लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
केदारनाथ सिंह: उदात्त प्रेम के कवि- पल्लवी प्रकाश

डॉ पल्लवी प्रकाश का यह लेख ‘आजकल’ पत्रिका में छपा था। पल्लवी युवा कवयित्री हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी की है। वर्तमान में आप एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय, मुंबई में हिंदी की अध्यापिका हैं। हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण विषयों पर आपके लेख प्रकाशित होते हैं। ‘आजकल ‘ और स्त्री दर्पण का आभार व्यक्त करते हुए यह लेख एकबार फिर से प्रस्तुत है । पढ़ें , डॉ पल्लवी प्रकाश का यह आलेख-

इक लफ्ज़-ए-मुहब्बत का अदना यह फ़साना है

सिमटे तो दिले आशिक फैले तो जमाना है। – जिगर मुरादाबादी

त्रिलोचन ने भी कहा है – ‘मुझे जगत जीवन का प्रेमी बना रहा है प्यार तुम्हारा’ अर्थात अगर प्रेम को सीमित अर्थ में लिया जाए तो वह प्रेमी और प्रेमिका के दिलों तक ही सीमित रहता है, लेकिन व्यापक अर्थ में उसका विस्तार इस पूरे संसार तक है. प्रेम इस संसार का मूल तत्व है, सृष्टि का आरम्भ ही प्रेम से हुआ है. प्रेम जहाँ एक तरफ रुढियों को तोड़ने का काम करता है वहीँ दूसरी ओर मनुष्य की समानता के सिद्धांत को भी प्रतिपादित करता है. मनुष्य की जैविकीय आवश्यकताओं से लेकर सांस्कृतिक आवश्यकताओं तक, प्रेम सभी की पूर्ति का मूलाधार रहा है. वर्ड्सवर्थ के अनुसार सुन्दरतम को और भी अधिक सुन्दर बनाना ही प्रेम है, “love betters what is best”. भवभूति के अनुसार कोई अज्ञात कारण ही है जो दो हृदयों को मिला देता है, किसी बाहय कारण, सौन्दर्यादि पर प्रेम निर्भर नहीं है- ‘व्यतिषजति पदार्थानान्तरः कोsपि हेतु न खलु बहिरुपाधीन प्रीतयः संश्रयन्ते’ प्रिय की उपस्थिति और अनुपस्थिति, दोनों ही सूरतों में दुनिया का ठिकाना नहीं होता, क्योंकि प्रेम से बड़ा ना कोई अर्थ होता है जीवन के लिए, ना ही कोई मूल्य. प्रसिद्ध निकोरगुआई कवि अर्नेस्टो कार्डेनल की कविता न्यूयॉर्क‘ कुछ ऐसे ही मनोभावों को दर्शाती है-

If you are in New York

In New York there is no body else

And if you are not in New York

In New York there is no body – Ernesto Cardenal

 केदारनाथ सिंह, लोकमंच पत्रिका
केदारनाथ सिंह, लोकमंच पत्रिका

कुछ ऐसा ही भाव है मोमिन के शेर का भी, जब वे कहते हैं- तुम मेरे पास होते हो गोया जब कोई दूसरा नहीं होता कुछ और इसी तरह का सन्देश देता है है गीत, “पिया नहीं, जब गाँव में आग लगे, सब गाँव में’. एरिक फ्रॉम के अनुसार, “प्रेम व्यक्ति के भीतर एक सक्रिय शक्ति का नाम है. यह वह शक्ति है, जो व्यक्ति और दुनिया के बीच की दीवारों को तोड़ डालती है, उसे दूसरों से जोड़ देती है. प्रेम उसके अकेलेपन और विलगाव की भावना को दूर कर देता है, पर इसके बावजूद उसकी वैयक्तिकता बची रहती है. प्रेम एक ऐसी क्रिया है जिसमें दो व्यक्ति एक होकर भी दो बने रहते हैं.”

इन पंक्तियों से यह पता चलता है जहाँ प्रेम एक तरफ व्यक्ति को विश्व से जोड़ता है, वहीँ दूसरी तरफ उसकी वैयक्तिकता को भी सुरक्षित रखता है. आदिकाल से कवियों ने प्रेम पर लिखा है लेकिन यह एक ऐसा विषय है जिसकी बार-बार पुनरावृत्ति होने पर भी वह आज तक कविता का वर्ण्य-विषय बना रहा है. प्रेम मनुष्य की वह आदिम भावना है जो उसे मानवीय गुणों से परिपूर्ण करती है. इस ढाई अक्षर के शब्द को परिभाषित करने के प्रयास आज तक हो रहे हैं, लेकिन कोई भी परिभाषा अंतिम और परिपूर्ण नहीं है. सच्चे प्रेम में शरीर का आकर्षण गौण हो जाता है, प्रिय और प्रेमी का भेद मिट जाता है और तन तथा मन में पूर्ण एकात्मकता स्थापित हो जाती है. सुख और दुःख, दोनों ही स्थितियों में सच्चा प्रेम तटस्थ होता है.

केदारनाथ सिंह, लोकमंच पत्रिका

हिंदी साहित्य में भी प्रेम की मौजूदगी आदिकाल से ही देखने को मिलती है, भक्ति, रीति तथा आधुनिककाल तक, साहित्य के सभी काल-खंडों में प्रेम कवियों का प्रिय वर्ण्य विषय रहा है. प्रेम वस्तुत: सौन्दर्य के प्रति आकर्षण और समर्पण को ही प्रतिबिम्बित करता है. इस सृष्टि में सौन्दर्य की सत्ता भी बड़ी व्यापक है, जिसका फैलाव केवल मानवीय सौन्दर्य तक ही नहीं बल्कि इसके अंतर्गत मानवेतर सौन्दर्य भी समाहित है. महाकवि कालिदास ने सौन्दर्य को सात्विक एवं शुद्ध माना है जो किसी भी प्रकार के विकार को उत्पन्न नहीं करता. अत: लौकिक सौन्दर्य भी अलौकिक सौन्दर्य के समान सत्य होकर शिव या सौभाग्य का कारण बनता है- “प्रियेषु सौभाग्य फला हि चारुता “. प्रेम और सौन्दर्य का घनिष्ठ सम्बन्ध है, प्रेम के बिना सौन्दर्य की परिणति संभव नहीं. सदियों से कविता के प्रेरणा स्रोत के रूप में सौन्दर्य और प्रेम विद्यमान रहे हैं.

केदारनाथ सिंह उस तरह से प्रेम कविताओं के लिए नहीं जाने जाते जिस तरह से केदारनाथ अग्रवाल या धर्मवीर भारती और शमशेर आदि. विशुद्ध प्रेम कवितायें उन्होंने लिखी भी बहुत कम हैं, लेकिन जो लिखी हैं, वे मार्के की हैं. केदारनाथ सिंह के यहाँ प्रेम उस तरह से उपस्थित नहीं है जिस तरह से धर्मवीर भारती या शमशेर के यहाँ है. शमशेर के यहाँ जैसी क्यारी भरी गेंदा की है, एक ठोस बदन अष्टधातु का सा है, देह का पावन महोत्सव है, वैसा केदारनाथ सिंह के यहाँ नहीं, धर्मवीर भारती के यहाँ जैसे फ़िरोज़ी होंठ या शरद के चाँद से उजले धुले से पाँव भी केदार जी के यहाँ नहीं, फिर ऐसा क्या है जो उनके यहाँ प्रेम को विशिष्ट बनाता है?

केदारनाथ सिंह के यहाँ प्रेम उद्दाम नहीं, बल्कि उदात्त है. यह प्रेम भोग-लिप्सा से प्रेरित नहीं दिख पड़ता और शायद यही वजह है कि ढूँढने से भी उनकी किसी भी कविता में प्रिया के रूप-सौन्दर्य के वर्णन का सीधा-सीधा कोई उदाहरण नहीं मिलता, सिर्फ़ “हाथ” कविता में हल्का सा वर्णन आया है, लेकिन फ़िर वहां भी उसका फैलाव सम्पूर्ण विश्व तक है. शमशेर या भारती जी या अधिकतर कवियों के यहाँ प्रेम में शरीर का स्वीकार्य है, इसीलिए प्रिया के रूप-सौन्दर्य को व्याख्यायित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा जाता, लेकिन केदारनाथ सिंह के यहाँ प्रेम अपने विशुद्ध रूप में उपस्थित है, बिना किसी आशा-आकांक्षा के, सिर्फ प्रेम के लिए प्रेम. प्रेम बिना किसी पूर्वभूमिका के, अपने होने की उद्घोषणा करते हुए मौजूद है यहाँ पर. ठोस जीवन के बीचों-बीच होकर बहने वाला प्रेम, बिना किसी गलदश्रु भावुकता के मौजूद है यहाँ. प्रेम में एक प्रकार का गाम्भीर्य है, एक तरह की तटस्थता सी दिखती है, कोई अभिमान नहीं, कोई अस्वीकृति नहीं. प्रेम, सिर्फ़ प्रेम के लिए उपस्थित है.

प्रेम में स्व तिरोहित हो जाता है, और इसी एकात्मकता की दरकार है कवि को, जिसमें मैं और तुम का पता नहीं चले, और अगर प्रेम में ऐसी एकात्मकता नहीं तो फिर ऐसे छद्म बंधन का फिर अस्वीकार ही अपेक्षित है-

अगर नहीं हैं मेरे स्वरों में तुम्हारे स्वर,

अगर नहीं हैं मेरे हाथों में तुम्हारे हाथ,

………………..

मुझे पछाड़ खाए बादल की तरह

टूटने दो, टूटने दो, टूटने दो ! (टूटने दो)

प्रेम में मिलन तो अनेक कवियों ने वर्णित किया है, लेकिन विरह को भी सेलिब्रेट करने वाले केदारनाथ सिंह अपने ढंग के अनूठे कवि हैं. इससे पूर्व अगर कवियों ने विरह की मन:स्थिति को दर्शाया है तो प्रेमी या प्रेमिका को तड़पते हुए दिखाया है, बिहारी की नायिका विरह में सूख कर काँटा बन जाती है, गुलाबजल की शीशी उस पर डाली जाती है तो वह विरह के ताप से सूख कर उड़ जाता है, जायसी की नागमती विरह में बारहमासा गाती है तो घनानन्द के यहाँ प्रेमी अपनी विरह वेदना को मेघ के माध्यम से प्रेयसी तक पहुंचाना चाहता है –

घनआनन्द जीवनदायक हो, कछु मेरी भी सुध हियो परसो

कबहूँ वा विसासी सुजान के आंगन मो अंसुअन को ले बरसो

केदारनाथ सिंह के यहाँ प्रेमी या प्रेमिका अपने होश-हवास खो कर दिन-दुनिया से दूर किसी कोने में कहीं पड़े नहीं होते. न तो कोई कबूतर, ना ही कोई मेघदूत बन कर आता है, एक दूसरे तक सन्देश पहुंचाने के लिए. प्रेम अपनी जगह है, दुनिया अपनी जगह है, फैज़ के शब्दों में कहें तो, “तुझसे भी दिल फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के”. कभी भी बिछोह के क्षणों में भी प्रेमी अपने को कहीं से भी कमजोर नहीं पड़ने देता. एक ज़ालिम सी गंभीरता दिखती है सभी प्रेम कविताओं में. विरह के क्षण, मार्मिक गीतों के स्रष्टा बन कर आते हैं. विदा से पूर्व की तैयारी की जाती है, ठीक वैसे ही जैसे घर से यात्रा पर निकलने से पहले तैयारी की जाती है. इस प्रकार का संयम अन्य कहीं दुर्लभ है, जब अपने प्रिय को इस तरह से विदा दी जा रही हो-

रुको आंचल में तुम्हारे

यह समीरन बाँध दूँ, यह टूटता प्रन बाँध दूँ

एक जो इन अँगुलियों में

कहीं उलझा रह गया है

फ़ूल-सा वह काँपता क्षण बाँध दूँ – विदा-गीत

प्रेम सहने की अपार शक्ति देता है और सच्चे प्रेम में कोई आधिपत्य भावना नहीं होती, कोई अधिकारबोध नहीं होता. किसी प्रेमी के लिए इससे ज्यादा तकलीफ़देह क्या हो सकता है कि उसे प्रेमिका को अलग होने की अनुमति देनी पड़े. लेकिन फिर जैसा कि पहले भीं कहा जा चुका है, एक तरह का प्रैक्टिकल एप्रोच मिलता है प्रेम को लेकर, जीवन अपनी जगह है, प्रेम अपनी जगह और दोनों ही कहीं भी एक दूसरे के विरोध में खड़े नहीं होते-

मैं जा रही हूँ- उसने कहा

जाओ मैंने कहा

यह जानते हुए कि जाना हिंदी की

सबसे खौफनाक क्रिया है – जाना

यह कविता वस्तुत: प्रेम में स्वीकृति की कविता है, ‘जाना’ भी एक ऐसा सच है जिससे ज्यादा देर तक नहीं बचा जा सकता. इस कविता में एक बार भी प्रिय को रोकने की कोशिश नहीं होती. प्रेम अपनी जगह है और दुनिया के गोरखधंधे अपनी जगह. पता नहीं केदारनाथ सिंह को पढ़ते हुए बार-बार फैज़ क्यों याद आ जाते हैं, यहाँ जिस तरह से “जाना” को हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया मानते हुए भी उससे बचने का कोई प्रयास नहीं होता, वह अपनी संवेदना में फैज़ के बहुत करीब है, जब वे कहते हैं-

“उठ कर तो आ गए हैं तेरी बज़्म से मगर,

कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आये हैं”.

प्रेम में विदा के क्षण जब आते हैं, तब भी एक सधा हुआ संयम दिख पड़ता है, बावजूद इसके कि विरह के बाद ‘कमरे के दानव” को खुद ही झेलना होगा. विदा गीत कविता अपनी मार्मिकता में अनूठी बन पड़ी है-

प्यार- यह आवाज

पेड़ों-घाटियों में खो गयी है !

………………..

पर रुको तो,

रुंधे गीतों में तुम्हारे

लपट हिलती बाँध दूँ !

यह डूबता दिन बाँध दूँ ! – विदागीत

प्रेम बांधता है, पर यह बंधन सुखद होता है जिसमें बंधने के लिए प्रत्येक प्रेमी हृदय प्राय: व्याकुल होता है. केदारनाथ सिंह के यहाँ प्रेम न सिर्फ़ घर-आंगन के कोने-कोने तक है, बल्कि प्रकृति के कण-कण में भी व्याप्त है. प्रेम, जो रोजमर्रा के छोटे-छोटे कार्य-कलापों में भी अपनी उपस्थिति का भान कराता है-

जाना, फिर जाना,

उस तट पर भी जा कर दिया जला आना

पर पहले अपना यह आंगन कुछ कहता है,

उस उड़ते आंचल से गुड़हल की डाल

बार-बार उलझ जाती है

एक दिया वहां भी जलाना

जाना, फिर जाना – दीप-दान

प्रिय का जाना एक निराश मन:स्थिति नहीं है क्योंकि एक आस की डोर बंधी हुई है आने की उम्मीद के साथ. यह आना कितने समय के बाद होगा, यह अप्रत्याशित है, लेकिन आना तय है, चाहे जब भी हो. यह वस्तुत: जीवन के प्रति उनकी अगाध आस्था को दर्शाता है-

आना

जब समय मिले

जब समय न मिले

तब भी आना

………….

आना जैसे मंगल के बाद

चला आता है बुध

आना – आना

केदारनाथ सिंह ने पत्नी को लम्बी बीमारी के बाद असामयिक मृत्यु में खो दिया था. मृत्यु से पूर्व, जीवन और मरण के मध्य चलने वाले संघर्ष को जितनी तटस्थता से केदारनाथ सिंह ने उकेरा है, वह कहीं और दुर्लभ है. एक निर्वैयक्तिक सी तटस्थता दिख पड़ती है समूचे वर्णन में-

और अब खाली चारपाई पर

सिर्फ़ एक लम्बी और अकेली सांस थी

जो उठ रही थी

गिर रही थी – एक अड़ियल सांस

जब यह अड़ियल सांस भी जीवन की जंग हार जाती है और राख के सुपुर्द कर दी जाती है, तब भी उसकी उपस्थिति महसूस होती है, उसके न होने की गंध को लेकर-

जीवितों की लंबी उदास बिरादरी में

कुछ नहीं था

सिर्फ कच्ची दीवारों

और भीगी खपरैलों से

किसी एक के न होने की

गंध आ रही थी – न होने की गंध

केदारनाथ सिंह के यहाँ रोमानियत तो है लेकिन वे ठोस ऐन्द्रियता के कवि नहीं हैं. सच्चे अर्थों में तो केदारनाथ सिंह के यहाँ प्रेम, विरह की वेदना का ही दूसरा नाम है. प्रेमानुभूति की तीव्रता को दर्शाने के लिए जीवनानुभवों से बिम्ब लिए गया हैं. लोकरंग में रंगे हुए ये बिम्ब अनायास ही चले आते हैं सभी प्रेम कविताओं में, फिर चाहे वह “रात पिया, पिछवारे पहरू ठनका किया”, हो या फिर फागुन या वसंत का गीत. प्रेम में प्रकृति की भी अनिवार्य उपस्थिति है, वह कहीं से भी थोपी हुई उपस्थिति नहीं लगती-

जाना, फिर जाना,

एक दिया वहां जहाँ नई-नई दूबों ने कल्ले फोड़े हैं,

एक दिया वहां जहाँ उस नन्हें गेंदे ने

अभी-अभी पहली ही पंखुड़ी बस खोली है,

एक दिया उस लौकी के नीचे

जिस की हर लतर तुम्हें छूने को आकुल है – दीप-दान

लोकधर्मिता केदारनाथ सिंह की कविताओं की एक प्रमुख विशेषता है और इसीलिए प्रेम कविताओं में जो बिम्ब लिए गए हैं वे भी दिन-प्रति-दिन से उठाये गए हैं. प्रिया, जो अब स्मृति मात्र रह गयी है, बार-बार कविताओं में चली आती है, एक सजीव उपस्थिति के साथ-

चुचुहिया की आवाज़ से भी पहले

उठ जाती थी वह

पहले बिस्तर ठीक करती थी

फिर अपने बाल कि तकिये पर दिख जाता था

अपना पड़ा हुआ चेहरा – एक अधूरी कविता

लोकमंच-पत्रिका-पोस्टर
लोकमंच पत्रिका

नयी कविता ने पाश्चात्य काव्य-चिंतन से प्रभावित होकर बिम्बों और प्रतीकों की महत्ता स्वीकार की, केदारनाथ सिंह ने भी बिम्ब के अनेक पक्षों पर विचार करते हुए उसके महत्व को स्वीकार किया है. इसीलिए वे कहते हैं, “ बिम्ब-विधान का सम्बन्ध जितना काव्य की विषय-वस्तु से होता है, उतना ही उसके रूप से भी. विषय को वह मूर्त और ग्राह्य बनाता है, रूप को संक्षिप्त और दीप्त.” केदारनाथ सिंह अपनी कल्पना शक्ति के सहारे प्रकृति और प्रिय की एकात्मकता का सुंदर संयोजन करने के लिए अत्यंत सुन्दर बिम्बों का समायोजन करते हैं और कई जगहों पर तो यह मानना कठिन हो जाता है कि प्रिय ही प्रकृति है या प्रकृति ही प्रिय का रूप धारण कर आई है. इसीलिए “शरद कभी बालों में गुलाब उलझाता है” तो “फागुन के गीत उन बाहों की तरह प्रतीत होते हैं जो बांधे नहीं बंधते’, प्रेम जीवन में उस प्रकार आता है, जिस प्रकार “छीमियों में धीरे-धीरे आता है रस”. प्रेम की व्याप्ति प्रकृति के कण-कण में है, जिसे परिसीमित नहीं किया जा सकता-

एक रेखा

जोकि बंधती ही नहीं है

कभी तुममें

कभी मुझमें कौंध जाती है

हम उसी को प्यार करते हैं . – प्यार-रेखा

प्रेम एक जीवनदायिनी शक्ति है, जिसका कार्य है मनुष्य-मनुष्य को जोड़ना, परिवार से, समाज से राष्ट्र से, प्रकृति से कुल मिला कर अनंत संभावनाओं के द्वार खोलता है प्रेम और इसीलिए जीवन की संजीवनी है प्रेम. प्रेम का अधिकार सभी के पास होना चाहिए, फिर चाहे वह मनुष्य हो या प्रकृति, ताकि वे अपना विस्तार कर सकें-

फूल को हक दो, वह हवा को प्यार करे,

ओस, धूप, रंगों से जितना भर सके, भरे,

सिहरे, कांपे, उभरे,

और कभी किसी एक अंखुए की आहट पर

पंखुडी-पंखुडी सारी आयु नाप कर दे दे – हक़ दो

प्रेम, केदारनाथ सिंह के यहाँ वह जीवन शक्ति बन कर उभरता है जो तटस्थता और गाम्भीर्य जैसे मूल्यों से परिचालित है, जिसमें भोग-लिप्सा का कोई भाव नहीं दृष्टिगत होता, जहाँ मिलन और बिछोह में फर्क करना मुश्किल हो जाता है. विरह की वेदना भी दार्शनिकता के आवरण में नहीं आती, बल्कि विरह का भी एक्सेप्टेंस (स्वीकृति) मिलता है और प्रेम यहाँ मनुष्य को जीवन से जोड़ता है, तोड़ता नहीं. दूसरे शब्दों में कहें तो उदात्तता ही वह मूल तत्व है, जो केदारनाथ सिंह की कविताओं में व्यक्त प्रेम को अन्य कवियों के यहाँ उपस्थित प्रेम से विशिष्ट बनाता है. केदारजी के शब्दों में ही कहें तो-

“धीरे-धीरे मैं,

धीरे-धीरे तुम,

धीरे-धीरे वे,

धीरे-धीरे हम – धीरे-धीरे हम

डॉ पल्लवी प्रकाश

डॉ पल्लवी प्रकाश, हिन्दी विभाग, एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय, मुम्बई, महाराष्ट्र।

Leave comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *.