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भारतेंदु हरिश्चंद्र: हिंदी नवजागरण व पत्रकारिता के अग्रदूत- आलोक रंजन पाण्डेय

आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक तथा तुलसीदास के बाद के महानतम लेखकों में शुमार भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 ई. को काशी में हुआ था. इन्हें साहित्य सेवा का अधिक समय न मिला, केवल 34 वर्ष और 4 मास की अल्पायु में ही जनवरी 1885 ई. में इनका स्वर्गवास हो गया. अपनी छोटी सी इस अवस्था में ही भारतेंदु ने साहित्य की जितनी सेवा की वैसी सेवा बहुत कम ही साहित्यकार कर पाए हैं. वे साहित्य जगत में सुकवि, गद्यकार, नाटककार, निबंधकार,पत्रकार, आलोचक एवं इतिहास लेखक के रूप में प्रसिद्ध हैं. बहुभाषाविद भारतेंदु की प्रमुख रचनाएँ हैं.. भारत जननी, सती प्रताप, सत्य हरिश्चंद्र,श्री चंद्रावली, नील देवी,प्रेम योगिनी, अंधेर नगरी आदि (नाटक) पूर्ण प्रकाश चंद्रप्रभा (उपन्यास) कार्तिक स्नान, प्रेम प्रलाप, दान-लीला, विजय वल्लरी, प्रेम फुलवारी, नए जमाने की मुकुरी, जातीय संगीत आदि ( कविता). इसके अतिरिक्त उन्होंने कई आलोचना और निबंध की पुस्तकें लिखी है और कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया है। ऐसे साहित्यनुरागी एवं महान साहित्यकार भारतेंदु के जन्मदिन पर उनके साहित्य व पत्रकारिता पर एक आलेख डॉ आलोक रंजन पाण्डेय ने लिखा है. पढ़ें –

आज 9 सितंबर है, आज ही के दिन 1950 ई. में आधुनिक हिंदी के जनक तथा तुलसीदास के बाद महानतम लेखक माने जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म काशी के अग्रवाल वंश में हुआ था। भारतेंदु जी को साहित्य सेवा का अधिक समय नहीं मिला और वे केवल 34 वर्ष 4 महीने की अल्पायु में 6 जनवरी 1885 ई. को इस संसार से विदा हो गए, पर इस छोटी सी अवस्था में ही उन्होंने साहित्य की जैसी सेवा की वैसी सेवा बहुत ही कम साहित्यकार कर पाए हैं। वे साहित्य जगत में सुकवि, गद्यकार,नाटककार,निबंधकार, पत्रकार, आलोचक व इतिहास लेखक के रूप में प्रसिद्ध हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास में भारतेंदु का नाम नवजागरण के लिए लिया जाता रहा है। उन्हें नवजागरण के अग्रदूत के रूप में सदैव से देखा-समझा जाता रहा है। नवजागरण का जो प्रसार बंगाल से हिंदी पट्टी में हुआ उसकी एक प्रमुख वजह भारतेंदु स्वयं रहे हैं। भारतेंदु का समय वह संवेदनशील दौर था जब हमारा देश अंग्रेजी साम्राज्य के तले शोषण, उपेक्षा और अपमान की पीड़ा से कराह रहा था। ऐसे अवसर पर वीणापाणि मां शारदे के वरद-पुत्र भारतेंदु हरिश्चंद्र अपने ही क्रंदन के इस मार्मिक स्वर में देश का स्वर मिलाते हैं:

“आवहु हम सब मिली रोवहु भारत भाई

हा! हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई।“

वैसे तो 18वीं सदी में भारत में विधिवत पत्रकारिता प्रारम्भ हो चुकी थी परंतु हिंदी पत्रकारिता का प्रारम्भ 19वीं सदी के तीसरे दशक से माना जाता है जब पंडित जुगल किशोर ने ‘उदंत मार्तंड’ का प्रकाशन प्रारम्भ किया। परंतु उससे पहले का इतिहास और अधिक प्रभावी है,और उसके बाद का समय पूरे समाज पर प्रभाव पैदा करने वाला। भारतेन्दुयुगीन पत्रकारिता के संदर्भ में बात करने से पहले पत्रकारिता के इतिहास के बारे में जानना आवश्यक है।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र , लोकमंच पत्रिका
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र , लोकमंच पत्रिका

पत्रकारिता की पहल भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी विलियम वोल्ट ने की। कंपनी से मतभेद होने के बाद विलियम वोल्ट और उनके सहयोगियों द्वारा 1768 ई. में कलकत्ता के काउंसिल हॉल सहित प्रमुख स्थानों पर ‘जनसाधारण से’ शीर्षक के साथ एक नोटिस लगाया गया, जिसमें लेखन और मुद्रण के जानकार व्यक्तियों से वोल्ट से मिलने का आह्वान किया गया। कंपनी को लगा कि ऐसा करके वोल्ट कंपनी को बदनाम कर रहे हैं, और उन्हें जबरदस्ती भारत से बाहर भेज दिया गया। पर विलियम वोल्ट के इस कार्य ने पत्रकारिता के लिए एक नींव रख दी थी । 29 जनवरी, 1780 ई. में जेम्स आगस्टस हिकी ने ‘बंगाल गजट’ प्रकाशित किया। 1780 ई. में दूसरा समाचार पत्र ‘इंडिया गजट’ तत्पश्चात 1784 ई॰ में ‘केलकट्टा गज़ट’ तथा 1785 ई. में ‘बंगाल जनरल’ प्रकाशित हुआ। 1816 ई. में भारतीय समाचार पत्र का एक नवीन अध्याय श्री गंगाधर भट्टाचार्य द्वारा प्रकाशित पत्र ‘बंगाल गजट’ से शुरू होता है । राजा राममोहन राय ने 1821 ई. में ‘संवाद कौमुदी’ प्रकाशित की, इससे पूर्व 1818 में मार्क्समैन के संपादन में मासिक ‘दिग्दर्शन’ प्रकाशित हुआ जिसके अंग्रेजी और बंगला में 16 अंक उपलब्ध हैं।

हिंदी का पहला पत्र ‘उदंत मार्तंड’ है जो 30 मई 1826 ई. को कोलकाता से पंडित युगल किशोर के संपादन में प्रकाशित हुआ। इसके पश्चात 1829 में ‘बंगदूत’, 1845 में ‘बनारस अखबार’ और 1850 ई. में ही तारा मोहन सेन ने बनारस से ‘सुधाकर’ पत्र का सम्पादन किया। 1846 में ‘इंडियन सन’ हिंदी में ‘मार्तंड’ नाम से छपने लगा। 1848 ई. में ‘सप्ताहिक मालवा’ तथा 1849 ई. में कोलकाता से बंगला-हिंदी में ‘जगदीप भास्कर’ छपना शुरू हुआ। 1848 ई. में ही शेख अब्दुल्ला ने हिंदी-उर्दू पत्र ‘शिमला अखबार’ शिमला से प्रकाशित किया। 1852 ई. में आगरा से मुंशी सदासुख लाल के संपादन में ‘बुद्धि प्रकाश’ प्रकाशित हुआ। 1854 में ‘समाचार सुधा वर्षण’ का प्रकाशन हुआ, जिसे हिंदी का पहला दैनिक पत्र माना जाता है। 1857 के दौरान लगभग डेढ़ दशक में अनेक महत्वपूर्ण पत्र बंगाल और हिंदी प्रदेशों से प्रकाशित हुए जिसमें ‘सर्वहितकारक’, ‘ग्वालियर गजट’, ‘मजहरुल सरूर’, ‘धर्म प्रकाश’ ‘भारत खंडामृत’, ‘वृतांत विलास’, ‘धर्म प्रकाश’, ‘सत्य दीपक’, ‘तत्वबोधिनी पत्रिका’, ‘प्रजा हितैषी’, ‘रतन प्रकाश’ तथा ‘ज्ञान प्रदायिनी’ पत्रिका आदि प्रमुख रूप से उल्लेखनीय है। इसका परिणाम यह हुआ कि हिंदी पत्रकारिता क्षेत्रफल बंगाल की सीमाओं को लांघकर भरतपुर, आगरा, ग्वालियर, इटावा, बरेली, अहमदाबाद, जम्मू कश्मीर तथा लाहौर तक फैल गया।

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1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय सामाजिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान और राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने के प्रयासों का श्रीगणेश हो गया था। जब पूरे भारत पर अंग्रेजों का शासन हो गया और भारत कम्पनी के हाथों से निकलकर विक्टोरिया के हाथों में चला गया, परिणाम स्वरूप दमनकारी नीति में वृद्धि हुई और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कई प्रकार के ख़तरे में पड़ गई । साथ ही इसी क्रांति से भारतवर्ष में एक नवीन चेतना का विकास हुआ और उपनिवेश विरोधी तथा स्वतंत्रता प्राप्ति की चेतना जागृत हुई, हताश भारतीय जनता को पूर्ण जागृत करने और भारतीय संस्कृतिके पक्षों को प्रकट करने के लिए तथा लोगों में उत्साह का संचार करने में हिंदी पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारतेंदु जिस काल में जन्मे थे वह काल बड़ा संवेदनशील काल था। भारतीयों में ब्रिटिश शासन के विरोध धधक रहा था। लोग फूटी आंख से ईस्ट इंडिया कंपनी के वर्चस्व को नहीं देखना चाहते थे। 1857 ई.में जब वह केवल 7 वर्ष के थे अंग्रेजों के विरुद्ध भीषण संग्राम का रूप धारण कर लिया, किंतु संगठनशीलता अथवा योजनाबद्ध ता के अभाव जैसे अनेक कारणों से यह संग्राम अंग्रेजों द्वारा बुरी तरह कुचल दिया गया और भारतीयों को अपने शौर्य की पराजय देखनी पड़ी।

भारतेंदु जब दुनिया को समझने की स्थिति में आए तो उन्हें पृष्ठभूमि में यह कारुणिक सत्य मिला जिसे जानकर भारतेंदु जी खूब अच्छी तरह समझ गए थे कि अंग्रेजों से शक्ति के बल पर लड़ना मुश्किल होगा। उस समय के जनमानस को राष्ट्रीय स्वाभिमान, नैतिकता, ईमानदारी और स्वदेशी मर्यादा का पाठ पढ़ाना भी समय की परम आवश्यक मांग थी और इस कार्य को पूरा किया भारतेंदु जी ने पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से। भारतेंदु जी का यह प्रयोग बड़ा प्रयोग सफल हुआ और मात्र दो दशकों की अत्यंत अल्प अवधि में देश के जनसामान्य में राष्ट्रीय स्वाभिमान के बिंदु पर एक नवीन चेतना का संचार हुआ। भारतेंदु युगीन पत्रों ने सचमुच तोपें फेल कर दी और कदाचित उसकी बनाई पृष्ठभूमि का ही सुपरिणाम था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। आगे चलकर इसी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आंदोलन के कारण अंग्रेजों के पैर भारत से उखड़ गए और देश स्वतंत्रता के स्वच्छ और स्वच्छंद नभ तले सांस ले सका।यह कहना भी ठीक होगा कि भारत की स्वाधीनता संग्राम के संदेशवाहक और राष्ट्रीय अस्मिता के लिए संघर्ष की संरचना के वास्तविक रचनाकार भारतेंदु हरिश्चंद्र थे। भारतेंदु हमारे राष्ट्रीय सम्मान और भारतीयों को उनके अधिकार मिले इसके लिए भी वे हिंदी क्षेत्र के प्रथम प्रवक्ता है। यही कारण है कि भारतेंदु काल में जिन पत्र-पत्रिकाओं ने जन्म लिया उसका एकमात्र उद्देश्य था सामाजिक तथा राष्ट्रीय उन्नति।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र , लोकमंच पत्रिका
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र , लोकमंच पत्रिका

सामाजिक तथा राष्ट्रीय उन्नति के साथ देशवासियों मे देश-प्रेम, स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग आदि के लिए भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने 1868 ई. में ‘कवि वचन सुधा’ का प्रकाशन प्रारंभ किया, इस पत्रिका के प्रकाशन के समय भारतेंदु की आयु 18 वर्ष थी। इस पत्रिका ने अपने गौरवपूर्ण कलेवर के कारण न केवल हिंदी पत्रकारिता अपितु हिंदी गद्य साहित्य में भी अभूतपूर्व परिवर्तन ला दिया था। इस पत्रिका ने देश के लोगों को भाषा-साहित्य और देश प्रेम की शिक्षा देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। ‘कवि वचन सुधा’ में ही भारतेंदु ने स्वदेशी वस्तुओं के व्यवहार के लिए अपना प्रतिज्ञा पत्र छापा था तथा खाना देश तथा खानदेश के बाढ़ पीड़ितों की सहायता की अपीलें, हिंदी के प्रचार-प्रसार पर बल एवं अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली व नीति की पोल खोलने का साहसिक कदम उठाया था।

1870 में लार्ड मेयो का लेवी दरबार हुआ था। भारतेंदु ने इस पर करारा व्यंग करते हुए एक लेख लिखा था कि “लेवी जान लेवी” इसके बाद ब्रिटिश प्रशासन ने भारतेंदु बाबू को कभी राजभक्त नहीं समझा। सन 1874 ईस्वी में इसमें एक मरसिया निकला इस पर भी भारतेंदु को अंग्रेजी शासन का कोप भाजन बनना पड़ा। यह किस राजा पर लिखा गया था, कौतूहल था जिसका समाधान भारतेंदु ने अपने पत्र में ‘श़ंका शोधन’ शीर्षक से लिखा- ‘मरसिया में हमारे ग्राहकों को शंका होगी कि यह राजा कौन था। इससे अब हम उस राजा का अर्थ स्पष्ट करके सुनाते हैं। वह राजा अंग्रेजी फैशन था जो इस अपूर्ण शिक्षित मंडली रूपी अंधेर नगरी का राज करता था। जब से मुंबई और काशी इत्यादि नगरी में अच्छे अच्छे लोगों ने प्रतिज्ञा करके अंग्रेजी कपड़ा पहनना छोड़ देने का सौगंध खाई तब से मानो वह मर गया’।

भारतेंदु ने इस शंका समाधान से इसमें संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं कि यह मरसिया अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध था, जिसका प्रभाव यह पड़ा की ब्रिटिश हुकूमत ने ‘कवि वचन सुधा’ की शासकीय सहायता ही बंद कर दी। 1 सितंबर 1873 से ‘कवि वचन सुधा’ सप्ताहिक हो गया, इस पत्रिका ने सामाजिक समस्याओं को भी बड़ी निकटता से स्पर्श किया। देश में महिलाओं की शिक्षा-दीक्षा और समानता के लिए भी इस पत्र ने आवाज उठाई। आज जब नारी शिक्षा के नारे को आधुनिकता की ओर बढ़ने की प्रक्रिया का एक आवश्यक कदम बताया जा रहा है भारतेंदु कवि वचन सुधा में 19वीं सदी के उत्तरार्ध में न केवल उस पर चिंता व्यक्त कर रहे थे अपितु स्त्री को शिक्षा के प्रांगण में कूद पड़ने का आह्वान कर रहे थे।

भारतेंदु के संपादन में ‘हरिश्चंद्र मैगज़ीन’ का प्रकाशन 1873 में प्रारंभ हुआ जिसका नाम बाद (1874ई.) में ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ कर दिया गया। यह समकालीन पत्रिका में सर्वाधिक सुव्यवस्थित ढंग से संपादित पत्रिका थी इस पत्रिका में भी राष्ट्रीय चेतना की भावना को बढ़ावा मिला। समाज का प्रतिनिधित्व करना और जनमानस का मार्गदर्शन करना इस पत्रिका की प्रमुख विशेषता थी। अपनी स्पष्टवादिता और ब्रिटेन सरकार के विरोधी लेखा के कारण इसे अनेक बार सरकारी प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी परंतु इस ने पत्रकारिता में अपना स्वरूप निश्चित तौर पर स्थापित किया।हरिश्चंद्र चंद्रिका ने राष्ट्रीय गौरव की वृद्धि के लिए साहित्य, पत्रकारिता तथा सांस्कृतिक मानदंडों की स्थापना के लिए उल्लेखनीय कार्य किया।भारतेंदु ने इस पत्रिका में जहां शुद्ध साहित्य चिंतन का परिचय दिया वही ललित निबंध, यात्रा वृतांत आदि को अत्यंत साधारण शैली में व्यक्त किया है ताकि पाठक को पढ़ते समय साक्षात्कार की अनुभूति हो जाए।

आज के इस अत्याधुनिक दौर में जब महिलाओं बच्चों के लिए पृथक-पृथक प्रकाशनों की प्रक्रिया को हमारी अत्याधुनिक चिंतन पद्धति, प्रगति और विकास जैसे दर्दीले संबोधन से जोड़ा जा रहा है, वहीं इस वास्तविकता पर विशेष ध्यान आकर्षण की आवश्यकता है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने दासता के उस युग में इस देश की महिलाओं को राष्ट्रीय, सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक चिंतन धारा से जोड़ने के लिए 1 जून 874 ई. को हिंदी में पहली महिलाओं की उपयोगी मासिक पत्रिका ‘बाला-बोधिनी’ का प्रकाशन आरंभ किया। भारतेंदु ने ‘बाला- बोधिनी’ ने नारियों में आदर्श आचरण की प्रवृत्ति को बल देते हुए उनके सारे पराक्रम और शक्ति का स्मरण दिलाने का अत्यंत प्रासंगिक और महत्वपूर्ण कार्य ब्रिटिश दासता के उस घोर संवेदनशील दौर में किया। ‘बाला बोधिनी’ का सिद्धांत वाक्य था :

‘जोई हरि सोई राधिका जो शिव सोई शक्ति

नारी जो सोई पुरुष जामें कुछ ना विभक्ति’।

भारतेंदु हरिश्चंद्र निसंदेह आधुनिक हिंदी साहित्य के तो जनक हैं ही साथ ही साथ हिंदी पत्रकारिता के भी वे ऐसे मील के पत्थर हैं जिनके अभाव में समग्र हिंदी पत्रकारिता की चर्चा ही नहीं हो सकती। उनका व्यक्तित्व सचमुच इतना अद्भुत और प्रभावशाली था कि वे अपने समय की सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक पत्रकारिता और प्रशासकीय कार्य की प्रत्येक गतिविधियों में उनका सक्रिय सहयोग रहता था और इनमें बहुत कुछ उनके द्वारा ही संचालित होता था। उस कालखंड के पत्रों की भाषा,शैली,कलेवर और राष्ट्रीय चिंतन धारा प्रेरणास्पद है और वर्तमान हिंदी पत्रकारिता इससे बहुत कुछ सीख सहज रूप से ले सकती है। सुविधा, शक्ति और वैभव के नाम पर इस समय के निर्भिक पत्रकारों ने अपने सर्वस्व होम करके हिंदी पत्रकारिता की ऐसी त्यागमयी पृष्ठभूमि बनाकर हमें दी है कि आज हमें उस पर गर्व और गौरव है।

लेखक- डॉ. आलोक रंजन पांडेय, रामानुजन कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।

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