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ध्रुवदेव मिश्र पाषाण : कलम का पक्ष- कौशल किशोर

ध्रुवदेव मिश्र पाषाण क्रांतिकारी वाम धारा के अग्रणी कवि हैं। पिछले साल इन्हीं दिनों ‘पतहर’ का अंक उन्हीं पर केंद्रित आया। पाषाण जी की कविताओं पर विचार करना समकालीन हिंदी कविता की प्रगतिशील-जनवादी धारा के काव्य पर विचार करना है। पाषाण जी जन संघर्षों की सबसे प्रखर और प्रतिबद्ध धारा से जुड़ते हैं। पतहर को इस विशेष अंक के लिए हार्दिक बधाई दी जानी चाहिए क्योंकि पाषाण जी जैसे कवि की जितनी और जैसी चर्चा होनी चाहिए वह नहीं हुई है। इस अंक में कौशल किशोर का यह लेख भी प्रकाशित हुआ है। पढ़ें-

ध्रुवदेव मिश्र पाषाण मात्र भाव व संवेदना के कवि नहीं हैं। वे विचार के कवि हैं, विचारशील कवि हैं। यहां यथार्थ का चित्रण नहीं, बल्कि चित्र व चित्त को बदलना है। यही कारण है कि चाहे उनकी कविताएं व्यक्तिगत अनुभव की हो या सामाजिक संघर्ष की, उनमें राजनीतिक सजगता है। 1960 से वे कविता के नागरिक हैं। अर्थात करीब छ: दशक की उनकी काव्य-यात्रा है। यह इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक का अन्तिम वर्ष है। पर आज भी उसी जीवटता व प्रतिबद्धता के साथ सृजनरत हैं जो सत्तर के दशक में उनमें मौजूद रही है। उनके कई कविता संग्रह आये। इस दौरान समाज और राजनीति में बड़ा उथल-पुथल देखने को मिला। पाषाण इससे असंपृक्त रहने वाले रचनाकार नहीं हैं। उनकी पक्षधरता स्पष्ट है। मतलब उनका काव्य पक्षधरता का काव्य है। इसी से उनकी वैचारिकी की निर्मिति हुई है। उनकी वैचारिकी को जाननेे के लिए उस कालखण्ड को समझना आवश्यक है। 

ध्रुवदेव मिश्र पाषाण, लोकमंच पत्रिका

विदित है कि आजादी के बाद सत्ता कांग्रेस के हाथ में आयी। इस सत्ता से मोहभंग की पहली राजनीतिक अभिव्यक्ति 1967 के राष्ट्रीय आम चुनाव में देखने को मिली जब सात राज्यों में गैरकांग्रेसी सरकारों के हाथों में सत्ता आयी। यही समय है जब उत्तर बंगाल के नक्सलबाड़ी में क्रान्तिकारी किसान आंदोलन की घटना घटित हुई। यह आजादी से जुड़े स्वप्न का टूटना था। इस किसान संघर्ष की वसन्त गर्जना ने कला व साहित्य के क्षेत्र में अखिल भारतीय प्रभाव सृजन किया। उस वक्त हिन्दी में अकविता की अराजकतावादी धारा प्रभावी थी। दिशा की तलाश करती सहित्य की युवा पीढ़ी को तो जैसे नया जीवन मिला। कवियों की नयी फौज सामने आयी। कुमारेन्द्र परसनाथ सिंह, कुमार विकल, शलभ श्रीराम सिंह, वेणु गोपाल, धूमिल, गोरख पाण्डेय, आलोक धन्वा जैसे कवियों की कतार सामने आयी। ध्रुवदेव मिश्र पाषाण इसकी अगली कतार में शामिल थे। राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन किस तरह साहित्य-संस्कृति को प्रभावित करता है, यह उसका अप्रतिम उदाहरण था। उस दौर की विशेषता को रेखांकित करते हुए मशहूर लेखक हंसराज रहबर ने टिप्पणी की ‘हर क्रान्तिकारी आन्दोलन अपने गायक अपने साथ लाता है। यह एक सहज ऐतिहासिक प्रक्रिया है। दमन, शोषण और उत्पीड़न की जो परिस्थितियां क्रान्तिकारी शक्तियों को जन्म देती हैं, वही क्रान्तिकारी विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने वाले कवि, लेखक और कलाकार भी पैदा करती हैं। कवि खुद वर्ग संघर्ष का एक जुझारू सिपाही-विशाल जनता का अभिन्न अंग है। क्रान्ति उसके जीवन की बड़ी जरूरत है।’

पाषाण के यहां कविता जीवन की जरूरत है। चूंकि जीवन को बदलने का संघर्ष जारी है और यह बदलाव क्रान्ति से ही संभव है। इसलिए कविता क्रान्ति की जरूरत है। हमने देखा है कि जब समाज का यथार्थ बदलता है तो वह साहित्य के वस्तु तत्व से लेकर रूप को भी परिवर्तित कर देता है। ऐसा हम सत्तर के दौर की कविताओं में देखते हैं। जहां सत्ता विरोधी संघर्ष तेज है, वहीं वियतनाम जैसा देश अमेरिकी साम्राज्यवाद से टकरा रहा है। यह मुक्ति संघर्ष मुक्ति आकांक्षा बनकर कविता में व्यक्त होता है। हिन्दी कविता में क्रान्तिकारी आंदोलनों से आये शब्द सुनाई पड़ते हैं। यही दौर है जब पाषाण ‘बन्दूक और नारे’ तथा ‘मैं गुरिल्ला हूं’ जैसी कविताएं लिखते हैं। यह हिन्दी कविता के क्षेत्र में आया गुणात्मक परिवर्तन था। ऐसा बदलाव न सिर्फ हिन्दी कविता में दिखता है बल्कि अन्य भाषाओं की कविताओं में देखा जा सकता है। पंजाबी के कवि अवतार सिंह पाश – ‘हम लड़ेगे साथी’, बांगला कवि नवारुण भट्टाचार्य – ‘मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश’, तेलुगु के कवि चेराबण्डा राजु -‘जन्म लूंगा क्रान्ति-बीज होने के लिए’ जैसी कविताएं लिखी गयीं। आलोक धन्वा अपनी कविता ‘गोली दागो पोस्टर’ में कहते हैं – ‘यह कविता नहीं/गोली दागने की समझ है/जो कविता लिखने वालों को/हल चलाने वालों से मिल रही है’। पाषाण अपने तरीके से यथार्थ में आये बदलाव और क्रान्तिकारी भाव को व्यक्त करते हैं। उनकी कविता ‘कलम का पक्ष’ को हम देखें: ‘अलग अलग चलने वाली कलमें/इस्तेमाल की जाती हैं/कभी झाड़ू की तरह/कभी रिवाल्वर की तरह’ । और भी: ‘हल की नोंक पर हथौड़े के संकल्प/वक्त के नासूर का करते हैं इलाज/संभाल कर आपरेशन के औजार/गूंजती है परिवर्तन की पहली चाप/कविता में’। 

कविता का क्या काम है? पाषाण के पास इसका उत्तर है। कोई दुविधा या संकोच नहीं। कलावादियों जैसा आग्रह नहीं। इसके उलट जनवादी चेतना है। वे साफ-साफ बात करते हैं। ऊपर उद्धृत कविता-अंश इसका दाहरण है जिसके केन्द्र में हल और हथौड़ा है। अर्थात किसान और मजदूर की एकता। यह व्यवस्था परिवर्तन का आधार है। पाषाण के लिए कविता परिवर्तन का औजार है। जहां कविता में मौन और सन्नाटा बुना जा रहा था, वहां ‘झाड़ू’ और ‘रिवाल्वर’ की तरह कविता के इस्तेमाल की बात कवि द्वारा की जाती है। यहां मुक्तिबोध की चर्चा करना प्रासंगिक होगा। हम जानते हैं कि मुक्तिबोध अपने जीवन काल में उपेक्षित रहे। यह नयी कविता का काल था। आधुनिकतावाद की हवा बहायी जा रही थी। ऐसे में मुक्तिबोध की नजर आजादी के बाद के चकाचौंध के भीतरी के अंधेर की ओर था। अपनी चिन्ता व बेचैनी को वे यूं व्यक्त करते हैं:

‘कि सारे प्रश्न छलमय

और उत्तर और भी छलमय

समस्या एक

अपने सभ्य ग्रामों और नगरों में

सभी मानव सुखी, सुन्दर

व शोषणमुक्त कब होगे!’

पाषाण की कविता में इसी ‘समस्या’ और ‘कब होगे’ का विस्तार है जो हिन्दी की जनवादी कविता का मूलाधार है। 

प्रगतिशीलता और जनवाद ऐतिहासिक सापेक्षता में परिभाषित होता है। कबीर अपने ऐतिहासिक-सामाजिक संदर्भ में प्रगतिशील व जनवादी है तो नागार्जुन अपने संदर्भ में। कहने का अर्थ है कि अपने समय के जनसंघर्ष की उच्च धारा से जो जितना गहरे जुड़ता है, वह उतना ही जनवादी है। यह साहित्य  के लिए सही है और राजनीतिक के लिए भी। पाषाण की यह विशेषता है कि उनका अपने समय के जनसंघर्ष की उच्च धारा के साथ जुड़ाव रहा। यह क्रान्तिकारी वामधारा थी जो ‘नवजनवाद’ से प्रतिष्ठित हुई। पाषाण जी परम्परा का निषेध नहीं करते बल्कि उससे जुड़ते है खासतौर से कबीर से। वे भक्ति आंदोलन के सत्ता विमुख कवियों जैसे कुंभनदास और तुलसीदास से भी प्रभावित हैं। अपने पूववर्ती कवियों में मुक्तिबोध उनके लिए खास महत्व रखते हैं। कुछ जनवादी आलोचकों ने मुक्तिबोध को नक्सलबाड़ी का ‘अवांगर्द’ कवि  भी माना है। पाषाण जी के लिए मुक्तिबोध का क्या महत्व है, इसे उन पर ‘एक हर्फनामा: मुक्तिबोध से जुड़ते हुए’ शीर्षक से लिखी कविता से समझा जा सकता है।  

समय बदलने से यथार्थ भी बदलता है। यह बदलाव विचार के स्तर पर भी होता है। रचना के स्तर पर भी यह घटित होता है। जब कबीर पाने नहीं खोने की बात करते हैं तो यह साहित्यकारों के लिए सीख है कि वे सत्तालोलुपता या किसी महत्व की आकांक्षा से अपने को दूर रखें। आजादी के बाद के काल में मुक्तिबोध इस भाव-विचार के जरूरी कवि हैं। कबीर हो या मुक्तिबोध पाषाण के प्रेरक कवि हैं। मुक्तिबोध कहते है ‘तय  करो, किस ओर हो तुम ?’ पाषाण की समझ भी इसी के करीब है। वे जिस समाज में हैं, वह वर्ग समाज है। शोषण-दमन की प्रवृति है। वे कहते हैं-

‘जितना लगाव

राज-समाज का राज-भवन से है

उससे ज्यादा मुझे

इस भीड़ से

यानी

बार-बार टूटे

बार-बार छले गये

खण्डित-विखण्डित

सपनों के नीड़  से है।’

यहां भीड़  से आशय स्पष्ट है और यह भी कि उनके साथ क्या घटित हुआ। पाषाण की विशेषता है कि वे मुक्तिबोध की काव्य परम्परा से कम उनकी विचार परम्परा से अधिक जुड़ते हैं। मुक्तिबोध ने फैंटेसी का सहारा लिया है। इस शिल्प में भी जहां और जब वे व्यवस्था की आलोचना करते हैं या जन की भूमिका प्रकट होती है, वहां कविता डायरेक्ट हो जाती है। उदाहरण के रूप में देखा जाय – ‘वर्तमान समाज चल नहीं सकता/पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता’, ‘पार्टनर, तुम्हारी पाॅलिटिक्स क्या है’ आदि। 

पाषाण का काव्यकथन डायरेक्ट है। वे अपने को मुक्तिबोध से जोड़ते हैं और ऐसा करते हुए उस स्वप्न को साकार करना चाहते हैं जो आमजन का है। वे उस दिशा में संकल्पबद्ध भी है। हम जानते हैं कि मुक्तिबोध अपनी बातों को सूत्रों में कहते हैं। यदि उन सूत्रों को खोला जाए तो वह धागे की रील की तरह खुलती चली जाएगी। मुक्तिबोध ने अपने समय की व्याख्या की थी। उन्होंने बताया कि  किस तरह सत्ता क्रूर हुई है। वह सारे अधिकारों का हनन कर रही है। वे लेखकों  और बुद्धिजीवियों से अपेक्षा करते हैं कि वे सत्य का साथ देंगे और अभिव्यक्ति का खतरा उठायेंगे।  पर कवियों, साहित्यकारों और बौद्धिकों की हालत क्या है ? सब कुछ देखते सुनते भी वे चुप हैं। पाषाण खतरा उठाते हैं और जन संघर्षों और प्रतिरोध को वाणी देते हैं। उनका दृढ भरोसा शोषित पीड़ित जन पर है जो सामाजिक बदलाव का मुख्य कारक है। उनका विश्वास ही है जो यूं व्यक्त होता है-

‘पूछा था जिनसे तुमने

उनकी पालिटिक्स का पता

वे तुम्हारे ही पार्टनर

फूंकेंगे

बेहतर दुनिया का

नया दिशा बोधक मंत्र

साफ करेंगे तमाम कूड़ा करकट

‘झाड़ू बनती बंदूक से कभी

‘बंदूक’ बनती झाड़ू से कभी’।

पाषाण के यहां कोई दुविधा नहीं है। वे जब कहते हैं ‘ओ मुक्तिबोध! ओ मेरे कामरेड! तुम्हारे स्वप्नों के/नए भारत का/भवितव्य’ तो साफ है कि वह मुक्तिबोध और उनकी परंपरा से जुड़कर यह आश्वस्ति पैदा करना चाहते हैं कि समाज बदलेगा, दुनिया बेहतर होगी, सुंदर होगी और मुक्तिबोध का वह स्वप्न कि ‘अपने सभ्य ग्रामों और नगरों में/सभी मानव सुखी, सुन्दर/व शोषणमुक्त कब होगे!’ यह सब पूरा होगा, जरूर पूरा होगा। पाषाण इसी स्वप्न के कवि हैं। इस मायने में वे तथाकथित मुख्यधारा के कवियों से अलग भी हो जाते हैं। यह विडम्बना है कि आज हिन्दी कविता की दुनिया के शीर्ष पर अधिकांश वैसे कविगण विराजमान हैं जिनकी चुप्पी पर मुक्तिबोध ने सवाल उठाये। ऐसे में ध्रुवदेव मिश्र पाषाण और इन जैसे कवि यदि उपेक्षित हो जाते हैं, हाशिए पर ढकेल दिये गये तो यह अस्वाभाविक नहीं। 

1970 के बाद के जन आंदोलनों ने कवियों व लेखकों को रचनात्मक ऊर्जा प्रदान की थी। ये आंदोलन थे नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन और जेपी आंदोलन। लेकिन जब आंदोलन सत्ता के दमन का शिकार हुआ और भौतिक शक्ति नहीं रह गया, वैसे समय में हमने देखा कि साहित्य में वह आन्दोलन जिन्दा रहा, अभिव्यक्ति पाता रहा तथा उसकी वैचारिकी से लेखक प्रेरित होते रहे। सोवियत समाजवादी व्यवस्था के खात्मे और नवउदारवाद के दौर में वैसा कोई आंदोलन भी नहीं था जो सृजन को प्रेरित करे। वैचारिक जमीन भी बदल चुकी थी। उत्तर आधुनिकतावादी दौर में किसान और मजदूर साहित्य से सचेतन रूप से बाहर किये गये। इसकी जगह अस्मिता विमर्श ने ले ली। अब लोकतंत्र का प्रश्न साहित्य के केन्द्र में था। जनतांत्रिक आशा-आकांक्षा की अभिव्यक्ति हुई। एक और बात, हमने देखा कि सोवियत समाजवाद के खात्मे ने बहुत से  रचनाकारों के विश्वास को खण्डित किया। इस व्यवस्था के पतन को उन्होंने माक्र्सवादी विचारधारा की असफलता के रूप में देखा और  वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में उत्तर आधुनिकतावाद की ओर मुड़े। 

ऐसे दौर में हम ध्रुवदेव मिश्र पाषाण के अन्दर वैचारिक दृढता व अडिगता का दर्शन करते हैं। उन्होंने क्रान्तिकारी अन्तर्वस्तु की रक्षा की। अपने काव्य सृजन को जनतांत्रिक आयाम प्रदान किया। इस संबंध में वे मानते हैं कि धारा मन्द भले हुई हो पर वह बन्द नहीं हुई। उनकी कविता जीवन के विविध प्रश्नों से रू-ब-रू है। उसमें विचार के साथ संवेदना के तत्व अधिक मुखर हैं। इसकी पड़ताल इनकी कविताओं में की जा सकती है। इस संबंध में उनकी कविता ‘नजीर मियाँ’ की चर्चा करना प्रासंगिक होगा। यह कविता शोषक वर्ग की क्रूरता तथा उसके बरक्स मेहनतकश जन की एकता और उनके अदम्य साहस की कथा कहती है। नजीर मियां की पहल पर सब मिलकर जिस कुएं को खोदते हैं, वह नयी व्यवस्था के लिए रचनात्मक संघर्ष है। पाषाण कहते हैं-

‘दर्द से पैदा हुई जिद

जिद से पैदा हुई हिम्मत

हिम्मत से जनमा हौसला

हौसले ने थमाई कुदाल’ फिर सबने मिल जिसमें नजीर मियाँ ही नहीं हैं, उनके साथ लोहार, बढ़ई, कोहार, चमार आदि है, अपने फैसले को कार्य रूप प्रदान करते हैं। ‘खोदेंगे आज कुँआ’ सामूहिक संकल्प है। यह मात्र एक कुँआ खोदना नहीं है बल्कि वैकल्पिक संस्कृति का निर्माण है। ऐसी कविता वर्ग दृष्टि के बिना संभव नहीं है। 

पाषाण के सौन्दर्यबोध की निर्मिति में वर्ग दृष्टि है। जीवन, समय और समाज यहां तक कि किसी व्यक्ति व घटना को भी वे इसी दृष्टि से देखते हैं। जीवन के प्रति गहरी आस्था है ‘पत्तियां/पेड़ पर जी रही होती हैं/उनके जीते/पेड़ नहीं मरता।’ कविता को देखने का नजरिया भी इसी तरह का है। पाषाण मानते हैं यदि कविता मनुष्य और मनुष्यता के पक्ष में नहीं है तो उसका क्या काम? अपनी एक कविता में कहते हैं-

‘धूप और वर्षा में

छतरी बनने वाली बात

ठंड में अलाव की आंच बन जाती है

जो कुछ नहीं होता है

आदमी के अनुकूल

कविता उसके प्रतिकूल खड़ी हो जाती है’।

कहने का अर्थ है कि धूप और वर्षा से छतरी और ठंड से अलाव बचाने का काम करता है, उसी तरह कविता मनुष्य विरोधी व्यवस्था के विरोध में खड़ी होती है। कविता का संघर्ष बेहतर जीवन स्थितियों  तथा मानव समाज को सुन्दर व मानवीय  बनाने का है। 

पाषाण जहां पूंजी की लूट और झूठ की व्यवस्था के विरुद्ध हैं, वहीं उनकी कविता में श्रम की प्रतिष्ठा है, सम्मान है। उदाहरण के लिए ‘मेहनत की बेटी’ कविता को देखा जा सकता है। यह श्रम सौन्दर्य की उत्कृष्ट कविता है। मेहनत की बेटी का वर्णन इस प्रकार है-

‘उसका ललाट

घर-बाहर

खेत-खलिहान, खंदक-खदान

हर कहीं, हर मौसम में

श्रम के ताप से चमकता-दमकता है

उसकी आंखों से काहिलों पर गुस्सा

खटने वालों पर प्यार बरसता है’।

इस बेटी का वर्ग चरित्र स्पष्ट है। ऐसे ही पात्र पाषाण की कविता के केन्द्र में हैं। उनका दुख-दर्द, जद्दोजहद, स्वप्न है। धक्के खाने, गिरने, गिरकर उठने और आगे बढ़ने का संघर्ष है। कांटो भरी राह है, पर उसे चलना ही चलना है। इन पात्रों को किसी मसीहा का इन्तजार नहीं है बल्कि अपने पर भरोसा करना है, जूझना है। कुछ आलोचक इसे कवि द्वारा निर्मित इच्छित यथार्थ मान सकते है। पर पाषाण की कविता में यह यथार्थ किसी कल्पना के रूप में नहीं घटित होता बल्कि उनकी नजर समाज के उन तत्वों पर है जिनमें गतिशीलता है। पाषाण की कविता यथार्थ के चित्रण-वर्णन तक सीमित नहीं है बल्कि यथास्थिति को कैसे बदला जाय, इसके मूल में है। 
यह लोकतंत्र के तानाशाही में बदलने और उसके मूल्यों के क्षरण का काल है। यह दुनिया में भी हो रहा है और भारत में भी। सत्ता की क्रूरता बढ़ी है।

लोकतंत्र ने अपने कुछ  जीवन मूल्य गढ़े हैं। लेकिन तानाशाहों को ये मूल्य पसन्द नहीं। ‘सिर्फ उस एक के खिलाफ’ कविता इसी तानाशाही को केन्द्र कर पाषाण ने लिखी है। यह कविता फासिस्टों-तानाशाहों के चरित्र और उनकी क्रूरता को उजागर करती है। बातें भले जनतंत्र, मानवता, स्वतंत्रता, न्याय, प्रेम, भाईचारा आदि की तानाशाह करे लेकिन सच्चाई यह है कि उसके लिए इनका कोई महत्व नहीं। हिरोशिमा व नागासाकी, 1984 का सिख विरोधी हिंसा, 1992 का बाबरी मस्ज्दि घ्वंस, 2002 का गुजरात जैसी घटनाओं के द्वारा उसने लोकतंत्र को रक्तरंजित किया है। उसके हाथ हजारों बेगुनाहों के खून से रंगे है। पाषाण की कविताओं में यदि तानाशाहों के प्रति तीव्र  नफरत का भाव है तो वहीं आम जन के प्रति अथाह प्यार है। वे उन नायकों को जरूर याद करते हैं जिन्होंने बेहतर समाज बनाने और मानव मुक्ति के लिए संघर्ष किया है। आशा की डोर कभी कमजोर नहीं होती। वे कहते हैं-

‘मेरे धरती के लोगों!

याद करो भगत सिंह और हो ची मिन्ह के हौसले

नेल्सन मण्डेला और यासर अराफात के संकल्प

अपने वक्त की जिन्दगी और जिन्दगी के अन्तहीन

सिलसिले के लिए फिक्रमंद लोगों!

खड़े होओ कतार-कतार एक आखिरी युद्ध के लिए

सिर्फ उस एक के खिलाफ

जो अभी भी रच सकता है

हिरोशिमा और नागासाकी का ध्वंस

बना सकता है धरती के एक हिस्से को

भिंडरवाले का पंजाब, चौरासी की दिल्ली

बानवे की अयोध्या और दो हजार दो का गुजरात’।  

ध्रुवदेव मिश्र पाषाण के काव्य का यह खास गुण है कि वह अपने समय के न सिर्फ सवालों से रु-ब रू होते हैं बल्कि जनसंघर्ष की सबसे निच्छल, प्रखर और उच्च धारा से जुड़ते हैं। आम जन से उनका भावनात्मक तादात्मय स्थापित होता है। उनकी वैचारिकी भी इसी से निर्मित होती है और उनकी संवेदना इसी से उत्प्रेरित है। हिन्दी कविता में भक्तिकाल से लेकर आधुनिक कविता में कबीर, निराला, मुक्तिबोध और नागार्जुन की विशिष्टता इस मायने में हैं कि ये अपने समय के जन संघर्षों की जो सबसे उच्च धारा रही है, इनका जुड़ाव उससे है। पाषाण के काव्य में भी यह दिखता है। उन्होंने छ दशक की काव्ययात्रा की। तमाम झंझावातों से गुजरने के बाद भी अंधेरे के आतंकी खोह से बाहर निकलने और खुशियों के नये संसार को बसाने के युद्ध में शामिल होने की उनकी तमन्ना कम नहीं हुई है। शरीर कमजोर भले हुआ हो पर मन आज भी वैचारिक ओज से भरा है। इसका प्रमाण है पहली जनवरी 2020 को लिखी उनकी यह कविता-

‘बादलों का ब्यूह तोड़ते हुए

आज जनवरी की पहली सुबह

ओस नहाई धरती के प्यारे होठों पर

मुस्कुराती किरणें बिखेरते हुए

कितने प्यारे लग रहे हो तुम सूरज!

अंधेरे के आतंकी खोह से निकल कर

खुशियों का एक और नया संसार

बसाने के युद्ध में

खटते-खपते

खपते-खटते

बार-बार लुढ़कते

फिर संभलते

लोगों की आशा हो तुम सूरज

स्वागत है तुम्हारा प्राण-प्यारे सूरज!’  

लेखक- कौशल किशोर, एफ – 3144, राजाजीपुरम, लखनऊ -226017मो – 8400208031

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