लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
मंजू सरगम की ‘दलित स्त्री’ व अन्य कविताएँ

(1) सफर-ए-जिंदगी   

जिंदगी के सफ़र में

बहुत साथी मिले

बहुत चाहने वाले मिले

बहुत याद हैं

बहुतों ने भूला दिया  

बहुतों को भूल गए

वो खुशियाँ, वो प्यार

अपनेपन का वो एहसास

जिंदगी जिनकी, उनके बच्चे हैं

हर ख़ुशी जिनके बच्चे हैं  

बच्चों की जरूरतों को पूराकर

खुद की जरुरत को पूरा समझ

दिल में ख़ुशी की उमंग लिए,

अपनी जिंदगी को मशीन बना

जिंदगी के हर दुःख दर्द सहे  

केवल उनकी ख़ुशी के लिए

जिंदगी के हर कदम पर

हर तरह के उतार-चढाव में  

सच में –

अगर कोई निस्वार्थ भाव से

सच्चा प्यार, सहारा

अपनेपन का एहसास

आत्मविश्वास, हौसलों में जान भर सकता है

हमारे मन को, हमारे दर्द को

हमारी बेचैनी, घबड़ाहट को

जिंदगी में मिली, हमारी हर ख़ुशी को

हमारे हर-एक एहसास को

बिना कहे-

कोई समझ सकता है

बिना किसी ग्लानि के,

वो हमारे अपने ही हैं

जिन्होनें हमें अपनी जिंदगी से जिंदगी दी ||

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(2) किरण: जिंदगी के लिए

कभी रखा गया नहीं बंदिशों में मुझे

भाई-बहनों में प्यार एक जैसा मिला

हर तरह की आजादी दी गई मुझे

बचपन से रही मैं चंचला

यह एहसास कभी हुआ ही नहीं

लड़की हूँ मैं,

रहूँ मैं लड़कियों की तरह।

अपने ही समाज में भेद-भाव को देखा है मैंने

लडकियां पाप की निशानी हैं

और लड़के वरदान हैं पूर्वजन्म के

इसी अंधविश्वास ने बनाया

अपाहिज पूरे समाज को।

लडकियां पढ़ाई जाती हैं सिर्फ शादी के लिए

हमेशा परम्परा और संस्कार का

पाठ पठाया जाता है इन्हें

बड़े होने के साथ-साथ

बंदिशों में जकड़ा जाता है इन्हें

जिंदगी के सफ़र में पर काट दिए जाते हैं इनके

चाहकर भी उड़ पाती नहीं,

आसमान में खुले |

इक छोटी सी गलती पर भी,

कुचला जाता है इन्हें

हर बार एक ही फार्मूला रटाया जाता है-

लड़की हो,

रहो तुम लड़कियों की तरह |

अपने समाज से ऐसी सोच को

बदल देना चाहती हूँ मैं

हमेशा कुछ करने के लिए

उनकी स्वछन्दता नहीं,

स्वतंत्रता के लिए तड़पती हूँ मैं

पर कुछ कर पाती नहीं |

इतना तो पता है मुझे कि-

हाथ–पाँव चला सकती नहीं

पर बनाऊंगी शिक्षा को तलवार

बनूँगी मिशाल उन परिंदों के लिए

 किरण बन के चमकूंगी

उनकी जिंदगी के लिए

मिटाउंगी अन्धेरा,

उनकी रोशनी के लिए |

निर्मला सिंह की पेंटिंग, लोकमंच पत्रिका
प्रसिद्ध चित्रकार निर्मला सिंह की पेंटिंग, लोकमंच पत्रिका

(3) दलित स्त्री

जिंदगी वास्तव में-

दोहरा अभिशाप है दलित स्त्री की

समाज से ही नहीं अपनों से भी छली जाती हैं ये

समाज में स्त्री होने की ही नहीं

अछूत होने की भी

विदारक पीड़ा को सहती हैं ये

आक्रोश संघर्ष के साथ

जिंदगी में बस इक उम्मीद के सहारे

होगा नया सबेरा हमारे भी जीवन में।

थोड़ा सा विचलित हो जाती हैं

जब अपनों से ही ठगी जाती हैं ये

फिर भी ये डरती नहीं

आत्महत्या करती नहीं

देती हैं चेतावनी

उस पितृसत्तामक व्यवस्था को

जिसकी वजह से रही

ये अपाहिज सदा के लिए ||

(4) बेदर्द जिन्दगी 

आखिर क्या चाहती हो तुम जिंदगी?

मैं तुमसे सवाल करती हूँ.

एक पल ख़ुशी,

एक पल गम,

कुछ चाहत और कुछ ख़्वाबों के बीच,

क्यों फँसाती–रिझाती हो तुम।

ऐसी मीठी तडप,

और तीखे एहसासों की कैदखाने से,

निकलना चाहती हूँ मैं,

सब कुछ भूला,

सब कुछ मिटा,

जिंदगी अपनी तरह से जीना चाहती हूँ मैं,

पर ऐ जिंदगी-

तुझ पर कोई कंट्रोल नहीं है मेरा।

सच में-

मैं तुम पर कोई कंट्रोल चाहती भी नहीं,

बस,

एक एहसान कर

मुझ पर,

तू ऐ जिंदगी-

मेरी साँसों, मेरे एहसासों

और मेरे ख़्वाबों को,

अपनी कैद से मुक्ति दे तू,

जिससे,

जी सकूं मैं भी

बदलते समय के साथ

अपनी शर्तों पर…।

आखिर क्या चाहती हो तुम जिंदगी?

मैं तुमसे सवाल करती हूँ…. ।

(5) बेजुबान गमलों की दास्तान

सुनो!

कहानी आज मेरी भी तुम सभी

बेजुबान गमलों की दास्तान!

!! जो कहूँगा सच कहूँगा !!

हम कभी नहीं चाहते थे,

वह आजाद सिंहासन।

जहाँ हमें बैठाया गया था बहुत शान से।

हमें नहीं पसन्द था,

उस आजाद मंच की आवाज को धूमिल करना,

हम नहीं चाहते थे आजाद की आजादी को

कैद करना।

हम नहीं चाहते थे उस आजाद मंच पर

अपना साम्राज्य फैलाना।

जहाँ से नव कोपलें अपनी आवाज बुलंद कर,

अपने अस्तित्व की पहचान के लिए,

सचेत हो,

जगे रहने का आगाज करती रहीं हमेशा।

कुछ वर्षों से ही,

उन्हें अपने ही घर में,

कैद करने के लिए

फरमान जारी होते रहें हैं लगातार।

बोल की लब आजाद हैं तेरे

हो रहा नये भविष्य का निर्माण।

उस आजाद मंच से यह सुन,

हम जैसे सारे छोटे पौधे पुलकित हो

बढ़ाते रहे हैं अपनी जिजीविषा

इस घनघोर अंधकारपूर्ण समय में भी।

जहाँ हमारे भी अस्तित्व पर

तलवार खड़ी थी,

अपना निशाना साध।

संकट के इस दुर्दिन समय में,

जब कुछ हथियार न मिल सका,

इन्हें कुचलने को,

सारे हथकंडे अपनाने के बाद भी

जब सफल न हो सकी इनकी तानाशाही।

फिर प्रतिद्वंदी हमें बना

खड़ा किया,

उस आजाद सिंहासन पर

जहाँ से आगाज होता रहा सदैव

इक नई सोच, एक नये भविष्य का।

शायद हो!

इस बात से अन्जान

नव भविष्य की, नई कोपलें बलून की भांति

बहुत सुलझी और मुलायम जरुर होती हैं,

लेकिन एक सहनशीलता की हद तक।

अपने अधिकारों के हनन,

पाबंदियों और कदम-कदम की तानाशाही से हो

परेशान।

जैसे बलून में ज्यादा हवा भर देने से फूट जाता है,

ठीक उसी भांति…!

वो टूट पड़े हम पर।

क्योंकि-

अब तक थक चुकी थी नई कोपलें भी,

जारी हो रहें,

एक से बढ़ के एक फरमानों से।

फिर क्या हुआ???

एक दिन, क्रोध में तो नहीं कहूँगा,

पर उस झनझनाहट में झटका तो बहुत तेज था।

वो नहीं चाहते थे हमें तोड़ना

पर हम चाह कर भी स्वयं से

नियम तोड़ हट नहीं सकते थे,

उस आजाद मंच से

जहाँ हम अपनी इच्छा के विरुद्ध विराजमान थे।

क्योंकि! हमें सदियों पहले बना दिया गया था

अचल और मूक,

पर काट दिए गए थे हम सभी के।

आखिर कसूर क्या था हमारा???

हमें तो बस इस्तेमाल किया गया

अपनों के ही खिलाफ

हम तो मात्र कठपुतली बने हुए थे

किसी और के हाथ की।

एडमिन पर विराजमान सारे गमले बेचारे…!

आज चोट खा, वो भी सचेत हो,

पूछने लगे थे…’प्रश्न’ ।।  

कोरोना पर पेंटिंग, लोकमंच पत्रिका

(6) कोविड -19

अभिमान था उन्हें बहुत

अपने होने का,

पल भर में कमर टूट गई उनके घमण्ड की।

दुःख बस इतना है

बेबस और लाचार वो भी हो गए

जिनका कसूर था न कोई…।

चूर हो अपने घमण्ड में,

भू,आकाश, पाताल

फ़तह कर लेना,

विजय नहीं, अन्त नहीं,

प्रकृति सत्ता के विस्तार का…।

इंसानी फ़ितरत ने

अपनी ही कूटनीति से,

स्वयं राक्षस रूपी वायरस को गढ़ा।

शायद था नहीं उसे भी भान इसका।

अपनी तीखी कूटनीति की धार से

अपना भी कुनबा हो जाएगा तबाह।

अभी भी अक्ल नहीं आयी है उसे

अपने ही मद में,

हो सराबोर,

मदमस्त हो।

करता जा रहा है विश्व पटल पर आज भी,

मानवीय संवेदनाओं की अवहेलना।।

अब..!

जिसका मतलब है-तबाही,

केवल तबाही!

और कुछ भी नहीं!!

दुःख बस इतना है-

बेबस और लाचार वो भी हो गए

जिनका कसूर था न कोई…।। – मंजू सरगम

डॉ. मंजू कुमारी (सरगम), (पीएच.डी. – जेएनयू, नई दिल्ली), सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय ढलियारा, काँगड़ा, हिमाचल प्रदेश, ईमेल- MANJOO89JNU@GMAIL.COM

                                                                                   

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