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पटकथा लेखन की शैलियां- अरुण कुमार

हिन्दी GE के अंतर्गत ‘पटकथा व संवाद लेखन’ पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए उपयोगी

फ़िल्म की सफलता उसकी पटकथा लेखन की शैली पर बहुत अधिक निर्भर करती है। फिल्में सामान्यतः फैंटेसी, काल्पनिक या यथार्थवादी शैली की होती हैं। यह भी कहा जा सकता है कि सभी फिल्में यथार्थ और कल्पना के योग से बनी होती हैं। जिन फिल्मों में कल्पना के तत्व अधिक होते हैं उन्हें काल्पनिक और जिनमें यथार्थ के तत्व अधिक होते हैं उन्हें यथार्थवादी फिल्मों की श्रेणी में रखा जाता है। फ़िल्म की शैली उसकी पटकथा लेखन की शैली पर निर्भर करती है। इस आधार पर पटकथा लेखन की दो शैलियां प्रचलित हैं –

कल्पनावादी शैली और यथार्थवादी शैली

कल्पनावादी शैली-

सिनेमा उद्योग की अधिकांश फिल्में कल्पनावादी पटकथा लेखन शैली में ही लिखी जाती हैं। इस शैली में पटकथा लेखक कल्पना का बहुत अधिक सहारा लेकर एक ऐसे समाज और वातावरण का सृजन करता है जो हमारे वास्तविक जीवन से अलग होते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो इस शैली में लिखी गई फिल्में हमारे वास्तविक जीवन से दूर होती हैं। कल्पनावादी शैली में लिखी पटकथा में पात्रों के कार्यकलाप, वेशभूषा, भाषा, उद्देश्य, मान्यताएं आदि अलग होती हैं। कल्पनावादी पटकथा लेखन शैली के अंतर्गत लेखक एक ऐसे जीवन का सृजन करता है जो अब तक दर्शकों ने न तो देखा है और न ही अनुभव किया है। पटकथा लेखक कल्पना की उड़ान भरते हुए जो कुछ भी लिखता है यदि उस पर फ़िल्म बन जाती है और वह हिट हो जाती है तो दूसरे लोग भी उसका अनुसरण करने लगते हैं। यदि फ़िल्म फ्लॉप हो गयी तो उस पटकथा को लोग भूल जाते हैं। यही सामान्य नियम सा बन गया है।

पटकथा में कभी-कभी कल्पना का अतिरेक शामिल हो जाता है। इसे दर्शक सह नहीं पाते। इसलिए कल्पनावादी पटकथा लेखन शैली में कल्पना का संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है। भारत में वैसी फिल्में कम बनती हैं जिनमें कल्पना का अतिरेक हो। हॉलीवुड में ऐसी फिल्में अधिक बनती हैं। हॉलीवुड की कई फिल्में जैसे जुरसिक पार्क, गॉडजिला, अवतार आदि में कल्पना का अतिरेक है। कल्पनावादी पटकथा लेखन शैली पर आधारित फिल्मों की शूटिंग करने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इस तरह की फिल्मों के निर्माण के लिए उन्नत तकनीक की भी जरूरत पड़ती है जिसके कारण फ़िल्म का बजट बढ़ जाता है। सामान्यतः भारत में अधिकांश फिल्में इस तरह बनती है कि जिनमें थोड़ा प्रेम हो, थोड़ी हिंसा हो और कहीं-कहीं कल्पना भी हो। जादुई तरीके से बुराइयों का अंत हो और अच्छाई की जीत हो।

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यथार्थवादी शैली-

पटकथा लेखन की यथार्थवादी शैली के अंतर्गत समाज के यथार्थ को चित्रित करने का प्रयास किया जाता है। इसके माध्यम से समाज का जो चित्र दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है उसे देखकर लगता है कि यह देखा हुआ या अनुभव किया हुआ समाज है। यहां कुछ भी कल्पनीय नहीं दिखता। इस शैली के अंतर्गत कल्पना का सहारा लिया भी जाता है तो वह भी यथार्थ से नजदीक ही होता है। यथार्थवादी पटकथा लेखन शैली के माध्यम से दर्शक अपना और अपने आसपास का जीवन देखते हैं। हिन्दी सिनेमा के इतिहास में हमेशा से यथार्थवादी पटकथा लेखन शैली पर आधारित फिल्में बनती रही हैं। ‘अछूत कन्या’, ‘किसान कन्या’, ‘नीचा नगर’, ‘दो बीघा जमीन’ आदि फिल्में यथार्थवादी पटकथा लेखन शैली का उदाहरण हैं। 1975 के आसपास हिन्दी सिनेमा में यथार्थवादी पटकथा लेखन शैली पर आधारित फिल्मों के निर्माण में तेजी आती है और ‘समानांतर सिनेमा’ नामक एक आंदोलन की ही शुरुआत हो जाती है। ‘अंकुर’, ‘निशांत’, ‘सारांश’, ‘मृगया’, आदि सैकडों फिल्में यथार्थवादी पटकथा लेखन शैली के आधार पर बनी।

यथार्थवादी पटकथा लेखन शैली के आधार पर पटकथा लिखते समय लेखक को हमेशा यह ध्यान रखना होता है कि वह कोई दूसरे समाज का सृजन नहीं कर रहा है बल्कि अपने समाज का ही प्रतिबिम्ब चित्रित कर रहा है। वह समाज का प्रतिबिंब चित्रित करते समय कल्पना का सहारा लेता है लेकिन हमेशा यह ध्यान रखता है कि यथार्थ और कल्पना का संतुलन बना रहे। कई बार यथार्थवादी पटकथा लेखन शैली के अंतर्गत लेखक कोरा यथार्थ चित्रित कर देते हैं। कोरा यथार्थ फ़िल्म की व्यावसायिक सफलता के लिए उचित नहीं होता क्योंकि अधिकांश दर्शक मनोरंजन के उद्देश्य से फ़िल्म देखने जाते हैं। कोरा यथार्थ से बचने के लिए और मनोरंजन को ध्यान में रखते हुए लेखक कल्पना का मिश्रण करता है। कल्पना का यह मिश्रण भी यथार्थ का ही आभास कराता है।

लेखक- डॉ अरुण कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, लक्ष्मीबाई महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय व संपादक, लोकमंच पत्रिका। सम्पर्क- 8178055172, 9999445502, lokmanchpatrika@gmail.com

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