लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
के एम रेनू की कविता: “चिट्ठी आयी थी”

एक दिन चाँदनी रात की

श्वेत चमक निहार रही थी

और बैठी बैठी सोच रही थी

कोई पेंसिल से पन्ने पर

खींच देता एक लकीर

और पास आकर कहता

देखो ये है तुम्हारी तस्वीर

वह हकीकत किसी

जन्नत से कम नहीं होती

मेरी निगाहों में प्रेम की

बरसात होती और

उसकी हर बूँद

वो गिन लेते

भर लेते किसी घड़े में

और

मेरी हर भंगिमाओं को

काश उस लकीर में कैद करते

और कहते सुनों

मेरी खींची एक लकीर

तुम्हारी तस्वीर के साथ ही

एक राग है

जिसे मैं संगीत की तरह

गुनगुनाता हूँ

महसूस करता हूँ

लकीर के रूप में

तुम्हारी हर आकृति

अपने भीतर समेटता हूँ

समा जाता हूँ

और चाँदनी जब डूब जाती है

मेरी आँखे उससे दूर जाती है

तब पता चलता है

जो अब तक हकीकत

की दुनियाँ में तैर रही थी

वह एक चिट्ठी भर थी

और शब्दों में बँधकर

रह गयी थी

मेरी हकीकत

पन्ने और स्याही के बीच

सिमटकर रह गयी थी।

के.एम.रेनू, शोधार्थी, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

लोकमंच पत्रिका, संपादक, डॉ अरुण कुमार
लोकमंच पत्रिका
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14 thoughts on “के एम रेनू की कविता: “चिट्ठी आयी थी”

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