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रामनारायण शुक्ल: कथ्य और रूप का प्रश्न अर्थात इतिहास का ट्रैजिक – शशांक शुक्ल

श्रद्धांजलि आलेख-5

काशी हिंदू विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग (1960-1970 )

दीक्षा-काल

वह 1960 के दशक का हिंदी विभाग था। यह समय ‘आचार्यों के वर्चस्व’ के रूप में भी स्मरण किया जा सकता है। हिंदी के ख्यात आचार्यों से सजा काशी हिंदू विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग। इसी विभाग में सन 1961 ई में रामनारायण शुक्ल का आगमन होता है। 1959 से लेकर 1961 तक डीएवी कॉलेज से इंटर पास करने तक की आपकी यात्रा को आपके “काशी की बौद्धिक संस्कृति में दीक्षित” होने के रूप में देखा जाना चाहिए। इंटर के वर्ष बनारस की गलियों में घूमने , बौद्धिक चर्चाओं में भाग लेने तथा साहित्यिक अनुराग के उदय की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। यही वह समय था, जब आपका परिचय डॉ देवराज जी से हुआ था। डॉ देवराज जी ‘छायावाद का पतन’, ‘अजय की डायरी’, ‘भारतीय संस्कृति: महाकाव्यों के आलोक में’, ‘संस्कृति का दार्शनिक विवेचन’ ( मूल रूप से अंग्रेजी में ) आदि पुस्तकों के कारण चर्चित हो चुके थे। देवराज जी तुलनात्मक एवं क्लैसिक समीक्षा के लिए हिंदी आलोचना में ख्यात रहे हैं। हिंदी साहित्य या विभाग से सीधे-सीधे संबंधित न होने के बावजूद देवराज जी का साहित्य-विवेक अत्यंत परिष्कृत था। देश-विदेश के साहित्य विवेक के अभाव में आलोचना पुष्ट कैसे हो सकती है? देवराज जी दार्शनिक चिंतक व आलोचक थे। बीए में प्रवेश से पूर्व रामनारायण शुक्ल के ऊपर देवराज जी का प्रभाव पड़ चुका था। बाद के दिनों में आपके साथ की लंबी साहित्यिक चर्चा का यह प्रारंभिक चरण था।

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इंटर पाठ्यक्रम के बीच गर्मी के दिन सोनभद्र ( तब मीरजापुर ) में बीतते। दो महीने तक क्षेत्र में भ्रमण …शास्त्रीय चर्चा, कथा वाचन… बौद्धिक गोष्ठियां। हां इन बौद्धिक गोष्ठियों का विषय प्रायः शास्त्रीय विषय होते। रामनारायण शुक्ल के ऊपर बनारस का प्रभाव पड़ चुका था। अब ‘शास्त्र चर्चा’ में संदर्भ-प्रसंग जुड़ने लगे थे, तत्कालीन सामाजिक यथार्थ के साथ ही स्फुट टिप्पणियां भी जुड़ने लगी थीं। बनारस आने से पूर्व इस चर्चा का स्वरूप धार्मिक और शास्त्रीय स्वरूप के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ था। बनारस ने उस चर्चा को आधुनिक जीवन यथार्थ से जोड़ दिया था। सोनभद्र के लिए यह नए ढंग की बात थी। लंबी कद-काठी और वक्तृत्व क्षमता के साथ जब आप वक्तव्य के लिए उठते, तब ‘एक नए ढंग का’ प्रभाव पड़ता। आपके पिताजी मध्यमा से इंटर पाठ्यक्रम में प्रवेश के समय आपसे बहुत नाराज हुए थे, किन्तु यह नाराज़गी अब शमित होने लगी थी। आपके क्षेत्र में लोकप्रियता के कारण आपके पिताजी को संतोष भी हुआ कि उनका तथा परिवार का नाम प्रसरित हो रहा है।

सोनभद्र में साहित्यिक-बौद्धिक चर्चा का यह क्रम आपके स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम पूर्ण होने तक चलता रहा। इस चर्चा के केंद्र में गांव-शहर, शास्त्र और साहित्य का द्वंद्व भी था, जो आपके गठन से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है। बीए पाठ्यक्रम के बीच ही आपका विवाह प्रभावती देवी के साथ हो गया। तब कम उम्र में विवाह का प्रचलन आम था। घर की आर्थिक स्थिति बहुत सुदृढ़ न थी। ट्यूशन , वज़ीफ़े और सामाजिक सहयोग ही वह भूमियां थीं, जो आपको सहयोग कर सकती थीं।ट्यूशन से इतनी आय न होती कि परिवार का ख़र्च चल पाए। घर से सहयोग भी बहुत मामूली था। विश्वविद्यालय से वज़ीफ़े मिलने के बाद थोड़ी राहत मिल पाई थी। ये वर्ष बहुत संघर्ष के थे। लक्ष्य बड़ा था, इसलिए संघर्ष छोटा पड़ने लगा। काशी की संस्कृति, गली, मंदिर, शास्त्र की एक दुनिया थी तो दूसरी ओर साहित्य का एक अभिनव संसार था, जो अपनी ओर आपको खींच रहा था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में 1961 में बी ए में दाखिले ने आपको एक बड़े वितान का रास्ता खोल दिया था। बीए में हिंदी के साथ ही आपके अन्य विषय अंग्रेजी और दर्शन थे। धीरे-धीरे शास्त्र पर साहित्य का रंग चढ़ने लगा था।

हिंदी विभाग के आचार्य : आचार्य के बीच आचार्य

सन 1964 तक का वर्ष बीए, 1964 से 1966 में स्नातकोत्तर तथा उसके बाद पीएचडी में प्रवेश। यानी यह दशक आपकी ‘साहित्यिक दीक्षा’ का था। 60 तक हज़ारी प्रसाद द्विवेदी विभाग छोड़कर जा चुके थे। नामवर सिंह भी विभाग से जा चुके थे। हां प्रभाव की दृष्टि से द्विवेदी जी का व्यक्तित्व हिंदी विभाग पर छाया हुआ था। नामवर सिंह भी शोधार्थी के रूप में कक्षाएं लेकर लोकप्रियता प्राप्त कर चुके थे। यहां हम इस प्रवाद में नहीं पड़ना चाहते कि नामवर सिंह को काशी हिंदू विश्वविद्यालय से निकाला गया या उन्होंने इस्तीफ़ा दिया था। प्रश्न यह है कि जब उनकी नियुक्ति ही नहीं हुई थी, तब उन्हें निकाला कैसे गया? तो क्या यह प्रवाद नामवर सिंह ने अपनी ओर से रचा? अभी मैं किसी निष्कर्ष पर नहीं जा रहा हूँ। अस्तु! 60-70 के बीच अपने-अपने विषय के दिग्गज़ आचार्यों का जमावड़ा था। रामनारायण शुक्ल ने जब बी ए में प्रवेश लिया तब विभाग में आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, डॉ श्री कृष्ण लाल, आचार्य भोलाशंकर व्यास, शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र काषिकेय’, डॉ जगन्नाथ प्रसाद शर्मा, आचार्य राजपति दीक्षित, कमलिनी मेहता, डॉ बच्चन सिंह, डॉ विजयशंकर मल्ल, डॉ त्रिभवन सिंह, डॉ शिवप्रसाद सिंह, डॉ नागेन्द्रनाथ उपाध्याय, डॉ श्यामसुंदर शुक्ल, डॉ सतीष कुमार रोहरा आदि प्राध्यापक थे। इसके अतिरिक्त हिंदी डिप्लोमा पढ़ाने के लिए दो प्राध्यापक और नियुक्त थे- डॉ कृष्ण कुमार मिश्र तथा डॉ विश्वनाथ मिश्र।

राम नारायण शुक्ल, लोकमंच पत्रिका
राम नारायण शुक्ल, लोकमंच पत्रिका

आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के खिलाफ एक वर्ग षडयंत्र कर चुका था। इसी कारण द्विवेदी जी को विभाग छोड़ना पड़ा था। इस बात से आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र खिन्न थे। आचार्य मिश्र शुक्ल जी के शिष्य थे, किन्तु सहृदय समीक्षक तथा उदारमना व्यक्तित्व थे। सन 1960 में जगन्नाथ प्रसाद शर्मा जी हिंदी विभाग के अध्यक्ष बन गए थे। द्विवेदी के अध्यक्षीय कार्यकाल से यह समय भिन्न था। मिश्र जी की खिन्नता बढ़ती जा रही थी। सन 1963 में उन्होंने विभाग छोड़कर मगध विश्वविद्यालय, बोधगया जॉइन कर लिया था। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र में विद्वता कूट-कूट कर भरी हुई थी। रीतिकाल पर उतनी मात्रा में तथा उतनी गुणवत्तापूर्ण समीक्षा उनके बाद नहीं लिखी गई। बिहारी की वाग्विभूति, घनानंद कवित्त जैसे ढेरों ग्रंथ आपकी सह्रदय समीक्षा के उदाहरण हैं। ‘हिंदी साहित्य का अतीत’ आपके इतिहास बोध का परिचायक है। इसके अतिरिक्त ढेर सारे ग्रंथ आपकी विद्वता के साक्ष्य हैं।

आचार्य भोलाशंकर व्यास के बारे में कहा जाता है-‘न भूतो न भविष्यति’। कहते हैं हिंदी में ऐसा अध्यापक कोई न हुआ और न होगा। हालांकि मेरी इस धारणा से पूर्ण सहमति नहीं है। इतिहास युगानुरूप व्यक्तित्व का निर्माण कर लिया करता है। फ़िर हर बड़े व्यक्तित्व अपने ढंग के अकेले ही होते हैं। भोलाशंकर व्यास को हिंदी के श्रेष्ठ प्राध्यापक के रूप में नामवर सिंह ने स्मरण किया है। रामनारायण शुक्ल भी मानते थे कि “मैंने अब तक ऐसा उद्भट विद्वान और योग्य प्राध्यापक न देखा” । व्यास जी संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, भाषा विज्ञान, भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य काव्यशास्त्र, आधुनिक साहित्य, प्राचीन साहित्य, गद्य-पद्य…यानी साहित्य के हर अनुशासन पर समान भाव से अधिकार रखते थे और कक्षा-अध्यापन किया करते थे। किसी विषय का कोई अध्यापक कभी न आता तो कक्षा में पहुंच जाते। छात्रों से पूछते कहाँ तक पढ़ाया गया है…और उसके बाद उसके आगे से पढ़ाना प्रारंभ कर देते। विद्वता और आचार्यत्व के आप अप्रतिम उदाहरण थे।

आचार्य व्यास की विद्वता जितनी उद्भट थी, व्यक्तित्व उसी अनुपात में विराट न था। आचार्य द्विवेदी के प्रति आपके मन में प्रतिस्पर्धा भाव साथ-साथ चलता रहता। द्विवेद जी अपनी विद्वता तथा रचनाकार रूप में तो बड़े थे ही, उनका व्यक्तिव भी विराट था, इसीलिए तो उनकी लंबी शिष्य परंपरा विकसित हुई। व्यास जी को अपनी विद्वता द्विवेदी से ज़्यादा दिखती। काव्यशास्त्रीय ज्ञान आपका प्रखर था। दशरूपक का भाष्य और ध्वनि सिद्धांत पर आपकी कृतियां आपकी मेधा का उत्तम निदर्शन हैं। रचनाकार के रूप में आपने सर्जनात्मक लेखन (उपन्यास आदि ) भी किया है, किन्तु उनमें विद्वता है, सरसता नहीं। आचार्य द्विवेदी का संस्कृत ज्ञान आपको अपूर्ण लगता। विद्वान व्यक्तियों में रचनात्मक प्रतिस्पर्धा होती ही है। इन सब का प्रभाव आपके निष्कर्षों पर भी पड़ता। आचार्य द्विवेदी को आप आचार्य मानने को तैयार न थे। वे कहा करते कि –” हिंदी में आचार्य तो केवल एक ही हुआ है- आचार्य रामचंद्र शुक्ल। बाक़ी तो आचार्याभास हैं…”। बड़े लोगों के मूल्यांकन प्रतिमान भी ऊंचे होते हैं। यह व्यास जी का अपना प्रतिमान था। रामनारायण शुक्ल व्यास जी की विद्वता और वैदुष्य से प्रभावित थे, लिहाज़ा कुछ समय में ही आप उनके प्रिय शिष्य बन गए। संस्कृत के प्रति अनुराग और दक्षता के कारण व्यास जी आपको प्रीतिकर लगते। एक बार व्यास जी ने आपको मूल्यांकन सूत्र देते हुए बताया-” देखो! छायावाद से पूर्व के साहित्य को समझना है तो भारतीय दर्शन की समझ आवश्यक है…और यदि छायावाद के बाद के साहित्य को समझना है तो पाश्चात्य दर्शन, विचार परंपरा और साहित्य का ज्ञान आवश्यक है”। रामनारायण शुक्ल के व्यक्तित्व और आलोचना पर इस सूत्र का गहरा असर हुआ।

अब तक भारतीय शास्त्र पर आपकी अगाध श्रद्धा थी। एकबारगी आपको लगा कि ज्ञान धारा में भारतीय, पाश्चात्य दोनों दृष्टियां अनिवार्य हैं। भोलाशंकर व्यास जी में वैदुष्य था। वैदुष्य जब प्रभावी हो जाता है, तब आलोचना व्याख्यापरक हो जाती है। आपकी काव्यशास्त्रीय मान्यताओं पर व्याख्या दृष्टिकोण का प्रभाव रहा है। डॉ श्रीकृष्ण लाल इतिहास पढ़ाते थे। आधुनिक साहित्य के इतिहास पर आपकी विशिष्ट कृति है। आधुनिक हिंदी साहित्य के 25 वर्ष इस ग्रंथ का प्रतिपाद्य कथ्य है। आपके अध्यापन में नए निष्कर्ष होते थे। इतिहास के अध्येता होने के कारण आपका अध्यापन मौलिक होता। कक्षा में आप पान खाकर आते। पान से आपके होंठ लाल हो जाते…इसी भंगिमा में अध्यापन …यह सब छात्रों को बड़ा रुचिकर मालूम पड़ता। जगन्नाथ प्रसाद शर्मा जी नाटक पढ़ाते। आप अपने को ‘गुण्डेश’ कहते। ‘प्रसाद के नाटकों का शास्त्रीय अध्ययन’ अपने ढंग की विशिष्ट कृति है। शर्मा जी 60 से 66 तक अध्यक्ष पद पर शोभायमान रहे। रामनारायण शुक्ल की रंगमंच के प्रति स्वाभाविक अभिरुचि थी, इस कारण आप शर्मा जी के प्रिय छात्र बन गए थे। अच्छी डील-डाल के बीच आपका अपने को ‘गुण्डेश’ के रूप में उद्घोषित करना, बड़ा कौतुक उत्पन्न करता।

डॉ राजपति दीक्षित जी मध्यकाल के विशेषज्ञ विद्वान थे। तुलसीदास पर आपका अध्यापन बड़ा विद्वतापूर्ण होता। आपकी कृति ‘तुलसीदास और उनका युग’ अपने ढंग की विशिष्ट कृति है। बाद में तुलसी पर ढेरों पुस्तकें रची गईं, जिन पर इस पुस्तक का प्रभाव महसूस किया जा सकता है। नागेन्द्रनाथ उपाध्याय संत काव्य पढ़ाते थे। संत काव्य पर आपका ग्रंथ स्थायी महत्व का है। श्यामसुंदर शुक्ल का अध्यापन भी आदिकाल और संत काव्य पर आधारित रहा है। सरस भाषा में विषय की अभिव्यक्ति आपके अध्यापन की विशिष्टता थी। डॉ विजयशंकर मल्ल जी सुबुद्ध प्राध्यापक थे। नपे-तुले अंदाज में आप अध्यापन करते। भारतेंदु हरिश्चंद्र के निबंधों , गद्य पर आपकी टिप्पणी- भारतेंदु का गद्य हँसमुख गद्य है- काफ़ी चर्चित हुई थी। डॉ शिवप्रसाद सिंह अपने शोध कार्य से ही चर्चित हो चुके थे। हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी के निर्देशन में सूर पूर्व ब्रजभाषा काव्य का अनुशीलन अपने ढंग का विशिष्ट कार्य है। कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में आप ख्यात हो चुके थे। नई कहानी आंदोलन के कहानीकार के रूप में आपकी ख्याति हो चुकी थी। आप कथा साहित्य पढ़ाते। इतिहास और इतिहासबोध आपके व्यक्तित्व और चिंतन में घुले-मिले थे। रामनारायण शुक्ल आपके इतिहास विवेक से प्रभावित थे। विभाग के भीतर आप शिवप्रसाद सिंह जी से प्रभावित थे और विभाग के बाहर डॉ देवराज जी से।

‘भक्तिकाव्य: स्वरूप और संवेदना’ विषय पर रामनारायण शुक्ल का शोध प्रबंध शिवप्रसाद सिंह जी के निर्देशन में ही सम्पन्न हुआ था। रामनारायण शुक्ल संस्कृत परंपरा से हिंदी में आए थे। संस्कृत साहित्य के प्रति आपकी अभिरुचि और दक्षता से देवराज जी काफ़ी प्रभावित थे। 1967 को लिखे एक पत्र में देवराज जी ने आपका वैशिष्ट्य संस्कृत साहित्य का गहरा ज्ञान बताया था। जब शिवप्रसाद सिंह जी के आप संपर्क में आए, तब आपकी दृष्टि इतिहास बोध से व्यापक उन्नत हुई। मार्क्सवाद से तब तक आप न जुड़े थे, किन्तु दर्शन और इतिहास में अभिरुचि होने के कारण साहित्य को देखने की व्यापक दृष्टि मिल गई थी। शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र काषिकेय’ काशी की संस्कृति के जीवंत मूर्ति थे। शिवप्रसाद जी की वैचारिकी में इतिहास था तो रुद्र जी के व्यक्तित्व और भाव-भंगिमा में ही इतिहास झांकता था। काशी की संस्कृति पर आपका क्लैसिक उपन्यास ‘ बहती गंगा’ प्रकाशित हो चुका था। आप उपन्यास पढ़ाते थे। रुद्र जी भांग का सेवन करते और एक तरंग में रहते। बहुधा वे एक तरंग में अध्यापन करते। प्रवाहपूर्ण अध्यापन की दृष्टि से रुद्र जी का प्रभाव भी रामनारायण शुक्ल के अध्यापन पर गहरे पड़ा। रुद्र जी की ‘बहती गंगा’ अपने ढंग की विशिष्ट कृति है- काशी को समझने की दृष्टि से अनिवार्य पुस्तक। जो लोग ‘काशी का अस्सी’ पढ़कर बनारस को देखते हैं, वह भ्रम के शिकार हैं। ‘काशी का अस्सी’ काशी का अस्सी नहीं है, अपितु काशीनाथ का अस्सी है। एक बड़े शहर को छिछले ढंग से देखने का प्रयास…। रुद्र जी का महत्व इस ढंग से विशिष्ट है।

डॉ बच्चन सिंह पाश्चात्य समालोचना के प्राध्यापक थे। ‘क्रांतिकारी कवि निराला’ (1948) लिखकर आप पहले ही चर्चित हो चुके थे। ‘बिहारी काव्य का नया मूल्यांकन’ भी आप कर चुके थे। मध्यकाल, आधुनिक साहित्य, भारतीय और पाश्चात्य साहित्य पर आप गंभीरतापूर्वक पढ़ाते। ‘आलोचक और आलोचना’ भी अपने ढंग की महत्वपूर्ण कृति है। हालांकि आपकी महत्वपूर्ण कृतियाँ काशी हिंदू विश्वविद्यालय से बाहर रचित हुईं। एक बार नामवर सिंह ने अपने एक व्याख्यान में कह दिया था कि-” बच्चन सिंह निराला और बिहारी के बीच में झूला झूल रहे हैं”। कहा जाता है कि यह सुनकर बच्चन सिंह बीमार पड़ गए थे। बच्चन जी जितना अच्छा लिखते थे, उस अनुपात में उनका अध्यापन प्रभावी न था। वे बहुत धीमा बोलते। अर्थ यह कि बच्चन सिंह का वक्तृत्व उतना प्रभावी न था, जितना लेखन। डॉ त्रिभवन सिंह का अध्यापन क्ष्रेत्र भी उपन्यास और आधुनिक साहित्य था। बाद के दिनों में उपन्यास और आधुनिक साहित्य पर आपके द्वारा लिखी और संपादित पुस्तकें बहुत दिनों तक छात्रोपयोगी रहीं। सतीष कुमार रोहरा भाषाविज्ञान के प्राध्यापक थे। भाषाविज्ञान की दृष्टि से काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग का मूल्यांकन होना अभी बाक़ी है।

1965 में हिंदी विभाग में दो (02) नियुक्तियां और हुईं। आर्ट्स कॉलेज में तब हर वर्ष ‘कॉलेज डे’ मनाया जाता था। इस बीच यदि किसी नवनियुक्त प्राध्यापक की नियुक्ति होती तो उसकी घोषणा भी इसी दिन होती। सन 1965 के ‘कॉलेज डे’ में घोषणा हुई कि हिंदी विभाग में दो प्राध्यापक और नियक्त हुए हैं। ये दो प्राध्यापक थे- काशीनाथ सिंह और शिवकरण सिंह। सन 1966 का वर्ष था। रामनारायण शुक्ल स्नातकोत्तर द्वितीय वर्ष के विद्यार्थी थे। अध्ययन के प्रति एकांतिक आग्रह, वक्तृत्व क्षमता और तर्क प्रवणता के कारण आप विभाग के प्राध्यापकों की नज़र में आ चुके थे। भोलाशंकर व्यास, शिवप्रसाद सिंह जैसे प्राध्यापकों के आप अत्यंत निकट थे। इसके अतिरिक्त श्यामसुंदर शुक्ल दूर के रिश्तेदार लगते थे और एक ही क्षेत्र के थे। इस कारण आपका भी सहज स्नेह आपको प्राप्त था। राजपति दीक्षित जी और रुद्र जी से आपके संबंध भी आत्मीय थे। साथ ही अपने को गुण्डेश कहने वाले विभागाध्यक्ष जगन्नाथ प्रसाद शर्मा जी भी आप पर स्नेह रखते थे। हालांकि विभागीय राजनीति की दृष्टि से व्यास जी तथा शिवप्रसाद सिंह के आप ज़्यादा करीब थे।

स्नातकोत्तर अंतिम वर्ष की परीक्षा प्रारंभ हो गई थी। एक दिन जगन्नाथ प्रसाद शर्मा जी के पास विभाग के एक प्राध्यापक ( बाद के दिनों में विभागाध्यक्ष तथा अन्य बड़े पदों पर सुशोभित ) आए। प्राध्यापक महोदय का आग्रह किसी लड़के को टॉप कराने को लेकर था। रामनारायण शुक्ल मेधावी छात्र के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। कुछ लोगों को लग रहा था कि रामनारायण शुक्ल ही टॉप करेंगे। प्राध्यापक महोदय ने शर्मा जी से कहा कि-” इस बार इस लड़के को टॉप करवा दीजिए….”। शर्मा जी उसी साल सेवानिवृत्त हो रहे थे। उन्होंने बड़े इत्मीनान से कहा-” देखो! मैंने जीवन में जो भी गलत किया हो। गलती सब से हो जाती है। इस वर्ष मैं रिटायर हो रहा हूँ…शुक्ला योग्य है…उसे ही टॉप करने दो…”। कुछ दिनों बाद परीक्षा का परिणाम आया। रामनारायण शुक्ल ने प्रथम श्रेणी से परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। एमए करने के बाद शोध निर्देशक का प्रश्न सामने था। व्यास जी और शिवप्रसाद सिंह इन लोगों के प्रति आपके मन में आकर्षण था। व्यास जी अपनी विद्वता में जितने उद्भट थे, व्यवहार के स्तर पर नहीं। व्यवहार में उनके संकोच था। इतिहास बोध और भक्तिकाल पर आकर्षण के चलते शिवप्रसाद सिंह जी के साथ शोध कार्य करने का निर्णय आपने पूर्व में ही कर लिया था। शिवप्रसाद सिंह जी की स्वीकृति के पश्चात आपके शोध कार्य की दिशा तय हो गई थी। 1966 से 1970 तक का आपका समय साहित्य की गूढ़ता और समझ विकसित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा।

सन 1969 का वर्ष हिंदी विभाग की समृद्धता दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। इस वर्ष हिंदी विभाग में कुछ महत्वपूर्ण नियुक्तियां हुईं। इस वर्ष नवनियुक्त प्राध्यापकों में डॉ विजयपाल सिंह, शुकदेव सिंह, महेन्द्रनाथ दुबे, सूर्यनारायण द्विवेदी, बब्बन त्रिपाठी एवं शम्भूनाथ पांडेय प्रमुख थे। विजयपाल सिंह इसके पूर्व 14 वर्ष तक तिरुपति विश्वविद्यालय में कार्य कर चुके थे। भविष्य में हिंदी के सबसे बड़े मठाधीश अध्यापक तथा केशव विशेषज्ञ के रूप में ख्यात हुए। ‘केशव का आचार्यत्व’ अपने ढंग का महत्वपूर्ण कार्य है। शुकदेव सिंह बहुश्रुत प्राध्यापक थे। कबीर बीजक पर आपका महत्वपूर्ण कार्य बाद के दिनों में आपकी कीर्ति का स्थायी आधार बना। सूर्यनारायण द्विवेदी काव्यशास्त्र में गति रखते थे। बाद के दिनों में नामवर सिंह के लिए महामृत्युंजय जाप करके भी आपने एक पैराडॉक्स रचा। बब्बन त्रिपाठी अपने अध्यापकीय कौशल के लिए जाने गए तथा शम्भूनाथ पांडेय अपभ्रंश के ज्ञान तथा विशिष्ट भंगिमा में अध्यापन के कारण

रामनारायण शुक्ल: विरुद्धों का सामंजस्य

काशी की संस्कृति इतनी विराट है कि हर व्यक्ति इसे आधे-आधे रूप में पकड़ता है। कुछ लोग इसे ‘आध्यात्मिक’ मान लेते हैं तो कुछ लोग ‘दार्शनिक’। कुछ इसे ‘सांस्कृतिक’ शहर के रूप में देखते हैं तो कुछ निहायत स्थूल ‘भौतिक रूप’ में …। अपनी-अपनी काशी; किन्तु काशी का मूल ‘विरुद्धों का सामंजस्य’ है। परस्पर विरोधी मतों को अपने में सँजोये, समोए काशी की भाव-भंगिमा वही समझ सकता है, जो वैयक्तिकता का अतिक्रमण करना सीख चुका हो। आश्चर्य या अतिश्योक्ति नहीं कि रामचंद्र शुक्ल को यह पद काशी को देखकर मिला हो। आकर्षण सपाट में नहीं होता, जटिलता में होता है। एक सपाट जीवन वैराग्य के लिए भले ही काम्य हो, किन्तु साहित्य के व्यक्ति के लिए तो जीवन की गूढ़ स्थितियां, असमतल रास्ते ही आकर्षित करते हैं। जिस व्यक्तित्व में जितना असमतल कोण होगा, वह उतना ही सार्थक जीवन जियेगा।

वैयक्तिक जीवन की ट्रैजिक स्थितियां विडम्बनापूर्ण होती हैं, किन्तु वही साहित्य में आकर बहुमूल्य हो जाती हैं। घीसू-माधव, मंटो के पात्र ट्रैजिक हैं। विद्रोही पात्र भी ‘ट्रैजिक’ होते हैं। उनके जीवन की विडंबना को पकड़ कर ही उन तक पहुंचा जा सकता है। दोस्तोवस्की के पात्रों को देखें या दूसरे बड़े रचनाकारों को, वे सब ट्रैजिक जीवन का महाकाव्यात्मक आख्यान रचते हैं। बिना ट्रैजिक हुए न मनुष्य सार्थक होता है और न साहित्य। जो लोग सीधे-सीधे जीवन को, सफ़लता की माप से नापते हैं, वे एक समय बाद काल से बाहर धकेल दिए जाते हैं। जीवन की विडम्बना को पकड़ना कला का कार्य है और ट्रैजिक स्थितियों को समझते हुए अपनी राह चुनना महनीय व्यक्तित्व का लक्षण। शास्त्र को शास्त्र के रूप में या प्राचीन को उसी रूप में देखना शास्त्रकार का कार्य है…शास्त्र को, प्राचीन रूप को सातत्य रूप में देखना इतिहासकार का काम है; जबकि शास्त्र को आधुनिक ढंग से देखना आलोचक का कार्य है। आग्रही आलोचना एक को दबाकर विकसित होती है…प्रगतिशील आलोचना सापेक्षता में विकसित होती है। रामनारायण शुक्ल का व्यक्तित्व और आलोचना कहन और लेखन की विडंबनाओं को पकड़ने में विकसित हुआ है। ‘रूप और वस्तु’ उनकी पुस्तक तो है ही, जीवन में भी कथ्य और शिल्प ( रचाव ) का तनाव कम नहीं रहा है।

जीवन की ट्रैजिक स्थिति क्या है? हमारे चुनाव और इतिहास के चुनाव में कई बार विचलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इतिहास हमसे कुछ करवाना चाहता है और व्यक्ति की मानसिक संरचना उससे पूरी तरह एकाकार नहीं हो पाती। व्यक्ति अपनी भूमिका से अपदस्थ हो जाता है। एक अधूरापन, संत्रास, विघटन…में जीने के लिए वह अभिशप्त हो जाता है । व्यक्ति के स्तर पर देखें तो यह बहुत पीड़ाजनक है, किन्तु इतिहास के धरातल पर देखें तो ऐसी ढेरों पीड़ाएँ अपनी-अपनी व्यथा का उत्सव रचती हैं।

रामनारायण शुक्ल की प्रारंभिक दीक्षा शास्त्रबद्ध चेतना से निष्पन्न हुई थी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के विराट परिसर में शास्त्र को जैसे दिशा मिल गई थी; किन्तु मन अब अशांत हो चुका था। शास्त्र अब जीवन के लिए कमतर पड़ने लगा था। जीवन बोध पुष्ट होने की प्रक्रिया में आ गया था। एक रिक्तता महसूस होने लगी थी। जीवन को दिशा देने वाली क्रियात्मक शक्तियों की खोज़ प्रारंभ हो गई थी, किन्तु वह पकड़ नहीं आ रही थी। देवराज जी से लंबी साहित्यिक चर्चा होती। देवराज जी ‘सांस्कृतिक मानवतावाद’ के प्रवक्ता थे। ऐसी संस्कृति जो मानव केंद्रित हो तथा जिसका मुख्य वर्तमान की ओर ढला हो। रामनारायण शुक्ल क्लैसिक लिटरेचर के प्रशंसक थे। इसीलिए देवराज जी उनसे बहुत प्रभावित होते। शोध कार्य के 4 वर्ष साहित्य के गहरे अध्यवसाय की दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण था, किन्तु जीवन को दृष्टि तो बलिया में मिली। सन 1970 में बलिया के सतीश चंद्र डिग्री कॉलेज में आपकी नियुक्ति होने के बाद आपका जीवन एक नए मोड़ पर मुड़ चला। 1966 ई में जगन्नाथ प्रसाद शर्मा जी के सेवानिवृत्त होने के पश्चात पदमनारायण आचार्य को कार्यकारी विभागाध्यक्ष बनाया गया। लगभग 1 वर्ष पश्चात 1967 में आचार्य भोलाशंकर व्यास जी विभागाध्यक्ष बने। व्यास जी लगभग 2 वर्ष विभागाध्यक्ष रहे। डॉ विजयपाल सिंह जी 1969 में अपनी नियुक्ति के साथ ही अध्यक्ष पद पर आसीन हुए। व्यास जी और विजयपाल सिंह जी के अध्यक्ष बनने का यह क्रम आगे भी चलता रहा।

हिंदी विभाग: कथ्य और प्रयोग

काशी हिंदू विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग किस मायने में भारत के दूसरे हिंदी विभागों से अलग है? क्या यह अपनी संरचना में शास्त्रीय है? क्या यह अपनी निष्पत्ति में समीक्षामूलक है? क्या यह अपने प्रस्थान को अब तक लेकर चलने के लिए बाध्य या अभिशप्त है? काशी का पड़ोसी इलाहाबाद विश्वविद्यालय जिस प्रकार अपने रूपवादी प्रयोगों और रचनामूलक आग्रहों को लेकर एकसमय गतिशील होता है, उस प्रकार हिन्दू विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग नहीं…। क्या इसे हम दो शहरों या दो संस्कृतियों के पार्थक्य के रूप में देखें? छायावाद के एक बड़े कवि जयशंकर प्रसाद काशी के थे, किन्तु हिंदी विभाग के रामचंद्र शुक्ल उन्हें अपनी सहानुभूति न दे सके। हालांकि वही शुक्ल जी पंत की कविता को सराहते हैं, जो कि उसके कतिपय अन्य कारण थे। छायावाद, परिमल और नयी कविता आंदोलन में काशी हिंदी विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग अपनी केंद्रीय भूमिका नहीं निभाता। हिंदी विभाग मूल्यांकन मूलक चेतना से आच्छादित रहा है। एक लंबी श्रृंखला है…। लाला भगवानदीन, श्यामसुंदर दास से लेकर रामनारायण शुक्ल, चौथीराम यादव, अवधेश प्रधान, कृष्णमोहन, मनोज सिंह, प्रभाकर सिंह, श्रीप्रकाश शुक्ल, रामाज्ञा राय…. तक। इस परंपरा में समीक्षा मुख्य है, रचना नहीं। रचनाकार व्यक्तित्व में हज़ारीप्रसाद द्विवेदी भी हैं, किन्तु वे इस व्यवस्था से बाहर कर दिए जाते हैं। शिवप्रसाद सिंह भी हैं, किन्तु विभाग की मुख्यधारा से अलग। कुछ और भी नाम हैं किंतु उनके रचनाकार रूप को उनका समीक्षक रूप ही छोटा कर देता है।

कथा साहित्य, आलोचना की परंपरा तो इस विभाग में ख़ूब फ़ली-फूली , किन्तु कविता, नाटक, भाषा विज्ञान और कथेतर साहित्य की उन्नत परंपरा न दिखी। रचना आंदोलन की दृष्टि से तो और भी निराशा है। एक रामनारायण शुक्ल के राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा को छोड़ दिया जाए तो दूसरा कोई सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन इस विभाग द्वारा केंद्रित न हो पाया। नाटककार व्यक्तित्व की खोज़ करें तो गहरी निराशा मिलेगी। विभाग में किसी बड़े नाटककार को खोजने के लिए दिमाग़ पर बल लगाना पड़ता है। हां नाट्य मंचन की दृष्टि से यह विभाग अत्यंत समृद्ध रहा है। रामनारायण शुक्ल के नेतृत्व में सैकड़ों नुक्कड़ नाटकों की प्रस्तुतियां हों या 17 बड़े क्लैसिक नाटकों का मंचन….। यानी नाटकीय अनुप्रयोग की दृष्टि से विभाग समृद्ध तो रहा है, किन्तु नाटक लेखन की दृष्टि से विभाग दूसरे विभागों से कमतर रहा है। आंदोलन और नाटकीय मंचन की दृष्टि से अकेले रामनारायण शुक्ल ही थे, जिन्होंने विभाग की इस कमी की पूर्ति की।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग अपनी चेतना में किस मायने में दूसरे विभागों से अलग हो जाता है? कुछ अध्यापक तो यहां से बाहर जाकर ही “पुनर्नवा” हो पाते हैं। जैसे नामवर सिंह, बच्चन सिंह, रामनारायण शुक्ल। साथ ही यहां से दीक्षित होकर दूसरे जगहों पर ख्यात होने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी है- रामदरश मिश्र, विश्वनाथ त्रिपाठी, मैनेजर पांडेय, वीरभारत तलवार…जैसे सैकड़ों लोग….। एक अध्ययन इस पर भी हो सकता है कि यहां रहकर अध्यापन करने वाले व्यक्तित्व बाहर जाकर किस प्रकार अपनी लेखन-शैली बदल लेते हैं। बच्चन सिंह , नामवर सिंह और रामनारायण शुक्ल को उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है। नामवर सिंह की प्रारंभिक पुस्तकों को देखें और उनकी उत्तरार्द्ध की पुस्तकों को तो हमें विचित्र प्रकार के निष्कर्ष प्राप्त होंगे। काशी में रहते नामवर सिंह की लिखी पुस्तकों में एक आंतरिक व्यवस्था है …संगति है, किन्तु बाद की रचनाओं में वैचारिक विचलन और अंतर्विरोधी उक्तियों की भरमार है। इस दृष्टि से बच्चन सिंह का बाद का लेखन ज़्यादा पुष्ट है। रामनारायण शुक्ल का विश्वविद्यालय से बाहर जाना उनके लेखन से ज़्यादा उनके व्यक्तित्वान्तरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। आंदोलनों के महत्व से तो आप परिचित हुए ही, साथ ही ‘रूप और वस्तु’ का संतुलन भी स्थापित हुआ। आपकी पुस्तक ‘रूप और वस्तु’ के मूल में काशी हिंदू विश्वविद्यालय की वैचारिकी और उससे बाहर निकलने का द्वंद्व भी महसूस किया जा सकता है, किन्तु बहुत भीतरी रूप में…।

हिंदी विभाग व्याकरण, भाषा विज्ञान, नाटक, कथेतर की ओर कम गया। शिवप्रसाद सिंह का शोध भाषा पर था। नामवर सिंह का शोध कार्य भाषा पर था। काशीनाथ सिंह ने भी संयुक्त क्रियाओं पर शोध कार्य किया था। रामनारायण शुक्ल का शोध कार्य भक्तिकाल के काव्य रूपों पर आधारित था। इसके अतिरिक्त कुछ और कार्य भी थे, जो व्याकरण और भाषा विज्ञान पर आधारित थे, किन्तु उनकी संख्या बहुत कम थी। प्रश्न फिर वही कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय का भाषा विज्ञान किन दृष्टियों से मूल्यांकित किया जा सकता है? केश्वप्रसाद मिश्र जी के भाषा विज्ञान के बहुमूल्य नोट्स किन्हीं व्यक्ति ने अपने नाम से छपवा लिए। स्वयं हज़ारी प्रसाद द्विवेदी अपभ्रंश की कक्षाएं लिया करते थे। द्विवेदी जी भाषा विज्ञान भी पढ़ाया करते थे। भाषा विज्ञान का स्वतंत्र प्रश्न पत्र हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी के विभागाध्यक्ष होने के बाद शुरू हुआ था। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ध्वनि विज्ञान भोलाशंकर व्यास पढ़ाते थे तथा अर्थ विज्ञान शिवप्रसाद सिंह पढ़ाते थे। रोहरा जी भाषा विज्ञान तो पढ़ाते ही थे। सन 1980 में रोहरा जी की नियुक्ति लिंग्विस्टिक डिपार्टमेंट में हो गई थी। उसी बीच भाषा विज्ञान का पद रिक्त हुआ। इसी पद पर 1981 में राजमणि शर्मा जी की नियुक्ति हुई थी। बाद में सुधाकर सिंह भी भाषा विज्ञान की कक्षाएं लेते रहे। इस ढंग से देखा जाए तो हिंदी विभाग में बड़े नाम थे, जो भाषा विज्ञान से जुड़े थे। किंतु ये भाषा विज्ञान की अपनी समझ को साहित्यिक उपयोग में तो लाते हैं, किन्तु भाषा विज्ञान में सैद्धांतिक निर्माण की ओर नहीं जाते।भाषा विज्ञान मनुष्य मन, मनोवृत्तियों के बनने का विज्ञान है, किन्तु हिंदी विभाग क्रियात्मक पदों से कम ही संचालित हुआ है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग क्रियामूलक प्रभाव से संचालित रहा है। क्रिया रचना मूलक होता है और क्रियात्मक प्रभाव समीक्षामूलक। हिंदी विभाग प्रभावात्मक औदात्य से संचालित रहा है।

हिंदी विभाग ( काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) कभी-कभी मुझे इतिहास की नाटकीय आख्या का एक रूपक-सा दिखता है, ख़ासकर तब जब वह अपनी चेतनामूलक निष्पत्तियों में अपने मूल से बाहर आने के लिए छटपटाता है, किन्तु वह उससे ‘बद्ध’ होने के लिए अभिशप्त है। प्रायः मनुष्यों में भी एक द्वंद्व है। विकासशील मनुष्य हो या सभ्यता, वह द्वंद्वग्रस्त होती ही है। विडम्बना व्यक्ति की ही नहीं, संस्था की भी होती है।

डॉ शशांक शुक्ल, लोकमंच पत्रिका
डॉ शशांक शुक्ल, लोकमंच पत्रिका

लेखक- डॉ शशांक शुक्ल, एसोसिएट प्रोफेसर एवं समन्वयक, हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय, सांबा, जम्मू और कश्मीर। मेल- parmita.shukla@gmail.com, मोबाइल – 9917157035, 6006966505

39 thoughts on “रामनारायण शुक्ल: कथ्य और रूप का प्रश्न अर्थात इतिहास का ट्रैजिक – शशांक शुक्ल

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