लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
कवि और कविता : डॉ. चम्पा प्रिया नुनिया- अशोक वर्मा

बराक घाटी में हिन्दी साहित्य चर्चा का विस्तार बहुत ही धीमी गति से हो रहा है । साहित्यिकों की संस्था उत्याहजनक नहीं है । साहित्य सेवा से जीविकार्जन का सपना देखना खतरनाक साबित हो सकता है । तो भी कुछ लोग उत्साही युवा अपनी भाषा के प्रति प्यार के कारण आगे बढ़ कर आ रहे हैं । पर साहित्य प्रेमियों से प्रेरणा कदाचित किसी को मिली हो । लेकिन कभी-कभार कुछ लोग दिल बहलाने के लिए या किसी महानुभाव व्यक्ति के सहयोग से गोष्ठी-अनुष्ठान कर लेते हैं । बराक घाटी में तुलसीदास को छोड़कर मुझे जहाँ तक जानकारी है किसी जातीय स्तर को साहित्यिक की सृष्टिशीलता पर चर्चा या आलोचना होते नहीं सुना है । बावजूद इन प्रतिकूलताओं के कुछ साहित्यिक अपनी रचना प्रकाश करते जा रहे हैं । उनमें महिलाएँ भी हैं । मनोरंजन के लिए हो, मानसिक विकास के लिए साहित्य चर्चा जरूरी है । अर्थात् मानव की सुकोमलवृत्तियो, पंखुड़ियों को खिलाने के लिए साहित्य चर्चा जीवन का एक अति आवश्यक वस्तु होती है । जैसे शारीरिक पुष्टि एवं वृद्धि के लिए उत्कृष्ट भोजन चाहिए उसी तरह मानसिक उत्कर्षता वृद्धि करना संभव होती है साहित्य के माध्यम से ।

लेखिका चम्पा प्रिया नोनिया , लोकमंच पत्रिका
लेखिका चम्पा प्रिया नोनिया , लोकमंच पत्रिका

डॉ. चम्पा प्रिया नुनिया नयी पीढ़ी की एक शक्तिशाली साहित्यिक हैं। “जीवन दर्पण” नामक अपनी पुस्तक में वह अपनी प्रतिभा और सामर्थ्य की झलक दिखा चुकी है । फिलहाल कविता एवं अन्यविध बहुत सारी रचनाएँ लिख रही है । मुश्किल यह है कि बराक घाटी में रचना प्रकाशित करनेवाली न कोई साहित्यिक पत्रिका है और न कोई सम्मयिकी। न उत्साह प्रदान करने वाले पर्व-त्यौहार में स्मारिका आदि आत्म प्रकाश करती है । बराक घाटी के अनेक विशिष्ट व्यक्ति जिनसे समाज उपकृत हुआ है उन पर कोई  “स्मृति ग्रंथ” हिन्दी में आज तक नहीं निकला है । नई पीढ़ी अपने क्षेत्र के महान व्यक्तियों के बारे में अनजान रह जायेंगी । ऋण तो चुकाना है । श्रद्धासुमन शब्द के माध्यम से उन्हें चढ़ाना है । बराक घाटी के बहुत सारे वरणीय चर्चित है जिनके उपकार से केवल घाटी ही नहीं पूरा देश उपकृत हुआ है ।

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चलते हैं तरूण कवयित्री डॉ. चम्पा प्रिया नुनिया की कविताओं की ओर । जो जिस परिवेश में जनमता है उस परिवेश का प्रभाव उस पर पड़ता है । पैनी नजर वाली प्रतिभाशाली व्यक्ति हर चीज को, हर आचरण का अवलोकन करता है, विचार करता है, सवाल करता है । कभी दूसरों से कभी अपने आपसे पठन, मनन, आलोचना, चर्चा द्वारा सवाल का जवाब ढूढ़ता है । विरोध करता है बगावत करता है । अज्ञानता से ज्ञान की ओर, जकड़न से सक्रियता की ओर, बंधन से मुक्ति की ओर बढ़ता है ।

डॉ. चम्पा प्रिया ने सामाजिक वैषम्य देखा है, लोगों में ढकोसला देखा है । द्विचारिता देखा है । मूक व्याख्या से धर्म ग्रंथों का विकृत अर्थ निकाल उसे निरीह अशिक्षित जनता पर थोप कर ऐश करने को देखा है । एक श्रेणी के स्वार्थ पर मानव को देख कवियत्रि आश्चर्जित होती है वह कहती है –  “देश में ही देश की आजादी की बात होती है ।” देश तो आजाद है, फिर आजादी की यह मांग क्यों ? कवयित्री जवाब भी देती है अगली पंक्ति में –

“जहाँ बुजुर्गो को अपनाने की, युवको को समझाने की

जनता को बहलाने की, टोपी को सहलाने की और

दलितों को न छूने की बात होती है ।”

कवियत्रि अपने अर्जित ज्ञानानिसार इस विसंगतिओं के विरूद्ध तर्क रखती है –

“कोख वही, दूध वही, वही रक्तधार है

रंग-रूप के साथ बदला केवल विचार है

किसे कहे मसीहा कौन संहारक है

सुरक्षित करे कैसे तुझे लुटेरा ही धारक है । ”

अगले एक और कविता में कवयित्री आपस का बैर भूलाकर एक साथ चलने की सलाह देती है –“मत करो आपस में झगड़े, हम सब भाई-भाई हैं ।” वे कहती हैं खून, श्वास, धरती, आकाश, पानी सब एक हैं । महान व्यक्तियों को याद करते हुए उसके सीख को सामने रख उच्चारण करती है –

“नादान है दिल, दिमाग में अनेकों सवाल अकुलाती है

यह जुदाई आन्तरिक है या मन की नादानी है ?”

साहित्यकार अगर संवेदनशील न हो तो चलता है क्या ? वह तो अनबोलता है । स्पंदन को समझता है । पत्थर की व्यथा से भी व्यथित होता है । कवयित्री की जुबानी सुनिए –

“धरती से अलग हो हल्दी का सूख के पिसना

फूल से अलग हो पराग का बिछोह

मधुमक्खी का भटकना

जड़ से टूटकर दूब का सिसकना ।….”

इसी तरह  “डाल से बिछड़ कर फलों का क्रन्दन, पत्थरों में पिसते हुए चन्दन की वेदना” कवयित्री सहन नहीं कर पाती है । उनका दिल कचोटता है । बोल सकना, अनबोलता, सचल-अचल और जड़, जीव और वस्तु के साथ अपना सूक्ष्म अनुभूति द्वारा दर्द पीड़ा को महसूस करना कठिन है । यहाँ तक कि बछड़े का तड़पना, बच्चे का रोना, चूल्हे में तपकर घी का बहना आदि बहुत कुछ कवियत्रि के सहानुभूतिशील मन को दु:ख पहुँचाते हैं । अंत में कवयित्री कहती है –

“तुझे खुश करने को जाऊँ को औरो को दु:ख दे जाती हूँ

तू ही बता ये मेरे खुदा तुझे कैसे खुश करूं  ?”

किसी के उद्देश्य से कवियत्रि उसके समक्षता के बारे में जानना चाहती है क्योंकि किसी को कुछ दिया जाए और वह व्यक्ति उस वस्तु का मोल नहीं दे पाता तो वह दान बेकार हो जाता है । इसीलिए कवियत्रि कहती है कि उन्हें माता-पिता का दिया संस्कार, आंगन से प्राप्त व्यवहार, भाई से मिला अपनापन का ज्ञान, गुरू से मिला सदाचार-सम्मान तथा चाँद की चाँदनी, फूलों की खुश्बू आदि बहुत कुछ देना चाहती है और पूछती है –

“देना चाहती हूँ कोमलता की थपथपाहट

शीतलता का एहसास

कोयल का सुर, मोर की चाल

आत्म की शक्ति, न्याय की पुकार

पर क्या तुम सक्षम हो ?”

अपात्र को दान देना मना है । अगर दाता और ग्रहीता दोनों लाभांवित हो तो ठीक वरना दान का कोई मूल्य नहीं ।

डॉ. चम्पा प्रिया गद्य से पद्य से बराक घाटी के नवीन प्रजन्म के कविओं में अग्रणी भूमिका निभाने में सक्षम है । उन्हें अभी बहुत दूर तक जाना है और साहित्य सेवा के माध्यम से जनचित को कल्याणमुखी भावना से मर्यादित करना है । हमारी शुभेच्छा रही । 

लेखक- अशोक वर्मा  

48 thoughts on “कवि और कविता : डॉ. चम्पा प्रिया नुनिया- अशोक वर्मा

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