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बढ़ती जनसंख्या: बने एक देश, एक कानून- वेद प्रकाश

भारत की जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है। भिन्न-भिन्न रूपों में असंतुलन दिखाई देने लगा है। हम कब जागेंगे? क्या तत्काल एक देश, एक कानून बनाने की आवश्यकता नहीं है? हम दो-हमारे दो- सबके दो-  इस वाक्य को  विकास का मंत्र और देश की आवश्यकता बनाना पडेगा। किसी भी देश के विकास में जनसंख्या जहां एक ओर सहायक है वहीं दूसरी ओर बाधक भी सिद्ध होती है। बढ़ती जनसंख्या आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को सर्वाधिक प्रभावित करती है। रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य आदि किसी भी व्यक्ति अथवा समाज की बुनियादी आवश्यकताएं हैं, क्या निरंतर बढ़ती जनसंख्या के कारण देश का एक बड़ा वर्ग इनसे वंचित नहीं है? लाखों परिवार ऐसे हैं, जिनमें बच्चों की  संख्या 8 से 10 है, क्या इतने बच्चों को जन्म देने वाली माता के स्वास्थ्य पर इसका विपरीत प्रभाव नहीं पड़ रहा है? क्या ऐसे परिवारों में बच्चों की समुचित शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आवास की व्यवस्था संभव है?

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यह भी एक बड़ा सत्य है कि ईमानदार कर दाता के खून पसीने का पैसा विकास की बजाय ऐसे परिवारों के  भरण पोषण में ही खर्च होता है। विकसित देशों की समृद्धि से भारत की तुलना करते समय जनसंख्या को भी देखिए। आज हम वैश्विक स्तर पर लगभग 135 करोड़ की संख्या के साथ चीन के बाद दूसरे स्थान पर है, जिसमें तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। हाल ही में उत्तर प्रदेश और असम राज्यों ने दो बच्चों की नीति पर कानून बनाने की घोषणा की है, क्या आज पूरे देश को ‘हम दो-हमारे दो-सबके दो’ की नीति पर काम नहीं करना चाहिए? आज बेहतर रहन-सहन, खानपान, रोजगार, संसाधनों की उपलब्धता, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा आदि विभिन्न पहलुओं पर भारत बहुत पीछे हैं। वैश्विक संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करते हुए तरक्की करने और इसका लाभ दुनिया के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचाने के उद्देश्य से वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने 17 सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) तय किए। इस दौरान यूएन के सदस्य देशों ने यह भी तय किया था कि इन लक्ष्यों को वर्ष 2030 तक हासिल किया जाएगा। इन लक्ष्यों में मूल रूप से गरीबी खत्म करना, भूखमरी खत्म करना, उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लैंगिक समानता, स्वच्छ जल और स्वच्छता, सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा, उद्योग- नवाचार और बुनियादी ढांचे का विकास, असमानता में कमी, सतत शहरी और सामुदायिक विकास, सतत उपभोग और उत्पादन, जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध कदम उठाना, शांति- न्याय और सशक्त संस्थान, लक्ष्य प्राप्ति में सामूहिक साझेदारी की हिस्सेदारी बढ़ाना आदि सम्मिलित हैं।

हाल ही में नीति आयोग ने सतत विकास लक्ष्य इंडिया इंडेक्स 2020-21 की रिपोर्ट जारी की है, जिसके अनुसार भिन्न-भिन्न मानकों पर किए गए सर्वे के तहत राष्ट्रीय स्तर पर धीरे-धीरे सुधार आ रहे हैं, लेकिन वैश्विक आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। संयुक्त राष्ट्र की तरफ से हाल ही में जारी भारत की पर्यावरण स्थिति रिपोर्ट 2021 के मुताबिक सतत विकास लक्ष्य की दौड़ में भारत विगत वर्ष 115 वें स्थान से खिसक कर 117 वें स्थान पर आ गया है, क्या इसका बड़ा कारण जनसंख्या वृद्धि नहीं है? हाल ही में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा है कि पिछले साल नवंबर तक देश में 6 महीने से 6 साल तक के करीब 9,27,606  गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की पहचान की गई है। कुपोषण के इन आंकड़ों में उत्तर प्रदेश, बिहार,महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ जैसे बड़े प्रदेश सबसे आगे हैं, क्या यह चिंतनीय नहीं है?

विगत वर्ष वैश्विक भूख सूचकांक में 107 देशों की सूची में भारत 94 वें स्थान पर रहा, क्या इसका बड़ा कारण बढती जनसंख्या नहीं है? यह भी एक बड़ा तथ्य है कि जैसे जैसे जन बढ़ेगा, वैसे वैसे वन घटेगा, क्योंकि बढ़ती जनसंख्या को भोजन, आवास एवं संसाधनों की उपलब्धता चाहिए। खेती, आवास, उद्योग, सड़क निर्माण आदि कारणों से वन क्षेत्र घट रहा है, जिसका प्रभाव जलवायु परिवर्तन एवं प्रदूषण जैसी विकराल समस्याओं के रूप में हम सबके सामने है। आज वर्ष 2021 में भी हर घर नल- हर घर जल इस बड़े लक्ष्य के लिए जद्दोजहद जारी है, भारत की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा आज भी शुद्ध पेयजल से वंचित है। आज भी भारत के विभिन्न राज्यों की हजारों ग्रामीण बस्तियों में लोग खराब गुणवत्ता का पानी पीने को मजबूर हैं। वर्ष 1947 से 2021 और 2025 में जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता, चिंतित करने वाली है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी चेतावनी के अनुसार वर्ष 2025 तक भारत में भयंकर जल संकट उपस्थित हो सकता है। आज भी जैसे जैसे गर्मी बढ़ती है, वैसे-वैसे ग्रामीण और शहरी सभी स्थानों पर जल के लिए संघर्ष देखा जा सकता है, क्या इसके लिए जनसंख्या जिम्मेदार नहीं है?

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शिक्षा की दृष्टि से विचार करें तो आज भी विभिन्न राज्यों में सभी को शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध नहीं है, विद्यालयों- महाविद्यालयों की भारी कमी है। वैश्विक रैंकिंग में पहले 100 में एक भी भारतीय विश्वविद्यालय नहीं है। बढ़ती जनसंख्या के लिए सूचना, तकनीक एवं इंटरनेट जैसी सुविधाएं उपलब्ध करवाना चुनौतीपूर्ण कार्य है। बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्यान्न आपूर्ति भी एक बड़ी चिंता का विषय है। यदि एक भी सीजन में किसी मौसमी प्रभाव के कारण कोई फसल नष्ट हो जाती है, तो उसी के लिए हाहाकार मच जाता है। महानगरों, नगरों एवं ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य से संबंधित आवश्यक दवाइयां, डॉक्टर एवं अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाएं भी सभी को उपलब्ध नहीं। स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में लाखों लोग प्रतिवर्ष मौत का शिकार हो रहे हैं। बेरोजगारी के आंकड़े निरंतर बढ़ रहे हैं।

बढती जनसंख्या एवं बेरोजगारी भिन्न भिन्न प्रकार के अपराधों को जन्म दे रही है। कुछ प्रदेशों में बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान किया जा रहा है, किंतु क्या इससे सरोकार सिद्ध होंगे, यह विचारणीय है। वर्तमान की कई समस्याओं के लिए अतीत की भूलें उत्तरदायी कही जाती हैं,  यह समय देशहित में बड़े निर्णय लेने का है, मोदी नेतृत्व में अनेक नए कानूनों द्वारा भारत के सशक्तिकरण का सिलसिला जारी है। आज आवश्यकता है राजनीतिक स्वार्थों एवं लाभ-हानि से ऊपर उठकर एक जिम्मेदार नागरिक, एक जिम्मेदार राजनीतिक दल एवं एक जिम्मेदार सरकार होने के नाते सभी मिलकर जनसंख्या नियंत्रण के लिए एक देश- एक कानून की आवश्यकता को समझें और यथाशीघ्र गंभीरता से काम करें अन्यथा हम बिजली,पानी, भोजन, आवास जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाने में ही उलझे रह जाएंगे और सतत विकास लक्ष्य कहीं पीछे ही छूटे रहेंगे।

लेखक- डॉ वेदप्रकाश, असिस्टेंट प्रोफेसर, हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।

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