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शैलेन्‍द्र : भोजपुरीयत के प्रतिनिधि – प्रमोद कुमार तिवारी

अनूठे गीतकार शैलेन्द्र जी का आज जन्मदिन है। एक ऐसे गीतकार जिन्हें उनकी मिट्टी से काट कर देखा गया। कुछ साल पहले, उन पर लगातार काम करने वाले डाॅ. इंद्रजीत सिंह ने शैलेन्द्र जी पर अपनी किताब दी। मैंने पाया कि उसमें अनेक लेख हैं पर इस पक्ष पर एक भी नहीं। इस ओर संकेत करने पर उन्होंने मुझे लिखने को कहा जो उनकी नयी किताब में संकलित है। आज शैलेन्द्र जी के जन्मदिन पर आप सबकी नज़र- डॉ प्रमोद कुमार तिवारी

गीतकार शैलेंद्र पूरे देश के दुर्लभ गीतकार थे, वे हिंदी के तो थे ही परंतु फिल्म संगीत और अन्य माध्यमों से राजकपूर की तरह उन्होंने भी भाषाओं की सीमाओं से परे अपनी एक खास पहचान बनाई थी। हिंदी फिल्मों की पहुंच भारत के हिंदीतर क्षेत्रों में और दुनिया के अनेक देशों में पर्याप्‍त है इसीलिए शैलेंद्र के गीत भी हिंदी की सीमा के परे जाते हैं।

मैं जब शैलेंद्र के गीतों की बनावट और बुनावट पर ध्यान देता हूं तो उन सूत्रों की तलाश करता हूं जिसे शैलेंद्रीयत के नाम से जाना जा सकता है। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि व्यक्ति चाहे जहां पहुंच जाए पर उसकी उड़ान एक पतंग की तरह होती है, जिसका एक सिरा धागे से बंधा होता है यानी बहुत ऊपर वही पहुंच पाता है जो जमीन से जुड़ा होता है। सवाल यह है कि शैलेंद्र की ऊंची उड़ान की जमीन क्या है? वह कौन सी चीज है जो शैलेंद्र को अन्य गीतकारों की तुलना में खास बना देती है? यह मेरी निजी राय है कि शैलेंद्र को समझने के जो तीन चार सूत्र हमें मिलते हैं उन सभी का बड़ा ही गहरा रिश्ता बिहार के भोजपुर इलाके से जुड़ता है।

गीतकार शैलेन्द्र, लोकमंच पत्रिका
गीतकार शैलेन्द्र, लोकमंच पत्रिका

शैलेंद्र के जीवन की जब भी चर्चा होती है तो रावलपिंडी, मथुरा, मुंबई, रेलवे आदि का जिक्र बार-बार आता है पर जिस एक चीज की चर्चा नहीं के बराबर होती है, वह है भोजपुर जिला और भोजपुरी भाषा और संस्कृति। हम सब जानते हैं कि शैलेंद्र के पिताजी भजन गाते थे और संगीत का एक पक्ष वहां से शैलेंद्र को प्राप्त होता है। खुद शैलेंद्र ने इस बात को स्वीकार किया है कि चक्‍की पीसते हुए मां गीत गाती थी और उसका गहरा प्रभाव मेरे ऊपर पड़ा था। इस बात पर गौर करने की जरूरत है कि पिता के भक्ति गीत गाने का और चक्‍की पीसते हुए मां के अच्‍छा खासा गा लेने का शैलेन्‍द्र के बाल मन पर क्‍या प्रभाव पड़ा। सवाल यह भी है कि मां-पिता के वे गीत किस संस्‍कृति और भाषा से जुड़ते थे? इन गीतों की प्रकृति हमें क्‍या सूचनाएं देती हैं? शैलेन्‍द्र ने स्‍वयं शिवनारायणी संप्रदाय की चर्चा की है। यह संप्रदाय भोजपुरी क्षेत्र में प्रचलित है और तथाकथित छोटी जाति के लोगों में अधिक लोकप्रिय है। इसी शिवनारायणी संप्रदाय के बुजुर्गों और युवाओं के साथ गीत गाते हुए शैलेन्‍द्र ने डफली बजाना सीखा था। यह वही डफली है जो बाद में इप्‍टा के आयोजनों में शैलेन्‍द्र के काम आयी और आगे चलकर राजकपूर की पहचान बनी।

मेरी स्‍पष्‍ट मान्‍यता है कि रावलपिंडी, मथुरा आदि में परिवेश की भाषा चाहे जो रही हो परंतु शैलेन्‍द्र की मातृभाषा भोजपुरी थी जो उन्‍हें उनके माता-पिता से और बिहार से उन इलाकों में श्रमिक के रूप में गए शिवनारायणी संप्रदाय के लोगों से प्राप्‍त हुई थी। बिहार के आरा जिले के धुसपुर गांव के दलित परिवार से ताल्लुक रखने वाला शैलेन्‍द्र का परिवार ने सिर्फ गांव छोड़ा था वहां की संस्‍कृति नहीं। धुसपुर गांव में ज्यादातर लोग खेतिहर मजदूर थे और उस गांव के लिए एक कहावत मशहूर थी- ‘जसपुर नगरी धुसपुर गांव वहां के बसिया रावतराव।’ शैलेन्‍द्र का वास्तविक नाम शंकरदास राव था। उनके पिता का नाम केसरीलाल राव था। इसी धुसपुर का नाम बाद में अख्तियारपुर हो गया। पता चला है कि आज भी इस गांव में राव उपनाम वाले लोग रहते हैं। इस गांव में उनके पुत्र और पुत्री जाते रहे हैं। उनके बेटे दिनेश शैलेन्‍द्र जी अख्तियारपुर पहुंचे थे। कुछ साल पहले उनकी बेटी अमला शैलेंद्र मजूमदार पटना होते हुए वहां पहुंचीं। वे अपने साथ पिता की डायरी से वह पन्ना भी लेकर आईं थीं, जिस पर शैलेंद्र की हस्तलिपि में दादा, पिता और गांव का नाम लिखा हुआ था- अख्तियारपुर, आरा।

हम सब जानते हैं कि शैलेन्‍द्र ने जनता के दुखदर्द को बयां करनेवाली जनवादी कविताएं काफी लिखी हैं। भोजपुरी इलाके की आरा, बलिया, छपरा की धरती पर सामंतवादी शक्तियां बहुत मजबूत रही हैं, इसीलिए उस इलाके में इनके प्रतिरोध की भी समृद्ध परंपरा मिलती है। जिसका रिश्‍ता निर्गुण पंथ और विभिन्‍न संप्रदायों से जुड़ता है। इस इलाके में ढेर सारे पंथ विकसित हुए। जैसे- कबीर पंथ (बनारस में), शिवनारायणी संप्रदाय (बलिया) नाथ सम्प्रदाय (गोरखपुर), दरिया पंथ (शाहाबाद), सखी संप्रदाय (सारन), सरभंग संप्रदाय (चम्पारण)। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि बाद के दिनों में वामपंथी दलों को इस इलाके में काफी मजबूती मिली जिनसे शैलेन्‍द्रजी का भी जुड़ाव था।

शैलेन्द्र अपने परिवार के साथ, लोकमंच पत्रिका
शैलेन्द्र अपने परिवार के साथ, लोकमंच पत्रिका

मैं यह जोर देकर कहना चाहता हूं कि शैलेंद्र की मानसिक बनावट को बगैर भोजपुरी के नहीं समझा जा सकता। हमें यह ध्यान रखना होगा कि शैलेंद्र की ताकत उनके लोकमानस की समझ में निहित है। लोक के साथ ही कुछ विसंगतियां जो उनके जीवन में रही हैं उनके प्रभाव का भी हमें अध्ययन करना चाहिए।

शैलेंद्र के माता पिता आरा जिले के प्रवासी थे जो रावलपिंडी पहुंचे थे, इसके साथ ही यह भी ध्यान रखा जाए कि शैलेंद्र तथाकथित छोटी जाति के थे और तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात शैलेंद्र ने गरीबी को और अभाव को बहुत करीब से देखा था। हालात यहां तक खराब थे कि पूरे उत्तर प्रदेश में दसवीं की मेरिट में तीसरा सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने वाले तेजस्वी छात्र शैलेन्द्र को पढ़ाई छोड़ कर रेलवे की मुश्किल नौकरी स्वीकार करनी पड़ी। यहां तक कि कई बार ऐसे दौर भी आए कि घर में एक आलू होता था और उसे सुबह खाएं या शाम को खाएं यह तय करने की दुविधा होती थी। गरीबी ने कुशाग्र बुद्धि वाले शैलेन्‍द्र से उनकी शिक्षा ही नहीं छीनी, उनसे ढेर सारे समझौते भी कराए। वे लिखते हैं- ‘‘गरीबी मेरे देश के नाम के साथ जोंक की तरह चिपकी है। नतीजा, हम सब एक हो गए- कवि, मैं और मेरे गीत और विद्रोह के स्वर गूंजने लगे- पचास-पचास हजार की भीड़ के बीच। सभाओं और जुलूस में गाए हुए इस काल के गीत, ‘नया साहित्य’ और ‘हंस’ में छपी इस काल की कविताएं अति उग्रवादी अवश्य थीं लेकिन इनके माध्यम से जनजीवन और रुचि को समझने का अवसर मिला और जनजीवन के पास रहने की आदत पड़ी जो कालांतर में फिल्मी गीतकार की हैसियत से बहुत काम आए।’’

ध्‍यान देनेवाली बात है कि शैलेन्‍द्र स्‍वयं अपने गीतों को अतिउग्रवादी कहते हैं, हालांकि इन्‍हें जनगीत या क्रांतिगीत कहते हुए लाखों लोग गाते गुनगुनाते हैं। इन गीतों की रचना प्रक्रिया में अभाव और भूख की बड़ी भूमिका रही है।

बुरी है आग पेट की, बुरे हैं दिल के दाग़ ये,

न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इन्क़लाब ये,

गिरेंगे जुल्म के महल, बनेंगे फिर नवीन घर

अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर….

तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर,

अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

यहां विचारधारा और प्रतिबद्धता का सवाल आता है। विचार हवा में नहीं पैदा होते, वे परिस्थितियों से पैदा होते हैं। भोजपुरी इलाके के महान लेखक प्रेमचंद द्वारा स्‍थापित ‘हंस’ में शैलेन्‍द्र जी की कविताएं छपती थीं इसलिए कि दोनों के विचारों में समानता थी। अपनी मृत्‍यु से कुछ दिन पहले प्रेमचंद ने कहा था कि, ‘‘मुझे यह कहने में हिचक नहीं कि मैं चीजों की तरह कला को भी उपयोगिता की तुला पर तौलता हूँ। निस्संदेह कला का उद्देश्य सौंदर्यवृत्ति की पुष्टि करना है और वह हमारे अध्यात्मिक आनंद की कुंजी है, पर ऐसा कोई रूचिगत मानसिक तथा आध्यात्मिक आनंद नहीं, जो अपनी उपयोगिता का पहलू न रखता हो। आनंद स्वतः एक उपयोगिता-युक्त वस्तु है और उपयोगिता की दृष्टि से एक वस्तु से हमें सुख भी होता है और दुःख भी।’’

इसी बात को शैलेन्‍द्र अपने ढंग से कहते हैं- ‘एक बात तो दृढ़ता से मेरे मन में विश्वास बनकर बैठ गई है कि जनता को मूर्ख या सस्ती रुचि का समझने वाले कलाकार या तो जनता को नहीं समझते या अच्छा और खूबसूरत पैदा करने की क्षमता उनमें नहीं है। हां, वह अच्छा मेरी नजरों में बेकार है जिसे केवल गिने-चुने लोग ही समझ सकते हैं।’

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घनघोर गरीबी के साथ शैलेन्‍द्र ने नस्‍ल और जाति के दर्द को भी करीब से झेला था। उसकी स्‍मृतियों का दंश बहुत गहरा था। वे लिखते हैं- ‘‘मैं और बहन श्‍यामा तितलियां पकड़ रहे थे। नीचे ढाल पर सड़क से जा रहे कॉन्‍वेंट के अंग्रेज विद्यार्थी लड़के। किसी एक ने पत्‍थर मारा। बहन की कनपटी से खून बह रहा था- हम काले अपने बाप-दादाओं की जमीन पर स्‍वछन्‍द क्‍यों घूम रहे हैं, इसी की जलन थी उन गोरे संपोलों को।’’

इसी प्रकार मथुरा में हॉकी खेलते समय साथी खिलाडि़यों द्वारा उनके गरीब और दलित होने का मजाक उड़ाया जाना, हॉकी खेलते हुए कुछ छात्रों का यह कहना कि ‘अब ये लोग भी खेल खेलेंगे,’ शैलेन्‍द्र के किशोर मन पर कितना घातक प्रभाव डाला होगा, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस घटना के तत्‍काल बाद उन्‍होंने अपने हाथों से अपनी प्‍यारी हॉकी स्टिक तोड़ दी थी और हॉकी को अलविदा कह दिया था। स्‍मृतियां और अनुभव, खास तौर से कड़वे अनुभव कहीं जाते नहीं हैं, रूप बदलकर हमारे साथ चलते रहते हैं। शैलेन्‍द्र की ये स्‍मृतियां या उनके माता पिता की यादें भी कहीं गायब नहीं हुईं, बल्कि अलग अलग रूपों में उनके गीतों में बयां होती रहीं।

गरीबी, जातिदंश, प्रवासी होने की विसंगति आदि बातों को आप भोजपुरी इलाके से जोड़ कर देखिए। गरीबी और बेकारी इतनी ज्यादा कि बिदेसिया बनना ज्‍यादातर लोगों की नियति बन जाती है। सामंतवादी अवशेष और जातिवादी बोध इतना गहरा कि वह अक्सर पीछा नहीं छोड़ता। परंतु एक सकारात्मक पक्ष भोजपुरी भाषियों का यह होता है कि वे जहां जाते हैं अपने गीत-संगीत को साथ लेकर जाते हैं। अपने कठोर कष्ट और बेशुमार दर्द को सुरों में बांधकर गा कर और नाचकर वे अपना जी हल्‍का कर लेते हैं। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि भोजपुरी इलाके में हर लड़का लड़की गायक गायिका हुआ करती है, जो कि शैलेंद्र के माता-पिता भी थे और यह चीज शैलेन्‍द्र के भी रगों में बसी हुई थी। लय और ताल की उनकी समझ इतनी गहरी थी कि गीत अपने आप पहाड़ी नदी जैसी रवानी पकड़ लेते थे। यह बचपन से मिला संगीत का संस्‍कार था जिसके बल पर शैलेन्‍द्र एक बैठक में शानदार गीत तैयार कर देते थे। जहां एक ओर दूसरे गीतकार पहले गीत फिर संगीत जैसी बातों में उलझे रहते थे वहीं शैलेन्‍द्र के लिए यह कोई मसला ही नहीं था। उन्‍होंने लिखा भी है- ‘‘गीत पहले लिखा जाए और फिर धुन बनाई जाए या धुन पर गीत लिखा जाए, इस सवाल को लेकर काफी कुछ कहा गया है। बहुत से लोगों का मत है कि धुन पर लिखा गीत बढ़िया नहीं हो सकता, मैं ऐसा नहीं मानता। मेरा ख्याल है कि यदि गीतकार को संगीत की थोड़ी बहुत समझ है तो वह धुन पर अच्छा गीत लिखेगा– नए-नए छंद उसे मिलेंगे और दूसरी ओर यदि संगीतकार को काव्य की थोड़ी बहुत समझ है तो वह लिखे हुए गीत पर बढ़िया धुन बनाएगा, शब्दों और भावनाओं को फूल की तरह खिलाता हुआ।’’

शैलेन्‍द्र का बचपन भले ही रावलपिंडी और मथुरा में गुजरा हो लेकिन उनकी मातृभाषा और संस्कारभाषा भोजपुरी थी। यही कारण है कि जब भी मौका मिला उन्‍होंने उन गीतों को आवाज दिया जो गरीब, उपेक्षित और हाशिए के लोगों की ताकत हुआ करती है। चूंकि इस हक के लिए सबसे ज्‍यादा वामपंथी दल खड़े होते हैं इसलिए वे बकायदा मार्क्‍स का नाम लेकर लिखते हैं-

क्रान्ति के लिए जली मशाल

क्रान्ति के लिए उठे क़दम !

भूख के विरुद्ध भात के लिए

रात के विरुद्ध प्रात के लिए

मेहनती ग़रीब जाति के लिए

हम लड़ेंगे, हमने ली कसम !

छिन रही हैं आदमी की रोटियाँ

बिक रही हैं आदमी की बोटियाँ

किन्तु सेठ भर रहे हैं कोठियाँ

लूट का यह राज हो ख़तम !

तय है जय मजूर की, किसान की

देश की, जहान की, अवाम की

ख़ून से रंगे हुए निशान की

लिख गई है मार्क्स की क़लम

यह मातृभाषा की ही ताकत थी कि जब भोजपुरी फिल्में बननी शुरू हुईं तो उसके गीत लिखने के लिए शैलेंद्र को एक बार भी सोचना नहीं पड़ा। अगर वे रावलपिंडी और मथुरा के होते तो उनके भीतर गंगा नहीं रची बसी होती बल्कि रावलपिंडी की ‘सावन’ नदी या मथुरा की ‘यमुना’ होती। अगर उनके भीतर भोजपुरीयत नहीं होती तो भोजपुरी के मुहावरे और भोजपुरी संस्कृति की पहचान कराने वाले ठेठ देशज शब्द इतनी आसानी से और इतनी बड़ी मात्रा में नहीं आते। वे गीत चाहे ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो’, ‘गंगा’, ‘नइहर छूटल जाय’ जैसी ठेठ भोजपुरी फिल्‍मों के हों या फिर हिंदी फिल्मों की, अपनी मिट्टी में रची-बसी-धंसी शैलेन्‍द्र की भोजपुरी उसमें से झांकती नजर आ जाती है। हिन्‍दी फिल्‍मों के गीतों में भी वे बार-बार भोजपुरी की छौंक लगाते थे। उदाहरण के लिए तीसरी कसम से पहले के भी कई गीतों को लिया जा सकता है। ‘भैया मोरे राखी के बंधन को निभाना’, ‘अब के बरस मोरे भैया को भेजो’ जैसे गीतों की बेहतर समझ आपको तब मिलेगी जब भोजपुरी इलाके में रक्षाबंधन त्यौहार की लोकप्रियता और भाई बहन के लगाव को आप करीब से देखेंगे। ‘पान खाये सैंया हमार’, ‘सजनवा बैरी हो गए हमार’, और ‘चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिंजरे वाली मुनिया’ जैसे उनके कई गाने भोजपुरी के प्राण तत्‍व को समेटे हुए हैं।

शैलेंद्र का बिहार या भोजपुरी से कोई सीधा जुड़ाव नहीं था, उनके पूर्वज करीब सौ साल पहले गांव छोड़ गए थे और तब से कोई भौतिक संपर्क नहीं रहा था, बावजूद इसके कुछ ऐसा था कि जब पहली फिल्म बनाने की बारी आई और बहुत दिनों से संजोया हुआ एक सपना साकार करने का मौका मिला तो उन्‍होंने कहानी और परिवेश बिहार का चुना। हजारों कहानियों में से रेणु की कहानी उन्‍हें पसंद आई। लोक में रची बसी सारंगा की कहानी और हीराबाई में उन्‍हें अपनापन मिला।

इंसानों को तरह तरह के नाच नचानेवाले बिधना (बिधाता) ने शैलेन्‍द्रजी को सिर्फ 6 भोजपुरी फिल्‍मों के गीत लिखने का अवसर दिया। ये फिल्में हैं- गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो, गंगा, नइहर छूटल जाय, संइया से नेह लगइबे, मितवा, विधना नाच नचाए। इन 6 फिल्‍मों में शैलेन्‍द्र ने कुल 35 गीत लिखे होंगे परंतु संख्‍या नहीं गुणवत्‍ता की दृष्टि से ये गीत उस ऊंचाई पर स्थित हैं जिसे ठेठ भोजपुरी इलाके में रहनेवाला प्रत्‍येक व्‍यक्ति समझता है। उदाहरण के लिए हे गंगा मइया तोहे पीयरी चढ़इबे’ का शीर्षक गीत सुनें जिसमें निर्गुण की साफ अनुगूंज सुनायी देगी। एक गायन शैली के रूप में निर्गुन भोजपुरी इलाके की विशेषता है जहां दुल्‍हन, पिया, नइहर, ससुराल का प्रतीकात्‍मक उपयोग होता है और दुल्‍हन और पिया के माध्‍यम से जीवात्‍मा-परमात्‍मा के रिश्‍ते की ओर संकेत किया जाता है-

ना मोरे गुन ढंग ना मोरे करनी

ना मोरे एको गहनवा हो राम

खोली घूंघट जब पिया मोको देखिहें

करबै न कवनो बहनवा हो राम…

हे गंगा मइया तोहे

एके कोठरिया में आना रे जाना

एके कोठरिया में रहना हो राम

गुन अवगुन मोरा सब जग जाने

पीहर से लेके अंगनवा हाय राम … हे गंगा

इसी प्रकार ‘नइहर छूटो जाय’ फिल्‍म की ठेठ भोजपुरिया कजरी का उदाहरण लिया जा सकता है जिसे मन्‍ना डे साहब ने गजब के जोश के साथ गाया था-

अरे रामा रीमझीम बरसे ला पनिया

चली तू आव जनिया रे हरि

या फिर इसी फिल्‍म का मो. रफी का अलग ही अंदाज में गाया हुआ वह गीत

जियरा कसक मसक मोर रहे लागल

मन में आ के केहू चोर रहे लागल

फागुन के आइ गइले रुत अलबेलिया

हिरनी के सोना मन करे अठखेलिया

बगीयन कोयल के सोर रहे लागल

भोजपुरी में लिखे शैलेन्‍द्र के गीतों की अगर विस्‍तार से चर्चा की जाए तो पता चलेगा कि उन्‍होंने लोक के मुहावरे को, भोजपुरी संस्‍कृति की विशेषताओं को और इस भाषा के नाद सौंदर्य को कितनी बारीकी से पकड़ा था। यह दुखद है कि उनके गीतों को मोहम्‍मद रफी, मन्‍ना डे और लता मंगेशकर जैसे बड़े गायकों ने गाया था इसके बावजूद आज वे भोजपुरी गीत आसानी से उपलब्‍ध नहीं हैं जबकि उनके हिन्‍दी गीत आसानी से मिल जाते हैं। इसे भोजपुरी भाषा प्रेमियों की उदासीनता के रूप में भी देखा जा सकता है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि शैलेंद्र के गीत भोजपुरियत के प्रतिनिधि हैं और यह बात इतने रूपों में सामने आती है कि मुझे आश्चर्य भी होता है कि शैलेन्‍द्र के मर्मज्ञों ने इस पक्ष को लेकर चर्चा क्यों नहीं की। खुद इंद्रजीत सिंह जी की महत्वपूर्ण किताब ‘धरती कहे पुकार के…’ में एक भी लेख ऐसा नहीं मिला जिसमें इस पक्ष की चर्चा हुई हो।

इस बात में दो राय नहीं कि व्‍यक्ति के संस्‍कार आसानी से नहीं छुटते, उसके भीतर बैठा ‘मैं’ लगातार उसका पीछा करता रहता है। आजकल के रंग बदलने में माहिर लोग भले इससे बच जाते हों पर पुराने समय में यह मुश्किल था और फिर अगर वह शैलेन्‍द्र जैसा ईमानदार कलाकार हो तब तो और भी मुश्किल। अगर आपको यकीन न हो तो खुद कवि की आवाज में सुन लीजिए – ‘’मैं, मेरे गीत और मेरा कवि तीनों यदि दौड़ें तो ‘मैं’ ही विजयी होगा, इसलिए नहीं कि अहं बोल रहा है, केवल इसलिए कि यह चोर बदन ‘मैं’ मेरे गीत और मेरे कवि पर बराबर हावी रहा है और अपना प्रभाव डालता रहा है- बुरा और अच्‍छा।‘’ (पृ. 5, धरती कहे पुकार के)

यह शैलेन्‍द्र ही थे जो अपने वजूद को कभी नहीं भूलते थे। उन्‍हें अकूत सफलता मिली, दुर्लभ लोकप्रियता मिली पर वे जमीन से कभी नहीं कटे, आम जन और साधारण इंसान होना क्‍या होता है और उससे जुड़ना क्‍या होता है, इसे वे अच्‍छी तरह जानते थे। उनके गीत आज भी हमारी धड़कनों में इसलिए नहीं बसे हैं कि वे एक बड़े गीतकार थे, बल्कि वे गीत इसलिए महत्‍वपूर्ण हैं कि शैलेन्‍द्र ने करोड़ों साधारण इंसानों के दर्द को अपनी आत्‍मा में बसाया था और उस अबोलेपन को मजबूत आवाज दी थी।

शोहरत और आराम किसे अच्‍छा नहीं लगता पर शैलेन्‍द्र इसलिए विशेष हैं कि अंत अंत तक उन्‍होंने अपनी शोहरत को खुद पर हावी नहीं होने दिया। महीन धोती और रेशमी कुर्ता सहेज कर रखा रह गया और कवि मोटे टाट पर सोने वाले साधारण इंसानों के गीत गाता रहा- “इस ‘मैं’ का कहना है कि कलाकार कोई आसमान से टपका हुआ जीव नहीं है, बल्कि साधारण इंसान है, यदि वह साधारण इंसान नहीं, तो जनसाधारण के मनमानस के दुख-सुख को कैसे समझेगा और उसकी अभिव्यक्ति कैसे करेगा? इस ‘मैं’ ने मेरे कवि के वैभव को बहुत बार नोचा खसोटा है और मेरे ‘गीतकार’ को समय-असमय नींद से झकझोरा है। मेरे कवि के चेहरे पर इसके नाखून के दाग हमेशा के लिए रह गए हैं। मेरा कवि महीन धोती और रेशमी कुर्ता कब से सहेज कर रखे है मगर पहनने का अवसर ही नहीं मिलता। बिना कमानी का चश्मा भी बेकार पड़ा है, क्योंकि ‘मैं’ का कहना है आंखें अभी तेज हैं।”

लेखक- डॉ प्रमोद कुमार तिवारी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी की है। आप गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर में असिस्टेन्ट प्रोफेसर हैं।

संदर्भ:
शैलेंद्र जी के पुत्र श्री दिनेश शैलेन्‍द्र जी से व्‍यक्तिगत बातचीत।
धरती कहे पुकार के… सं. इन्‍द्रजीत सिंह, ग्‍लोबल पब्लिकेशन प्रा.लि., फरीदाबाद, हरियाणा
https://songsofshailendra.com/2013/08/27/shailendra-all-songs-listing/

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