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‘एकेडेमिक्स फ़ॉर नेशन’ के मंच से श्री सुशील मोदी ने देशभर के प्रोफेसरों को किया सम्बोधित

एकेडेमिक्स फ़ॉर नेशन’ राष्ट्रवादी प्राध्यापकों, शोधार्थियों का संगठन है जो भारत-केंद्रित परिप्रेक्ष्य के साथ विद्वतापूर्ण गतिविधियों में शामिल होने के लिए एक मंच प्रदान करता है। इसका उद्देश्य सर्वोत्तम शैक्षणिक मानकों के साथ एक गतिशील, उत्पादक और व्यावहारिक बौद्धिक परिदृश्य बनाने में सहयोग करना है। एकेडेमिक्स फ़ॉर नेशन राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्व के प्रासंगिक मुद्दों पर विद्वानों, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं के लेख प्रकाशित करता है। विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर कार्यक्रम का आयोजन करता है। एकेडेमिक्स फ़ॉर नेशन ने नागरिकता अधिनियम, किसान आंदोलन, बंगाल में राजनीतिक हिंसा आदि मुद्दों पर देश का पक्ष रखने के लिए कई कार्यक्रमों का आयोजन किया। संगठन द्वारा आपातकाल की वर्षगांठ पर प्रो आनन्द कुमार के साथ भी एक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया था। 27 जून को भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री शिव प्रकाश जी का बंगाल हिंसा पर भी कार्यक्रम आयोजित किया गया।

एकेडेमिक्स फ़ॉर नेशन’

25 जून 1975 को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का काला अध्याय लिखने का प्रयास किया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर आम लोगों से जीने तक का मौलिक अधिकार छीन लिया था। उन्होंने एक तरह से पूरे देश को जेल बना दिया था। आपातकाल के पहले और उसके विरोध में आंदोलनों की एक पृष्ठभूमि है। आंदोलनों की इस पृष्ठभूमि में बिहार का नाम भी बहुत महत्वपूर्ण है। बिहार के आन्दोलन में जेपी थे उनके साथ सुशील मोदी जैसे छात्र नेता भी थे।

एकेडेमिक्स फ़ॉर नेशन’ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में श्री सुशील कुमार मोदी

आपातकाल विरोधी आंदोलन के नेता श्री सुशील कुमार मोदी जी ने ‘एकेडेमिक्स फ़ॉर नेशन’ द्वारा आयोजित ‘आपातकाल पर संवाद’ कार्यक्रम को सम्बोधित किया। वर्तमान में श्री सुशील मोदी राज्यसभा सांसद हैं और 15 वर्षों तक बिहार के उपमुख्यमंत्री व वित्तमंत्री रहे हैं। आप चारों सदनों विधान परिषद, विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रहे हैं। यह एक कीर्तिमान है। आप पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव रहे हैं। इस तरह आपने अपने लंबे राजनीतिक सफर में छात्र संघ से लेकर उच्च सदन तक की गरिमा बढाई है। बिहार प्रदेश भारतीय जनता पार्टी को आपने अपनी मेहनत और लगन के बल पर आगे बढ़ाया है। भाजपा की बिहार इकाई की बुनियादी में भी आप दिखते हैं और शीर्ष पर भी। जेपी आंदोलन कहें या बिहार आंदोलन कहें इस आंदोलन से निकले कई नेता राजनीतिक भ्रष्टाचार और वंशवाद की भेंट चढ़ गए लेकिन आपने अपने को पूरी तरह इससे अछूता रखा यह बड़ी उपलब्धि है।

एकेडेमिक्स फ़ॉर नेशन’ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में प्रोफेसर श्रीप्रकाश सिंह

इस कार्यक्रम में जो दो अन्य महत्वपूर्ण अतिथि मौजूद थे, उनमें से एक आदरणीय प्रोफेसर श्री प्रकाश सिंह जी हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में प्रोफेसर हैं। आप भारतीय लोक प्रशासन संस्थान में भी प्रोफेसर रहे हैं। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा एकेडमिक ऑडिट कमिटी के सदस्य रहे हैं। साथ ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की शिक्षा पर गठित कमिटी के भी सदस्य रहे हैं। आप भारत सरकार की शिक्षा से जुड़े कई कमिटियों के अभी भी सदस्य हैं। आपने सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में भी लंबे समय से काम किया है। फिलहाल आप प्रज्ञा प्रवाह, दिल्ली के संयोजक हैं।

एकेडेमिक्स फ़ॉर नेशन’ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में प्रोफेसर अनिल सौमित्र

दूसरे सम्मानित व्यक्ति प्रोफेसर अनिल सौमित्र जी हैं। आप भारतीय जनसंचार संस्थान, अमरावती के निदेशक हैं। आपने भी सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में लंबे समय से राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं। आप भारतीय जनता पार्टी के प्रकाशन विभाग के प्रमुख रहे हैं। डॉ अनिल सौमित्र भाजपा की मध्यप्रदेश इकाई के मुखपत्र चरैवेति के सम्पादन का भी लंबे समय तक दायित्व निभाया है। आपने स्पंदन नामक संस्था के माध्यम से लगभग एक दशक तक मीडिया चौपाल कार्यक्रम का आयोजन किया है।

श्री सुशील मोदी आपातकाल विरोधी आंदोलन के दौरान छात्र नेता के रूप में सक्रिय रहे। उनके पास इससे जुड़े तमाम अनुभव हैं जिन्हें एकेडेमिक्स जगत को बताने के उद्देश्य से यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था। श्री सुशील मोदी ने कहा कि आपातकाल की परिस्थितियों को याद करके सिहर जाता हूँ। भावी और आने वाली पीढ़ी को इस दिन को याद करना चाहिए ताकि फिर देश के लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसा दिन न आ पाए। यह कार्यक्रम सवाल और जवाब की शैली में तैयार किया गया था।

श्री सुशील कुमार मोदी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीप्रकाश सिंह के एक सवाल के जवाब में बताया कि आपातकाल के माध्यम से संविधान की मूल संरचना समाप्त कर दी गई थी। मीडिया, न्यायालय, संसद, प्रशासन सबको श्रीमती गांधी ने एक तरह से प्रतिबंधित कर दिया था। आज विश्वविद्यालयों में आपातकाल को पाठ्यक्रम के रूप में शामिल करने की जरूरत है ताकि विद्यार्थियों को इसके बारे में पता चल सके। आपातकाल में देश के नागरिकों के जीवन जीने के मौलिक अधिकार छीन लिया गया था। पूरा देश एक तरह से जेल बन गया था।

भारतीय जनसंचार संस्थान, अमरावती के निदेशक प्रो अनिल सौमित्र के सवाल बिहार का यह छात्र आंदोलन देश के आंदोलन से कैसे जुड़ गया’ जवाब में श्री मोदी ने कहा कि इससे पहले छात्र आंदोलन बस किराया, होटल का खाना, सिनेमा की टिकट आदि मुद्दों पर होता था। जब मैं पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ का महासचिव बना तो व्यापक मुद्दों पर छात्र आंदोलन शुरू हुआ। अब छात्र आंदोलन गरीबी, बेरोजगारी आदि मुद्दों पर होने लगे। छात्रों ने समस्या की जड़ राजनीतिक सत्ता और व्यवस्था बदलने के लिए आंदोलन करना शुरू किया।

आपातकाल विरोधी आन्दोलन में कम्युनिस्ट पार्टियों की भूमिका के बारे में प्रोफेसर श्रीप्रकाश सिंह के सवाल के जवाब में श्री मोदी ने बताया कि उन्होंने तो आपातकाल का न केवल समर्थन किया था बल्कि विरोधी नेताओं को गिरफ्तार करवाने में मुखबिर का काम करते थे। कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा आपातकाल का समर्थन करने के साथ ही उनके आधार वोटों में कमी आने लगी। एक तरह से यहीं से उनका जनाधार कम होता गया। इसका कारण यह है कि वे जनता की भावना के विरोध में जाने का निश्चय किया। आपातकाल के बाद जो चुनाव हुए उसमें बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में आंदोलन विरोधी दलों अर्थात जनता पार्टी की विजय हुई।

लक्ष्मीबाई महाविद्यालय के डॉ अरुण कुमार के सवाल ऐसा क्या कारण था कि आपके साथ जिन छात्र नेताओं ने मिलकर आंदोलन चलाया था, उनमें से कुछ आज आपातकाल लगाने वाले के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं’ के जवाब में श्री मोदी ने कहा कि यह आंदोलन राजनीतिक भ्रष्टाचार और वंशवाद के विरोध में यह आंदोलन शुरू हुआ था। कुछ लोग इस आंदोलन को अपने लिए राजनीतिक अवसर की तलाश में शामिल हुए थे। वही लोग राजनीतिक भ्रष्टाचार और वंशवाद की समानता के कारण आज आपातकाल लगाने वालों के साथ हैं।

सत्यवती कॉलेज की डॉ मोनिका गुप्ता ने पूछा कि इस आंदोलन में छात्राओं और महिलाओं की क्या भूमिका थी? इसके जवाब में श्री सुशील मोदी ने कहा कि इससे पहले बिहार में आंदोलनों और राजनीतिक गतिविधियों में महिलाओं और छात्राओं की भूमिका नगण्य होती थी। इस आंदोलन से पहली बार महिलाएं/छात्राएं घर से बाहर निकलकर रैलियां करने लगी। कॉलेजों की छात्राएं और अध्यापिकाएं स्थानीय स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करती थीं।

प्रस्तुति- डॉ अरुण कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, लक्ष्मीबाई महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय व संपादक, लोकमंच पत्रिका। सम्पर्क- 8178055172, 9999445502, lokmanchpatrika@gmail.com

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