लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
राम नगीना मौर्य की कहानी- ‘उसकी तैयारियां’

‘‘मैं तैयार हूँ। मुझे बस्स…साड़ी बदलना बाकी है। बच्चों ने कपड़े पहन लिये हैं। गैस का नाॅब देख लिया है। निकलने से पहले, आप जरा नल की टोटियां चेक कर लीजियेगा। पानी बहुत देर से नहीं आ रहा था। कोई नल खुला न रह गया हो। अब पंखा-बत्ती चेक करना तो आपकी ही ड्यूटी है। देखिये भूलियेगा नहीं। आप तो जानते हैं…ढे़रों काम-काज की हड़बड़ी में मैं अक्सर जरूरी चीजें भूल जाती हूँ। वैसे भी अब ये सिर्फ मेरे ही बस का रोग नहीं। कुछ काम-काज की जिम्मेदारी तो आप को भी उठानी चाहिए न! देखिये, दुबारा याद दिला रही हूँ, भूलियेगा नहीं। सब-कुछ ठीक से चेक कर लीजियेगा, और हाँ …दरवाजे, मेन-गेट का एक-एक ताला, खींच-खींच कर, ठीक से चेक कीजियेगा, तब घर से निकलियेगा।’’

‘‘ताला-चाभी कहां हैं…?’’

‘‘ताला-चाभी डायनिंग-टेबल पर रख दिया है। मांजने-धोने वाले सभी जूठे बरतन, नल के नीचे रख दिये हैं। आंगन की चाभी बरेठा को दे दिया है। महरिन आयेगी तो वह उसे दे देगा। दूध वाले को सुबह ही बता दिया था…‘भैय्या, रात को हमें लौटने में देर हो जायेगी आज दूध पड़ोस में ही दे देना’…उसे सहेजते, मिसराइन चाची को भगौना भी दे दिया है।’’

‘‘और मेरे कपड़े…?’’

‘‘आपके कपड़े इस्तरी कर दिये हैं, वो वहां सोफे पर तहिया कर रखे हैं। आज तो पूरा दिन टाइम ही नहीं मिला, जरा देर भी ओठंगने का। आपके और बच्चों के हफ्ते-भर के गन्दे कपड़े धुलने थे। दोपहर में जरा देर आँख लगी नहीं कि कभी काॅल-बेल, तो कभी मोबाइल, कभी कूरियर वाला, तो कभी कोई सेल्समैन, आधा पौन घण्टे के भीतर कोई-न-कोई डिस्टर्ब कर ही दे रहा था। सो आज सुबह से थोड़ी हरारत भी है मुझे।’’

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‘‘कुछ चाय-पानी भी मिलेगा…?’’

‘‘चाय मैंने आपके आने से पहले ही बना लिया था। भगौने में से ढ़ाल लीजिए। अभी गरम ही है। बिस्किट, डायनिंग-टेबल पर रखा है। आप तो जानते हैं…बच्चे एक तिनका भी इधर से उधर नहीं टसकाते। स्कूल से आते ही, न ठीक से मुंह-हाथ धोना, न कपड़े बदलना, न आराम से बैठकर खाना ही खाना। एक टी.वी. पर लग जायेगी तो दूसरा कम्प्यूटर पर गेम खेलने लगेगा। कुछ कहिए उनसे, तो उल्टे अंग्रेजी बोलने लगते हैं। जइसे घर के कामों में हाथ बटायेंगे तो घिस जायेंगे। ई कउन से किताब में लिखा है कि सारे काम-काज का जिम्मा हमारे ही सिर होगा? घर के बाकी लोग क्या लाऽटसाहब हैं? उनकी कोई जिम्मेदारी ही नहीं है? थोडा अपने हाथ-पाँव, कभी आप भी हिलाया-डुलाया कीजिये। ये क्या कि बस्स् दफ्तर से आये, जम गये टी.वी. के सामने…‘चाय लाओ-पानी लाओ, साथ में कुछ मीठा-नमकीन भी ले आओ’…फरमाइशें तो ऐसे करेंगे…जैसे बड़के नवाब हैं…कहीं के? और घर में बिस्कुट-मिठाई-नमकीन का भण्डार रखे हों? कुछ पता भी है आपको, नमकीन-बिस्कुट हफ्ते-भर से खत्म हैं? जहां कहीं भी छुपाती हूँ इन जासूसों के मारे, फौरन खोज निकालते हैं। मीठा-नमकीन घर में कुछ भी तो नहीं छोड़ते ये बच्चे। आलमारी, रैक, दराज, फ्रिज में, कहीं भी छुपाऊं, पा जाते हैं। कोने-अंतरे…छिपाते-छिपाते तो जी हलकान हो गया है मेरा। घर में बिस्कुट-नमकीन रखने की सभी जगहें तो जानते हैं ये।’’

‘‘अरे भई तुम भी जब देखो तब, लेक्चर झाड़ती रहती हो।’’

‘‘लेक्चर नहीं, सच्चाई कह रही हूं। मैं मरूँ या जीऊँ …आपको इससे क्या? आपको मेरी तबियत से कुछ लेना-देना तो है नहीं। पर कहे देती हूँ …इस उमर में कोई और नहीं मिलने वाली। उ का कहते है…सीने पर मूंग दलने के लिए? आपका-मेरा, सात जनमों का हिसाब-किताब है। किसी मुगालते में भी मत रहियेगा, पीछा नहीं छोड़ने वाली। अरे मैं भी तो आप सब की ही तरह हाड़-मांस की बनी इन्सान हूॅं। कोई मशीन नहीं जो बिना रूके, थके, चलती-घिसती ही जाऊं ? मुझे भी तो आराम की जरूरत होती है कि नहीं? आखिर…मेरा भी तो मन करता है, कहीं घूमने-फिरने का? बार-बार कहा कि तिहवार आने वाले हैं, पर-छत्ती पर ढ़ेरों पुराने मैंगजीन्स, रद्दी अखबार भरे पड़े हैं, उन्हें छांट-बीन कर किसी कबाड़ी वाले को बेच दीजिए। सौ-दो-सौ जो भी मिले। बिस्तुइया अउर मकड़ी का घर तो नहीं रहेगा। पंखे गन्दे हो गये हैं। सभी कमरों के कोने-अंतरे, छत के टांड़ आदि जाले से भर गये हैं। मेरे हाथ वहां तक नहीं पहुंचते, उनकी साफ-सफाई ही कर डालिए। लेकिन मेरी बात पर कान देने की जरूरत ही नहीं समझते?’’

‘‘अच्छा, मेरा तौलिया कहां है?’’

‘‘ये लीजिए। आपका क्या? दफ्तर से आये, पैण्ट-शर्ट उतारा। खूंटी पर टांगने के बजाय, इधर-उधर बिस्तर या सोफे पर कहीं भी फेंका। तौलिया लपेटा, अउर पसर गये चौड़े से टी.वी. के सामने, लिये पलेट भर पास्ता-पकौड़ी, पानी, चाय, चिप्स। लगे भकोसने भका-भक्क्…दोनों हाथों से। जैसे पहाड़ ढकेल कर चले आ रहे हों? कब के भुखाये-धंधाए-पियासे हों? फिर हाथ में रिमोट लिए, दना-दन लगेंगे बदलने, चैनल-दर-चैनल, जैसे कुल प्रोग्राम आज ही देख लेंगे। फिर कभी मौका नहीं मिलेगा।’’

‘‘मेरी चप्पलें कहां हैं?’’

‘‘ये रहीं। कितनी बार कहा होगा, दफ्तर से आने पर, घर में घुसने से पहले, बाहर दरवज्जे पर रखे ‘शू-रैक’ में ही जूते उतारकर रखिये। बैग, पर्स, गाड़ी की चाभी, मोबाइल, प्राॅपर जगह पर रखिये। पैण्ट-शर्ट इधर-उधर फेंकने के बजाय खूंटी पर ही टांगिए। हाथ-मुंह धोकर, आलमारी में धुला रखा कुर्ता-पायजामा पहनिए। फिर बढिया से बैठिये टी.वी. के सामने…भले-आदमी की तरह। लगे जैसे सच्ची में कोई ‘क्लाॅस-वन-अफसर’ बैठा है। और ई, टी.वी. की आवाज तनिक धीमें भी तो कर सकते हैं? खुद्दै सुन रहे हैं कि पड़ोसियों को भी सुना रहे हैं? कुछ पता भी है, कल से बच्चों के इग्जाम हैं। वो दूसरे कमरे में बैठे पढ़ रहे हैं। अपनी जिम्मेंदारियों का कुछ एहसास-वेहसास है भी कि नहीं? ठीक से सुनाई नहीं देता तो सुनने वाली मशीनियां काहे नहीं खरीद लेते?’’

‘‘अब, रिमोट कहांॅ गुम हो गया?’’

‘‘ये रहा, तकिये के नीचे। समझाया कितने दिनों से कितनी ही बार, पर सब बेकार। एक कान से सुनते हैं तो दूसरी से निकाल देते हैं। अऽरे, अच्छी आदत सीखिये, अैर बच्चों को भी सिखाइये। चिरकुटाही तऽ जइसे जायेगी ही नहीं कभी। एक भी ढंग की आदत नहीं सीखी है। पता नहीं आपके मां-बाप ने क्या सिखाया-पढ़ाया है? लड़की बड़ी हो रही है, इसका जरा भी एहसास नहीं। जब देखो तब फटी बनियाइन पर तौलिया लपेटे, नंग-धड़ंग से लेटे रहेंगे। कभी बिस्तर पर, तो कभी सोफे पर। ऊंघते-जगते, मोबाइल पर बतियाते। कोई मन-पसन्द कार्यक्रम न आ रहा हो तब भी। टी. वी. में बस्स चैनल ही तो बदलते रहते है, धाँय ये, तो धाँय वो? आपके चक्कर में तो मैं भी अपना ‘फेवरेट-सीरियल’ नहीं देख पाती।’’

‘‘बहुत आलस लग रहा है। आज कहीं जाने का मन नहीं कर रहा।’’

‘‘ज्यादा बकवास मत बतियाइये। अब उठिये, जल्दी बिस्तर छोड़िये। आप कब तैयार होंगे। अभी तो हाथ-मुंह भी नहीं धोए हैं? कब तक यूं कूड़े की तरह बिस्तर पर फैलाये रहेंगे अपने कपडे़-लत्ते। अउर ई जो फटी एंड़ियां हैं, नहाते समय जरा इन पर भी हाथ लगा लिया कीजिए। खींसे मत निपोरिये। हटिये, जाइये यहाँ से, झट-पट तैयार होइये। अभी तो आपको कपडे-सपडे बदलना है। टाई-वाई भी लगायेंगे। चैतरफे, कुछ सेण्ट-वेण्ट भी छिड़केंगे। अरे हां…अपने जूते-ऊते भी पाॅलिश कर लीजियेगा। पंद्रहियन हो गये हैं पाॅलिश किए। ऊपर से नीचे तक लक्-दक् रहेंगे, तभी न पाॅर्टी में इम्प्रेशन जमेगा?’’

‘‘बच्चे कहां हैं, क्या वो तैयार नहीं होंगे?’’

‘‘बताया तो। दूसरे कमरे में हैं। टी. वी. का वाॅल्यूम इतना तेज रखेंगे तो सुनाई देगा भला? अब बन्द भी करिये ये टी.वी.। भागा नहीं जा रहा मैच-हाईलाइट्स? लौट कर देख लीजियेगा। आपकी देखा-देखी तऽ बच्चे भी दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं। अउर हइ जो निमनकाऽ राजा बेटा है आपका, बहुतैऽ चण्ट हो गया है। मेरी एक भी बात नहीं मानता। एक कान से सुनेगा तऽ दूसरे से निकाल देगा। बिलकुल आपके खानदान पर गया है। आजकल, ये भी पता नहीं क्या-क्या गाता फिरता है? कभी…‘बत्तमीज दिल बत्तमीज’….तो कभी…‘इश्क कमीना’ आप कुछ कहते-रोकते-टोकते क्यों नहीं इसे? अरे मैं क्या इनकी दुश्मन हूँ ? ज्यादा प्यार-दुलार जताना, लप्पों-चप्पों बतियाना, ठीक नहीं होता। इस उम्र में थोडी सख्ती, थोड़ी डाॅट-फटकार, बहुत जरूरी होता है। ऐसा लगता है जैसे, बच्चे एक उम्र के बाद माॅं की नहीं सिर्फ बाप की ही सुनते हैं, और कुछ समय बाद तो ये डर भी खत्म हो जाता है।’’

‘‘अब यही तो उम्र है उनकी, खेलने-कूदने, कुछ बनने की?’’

‘‘आप को तो जो बनना था, बन चुके। जो तीर-तुक्का मारना था अपनी नियति पर, वो मार चुके? कम-अज-कम अब इन बच्चों पर भी ध्यान दीजिये। थोड़ा इनके कैरियर की भी सोचिये। बाथरूम जाने के समय को छोड़कर, रातों-दिन मोबाइल से चिपके रहते हैं। कभी-कभी तो आपकी देखा-देखी ये दोनों भी या तो कमोड पर ही बैठे-बैठे नाॅवेल पढ़ेंगे या मोबाइल पर बतियाते रहेंगे। लड़की स्कूल से आकर, टी.वी के सामने जम जायेगी। तो लड़का, कम्प्यूटर पर अपना मार-धाड़ वाला गेम खेलने में जुट जायेगा। अगर बच्चे कुछ ढंग का नहीं कर पाये तो लोग यही कहेंगे न!…‘कैसे मां-बाप हैं, जिन्हें जरा भी खयाल नहीं अपने बच्चों के कैरियर का?’ तब आप भी हमीं को दोषी ठहरायेंगे। बहत्तर ठो मीन-मेख बतियायेंगे। उहै निहाद है…जउन गाहे-बगाहे हमारे सुकुल महराज जी कहते हैं…‘कुछ बन गये तो बाप की मेहनत, साधना, अच्छे कर्मों का फल। अउर इसके विपरीत स्थिति हुई तो सारा क्रेडिट महतारी के खाते में।’…आप तो लगता है जैसे खुदै दिन-ब-दिन बच्चे होते जा रहे हैं। कुछ एहसास ही नहीं आपको, अपनी जिम्मेदारियों का? हरदम मगन रहते हैं पता नहीं किस दुनिया-जहान में? पता नहीं क्या-क्या गाते-गुनगुनाते रहते है? कभी…‘लागल झुलनी के धक्का’…तो कभी…‘जिया के जंजाल भइल तोहरी सुरतिया’, …कभी…‘रेलिया बैरन’…और आजकल तो पता नहीं का धुन सवार हुआ है। गाने लगे हैं…‘कउन फूल फूले पनियाॅ हो, कउन फूले आसमान हो’…।’’

‘‘समझ-समझ का फेर है।’’

‘‘दांत मत चियारिये। आप केतना समझदार हैं, हम्में मत समझाइये? बच्चों को तो चलो एक बार समझाया भी जा सकता है। पर आप तो उनसे भी बढ़ कर हो गये हैं। आखिर…आपके ही तो लच्छन दिखेंगे न, इनमें भी? अरे ई का…अभी तक आप उठे ही नहीं? ‘कहते जा…बहते जा’…? अच्छा अब जल्दी से उठिये। और बिना एक भी पल गंवाये, फौरन से तैयार हो जाइये। क्या केक कट जायेगा तब पहुंचेंगे हम-सब-जन पार्टी में? मैंने दरवाजा, खिड़की, पंखा, बत्ती, गैस…सब चेक कर लिया है। नौ यहीं बज गये हैं…कब पहुचेंगे पार्टी में? और फिर रास्ते में ट्रैफिक-जाम के तमामों झाम तो आम हैं हीं।’’

‘‘जबरदस्ती का खर्चा है। ई पाॅर्टी-वाॅर्टी भी मुसीबते ही होता हैं।’’

‘‘हां-हां! आप सब तो खा-पीकर लौट आयेंगे। घुस जायेंगे अपने-अपने बिस्तरों में। मुसीबत तो मेरी है। मुझे तो, अभी सुबह की तैयारी भी करनी होगी। बच्चों के गीले यूनिफाॅर्म सूखने के लिए अलगनी पर डाला है। लौट कर उन पर इस्तरी भी करना होगा। सुबह की भागम-भाग में मौंका ही कहां मिलता है? आप भी तो हमारी कुछ मदद नहीं कराते। कम-अज-कम बच्चों के जूतों में पाॅलिश ही कर दिया कीजिए? कहां तो मदद कराने की बात कहूँ, सुबह नहा-धोकर बाथरूम में अपना अण्डरवियर-बण्डी तक गीला छोड़ देते हैं। आज दोपहर बाथरूम में पैर फिसलते-फिसलते बची। दुनिया सुधर जायेगी, पर आऽप नहीं सुधरने वाले। अरे…? हद्द है भाई! अभी भी जमे हैं? लाइये, रिमोट मुझे दीजिये, क्या सारा समय टी.वी. ही देखते रहेंगे, या निकलेंगे भी?’’

‘‘बस्स, ये आखिर ओवर की आखिरी गेंद है।’’

‘‘जरा घड़ी की तरफ तो देखिये? मिसेज शर्मा ने तो साढ़े आठे बजे का टाइम दिया था। हम पहले ही काफी लेट हो चुके हैं। कहीं और भी देर न हो जाये? मैं बस्स यूं गयी…यूॅं आयी, हाथ-मुंह धोकर, कपड़े-सपड़े चेन्ज करके। मुझे बाथरूम में ज्यादा समय नहीं लगेगा। पर बाथरूम से मेरे बाहर आते ही…सभी लोग एकदम रेडी मिलने चाहिये। और…दिखें भी एकदम लक्-दक्…कहे देती हूँ, हां। समझे कि नहीं…?’’

कहानीकार – राम नगीना मौर्य , 5/348, विराज खण्ड, गोमती नगर, लखनऊ- 226010, उत्तर प्रदेश, मोबाइल – 9450648701 , ईमेल – ramnaginamaurya2011@gmail.com

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