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टूटे पंखों से परवाज़ तक: आत्मीयता की अंतहीन तलाश- सर्वेश कुमार मौर्य

भारत में हिंदी साहित्य के विकास क्रम को देखें तो पता चलता है कि 19वीं शताब्दी से पहले साहित्य का विषय सिर्फ ईश्वर, राजा, सामंत और अमीर थे. 1857 के ग़दर में जब पहली बार आमजन की साम्राज्यवाद के खिलाफ गोलबंदी हुई तब साहित्य में उसका प्रतिफलन उभरते हुए मध्यवर्ग और आमजन के रूप में हुआ. आगे हम देखते हैं; जैसे-जैसे मध्यवर्ग का विस्तार होता गया; विस्तारित मध्यवर्ग के सवाल साहित्य का विषय बनते गए. आजादी के आंदोलन के दौरान साहित्य में सच्चे जनतंत्र की तलाश शुरु हुई. सामान्य मनुष्यों के जन-जीवन; उनके दुख-दर्द ख़ुशी और आकांक्षाओं, उम्मीदों का चित्रण साहित्य में होने लगा. यह साहित्य का जनतंत्रीकरण था जिसकी प्रक्रिया तब से अब तक लगातार चल रही है. आज हम देख रहे हैं कि साहित्य में किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी, स्त्रियाँ, थर्ड जेंडर, अल्पसंख्यक आदि हाशिए के लोगों की आवाजें निरंतर प्रखर होती जा रही हैं; उनके सवाल अब साहित्य के प्रमुख सवाल बन रहे हैं. इसी क्रम में डिफरेंटली एबल्ड (इतर सक्षम) लोगों का साहित्य भी अब हमारे सामने आ रहा है. इसने साहित्यिक क्षितिज को और विस्तृत कर दिया है.

अगर साहित्य में डिफरेंटली एबल्ड लोगों की उपस्थिति की बात करें तो हमारे सामने मध्यकालीन डिफरेंटली एबल्ड कवि सूरदास और उनका काव्य हैं. लेकिन सूरदास अपने काव्य में अपने बारे में न के बराबर बोलते हैं. उनकी दुनिया उनके आराध्य कृष्ण के इर्द-गिर्द ही है. आगे चलकर जब आजादी के आंदोलन के दौरान साहित्य में सामान्य लोगों का प्रवेश हुआ तो हाशिये के लोगों के साथ डिफरेंटली एबल्ड लोगों के जीवन व आशाओं-आकांक्षाओं का चित्रण भी होने लगा. उस दौर के दो बड़े साहित्यकारों महादेवी वर्माप्रेमचंद ने डिफरेंटली एबल्ड लोगों के जीवन और उनकी आकांक्षाओं को वाणी दी. प्रेमचंद का ‘सूरदास’ और महादेवी की ‘गुंगिया’ ऐसे ही डिफरेंटली एबल्ड चरित्र हैं. दोनों रचनाकारों की रचनाओं में हमें डिफरेंटली एबल्ड लोगों के जीवन संघर्ष देखने को मिलते हैं. लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रेमचंद ने सूरदास के चरित्र को किंचित अतिरंजित और महानता के आवरण में रचा है. बेचारा सूरदास दिव्यता और महानता के आवरण में दब सा गया है. उसके अपने मन में क्या चल रहा है; वह क्या महसूसता है; इसके बारे में बहुत ज्यादा पता नहीं चल पाता. यह ज़रूर है कि महादेवी की गुंगिया में हमें ऐसी उपेक्षित स्त्री का साक्षात्कार होता है जिसके दुख का कोई ओर छोर-नहीं. यहाँ जिस संवेदनशीलता और मार्मिकता का परिचय महादेवी ने दिया वह अभूतपूर्व है. इस मायने में महादेवी की दृष्टि और संवेदना की प्रशंसा की जानी चाहिए. यह महादेवी की स्त्री दृष्टी और आत्मीयता है जो यहं भास्वर है. हालाँकि गरीबी और जातिवाद जो डिफरेंटली एबल्ड लोगों की दुनिया को बद से बदतर बना देते हैं उनका साक्षात् हमें महादेवी के यहाँ नहीं होता है; फिर भी साहित्यिक अंतर्वस्तु के मामले में यह एक बड़ा रैडिकल उछाल था.

दो बड़े साहित्यकारों महादेवी वर्मा व प्रेमचंद ने डिफरेंटली एबल्ड लोगों के जीवन और उनकी आकांक्षाओं को वाणी दी. प्रेमचंद का ‘सूरदास’ और महादेवी की ‘गुंगिया’ ऐसे ही डिफरेंटली एबल्ड चरित्र हैं. दोनों रचनाकारों की रचनाओं में हमें डिफरेंटली एबल्ड लोगों के जीवन संघर्ष देखने को मिलते हैं.

इसके बाद बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में जब दलित और स्त्री साहित्य विमर्श की साहित्य में दस्तक हुई तो साहित्य के जनतंत्रीकरण की प्रक्रिया में एक और बड़ा उछाल आया. प्रो. तुलसीराम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ ने दलित और डिफरेंटली एबल्ड दोनों सवालों को संजीदगी से उठाया. लेकिन इसका स्त्री पक्ष पर क्या प्रभाव पड़ता है; वह हमारे सामने नहीं आया था. दलित, स्त्री और डिफरेंटली एबल्ड तीनों सवालों को पहली बार हिंदी साहित्य में लाने का महत्वपूर्ण काम डॉ सुमित्रा महरोल ने अपनी आत्मकथा- ‘टूटे पंखों से परवाज तक’ से किया है. एक ओर इससे दलित साहित्य का विस्तार हुआ है तो दूसरी ओर हिंदी साहित्य का जनतंत्रीकरण. इस आत्मकथा को इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए. इन तीनों सन्दर्भों की बारीकी समझते हुए; उनकी शिनाख्त करते हुए अपनी आत्मकथा की भूमिका में सुमित्रा जी लिखती हैं- “स्त्री, दलित व शारीरिक विकलांग इन तीनों दशाओं को मैंने एक साथ झेला है. दलित और स्त्री होने की वजह से विषमतामूलक स्थिति में पड़े रहने के कारणों का विश्लेषण कर समाज व व्यवस्था को उत्तरदाई ठहराया जा सकता है; पर विकलांगता के लिए किसे कटघरे में खड़ा किया जाए- नियति को; प्रकृति को या हालात को. बहुत मुश्किल होता है अपनी अपूर्णता के साथ जीना. अपनी जिजीविषा से आप विकलांगता पर विजय प्राप्त भी कर लें पर समाज कभी आपको समानता का दर्जा नहीं देगा. कदम-कदम पर आइना दिखाकर कहता रहेगा कि आप अपूर्ण हैं; उनके समान नहीं.” (सुमित्रा महरोल, टूटे पंखों से परवाज़ तक, द मार्जिनलाईज्ड पब्लिकेशन, प्रथम संस्करण-2021, भूमिका से) ऊपरी तौर पर यह अपूर्णता भले ही बायोलॉजिकल लगती है लेकिन जो उपेक्षा, आपमान व तिरस्कार सामाजिक जीवन में ऐसे व्यक्ति को झेलना होता है; उसकी बुनावट ‘सांस्कृतिक’ ही है; जैसे जाति, जेंडर आदि के अन्य भेदभाव.

सुमित्रा महरौल की आत्मकथा, लोकमंच पत्रिका

सुमित्रा जी की यह आत्मकथा कई गंभीर सवालों को हमारे सामने रखती है. यहां पितृसत्ता, जातिसत्ता और विकलांगता से उपजी जीवन स्थितियां हैं; उपेक्षा, अपमान व तिरस्कार है जिनके चलते जीवन के सामान्य कष्ट भी और बढ़ गए हैं. सुमित्रा जी लिखती हैं- “आज पीछे मुड़कर अतीत में झांकती हूँ तो पाती हूँ आत्मविभोर कर देने वाले पल, भीतर तक तृप्त कर देने वाली अनुभूतियां, आत्मविस्मृत कर देने वाले क्षण; बहुत कम ही आए जीवन में.” (पृष्ठ-119) इस आत्मकथा में शहरी परिवेश में आजादी के बाद के भारत में एक दलित विकलांग स्त्री का जीवन संघर्ष देखने को मिलता है. सातवें दशक के बाद उत्तर भारत में जो उभार दलित चेतना के रूप में देखने को मिला; (देखें ‘सूरजपाल चौहान: कच्चे अनुभव नहीं पकी हुई समझ के रचनाकार’ समकालीन जनमत वेब पोर्टल ) उसकी छाया सुमित्रा जी के यहां भी देखने को मिलती है. उनके पिता पश्चिमी उत्तर प्रदेश से दिल्ली आते हैं; ग्रामीण परिवेश त्यागकर शहरी परिवेश में पहुंचते हैं और सरकारी नौकरी करते हैं. इसके चलते जो सांस्कृतिक बदलाव उनके जीवन में हो रहे हैं; उसका असर हमें आगे चलकर सुमित्रा जी के जीवन में भी देखने को मिलता है.

इस आत्मकथा में शहरी परिवेश में आजादी के बाद के भारत में एक दलित विकलांग स्त्री का जीवन संघर्ष देखने को मिलता है. सातवें दशक के बाद उत्तर भारत में जो उभार दलित चेतना के रूप में देखने को मिला; उसकी छाया सुमित्रा जी के यहां भी देखने को मिलती है.

सुमित्रा जी की यह आत्मकथा पितृसत्ता, जातिसत्ता और विकलांगता के बारे में कई जाने-अनजाने सत्य हमारे सामने रखती है. कई जगह पिता, भाई, पति और अन्य पुरुषों के स्त्रियों के प्रति पितृसत्तात्मक, असंवेदनशील रवैये का जिक्र आत्मकथा में आया है- पिता के असंवेदनशील रवैये के बारे में वे लिखती हैं, पिता को बच्चों को दुलारने-पुचकारने या संभालने से कोई सरोकार न था. उनके अनुसार घर गृहस्थी और बच्चे संभालना औरतों का काम था. बच्चों को संभालने, गोद-वोद में लेने से उनके पुरुषोचित अहम् को ठेस लगती थी, उनकी कोमल भावनाओं का प्रदर्शन तो होता था मगर वह पुरुषोचित कठोरता के आवरण में तनिक-सी भी दरार बर्दाश्त नहीं कर सकते थे’. इसके लिए वे परंपरा को जिम्मेदार ठहराते हुए कहती हैं, ‘परंपरा का आग्रह इतना प्रबल था कि अबोध बच्चे के करुण क्रंदन भी उन्हें पिघला नहीं पाते थे.’ (पृष्ठ-12)

सुमित्रा महरौल, लोकमंच पत्रिका
सुमित्रा महरौल, लोकमंच पत्रिका

पितृसत्ता के एक अन्य रूप का साक्षात् उनके भाई की हरकतों में होता है जो जाने-अनजाने वह सब करता है जिसे उसे नहीं करना चाहिए और माँ उसका ‘मौन समर्थन’ करती दिखतीं हैं. वे लिखती हैं- “चिढ़ाना, दूसरों का मजाक उड़ाना, हर काम में नुक्ताचीनी करना मेरे एक भाई की आदत में शुमार था. वह मुझ पर कन्या-सुलभ पाबंदियां भी लगाता था- यहां नहीं जाना, इससे नहीं बोलना, बाल ऐसे नहीं बनाना, अच्छे फैशन के कपड़े पहनना तो दूर उनकी चाह भी मन में न लाना आदि उसकी रोज की पाबंदियों में शामिल थीं. माँ उसका विरोध करने के बजाए मौन समर्थन करतीं” (पृष्ठ-38)

कई जगह तनिक संकोच के साथ; वे पिता, भाई और पति के पितृसत्तात्मक व्यवहार पर बोलती दिखती हैं. उनके अनुसार उनके पति के पास ‘न नेत्रों में छलछलाता प्यार था; न रस में पगे मन की वीणा को झंकृत कर देने वाले मधुर शब्द; न बाँहों के घेरे; न स्फुरित कर देने वाले प्रेमाकुल स्पर्श’ फिर भी वे स्टेटमेंट जारी करती हैं कि उनके पति “बिलकुल भी पुरुषवादी और अहंवादी नहीं हैं”(पृष्ठ-149) जबकि आत्मकथा के कई प्रसंगों में वे उनके व्यवहार पर क्षुब्ध और तल्ख टिप्पणियां करती हैं. उदाहरण के लिए देखें; वे लिखतीं हैं, नैनीताल के स्वच्छंद परिवेश में दिल्ली जैसे शहर में पली-बढ़ी उच्च शिक्षिता आधुनिका पत्नी के साथ वह ग्रामीण पति के समान पेश आते थे. कुछ-कुछ अजनबियों जैसा व्यवहार करते. निराश होने के बाद भी इसे मैं उनका स्वभाव मान नजरअंदाज कर देने की कोशिश करती (पृष्ठ-87) और एक अन्य प्रसंग में यह भी कि “इनकी एक आदत आज भी मुझे बहुत उदास कर देती है; वह है मेरे दुख और मानसिक परेशानी वाले क्षणों में इनका मुझे अकेला छोड़ देना. जीवन में बहुत बार ऐसे पल आते हैं जब किसी को किसी के स्नेहिल स्पर्श और सांत्वना की बहुत जरूरत होती है और ऐसे में इंसान अपनों से ही हमदर्दी की अपेक्षा रखता है. पर मुझे बहुत गंभीर और उदास पा, कारण पूछने के बजाए ये या तो घर से बाहर चले जाएंगे या खुद को घर में ही कहीं व्यस्त कर लेंगे. बहुत बार ऐसा हुआ है कि इनके बगल में लेटी मैं निशब्द आंसू बहा रही होती हूं और ये सब कुछ जानते-बूझते हुए भी अनजानों की तरह करवट दूसरी और करके सो जाते हैं; तब खुद से बहुत दूर पाती हूं इनको मैं.” (पृष्ठ-151)

लोकमंच पत्रिका, संपादक, डॉ अरुण कुमार
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एक तरफ ये स्टेटमेंट है; वे ‘बिलकुल भी पुरुषवादी और अहंवादी नहीं हैं’ दूसरी तरफ उनके तल्ख़ तिक्त अनुभव; इन दोनों की अंतर्विरोधी उपस्थिति को किसी भी कीमत पर परिवार बनाये बचाए रखने की युक्ति और अपने गम को व्यक्त करने की अदम्य इच्छा के रूप में देखा जा सकता है. सुमित्रा जी पितृसत्तात्मक व्यवहार के लिए ज्यादातर बार अपने पारिवारिक आत्मीय पुरुषों को जिम्मेदार नहीं ठहरातीं बल्कि इसका कारण ‘परंपरा का आग्रह’ (पिता के संदर्भ में पृष्ठ-12) ‘ग्रामीण पितृसत्तात्मक परिवेश’ (पति के संदर्भ में पृष्ठ-81) बतातीं हैं. ऐसा लगता है ये पुरुष ‘परंपरा’ और ‘परिवेश’ के पुतले भर हैं. उनके पितृसत्तात्मक व्यवहार में उनका कोई रोल ही नहीं. आत्मकथा में इस संदर्भ में एक किस्म का डाइल्यूसन मिलता है; मध्यमार्ग दिखता है. आत्मकथा पढ़कर यही निष्कर्ष निकलता है कि दलित पितृसत्ता के खिलाफ जिस कड़ाई से बोला जाना चाहिए संभवतः वह यहां नहीं है.

यह ही नोट करने वाली बात है कि सुमित्रा जी की आत्मकथा में गरीबी के संदर्भ न के बराबर हैं. उनका परिवार अन्य दलित परिवारों की तरह अंतहीन आर्थिक तंगी से जूझता नहीं दिखता. आरंभ के दिनों में एक प्रसंग में ही आर्थिक प्रश्न आया है जहाँ वे लिखतीं हैं- “मेरे पिता डेसू में क्लर्क थे; आमदनी कुछ खास न थी. (पृष्ठ-18) ‘बेहतर प्रदर्शन न कर पाने’ व ‘आर्थिक स्थितियों’ के चलते उन्हें चौथी क्लास के बाद सरकारी स्कूल में पढ़ना पड़ा. बस यही एक प्रसंग है लेकिन जाति की पीड़ा के सुमित्रा जी की आत्मकथा में कई प्रसंग आते हैं. यह सही है कि ये प्रसंग शहरी दलित जीवन के हैं; जहाँ जाति का बर्ताव गाँव की तरह नहीं है. लेकिन शहर में वह और महीन हो गया है. इसके बारे में लिखते हुए सुमित्रा जी कहती हैं- “शहरी परिवेश में दलित उत्पीड़न का स्वरूप वाह्य न होकर आंतरिक है; प्रत्यक्षत: दिखाई नहीं पड़ता. शहर के तथाकथित शिक्षित सवर्ण जानते हैं कि जातिगत आक्षेप उन्हें मुसीबत में डाल सकते हैं; क्योंकि कानूनन जातिगत भेदभाव अपराध है; सो प्रकटत: कुछ भी करने से वह बचते हैं पर दलित के लिए सोच उनकी अभी भी पूर्ववत ही है. शिक्षित, नौकरीशुदा, अच्छी सोच-समझ रखने वाले दलित को भी वह अपने पूर्वाग्रहों के कारण अपने समान नहीं समझते; उनसे घनिष्ठ संबंध स्थापित नहीं करना चाहते” (पृष्ठ-99)

सुमित्रा जी अपनी सामाजिक अस्वीकृति के दो बड़े कारण बतातीं हैं- “एक मेरा पैरों से विकलांग होना और इससे भी बहुत बड़ा मेरा दलित कही जाने वाली जाति से संबंधित होना. इन वजहों से सब मुझसे बस औपचारिक संबंध ही रखते हैं. घनिष्ठ आत्मीय संबंध किसी से भी कभी बन ही नहीं पाए. (पृष्ठ-100) कितना भयावह है कि जातिभेद दलित बच्चों को अबोध बचपन से ही अपनी उपेक्षा का  शिकार बनाता रहा है. जब जीवन में कोमलता की ज़रूरत होती है; कठोरता की नहीं. जब हम यह तर्क गढ़ते हैं कि जाति, साम्प्रदायिकता आदि बच्चों को आरम्भ से नहीं पढ़ाये जाने चाहिए तो हमें ध्यान रखना चाहिए कि दलित बचपन जाति की छाया में आरंभ से ही कुंठित होता रहा है. ऐसे में उसकी समझ यदि पाठ्यक्रमों के माध्यम से दी जाय तो बच्चे ज्यादा मानवीय बन सकते हैं. इस संदर्भ में सही गलत का बोध देना बेहद जरूरी है. छठी कक्षा से ही मित्र रही सुशीला के भाई के विवाह के अवसर पर मिली उपेक्षा बच्ची सुमित्रा के मन में गहरे बैठ जाती है. सामाजिक उत्सवों में दूरी उन्हें खलती है. वे लिखती हैं- “असल में मेरा साधारण रूप-रंग, कद-काठी, वस्त्र-आभूषण मेरे दलित होने की चुगली कर देते थे; इस कारण मेरा परिचय अपने रिश्तेदारों से करवाने में उसे झिझक हो रही थी. स्कूल में तो वह मुझे स्वीकार कर लेती थी पर मेरे दलित होने के कारण सामाजिक उत्सव में मुझसे दूरी साथ लेती थी” (पृष्ठ-40)

इसी तरह बचपन का एक और प्रसंग वह बताती हैं- “ऐसे ही बचपन में खेलते-खेलते हम पास के एक मंदिर में आरती के वक्त चले जाते थे. मंदिर का घंटा काफी ऊंचा था. मंदिर के संचालक अन्य बच्चों को तो गोद में उठाकर उनसे घंटा बजवा दिया करते थे पर ना जाने क्यों मेरी उपस्थिति से अनजान बने रहने का नाटक करते. मुझे गोद में उठाकर कभी भी उन्होंने घंटा नहीं बजवाया. (पृष्ठ-41) दलित होने के चलते पड़ोस में आयी बहू की मुँह दिखाई करने और सगुन देने गयी अपनी मां से होने वाले भेदभाव को भी वे तीखेपन के साथ याद करती हैं- “जब मेरी मां को छोड़ वहां उपस्थित अन्य सभी स्त्रियों के चरण बहू ने स्पर्श कर लिए. तब शुभाशीष देती मेरी मां हक्की-बक्की रह गई थीं” (पृष्ठ-66) एक दूसरे प्रसंग में वह अपने पिता से होने वाले भेदभाव के बारे में बताती हैं. उन्हीं के दफ्तर का एक कर्मचारी उनसे घर मिलने आता था लेकिन घर की चाय नहीं पिया करता था. वे लिखतीं हैं- “इतना धूर्त था वह. ऐसी दोगली थी उसकी नीति. दलित का ज्ञान और बुद्धि तो स्वीकार थी उसे; पर आदर और स्नेह से पेश की गई चाय नहीं.” (पृष्ठ-64) यही नहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के श्यामलाल कॉलेज (सांध्य) में; जहाँ वे अध्यापन करतीं हैं; जहाँ पढ़े-लिखे समझदार लोग पाए जाते हैं; जिनसे हम मानवीयता की ज्यादा उम्मीद कर सकते हैं; वहां भी उन्हें बेहद महीन जातिगत उपेक्षा का सामना करना पड़ता रहा है. वे लिखतीं हैं- “यह देख मैं संकुचित हो जाती; यह जानते हुए भी कि विकलांग और वह भी दलित को मुख्यधारा के लोग आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे मेरा मन बुझ जाता… मेरे मन की तहों में यह आशा की उच्च शिक्षित लोगों के विचार और भावनाएं परिष्कृत हो चुकी होंगी; वे विस्तृत धरातल पर सोचते होंगे; पर कोई कितना भी शिक्षित हो जाए; समाज की सोच से स्वयं को मुक्त कर पाना इतना सरल नहीं. (पृष्ठ-105) इसीलिए सुमित्रा जी कहती हैं- “कुछ भी नहीं थी उनकी दृष्टी में मैं; दीन-हीन दया की पात्र के अलावा; और अपनी इस मनोवृत्ति के संकेत भी अपने क्रिया-कलापों से बहुत बार उन्होंने दिए. दलितों के प्रति शहरी शिक्षित वर्ग के छलपूर्ण व्यवहार की अपेक्षा; गांव में; जो दलितों से घृणा करते हैं; उनका उत्पीड़न करते हैं- ऐसे लोगों को चिन्हित करना; उनका विरोध करना आसान है. ग्रामीण शोषक ‘मुंह में राम बगल में छुरी’ वाली नीति नहीं अपनाते; पर शहरी सवर्ण समाज दोगली नीति अपनाता है. उसके मन में दलितों के प्रति जहर भरा हुआ होगा; पर वो इस जहर का कभी खुलासा नहीं होने देंगे. भरसक अपनी सोच को छुपाने का यत्न करेंगे; पर अवसर आने पर दलित व्यक्ति की प्रगति में रोड़े अटकाने में कोई कोर-कसर भी बाकी नहीं छोड़ेंगे… दलितों के लिए अवसरों की अनुपलब्धता, रिकॉग्निशन का अभाव, समूह से बाहर करना यह उनके तरकश के कुछ अनदेखे तीर है.” (पृष्ठ-129) इस तरह देखा जा सकता है कि स्कूल, समाज कार्यस्थल सभी जगहों पर जातिगत उपेक्षा घिन्नाती मिलती है.

‘पितृसत्ता’ और ‘जातिवाद’ के अलावा ‘विकलांगता’ को लेकर पारिवारिक और सामाजिक असंवेदनशीलता के कई मार्मिक प्रसंग उनकी आत्मकथा में आये हैं. सुमित्रा जी कहती हैं, “विकलांग बालक की विशिष्ट आवश्यकताओं, उसके मन के भीतर चलने वाले झंझावातों को समझने का उन्होंने (माता-पिता) कभी प्रयास नहीं किया; उनकी इस सोच के चलते हर विषम परिस्थिति से मुझे अकेले ही जूझना पड़ता; अकेले ही अपनी राह चुननी व संवारनी पड़ती. प्रोत्साहन व सराहना के दो बोल उनके मुख से सुनने के लिए मेरे कान तरस जाते पर उनके लिए इन सब चीजों का कोई मोल ना था” (पृष्ठ-37) सुमित्रा जी ने अपने जीवन में विकलांगताजनित घटित उपेक्षा के तीन मार्मिक प्रसंग लिखे हैं- बचपन में फिल्म देखने जाने का प्रसंग, डांस का प्रसंग और पिकनिक का प्रसंग. इन प्रसंगों को पढ़ने के बाद पाठक के मन में सदियों से जमीं हुई पूर्वाग्रह की बर्फ पिघलने लगती है. एक अबोध स्पेशल बच्ची क्या महसूसती है हमें इन प्रसंगों से इसका पता चलता है.

पहला मार्मिक प्रसंग हैं फिल्म देखने जाने का. बच्ची सुमित्रा के पूछने पर पता चलता है कि माता-पिता भाई को साथ ले फिल्म देखने जा रहे हैं. वह भी साथ जाने के लिए मचलने लगी. लेकिन उसके आग्रह पर कान दिए बगैर मां तैयार होती रहीं. बच्ची ने पाया कि मां उसकी ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रही थीं और तैयार होने का समय निकला जा रहा था तो उसने उनसे आग्रह करना छोड़ मुंह धो, बालों में कंघी कर, नया फ्रॉक पहन स्वयं ही झटपट तैयार हो गई. माता-पिता के साथ-साथ वह भी घर से बाहर निकली घर से बाहर आने पर मां ने भाई को गोद में उठा लिया और वे तेजी से लंबे-लंबे डग भरने लगे. सुमित्रा जी लिखतीं हैं, “उनके पीछे-पीछे छोटे लंगड़ाते लड़खड़ाते कदमों से रोती-झींकती मैं भी दौड़ रही थी पर मेरे और उनके बीच की दूरी निरंतर बढ़ती ही जाती थी. जैसे-जैसे दूरी बढ़ रही थी; मेरे रुदन का स्वर व वेग भी तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा था. पर ऐसा लगता था मेरी गुहार; मेरा करुण क्रंदन मेरे माता-पिता के कानों तक पहुंच ही नहीं रहा था. मुझसे बिल्कुल बेखबर; पीछे मुड़कर मुझे देखे बगैर वह धीरे-धीरे मेरी आंखों से ओझल हो गए. मेरा हृदय एकदम सन्नाटे में आ गया. अपनी यह पराजय मेरा कोमल मन स्वीकार नहीं रहा था. उपेक्षा के गहरे आघात से मैं विकल हो उठी थी. अकेली, व्यथित, व निराश मैं उस स्थान पर खड़ी-खड़ी बहुत देर तक रोती रही. माता-पिता की यह बेरुखी और अजनबीपन तोड़ने वाला था” (पृष्ठ-15)

दूसरा मार्मिक प्रसंग है; जन्माष्टमी उत्सव के दौरान सामूहिक नृत्य में भाग लेने का. सुमित्रा जी कहती हैं कि ‘स्कूल के सांस्कृतिक कार्यकर्मों में जब मेरी सहेलियाँ हिस्सा लेती थीं तो मेरा कितना मन करता था कि मैं भी उनकी तरह वो सब करूँ स्टेज पर सबके आकर्षण का केंद्र बनूँ; सबकी सराहना व प्यार पाऊँ. किसी तरह उन्हें डांस का मौका मिला जन्माष्टमी उत्सव में. और जब डांस शुरू हुआ तो  वे लिखतीं हैं- “तभी मेरी निगाह सामने दर्शकों में खड़े मेरे भाई पर पड़ी; मुझे काटो तो खून नहीं; जमाने भर की हिकारत, उपेक्षा और अवमानना की आग आंखों में लिए मेरा भाई मेरी ओर देख गुस्से से दांत पीस रहा था. अपंग हो नाचने का दुस्साहस जो किया था मैंने; आखिर मैंने इस असाध्य कामना को अपने हृदय में आने ही क्यों दिया. नाचने की सारी खुशी, सारा उत्साह, सारी तरंग पैरों के रास्ते जमीन में धंस गई व तभी पर्दा गिर गया पर हिकारत से भरी हुई आंखें सदा के लिए मेरे मन में अंकित हो गई थीं. (पृष्ठ-23)

तीसरा मार्मिक प्रसंग है स्कूल की पिकनिक का; जहां सभी लोग बच्चे और अध्यापक बच्ची सुमित्रा को एक जगह बैठाकर घूमने निकल जाते हैं. यह प्रसंग बच्ची सुमित्रा को बहुत अखरता है. यह हमारे स्कूली सिस्टम की असंवेदनशीलता की काफ़ी गंभीर आलोचना है. वे लिखतीं हैं- “मेरी सखियां अपराधी की भांति सहमी हुई मुझे देख रही थीं व दबे स्वरों में बात कर रही थीं कि यदि मुझे साथ ले जाते तो मेरी ज्यादा दूर तक चल न पाने की असमर्थता के कारण टीचरों को असुविधा होती इसलिए मुझे पार्क में चपरासियों के पास छोड़ दिया गया था.” (पृष्ठ-27) इस किस्म की उपेक्षा स्कूल में रोज की कहानी थी, “कक्षा में बिल्कुल चुप और सहमा हुआ एक स्पेशल बच्चा भी है; उसकी चुप्पी को तोड़ उसे भी दूसरे बच्चों के समान हंसने-खिलखिलाने के लिए प्रेरित करना है तब यह किसी के ध्यान में ही नहीं आता था. टीचरें आतीं और पढ़ा कर चली जातीं… जब शरारती बच्चे मुझे धक्का देकर गिरा देते थे तो मुझे उठा कर प्यार से मेरी चोट सहलाने वाला; मेरे आंसू पोछने वाला कोई न था. बहुत असुरक्षित महसूस करती थी मैं स्कूल में. (पृष्ठ-17) अपनी शारीरिक अक्षमता के चलते होने वाली उपेक्षा का उन्हें बार-बार सामना करना पड़ता था. इस संदर्भ में घर-परिवार, स्कूल कालेज, व्यक्ति और समाज सभी असंवेदनशील रहे. यह आत्मकथा हमें हमारे असंवेदनशील व्यवहार का आईना दिखाती है. ये प्रसंग इतने बेधने वाले हैं कि इन्हें पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए. ये इन्क्लूसिव एजुकेशन के लिए बेहतरीन साहित्यिक पाठ हो सकते हैं.           

पूरी आत्मकथा को पढ़ने पर एक बात समझ में आती है कि यह आत्मकथा उपेक्षा तिरस्कार सह रहे व्यक्ति की जीवन गाथा है; साथ ही यह आत्मीयता की अंतहीन तलाश का मार्मिक दस्तावेज भी है. यहां आपको आत्मीयता तलाशती औरत की सघन अनुभूतियों के शब्द चित्र मिलेंगे; जिसके जीवन में आत्मीयता मिसिंग है. इस ‘मिसिंग आत्मीयता’ के स्पष्ट कारण हैं. आत्मकथा बताती है कि इसका कारण सामाजिक, सांस्कृतिक, संरचनागत बुनावट है. सुमित्रा जी बताती हैं कि दलित, स्त्री व विकलांगता से उपजी उपेक्षा के चलते लोगों से घनिष्ठ संबंध विकसित ही नहीं हो पाते हैं. इस औपचारिकता व अलगाव का दूसरा बड़ा कारण; शहरी परिवेश, नवीन सामाजिक संरचना और उससे उपजी नई मानसिक बुनावट है. इन सभी पर आत्मकथा मौन मुखर है. सुमित्रा जी के यहां आत्मीयता के मिसिंग होने के संदर्भ बार-बार आते हैं. बचपन में माता-पिता भाई-बहन परिवार से आत्मीयता नहीं मिली; युवावस्था में मित्रों, दोस्तों, अध्यापकों और स्कूल से आत्मीयता नहीं मिली; आगे चलकर वर्किंग प्लेस पर कॉलेज के सहकर्मियों, साथियों से आत्मीयता नहीं मिली; यहां तक की पति से भी वह आत्मीयता नहीं मिली जिसकी चाह पन्ने दर पन्ने दिखाई देती है. “मन के घावों पर स्नेहलेप लगाना सतीश के बस में ना था. उनकी घर में उपस्थिति बस एक रोबोट के समान थी”. या “मन के छाले देख समझ पाने लायक न उनमें संवेदना थी ना समझ.” (पृष्ठ-161)

बचपन से ही स्नेहहीन परिवेश में रहते हुए अनेक शारीरिक व्याधियों के साथ अंत:वाह्य संघर्षों और चुनौतियों से जूझती सुमित्रा जी खुद को निर्जीव और रिक्त महसूस करतीं हैं. जैसा कि पहले भी उल्लेख किया गया है कि पन्ने दर पन्ने इसी ‘मिसिंग आत्मीयता’ की चाह दिखाई देती है. सुमित्रा जी को जो थोड़ी बहुत आत्मीयता मिली वह मिली- दादी से, पॉलिटिकल साइंस की प्रोफेसर सुजाता वर्मा से, सुदर्शन लड़के से; जहाँ मूक प्रेम की दास्तान मुखर होने से पहले ही दम तोड़ गयी थी व कामवाली बाइयों; अंगूरी, बीना, मालती और जुलेखा से. वह बतातीं हैं कि विकलांग व्यक्ति सामान्य व्यक्ति के समान घंटों घूम फिर नहीं सकता; उछल कूद नहीं कर सकता तथा शारीरिक सक्रियता वाले खेल नहीं खेल सकता; नाच नहीं सकता; पहाड़ों पर बहुत दूर तक चल नहीं सकता; अपनी सीमाओं के कारण विकलांग व्यक्तियों के घनिष्ठ आत्मीय संबंध बहुत थोड़े से लोगों से ही बन पाते हैं (पृष्ठ-44) यहाँ एक ओर नार्मल लोगों की तरह घूमने फिरने खेलने की इच्छा है दूसरी ओर नार्मल न होने के चलते मिलने वाले अलगावबोध की पीड़ा भी. अपने दायरे के लोगों से मिली छोटी-छोटी अस्वीकृति के एहसास औपचारिक, स्नेहहीन संबंध उन्हें अंदरूनी तौर पर खंडित करते चले गए. भावनात्मक स्तर पर निरंतर पराजय का सामना करता हुआ उनका मन निराशा के भंवर में डूबने उतराने लगा; मन की भीतरी तहों में कहीं यह बहुत गहरे बैठने लगा कि उनकी खुशी अथवा दुख से किसी को कोई सरोकार नहीं है कोई एक भी ऐसा नहीं है जिसकी आंखों से उनके लिए दुख या खुशी के आंसू बहे.

इस आत्मकथा की बहुत सारी खूबियों के बावजूद कुछ जगहों पर गांव को लेकर जो हिकारत का भाव आया है; (पृष्ठ-82) वह अटपटा लगता है. नोट किया जाना चाहिए कि यह हिकारत दलित चेतना के चलते नहीं आयी जान पड़ती बल्कि शहरी परिवेश से उपजी हुई लगती है. आत्मकथा में ईश्वर, अध्यात्म और ब्रम्हकुमारी के भी संदर्भ मिलते हैं हालाँकि वे अपने को ‘उच्च शिक्षा प्राप्त आधुनिका’ मानती है. आश्चर्यजनक है इस आत्मकथा में कही भी दलित सामाजिक राजनीतिक चेतना के चिन्ह नहीं मिलते. बुद्ध, कबीर, रैदास, फुले, सावित्रीबाई, डॉ अम्बेडर, कांशीराम और मायावती किसी का कोई भी एक संदर्भ प्रसंग नहीं मिलता. सामान्य तौर पर जागृत दलित द्वारा जाति विरोधी परंपरा से इतनी निरपेक्षता खटकती है खासकर तब जब वह लेखक भी हो और उसे जाति का दंश सहना-भोगना पड़ा हो. अगर आत्मकथा की राइटिंग स्टाइल की बात करें तो ज्यादातर जगह अनुभूति की सघनता मार्मिकता के बजाय विवरणात्मकता व घटनात्मकता दिखाई देती है. आत्मकथा की ताकत उसका स्ट्रक्चर नहीं बल्कि बिखरे हुए छिटपुट जीवनानुभव हैं जहाँ-जहाँ लेखिका ने ठहर कर प्रसंगों को लिखा है वहाँ-वहाँ यह पाठक को बांधती है. लेकिन मात्रात्मक दृष्टि से देखें तो स्टेटमेंट शैली ज्यादा दिखाई देती है. भाषा में जो संस्कृतनिष्ठता आयी है वह कई बार ओढ़ी हुई लगती है. उससे भाषा की स्वाभाविकता और रवानी बाधित होती है. इन सब के बावजूद आत्मकथा ने बेशक नयी ज़मीन तोड़ी है; जिसका स्वागत किया जाना चाहिए. यह आत्मकथा हमें बताती है कि विकलांगता को दिव्यांगता कह देने भर से ही काम नहीं चलने वाला है बल्कि हमें विकलांगता से बनी बनाई सामाजिक-सांस्कृतिक बुनावट को तोड़ना-मिटाना होगा; तभी हम उनके पोटेंसियल को सही दिशा दे पाएंगे; समाज निर्माण में उसका सदुपयोग कर पाएंगे. कुल मिलाकर यह आत्मकथा हमें जनतांत्रिक बनाती है; हमारी संवेदना का विस्तार करती है और हमारी सामाजिकता को नया आयाम देती है.

लेखक- डॉ सर्वेश कुमार मौर्य ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी की है। वर्तमान में आप एनसीईआरटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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