर संबंधित विभागों/अनुभागों को भेज दिया जाता है। यदि कार्यालय के किसी अधिकारी के नाम पर कोई पत्र आया है और वह अधिकारी छुट्टी पर है तो उस पत्र को उसकी जगह पर कार्य कर रहे अधिकारी के पास भेज दी जाती है। यदि पत्र पर ‘गुप्त’ (Confidential) या ‘परम गुप्त’ (Strictly Confidential) लिखा हो तो उस पत्र को उसी अधिकारी के पास भेजा जाता है जिसे इस पत्र को खोलने का अधिकार हो।

‘पंजीयन विभाग’ द्वारा प्राप्त पत्र पर कार्यालय की ‘दिनांक मुहर’ (Dated Seal) लगाई जाती है। मुहर का नमूना इस प्रकार है-

………………………विभाग दिनांक…………….को प्राप्त हुआ

पंजीयन संख्या ………………. अनुभाग डायरी संख्या …………….

किसी कार्यालय के किसी अनुभाग का क्या कार्य है, इसकी सूची ‘पंजीयन विभाग’ के पास होती है। इस सूची के आधार पर ‘पंजीयन विभाग’ पत्रों को संबंधित विभाग को प्रेषित कर देता है। ‘प्राप्ति’ संबंधित अनुभाग में कार्रवाई के लिए भेजने से पहले ‘पंजीयन विभाग’ द्वारा एक रजिस्टर में उसके बारे लिखा जाता है। इस रजिस्टर को ‘पावती रजिस्टर’ या ‘आवती रजिस्टर’ कहा जाता है। ‘आवती रजिस्टर’ पर निम्नलिखित प्रकार से ब्यौरा दर्ज किया जाता है-
दिनांक: …………………

पत्र संख्या ……….. प्राप्ति का विवरण ……………..

कहाँ से भेजा गया ……………………….. किसको भेजा गया …………………..

विवरण ………………………………

प्रत्येक कार्यालय में काम की मात्रा के अनुसार ‘प्राप्ति रजिस्टरों’ तथा ‘पंजिकर्ता लिपिकों’ की संख्या निश्चित की जाती है। प्रत्येक पंजीकर्ता लिपिक के पास अपना एक ‘प्राप्ति रजिस्टर’ होता है। प्रत्येक पंजीकर्ता लिपिक के पास कुछ अनुभागों की जिम्मेदारी होती है। वह उन्हीं अनुभागों से संबंधित पत्रों का पंजीयन करता है।

बीजक- प्राप्त पत्रों के पंजीयन के बाद पंजीकर्ता लिपिक प्रत्येक अनुभाग के लिए दो प्रतिलिपियां तैयार करता है। इन दोनों प्रतिलिपियों के साथ पत्रों को संबंधित अनुभाग को भेज देता है। अनुभाग में दैनिकी लेखक (Diarist) प्राप्तियों को बीजक में अंकित उनकी रजिस्ट्री संख्या से मिलान करके देख लेता है और बीजक की एक प्रति पर हस्ताक्षर करके लौटा देता है। ‘पंजीयन विभाग’ में बीजकों की इन प्रतियों को तिथि क्रम के अनुसार सम्भालकर रख दिया जाता है। प्रत्येक महीने के अंत में इन बीजकों का एक बंडल बांधकर सुरक्षित स्थान पर रख दिया जाता है।

बीजक
…………..मंत्रालय
……….विभाग…….अनुभाग/डेस्क

दिनांक …………… पंजीयन संख्या ……………..प्राप्तियों की कुल संख्या……………………….

प्राप्तकर्ता का हस्ताक्षर

प्राप्ति का अवलोकन

‘पंजीयन विभाग’ से प्राप्त पत्रों को दैनिकी लेखक अनुभाग अधिकारी/डेस्क अधिकारी के पास रखता है। वे इन पत्रों को ‘प्राथमिक’, ‘विशिष्ट प्राथमिक’ और ‘गौण’ इन तीन भागों में वर्गीकृत कर अलग-अलग छांट देता है। जो पत्र केवल परामर्श के लिए प्राप्त हुए हैं वे गौण माने जाते हैं। शेष पत्रों को प्राथमिक माना जाता है। प्राथमिक पत्रों में भी जिन पर शीघ्र कार्रवाई की आवश्यकता होती है उन्हें ‘विशेष प्राथमिक’ मानकर यथाशीघ्र प्रेषित कर दिया जाता है।

टिप्पण (Noting)

कार्यालयी क्रियाविधि या कार्यालयी पत्राचार में ‘टिप्पण’, ‘आलेखन’ या ‘प्रारूपण’ का विशेष महत्व होता है। ‘टिप्पणी’ शब्द का अर्थ ‘टिप्पणी’ में टीप देखकर लिखना। टीप का अर्थ है- jotting अर्थात टंकी हुई बातें। मूल पत्र में जो बातें अंकित हैं उन्हें देखकर तैयार किया जाने वाला संक्षेप को ही ‘टिप्पणी’ कहते हैं। कार्यालय में ‘आगत पत्र’ का संक्षेप तैयार कर विधि-विधान के अनुसार सुझाव देकर संबंधित अनुभाग के लिपिक/सहायक द्वारा ‘टिप्पणी’ तैयार की जाती है। ‘फाइल सहित टिप्पणी’ अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करके पत्र के मामले में अधिकारी का आदेश पाने के बाद पत्रोत्तर (जवाबी पत्र) का प्रारूप (आलेख) तैयार किया जाता है। यह प्रारूप अधिकारी के समक्ष अनुमोदन के लिए भेजा जाता है। अधिकारी उस प्रारूप में आवश्यकतानुसार संशोधन कर सकता है। अधिकारी द्वारा प्रारूप से संतुष्ट होने पर उस पर हस्ताक्षर कर दिया जाता है।

कार्यालय में टिप्पणी लिखने की कला को ‘टिप्पण’ कहते हैं और प्रारूप तैयार करने की कला को ‘प्रारूपण’ या ‘आलेखन’ कहा जाता है। कार्यालयी पत्राचार में ‘टिप्पण’ और ‘आलेखन’ उन दो चक्रों के समान हैं जिनसे कार्यालयी कार्यों का रथ निरन्तर चलता रहता है।

कार्यालयों में ‘आगत पत्रों’ (इसे प्राप्ति या ‘आवती’ भी कहते हैं) के निपटान के लिए सुझाव सहित जो लिखित सामग्री तैयार की जाती है उसे ‘टिप्पणी’ कहते हैं। ‘टिप्पणी’ के अंतर्गत आगत पत्र पर पूर्व पत्राचार यदि हुआ हो तो उसका संकेत, आगत पत्र का संक्षेप, विधि-विधान के अनुसार अनुकूल सुझाव आदि लिखे जाते हैं। किसी कार्यालय के अधिकारी के पास समय की कमी होती है इसलिए वह किसी आगत पत्र को पूरा पढ़ नहीं सकता। आगत पत्र से संबंधित महत्वपूर्ण बातों को टिप्पणी के रूप में लिख दिया जाता है जिन्हें कम समय में पढ़कर कोई भी अधिकारी उचित निर्णय लेने की स्थिति में आ जाता है। अधिकारी का काम आसान करना ही ‘टिप्पण’ का उद्देश्य है।

सबसे पहले संबंधित सहायक या लिपिक ‘टिप्पणी’ लिखकर ‘फाइल सहित टिप्पणी’ अनुभाग अधिकारी के पास भेजता है। अनुभाग अधिकारी द्वारा ‘टिप्पणी’ का अध्ययन करने के बाद उस पर आवश्यक सुझाव देता है जिसे लिपिक/सहायक टिप्पणी में शामिल करता है। यदि अनुभाग अधिकारी कोई सुझाव नहीं देता है तो वह अपने हस्ताक्षर सहित उसे संबंधित कार्यालय/अधिकारी की ओर भेज देता है। इस प्रकार ‘फाइल सहित टिप्पणी’ उस अधिकारी के पास पहुंचती है जिसे निर्णय लेने का अधिकार है।

वरिष्ठ अधिकारी अपने कनिष्ठ अधिकारी की टिप्पणी से सहमत या असहमत हो सकता है। वह अपने कनिष्ठ अधिकारी द्वारा की गई टिप्पणी में संशोधन/परिवर्द्धन/परिवर्तन नहीं करता है बल्कि टिप्पणी के नीचे ही अपनी टिप्पणी लिख देता है। वह अपनी टिप्पणी इस प्रकार लिखता है कि कनिष्ठ अधिकारी की टिप्पणी में स्वत: संशोधन हो जाता है।

सहायक/लिपिक और कार्यालय के सबसे बड़े अधिकारी के बीच जितने भी अधिकारी हैं उनमें से कोई भी अपनी जिम्मेदारी पर कोई कार्यालयी मामला निपटा सकेगा तो उसे स्वयं निपटा सकता है। यदि मामला अधिक महत्वपूर्ण हो और उसे उच्च अधिकारी के पास ले जाना हो तभी आगे बढ़ाता है। सामान्यतः किसी भी मामले का उपस्थापन (Presentation/Putting Forward) का क्रम यह होगा- अनुभाग अधिकारी/अधीक्षक- अवरसचिव- उपसचिव- अपर सचिव- संयुक्त सचिव- मंत्री। सभी फाइलों को उस सोपान तक पहुंचाया जाएगा जहां तक उसका पहुंचना आवश्यक होता है। लिपिक/सहायक से लेकर ‘फाइल सहित टिप्पणी’ के आगे बढ़ने के बीच किसी अधिकारी को यदि किसी बिन्दु पर कोई संदेह हो जाए तो वह स्पष्टीकरण के लिए अतिरिक्त कागज़ात/प्रमाण पत्र की आवश्यकता पड़े तो वह फाइल रोककर उसका निवारण करता है।

टिप्पणी को बहुत अधिक विस्तृत नहीं होनी चाहिए। उसे सामान्यतः संक्षिप्त एवं विषय संगत होनी चाहिए। टिप्पणीकार को कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक बातें लिखने का प्रयास करना चाहिए। टिप्पणी संक्षिप्त होनी चाहिए लेकिन यह भी ध्यान रहे कि अस्पष्ट नहीं होनी चाहिए। तथ्यों की पुनरावृत्ति से बचना चाहिए।

टिप्पणी में पत्र से संबंधित तथ्यों को प्रवाहमान रूप से लिखना चाहिए। टिप्पणी इस प्रकार लिखनी चाहिए कि फाइल में पत्र जिस क्रम में रखे गए हैं, टिप्पणी में भी उनका क्रम वही रहे।टिप्पणी में उन सभी जानकारियों को अवश्य शामिल करना चाहिए जो मूल फाइल को निपटाने में आवश्यक हों। जब एक ही प्राप्ति (आगत पत्र) में एक से अधिक मामलों या बिंदुओं पर निर्णय होना आवश्यक हो या अलग-अलग आदेश प्राप्त करना आवश्यक हो तो प्रत्येक मामले के लिए अलग-अलग टिप्पणी तैयार कर अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए। इनमें प्रत्येक टिप्पणी को ‘आंशिक टिप्पणी’ या ‘अनुभागीय टिप्पणी’ कहते हैं। अभिलेखन (Placing on Record) के समय मुख्य टिप्पणी पहले रखी जाएगी।

जहां तक संभव हो टिप्पणी लिखते समय अनुच्छेदों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यदि अनुच्छेदों का प्रयोग करना बहुत अधिक आवश्यक हो तो प्रथम अनुच्छेद लिखने के बाद 2, 3, 4 क्रमानुसार संख्या लिखनी चाहिए।

टिप्पणी हमेशा ‘अन्य पुरुष’ में लिखनी चाहिए।

टिप्पणी में ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए जिसमें किसी भी भ्रांति की संभावना नहीं हो। टिप्पणी की भाषा सरल, सहज और स्पष्ट होनी चाहिए। इसमें अलंकृत, सांकेतिक, कठिन भाषा और मुहावरे-लोकोक्तियों आदि का किसी भी परिस्थिति में प्रयोग नहीं करना चाहिए। यदि टिप्पणी की भाषा सरल, सहज और एकार्थी नहीं है तो उसे समझने में ‘अर्थभेद’ या ‘अर्थ का अनर्थ’ हो सकता है। अनावश्यक वाक्यों और वाक्यांशों से बचना चाहिए और हमेशा वाक्य छोटे होने चाहिए।

टिप्पणी लेखक को कभी भी टिप्पणी व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। आगत पत्र के प्रेषक से कोई पक्षपात किए बिना उसे अपनी टिप्पणी में वास्तविक स्थिति की चर्चा करना चाहिए।

टिप्पणी में ‘संबोधन’ नहीं होता है। इसमें नीचे ‘भवदीय’, ‘आपका’ आदि अधोलेख नहीं लिखे जाते हैं।

टिप्पणी लिखने के पूर्व फाइल में रखे मूल पत्र में जितने भी कागज़ात रखे गए हैं उन पर पृष्ठ संख्या अंकित की जानी चाहिए। टिप्पणी में आवती का क्रमांक (पत्रांक) लिखा जाता है और पत्राचार खण्ड की पृष्ठ संख्या भी लिखी जाती है। इस प्रकार टिप्पणी में विचाराधीन पत्र का क्रमांक और पृष्ठ संख्या अंकित होने से संबंधित अधिकारी को यह मालूम हो जाता है कि अमुक पृष्ठ पर लगे पत्र के संबंध में अपना निर्णय या आदेश देना है। टिप्पणी में प्राप्त पत्र की विषय वस्तु संक्षेप में एवं क्रमबद्ध लिखी जाती है। पत्र में लिखित मामले पर कोई पूर्व पत्र व्यवहार हुआ हो तो उसका उल्लेख, निर्णय मांगने वाले प्रश्नों का विवेचन और उस पर नियमानुसार सुझाव टिप्पणी में लिखना चाहिए। निस्वार्थ विवेचन, नियमों-विनियमों के प्रति सजगता आदि टिप्पणी लेखन के लिए अत्यंत आवश्यक है।

टिप्पणी लेखक टिप्पणी के नीचे बाईं ओर अपने हस्ताक्षर करता है। हस्ताक्षर के रूप में अपने नाम के आद्यक्षर (Initial) लिखता है और पद का नाम भी लिखता है। इसका कारण यह है कि यदि अधिकारी को किसी बिंदु पर कुछ पूछना हो तो वह बुला सकता है। हस्ताक्षर करने और पदनाम लिखने के बाद जिस अधिकारी के पास ‘फाइल के साथ टिप्पणी’ भेजनी है उसका पदनाम भी लिख देता है।

‘टिप्पणी’ के तीन भेद होते हैं-

1. नेमी टिप्पणी (Routine Note)

2. स्वतः पूर्ण टिप्पणी (Self Contained Note)

3. आवती पर टिप्पणी (Note)

उन पत्रों पर नेमी टिप्पणी लिखी जाती है जिनमें आगे कोई कार्यवाही अपेक्षित नहीं होती। इसमें उपदेशात्मक या सूचनात्मक बातें लिखी जाती हैं। जैसे- फाइल कर दीजिए, चर्चा करें, स्पष्टीकरण मांगा जाए, आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजी जाए, केवल सूचनार्थ आदि।

स्वतःपूर्ण टिप्पणी किसी आवती/प्राप्ति/आगत पत्र पर आधारित न होकर परिस्थिति एवं आवश्यकता से उत्पन्न समस्या का समाधान करने के लिए लिखी जाती है। यह प्रशासनिक आवश्यकता पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए किसी कार्यालय में किसी पद पर नियुक्ति के लिए किसी अधिकारी की टिप्पणी स्वतःपूर्ण होती है। इसका संबंध किसी प्राप्त पत्र से नहीं होता इस कारण इसमें ऊपर क्रमांक और पृष्ठ संख्या लिखना आवश्यक नहीं होता है।

किसी ‘प्राप्ति पर टिप्पणी’ किसी अधिकारी के सहायक या क्लर्क द्वारा लिखी जाती है। इसका उद्देश्य संबंधित अधिकारी के समक्ष किसी पत्र का संक्षेप प्रस्तुत करना है ताकि वह कम समय में पढ़कर उस पर कार्रवाई कर सके। टिप्पणी में टिप्पणीकर्ता पत्र की मांग के सन्दर्भ में अपने विचार या सुझाव भी लिखता है। टिप्पणी के मुख्य अंग होते हैं- आवती या प्राप्ति का विषय, कारण, नियम, कार्यालय में कार्य की स्थिति, कार्रवाई से संबंधित सुझाव आदि। इनमें पहले दो चरणों में “बताया है कि …….”, जैसे वाक्यों का प्रयोग किया जाता है। टिप्पणी के तीसरे चरण में “ऐसा नियम है कि………” “किया जा सकता है……”, “दिया जा सकता है……….” जैसे वाक्यों का प्रयोग किया जाता है। चौथे चरण में ‘ऐसा है’ या ‘ऐसा नहीं है’ वाक्य सांचों का प्रयोग किया जाता है। पांचवें चरण में “किया जा सकता है”, “दिया जा सकता है’ जैसे वाक्य सांचों का प्रयोग किया जाता है।

अनुभागीय टिप्पणी:

एक विचाराधीन पत्र में अलग-अलग मद (Items) पर निर्णय अपेक्षित होता है तो हर मद पर अलग-अलग टिप्पणी लिखने की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार प्रत्येक मद पर लिखी जाने वाली टिप्पणी को ‘अनुभागीय टिप्पणी’ कहते हैं।

संयुक्त वाद टिप्पणी:

एक विचाराधीन पत्र में प्रस्तुत एक ही प्रश्न से सम्बद्ध अलग-अलग मुद्दों का उल्लेख कर उन सबका एक साथ निर्णय कराना हो या उन पर पर समेकित आदेश प्राप्त करना हो तो उन्हें एक टिप्पणी में ही लिखा जा सकता है। इस स्थिति में प्रत्येक मुद्दों को अलग-अलग क्रम संख्या या अनुच्छेद संख्या के साथ टिप्पणी लिखी जाती है और सभी मुद्दों पर एक ही साथ आदेश प्राप्त किए जाते हैं। ऐसी टिप्पणी जिसमें एक ही प्रश्न या मुद्दा से सम्बद्ध कई मुद्दों को उठाया जाता है उसे ‘संयुक्त वाद टिप्पणी’ कहते हैं।

असंबद्ध मिसिल:

जब किसी विषय से संबंधित मिसिल किसी अन्य अधिकारी के पास हो तो उस विषय पर अलग अस्थायी (Temporary) मिसिल बनाकर टिप्पणी लिखनी चाहिए ताकि संबंधित अन्य अधिकारी को दी जा सके। इस मिसिल को ‘असंबद्ध मिसिल’ कहते हैं। इस ‘असंबद्ध मिसिल’ (Loose File) का निपटारा होने पर इसमें लगे दस्तावेजों को पुनः विषय से संबंधित मूल मिसिल में लगा दिया जाता है।

टिप्पणी का नमूना:

श्री ……………….. अनुभाग अधिकारी……….….अनुभाग ने अपनी अस्वस्थता के कारण 30 दिन के अर्जित अवकाश के लिए जो आवेदन दिया है, उसके आधार पर लिखी गई टिप्पणी –

विचाराधीन पत्र संख्या…… दिनांक: ……………… पृष्ठ संख्या: ……………..

विषय: आकस्मिक अवकाश की मंजूरी

श्री ……………….अनुभाग अधिकारी………… अनुभाग के 30 दिन के अर्जित अवकाश का आवेदन अवलोकनार्थ प्रस्तुत है। श्री ………..ने दिनांक ……….से दिनांक…………..तक का अर्जित अवकाश मांगा है। उनके आवेदन से स्पष्ट है कि उनका स्वास्थ्य खराब है। अतः उन्हें अवकाश दी जा सकती है।

आदेशार्थ प्रस्तुत

हस्ताक्षर
दिनांक
अवर सचिव

अवर सचिव
श्री…….. के स्वास्थ्य प्रमाण पत्र के रूप में डॉक्टर का प्रमाण पत्र मांगा जाए।
आदेशार्थ प्रस्तुत
हस्ताक्षर
दिनांक
उपसचिव

उपसचिव
श्री…………. ने डॉक्टर का प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया है।
आदेशार्थ प्रस्तुत

संयुक्त सचिव
हस्ताक्षर
दिनांक

अवर सचिव
हस्ताक्षर
दिनांक

उपसचिव
प्रशासन अनुभाग से श्री…… की जगह नए अनुभाग अधिकारी की नियुक्ति हो जाने पर श्री…….को 30 दिनों का अर्जित अवकाश दिया जाए।

हस्ताक्षर
दिनांक:
संयुक्त सचिव।

आलेखन (Drafting)

कार्यालय की क्रियाविधि में ‘आलेखन’ का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। हिन्दी में ‘आलेख’ शब्द का प्रयोग सामान्यतः सम्मेलनों या संगोष्ठियों में प्रस्तुत निबंधों के लिए किया जाता है। अंग्रेज़ी में ‘आलेख’ के लिए ड्राफ्ट (Draft) शब्द का प्रयोग किया जाता है। ‘आलेखन’ शब्द का संबंध संस्कृत के ‘आलेखनम’ शब्द से है। आ+लिख+ल्युट = आलेखनम। इसका अर्थ होता है- लिखना या चित्रण करना। ‘आलेखन’ के लिए उर्दू में ‘तहरीर’ शब्द प्रचलित है जिसका अर्थ होता है- हाथ की लिखावट। हिन्दी में ‘आलेख’ शब्द के पर्यायवाची शब्द के रूप में ‘प्रारूप’ और ‘मसौदा’ शब्द भी प्रचलित हैं। ‘प्रारूप’ एक पारिभाषिक शब्द है जो वैज्ञानिक एवं पारिभाषिक शब्दावली आयोग द्वारा ‘ड्राफ्ट’ के लिए गढ़ा गया है। ‘प्रारूप’ या ‘आलेख’ शब्द का वास्तविक अर्थ ‘पत्र का कच्चा रूप’ होता है। किसी पत्र को अंतिम रूप देने से पहले उसके लेखन की जो भी प्रक्रिया अपनाई जाती है उसे आलेखन या प्रारूपण कहते हैं।

कार्यालय में प्राप्त किसी पत्र पर कार्यवाही हेतु किसी अधिकारी को कोई निर्णय देना होता है तो वह अपने सहायक/लिपिक को पत्र के संबंध में आवश्यक बिंदुओं को बताता है। सहायक या लिपिक उन बिंदुओं के आलोक में एक कच्चा पत्र तैयार करता है। उसके बाद वह उस कच्चे पत्र को अधिकारी के समक्ष रखता है। यदि अधिकारी को लगता है कि उक्त कच्चे पत्र में आवश्यक बातें छूट गयी हैं या कुछ अनावश्यक बातें जुड़ गई हैं तो वह सुझाव देता है। इस प्रकार अंतिम रूप से पत्र को तैयार करने से पहले लेखन की जो प्रक्रिया चलती है उसे प्रारूपण कहते हैं और जो लिखा जाता है उसे ‘प्रारूप’ या ‘आलेख’ कहते हैं। अंतिम रूप से तैयार पत्र पर ही सम्बद्ध अधिकारी का हस्ताक्षर कराकर प्रेषित किया जाता है।

आलेख या प्रारूप तैयार करते समय निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना अतिआवश्यक है-

शुद्धता- आलेखन में सामग्री एवं प्रस्तुतीकरण दोनों का शुद्ध होना अतिआवश्यक है। शुद्धता से तात्पर्य है कि कार्यालयी पत्र के सभी आवश्यक तत्वों जैसे पत्र संख्या, दिनांक, विषय, सन्दर्भ, सम्बोधन, कलेवर, स्वनिर्देश, प्रेषक-प्रेषिती के पते, संलग्नक, प्रतिलिपियां आदि लिखने में किसी भी प्रकार की गलती न हो। प्रत्येक पत्र का सांचा अलग-अलग होता है और अलग-अलग तरह के पत्रों में उसके अंगों के लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित होता है। इस बात का ध्यान रखना चाहिए।

पूर्णता और स्पष्टता- प्रारूप को पूर्ण व स्पष्ट होना चाहिए। यदि प्रारूप अपूर्ण व अस्पष्ट हुआ तो प्रेषिती उसे सही ढंग से समझ नहीं पाएगा। इस कारण पत्र पर कार्रवाई में विलंब हो सकता है। यदि पत्र से सम्बंधित पूर्व समय में कोई पत्र व्यवहार हुआ हो तो प्रारूप में उसका भी जिक्र करना चाहिए। प्रारूप तैयार करते समय सबसे पहले उससे संबंधित विषय और उद्देश्य का गहन अध्ययन करना चाहिए। फिर उसे अनुच्छेद के रूप में लिखना चाहिए। प्रारूप का प्रारंभ मुख्य विषय से करना चाहिए और सभी अपेक्षित सूचनाओं और निर्देशों का उल्लेख करना चाहिए। यदि प्रारूप काफी लंबा और जटिल बातों से युक्त हो तो अंतिम अनुच्छेद में मुद्दों को संक्षेप में स्पष्ट करना चाहिए।

विषय- प्रारुप लेखक को प्रारूप के विषय का पूरा ज्ञान होना चाहिए। प्रारूप के सांचे के अनुसार स्पष्ट शब्दों में विषय लिखना चाहिए। यदि विषय स्पष्ट न हो तो प्रेषिती कार्यालय में पत्र के पंजीयन के बाद उसके दूसरे अनुभाग में पहुंचने की संभावना रहती है। पत्र में लिखी जाने वाली बातें शीर्ष पर लिखे गए विषय से ही सम्बद्ध होती हैं।

सन्दर्भ- यदि पत्र से संबंधित विषय पर पहले से पत्राचार हो रहा है तो सन्दर्भ में उसका उल्लेख करना चाहिए।

संबोधन- प्रारूप में यदि संबोधन की आवश्यकता है तो ‘महोदय’ लिखा जाता है। अर्द्धसरकारी पत्रों में संबोधन के रूप में ‘प्रिय’ का भी उपयोग किया जाता है। गैरसरकारी व्यक्तियों के संबोधन के लिए ‘प्रिय महोदय’ भी लिखा जाता है।

संक्षिप्तता- प्रारूप को यथासंभव संक्षेप में लिखना चाहिए। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह संक्षिप्त हो लेकिन सभी विषयों का समावेश हो। पूर्ण व संक्षिप्त प्रारूप लेखक की प्रतिभा का परिचायक होता है। संक्षिप्तता के लिए आवश्यक है कि किसी भी बात की पुनरावृत्ति न हो।

उद्धरण- यदि प्रारूप में किसी नियम या किसी अधिकारी के आदेश को उद्धृत करना हो तो उसे मूल शब्दों में ही लिखना चाहिए।

मुख्य भाग- प्रारूप के मुख्य भाग हैं- विषय (Subject) , सन्दर्भ (Refrence), वक्तव्य (Body of a Letter), निष्कर्ष (Conclusion)

वक्तव्य- प्रारूप के वक्तव्य में विषय के पक्ष में विभिन्न तर्क प्रस्तुत करना चाहिए। इससे अपने कथन की पुष्टि में सहायता मिलती है।

निष्कर्ष- प्रारूप का निष्कर्ष वक्तव्य में प्रस्तुत तर्कों के आधार पर लिखना चाहिए। निष्कर्ष के आधार पर आवश्यक सुझाव भी देना चाहिए।

क्रम संख्या- सामान्यतः प्रारूप में अनुच्छेदों का क्रम संख्या अंकित नहीं किया जाता है। यदि अनुच्छेदों का क्रम संख्या अंकित करना आवश्यक हो तो कर सकते हैं।

स्वनिर्देश- सरकारी पत्रों में स्वनिर्देश के रूप में ‘भवदीय’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। अर्द्धसरकारी पत्रों में ‘आपका’ शब्द का प्रयोग होता है। स्वनिर्देश के नीचे प्रेषक का हस्ताक्षर और उसके नीचे नाम और पदनाम लिखे जाते हैं।

प्रतिलिपियां- एक सरकारी कार्यालय से किसी को प्रेषित पत्रों तथा आदेशों की प्रतिलिपियां अन्य संबंधित अधिकारियों को भी भेजी जाती है। प्रारूप के नीचे उन सभी अधिकारियों की सूची लिखी जाती है जिनको यह पत्र भेजा जा रहा है।

वस्तुनिष्ठता एवं तथ्यपरकता- सरकारी कार्य निश्चित मानदंडों, नीतियों, परंपराओं और संहिताओं के आधार पर होता है। अतः प्रारूप लेखन में वस्तुनिष्ठता एवं तथ्यपरकता का पालन किया जाता है। उसमें व्यक्तिगत दृष्टिकोण एवं भावुकता के लिए कोई स्थान नहीं होता है।

संलग्न (Enclosures)- यदि मूल पत्र के साथ कुछ अन्य दस्तावेजों को भेजनी की आवश्यकता हो तो उसकी भी सूची प्रारूप के नीचे देनी चाहिए।

भाषा- संक्षिप्तता, स्पष्टता, शिष्टता और विनम्रता कार्यालयी पत्रों व प्रारूपों की भाषा के अनिवार्य गुण हैं। प्रारूप की भाषा भी सहज, सरल और बोधगम्य होनी चाहिए। इसमें अतिशयोक्तिपूर्ण, आलंकारिक एवं मुहावरेदार भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यदि किसी मुद्दे पर जोर देना है तो उसे विनम्रता पूर्वक देकर देकर कहना चाहिए। इसमें छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए।

प्रारूप तैयार करने के बाद उस पर संबंधित अधिकारी की स्वीकृति प्राप्त करनी पड़ती है। अतः प्रारूप को संबंधित फाइल के साथ अधिकारी के पास नत्थी करके अनुमोदन के लिए भेजा जाता है। उसके ऊपर ‘अनुमोदनार्थ प्रारूप’ अथवा ‘अनुमोदन-स्वीकृति के लिए’ (Draft for Approval) की चिट लगा दी जाती है ताकि अधिकारी पहली नजर में ही समझ जाएं।

प्रेषण (Despatch) :

कार्यालय में आगत पत्र के ‘पंजीकरण’ के बाद उस पर पहली कार्रवाई ‘टिप्पण’ के रूप में और अगली कार्रवाई ‘आलेखन’ के रूप में होती है। कार्यालय से जवाबी पत्र के रूप में ही नहीं, अन्य किसी उद्देश्य से दूसरे कार्यालय को भेजे जाने वाले पत्र का आलेख तैयार किया जाता है। इन आलेखों पर सम्बंधित अधिकारी का हस्ताक्षर होता है। इन्हें अनुमोदित प्रारूप या आलेख कहते हैं।

अधिकारी द्वारा अनुमोदित प्रारूप पुनः अनुभाग में प्राप्त किए जाते हैं। इन प्रारूपों पर अनुभाग अधिकारी ‘प्रेषित किया जाए’ लिख देता है। उसके बाद ये प्रारूप टाइप किए जाते हैं। प्रारूप में अंकित पृष्ठांकन के अनुसार जितनी प्रतिलिपियों की आवश्यकता होती है उतनी प्रतिलिपियां तैयार की जाती हैं। इन प्रतियों को संबंधित अधिकारी के समक्ष हस्ताक्षर के लिए प्रस्तुत किया जाता है। अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर के बाद ये प्रारूप संबंधित अनुभाग को वापस भेजे जाते हैं। अनुभाग इन प्रारूपों को प्रेषण विभाग (Despatch Section) को भेज देता है। प्रेषण विभाग के कर्मचारी पत्रों का विवरण ‘प्रेषण रजिस्टर’ में दर्ज करते हैं। उसके बाद पत्र को लिफाफे में बंद कर उस पर कार्यालय की मुहर लगाकर भेज दिया जाता है।

संक्षेपण (Precis Writing) :

हिन्दी भाषा का शब्द ‘संक्षेपण’ के लिए अंग्रेज़ी भाषा में ‘Precis’ शब्द चलता है। ‘Precis’ मूलतः फ्रेंच भाषा का शब्द है जिसका अर्थ ‘सार लेखन’, ‘संक्षेपीकरण’ होता है। मूल पाठ के अनावश्यक विवरणों, अप्रासंगिक तथा असंबद्ध तथ्यों को हटाकर केवल मूल भाव या विचार को प्रकट करने वाले तथ्यों का संयोजन करना ‘संक्षेपण’ कहलाता है। कार्यालयी पत्रों के संदर्भ में संक्षेपण का लाभ यह है कि अधिकारियों को सीधे किसी पत्र के मूल भाव से अवगत कराया जाए। चूंकि अधिकारियों के पास समय की कमी होती है इसलिए उनके समक्ष लाए जाने वाले पत्रों का संक्षेपण तैयार किया जाता है। अधिकारी अपने सहायकों द्वारा प्रस्तुत संक्षेपण को पढ़कर शीघ्र ही पत्र में लिखित मूल बातों को समझ जाते हैं और शीघ्र निर्णय लेने में सक्षम हो पाते हैं।

‘संक्षेपण’ एक कला है जो निरंतर अभ्यास से विकसित होती है। इसमें मूल भाव को प्रकट करने वाले तथ्य मूल पाठ के लगभग तृतीयांश होते हैं। किसी कार्यालयी पत्र का संक्षेपण तैयार करते समय उसे बार-बार पूरे मनोयोग से पढ़ना चाहिए ताकि मूल पत्र का केन्द्रीय भाव समझ में आ जाए। उसके बाद केन्द्रीय भाव को प्रकट करने वाले तथ्यों को क्रमबद्ध करके छोटे-छोटे वाक्यों से तथा सरल व स्पष्ट भाषा में लिखना चाहिए। यदि मूल पाठ में अनावश्यक उद्धरण, विश्लेषण, आलंकारिक प्रयोग, मुहावरे आदि हों तो संक्षेप लिखते समय उन्हें छोड़ देना चाहिए। संक्षेपण तैयार कर लेने के बाद एक बार फिर से मूल पाठ को पढ़ना चाहिए ताकि यदि कुछ महत्वपूर्ण बातें छूट गई हों तो उसे शामिल कर लें। इसके बाद संक्षेपण को कई बार पढ़ना चाहिए ताकि यदि अनावश्यक बातें आ गईं हों तो उसे हटाया जा सके।

संक्षेपण लिखते समय भाषा और तथ्यों की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। संक्षेपण में स्पष्टता का होना भी अत्यंत आवश्यक है। स्पष्टता के अभाव में किसी भी अर्थ का अनर्थ हो सकता है इसलिए हमेशा एकार्थी शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए। संक्षेपण लिखते समय हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि वह पूर्ण हो। मूल पाठ की महत्वपूर्ण बातों को नहीं छोड़ना चाहिए।

संक्षेपण में तथ्यों और मुद्दों को क्रमबद्ध रूप में लिखना चाहिए। वाक्यों को आपस में इस प्रकार जोड़ना चाहिए कि वे असंबद्ध न लगें। उसमें भाषागत एवं विषयगत प्रवाह रहना चाहिए। यदि मूल पाठ में कई प्रश्न आएं हों तो प्रश्नों को छोड़ देना चाहिए और उत्तर इस प्रकार लिखना चाहिए कि उससे प्रश्न भी झलकते हों।

संक्षेपण का शीर्षक भी लिखना चाहिए। शीर्षक का लेखन करते समय वर्ण्य विषय से संबंधित शब्दों का चुनाव करना चाहिए।

‘संक्षेपण’ की दो पद्धतियां हैं: प्रवाह संक्षेप और तालिका संक्षेप। प्रवाह संक्षेप पद्धति से संक्षेपण लिखते समय सभी महत्वपूर्ण मुद्दों को मिलाकर प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग किया जाता है। इसमें शुरुआत में ही दिनांक और पत्रांक संख्या लिख दी जाती है। इसकी शैली वर्णनात्मक होती है।
प्रवाह संक्षेप पद्धति का उदाहरण-
पत्र संख्या………..दिनांक…….के पत्र में सूचित किया है कि तीस हजार की स्वीकृत राशि प्राप्त होने के दो माह के भीतर व्यय करनी चाहिए, जिसका विवरण वाउचर सहित लेखा विभाग को प्रेषित कर देना चाहिए।

तालिका संक्षेप पद्धति में संक्षेपण को तालिका बनाकर लिखते हैं। इस पद्धति में जो तालिका बनाई जाती है उसे मूल पत्र के साथ ही नत्थी कर दिया जाता है ताकि आवश्यक होने पर अधिकारी मूल पत्र को पढ़कर मिलान कर लें।

लोकमंच पत्रिका
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प्रतिवेदन (Report)

प्रतिवेदन शब्द अंग्रेज़ी के ‘Report’ शब्द का समानार्थी है। हिन्दी में ‘प्रतिवेदन’ शब्द का प्रयोग विवरण के अर्थ में होता है। किसी को सूचित करने के उद्देश्य से जब किसी घटना या कार्य का विवरण लिखा जाता है तो उसे प्रतिवेदन कहते हैं। पुलिस, प्रशासन, विधि, चिकित्सा, पत्रकारिता और साहित्य आदि क्षेत्रों में प्रतिवेदन लिखे जाते हैं। पुलिस किसी घटना का अनुसंधान करने के बाद जो ‘प्रथम छानबीन रिपोर्ट’ (एफआईआर) लिखती है वह प्रतिवेदन ही है। प्रशासनिक क्षेत्र से संबंधित कोई जांच आयोग या समिति भी अंत में प्रतिवेदन प्रस्तुत करती है। नार्कोटिक्स रिपोर्ट, फॉरेंसिक रिपोर्ट, डॉक्टर की रिपोर्ट आदि प्रतिवेदन के ही रूप हैं। प्रतिवेदन के लिए साहित्य में ‘रिपोर्ताज’ शब्द प्रचलित है। ‘रिपोर्ताज’ फ्रेंच भाषा का शब्द है। एक साहित्यकार किसी घटना का कलात्मक रूप से वर्णन करता है। पत्रकारिता के क्षेत्र में एक पत्रकार द्वारा किसी घटना या कार्यक्रम का विवरण तैयार करना भी प्रतिवेदन ही है।

प्रतिवेदन कई प्रकार के होते है- एक व्यक्ति द्वारा तैयार किया जाने वाला प्रतिवेदन, किसी कार्यालय द्वारा अपनी एक वर्ष के कार्यों पर तैयार वार्षिक प्रतिवेदन और किसी जांच आयोग या जांच समिति द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन। किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन ‘मैं’ शैली में लिखा जाता है। किसी जांच आयोग या समिति द्वारा तैयार प्रतिवेदन ‘अन्य पुरुष शैली’ में लिखा जाता है और भाव वाच्य का प्रयोग किया जाता है। प्रतिवेदन में कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जैसे- आयोग या समिति को क्या दायित्व सौंपा गया था? उसके अनुसार किन-किन व्यक्तियों से गवाही ली गई? आयोग या समिति द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन के अंत में अध्यक्ष सहित सभी सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए। निष्कर्ष रूप में सिफारिश भी प्रस्तुत की जानी चाहिए।

प्रतिवेदन का नमूना

बाढ़ग्रस्त जिलों की स्थिति पर जांच आयोग का प्रतिवेदन

20 सितम्बर 2021 को बिहार के दरभंगा, सीतामढ़ी, पूर्णिया और सहरसा जिलों में बाढ़ के कारण विनाश के अध्ययन हेतु राष्ट्रपति द्वारा गठित पांच सदस्यीय समिति निम्नलिखित निष्कर्षों पर पहुंची है-

1. इन जिलों के निवासियों के रोजगार बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और इनमें से अधिकांश की संपत्ति नष्ट हो गई है।

2 इन जिलों के निवासियों के लिए भोजन, दवाई और आवास की व्यवस्था करना अत्यंत आवश्यक है।

3 अतः सरकार एक हजार करोड़ रुपये की तत्काल सहायता राशि उपलब्ध कराए।

सभी सदस्यों के क्रमानुसार हस्ताक्षर

संलग्न:

1 बाढ़ प्रभावित व्यक्तियों के मत

2 बाढ़ में नष्ट सम्पत्ति का व्यौरा

3 बाढ़ की स्थिति संबंधित फ़ोटो

कार्यवृत्त (Minutes)

सरकारी आयोगों, समितियों और कर्मचारी परिषदों की समय-समय पर बैठकें आयोजित की जाती हैं ताकि उनके कामकाज सुचारू रूप से चलाए जा सकें। सर्वप्रथम इन बैठकों की तिथि निर्धारित की जाती है। उसके बाद कार्य-सूची (Agenda) तैयार की जाती है। निर्धारित तिथि और कार्य-सूची की सूचना सदस्यों को भेजी जाती है। उसके बाद निर्धारित तिथि को कार्य-सूची के अनुसार बैठक सम्पन्न होती है। बैठक के बाद उसका कार्यवृत्त तैयार किया जाता है। कार्यवृत्त किसी भी बैठक का विस्तृत विवरण होता है। कार्यवृत्त में बैठक के सम्पन्न होने तक का पूरा विवरण बहुत ध्यान से लिखा जाता है। ‘कार्यवृत्त’ में यदि कोई महत्वपूर्ण मुद्दा छूट जाए तो अगली बैठक में सदस्यों द्वारा विरोध का सामना करना पड़ सकता है। उसकी भाषा सरल, स्पष्ट, एकार्थी और कानूनी दृष्टि से संगत होनी चाहिए। उसमें बैठक में उपस्थित सदस्यों द्वारा उठाए गए मुद्दों, सिफारिशों, सुझावों का स्पष्ट विवरण होना चाहिए। सबसे अंत में बैठक द्वारा सर्वसम्मति या बहुमत से पास निर्णय लिखना चाहिए।

कार्यवृत्त निम्नलिखित क्रम में तैयार किया जाता है-

शीर्षक- आयोग/समिति का पूरा नाम

बैठक का परिचय, स्थान व दिनांक

उपस्थिति- बैठक में उपस्थित सदस्यों के नाम व पते। यदि कोई आमंत्रित सदस्य हों तो उनके नाम के साथ कोष्ठक में ‘विशेष आमंत्रित’ लिखते हैं।

सदस्यों के विचार- कार्य-सूची के अनुसार सदस्यों के विचार, सुझाव, सिफारिश आदि लिखे जाते हैं।

निर्णय- अंत में बैठक का निर्णय लिखा जाता है

हस्ताक्षर- आयोग/समिति के सचिव और अध्यक्ष के हस्ताक्षर

कार्यवृत्त का नमूना

महाविद्यालय वार्षिक सम्मेलन की स्वागत समिति की बैठक

पूर्व बैठक का कार्यवृत्त

स्थान- सभा कक्ष, दिनांक- 5 फरवरी 2021, 12 बजे

उपस्थित सदस्य-
1
2
3

समिति के अध्यक्ष ने स्वागत किया और सचिव ने विषय प्रस्तुत किया। वार्षिक सम्मेलन आयोजित करने संबंधी बातों पर चर्चा हुई।

वार्षिक सम्मेलन की तिथि 9 अक्टूबर 2021 निर्धारित की गई।

निम्नलिखित अतिथियों को आमंत्रित करने पर सहमति बनी।

बैठक साढ़े पांच बजे समाप्त हुई।

हस्ताक्षर, अध्यक्ष हस्ताक्षर सचिव

लेखक- डॉ अरुण कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। सम्पर्क- 8178055172, 9999445502, lokmanchpatrika@gmail.com

230 thoughts on “कार्यालय क्रियाविधि – अरुण कुमार

  1. Thank you for some other excellent article. Where else could anybody get that type of info in such a perfect way of writing?I have a presentation next week, and I’m at the look for such info.

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