लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
योगिता यादव की कहानी- अश्वत्थामा पुन: पुन:

होटल के कमरे से निकलकर मैं सीधे ग्राउंड फ्लोर पर बने जिम में चला गया। यहां लगभग एक घंटा वर्कआउट करने के बाद मैं पूल एरिया में बैठकर मोबाइल पर ताजा अपडेट्स चैक कर रहा था। लगातार ईमेल चैक करना मेरी नौकरी का हिस्सा है और सोशल साइट्स के अपडेट चैक करना मेरी नौकरी में मदद करता है। मैं दो दुनिया एक साथ जीता हूं। पहली वह जो मैं सचमुच जीता हूं और दूसरी वह जो मुझे लोगों को दिखाना है कि मैं जी रहा हूं। जैसे मुझे अभी दोपहर में वाटर पार्क में जाकर मस्ती करनी है और अपनी कुछ फोटोग्राफ्स अपने फेसबुक पेज पर अपडेट करनी हैं। जबकि मैं यहां एक दूसरे ही काम से आया हूं। जिसके बारे में मैं खुद को भी नहीं बता सकता। यह नौकरी के नियमों के खिलाफ है। कभी-कभी मैं खुद भी कन्फ्यूज हो जाता हूं कि मैं जो जिंदगी जी रहा हूं वह सचमुच जी रहा हूं या वह भी सिर्फ  अपने अफसरों को बता रहा हूं कि ‘देखिए जनाब मैं जी रहा हूं।’

जो भी हो, मैं खुश हूं ही इस दोहरी जिंदगी से । वरना पहले तो मुझे सिर्फ अपने बॉस का कंप्यूटर ठीक करने का ही काम करना पड़ता था । हालांकि कंप्यूटर खराब नहीं होता था, बस कुछ तकनीकी दिक्कतें होती थी जो वह कंप्यूटर फ्रेंडली न होने के कारण अटक जाया करते थे । कई बार कोई गलत कमांड मार देते, जिससे कोई आइकन गायब हो जाता और मैं उसी को ढूंढता, फिर डेस्कटॉप पर सेव कर देता । और वह खुश हो जाते । शुक्र है कि अब मुझे असाइनमेंट सौंपे जाने लगे हैं। जिनमें से कुछ बिल्कुल बकवास किस्म के होते हैं, जिनका बाद में आउटपुट कुछ नहीं होता । पर कुछ बहुत जरूरी भी, जिनसे कई दूर के काम साधे जाते हैं। जो पॉलिसी मेकिंग के लिए ग्राउंड बनते हैं।

खैर छोडि़ए मुझे अपने बारे में ज्यादा बात नहीं करनी चाहिए। यह ठीक नहीं होगा। इसके लिए मुझे पनिशमेंट भी दी जा सकती है । पिछले कुछ सालों से मुंबई में हूं । मेरी नौकरी के लिहाज से यह एक अच्छी पोस्टिंग है । क्या पता कल को मिजोरम, उड़ीसा या चैन्नई कहां फेंक दिया जाऊं । हो सकता है दिल्ली के किसी घटिया से ऑफिस में सिर्फ कागजी काम निपटाता रहूं । इससे बेहतर है कि मैं अपने बारे में कम से कम बातें करूं । अब तो यह मेरे नेचर में शामिल हो चुका है । अपनी पत्नी, अपने बच्चों यहां तक कि अपनी मां को भी मैं अपने बारे में अब कुछ भी सही सही नहीं बताता।

मोबाइल स्क्रॉल करते हुए नजर फिर से सुहाना शर्मा पर जाकर टिक गई। इसकी चैट मैं पिछले कई दिनों से अवॉइड कर रहा हूं । पर लगा आज चंडीगढ़ आ ही गया हूं तो क्यों न मिल लूं । लगभग तीन महीने पहले उसने मुझसे बहुत छोटी सी बातचीत की थी । बातचीत के ये तीन जोड़ी संवाद भी तीन दिन में पूरे हुए थे । एक तो मैं एक जरूरी असाइनमेंट में बिजी था, दूसरे जैसा कि मेरी आदत है, उसके बातचीत शुरू करने के फौरन बाद मैंने उसके बारे में जरूरी मालूमात हासिल कर ली थी । मेरे पास जो संसाधन हैं उसमें यह बहुत आसान और बहुत जल्दी हो जाने वाला काम है, पर इसकी शुरूआती जानकारी से मैं यह तो जान ही गया था कि यह मेरे लिए कोई खास अहमियत नहीं रखती । ये एक आम नौकरीपेशा कमाने, खाने और परिवार चलाने वाली महिला है । जो अपनी सही तनख्वाह या सही उम्र लोगों से छुपाकर खुद के पास कुछ गोपनीय होने का भ्रम पाले रखते हैं । दुनिया भर के ज्यादातर आम लोग ऐसे ही हैं, जिनकी नजर में आज भी पैसा सबसे गोपनीय चीज़ है और ऐसे लोग हमारे लिए कोई खास अहमियत नहीं रखते ।

मैंने चैट शुरू करते हुए उसे हैलो कहा, वह ऑनलाइन थी और उसने झट से हैलो का जवाब, हाय, आप कैसे हैं के साथ दिया।

”सॉरी मैं बिजी था । इसलिए आपकी बात का जवाब नहीं दे पाया।”

”कोई बात नहीं। मैं भी अकसर बिजी रहती हूं। मैं समझ सकती हूं आपकी व्यस्तता।”

”जी मैं आज चंडीगढ़ में ही हूं।”

”ओह ये अच्छा है, मैं आपसे मिलना चाहती थी।”

”कोई खास बात?”

”नहीं ऐसा कुछ खास नहीं। वैसे शायद आप जानते हों।”

”मैं आज शाम तक यहां हूं, आप चाहें तो मेरे होटल में आ सकती हैं।”

”मैं शाम पांच बजे तक ऑफिस में होती हूं, क्या आप मेरे ऑफिस आ सकते हैं?”

”नहीं यह मेरे लिए मुश्किल होगा।”

”इसी तरह होटल आना मेरे लिए मुश्किल होगा । रॉक गार्डन से लगभग आधा किलोमीटर आगे एक छोटा सा रेस्टोरेंट है । हम वहां मिलते हैं छह बजे।”

सपाट सी बातचीत के बाद वह ऑफलाइन हो गई। और मैं अपनी ड्यूटी निभाने के लिए तैयार हो गया। मुझे अभी करने और दिखने दोनों तरह के काम करने थे ।

शाम को अपने तय टाइम से दस मिनट पहले ही मैं  रेस्‍तरां पहुंच गया था। पर जैसा कि मेरी आदत में शुमार हो चुका है मैं  रेस्‍तरां के अंदर नहीं गया बस आसपास ही बना रहा । हर आती जाती औरत पर मेरी निगाह थी । मेरे ख्याल से वह अधेड़ उम्र की महिला उम्र में मुझसे कुछ छोटी ही होगी । बातचीत के अंदाज से बेहद साफ, स्पष्ट, लेकिन तेज तर्रार लगती थी । ट्राउजर और लूज टॉप में जब एक लड़की अंदर दाखिल हो रही थी तो मुझे लगा कि हो न हो यह वही है । अब यह टेबल पर बैठकर मुझे ऑनलाइन मैसेज देगी, क्योंकि मेरा मोबाइल नंबर उसके पास नहीं है । वह बैठी और उसने अपने पर्स से मोबाइल निकाला ही था कि एक दूसरी लड़की उसके पास आ गई । गर्मजोशी से इनके मिलने के अंदाज से लगा कि दोनों बहुत अच्छी तरह एक-दूसरे को जानती हैं और यह मीटिंग पहले से फिक्स है। हंसी-ठहाकों के साथ ही उनकी बातचीत शुरू हो गई।

ओह तो यह वह नहीं है। मैं लगभग बोर होने लगा था । छह बज चुके थे और अब मिनट वाली सूंईं आगे बढ़ रही थी। इतनी देर में मैंने एक सिगरेट सुलगाई और कुछ दूर यूं ही सड़क पर तफरी करने लगा । फिर सोचा अंदर जाकर बैठना चाहिए । अब तक छह बजकर बीस मिनट हो चुके थे। हमें वक्त की पाबंदी घुट्टी की तरह पिलाई जाती है। मुझे याद है एक बार इंटरनेशनल बॉर्डर पार करते हुए हमारा एक साथी पच्चीस सैकेंड लेट हो गया था और उसके इस पच्चीस सैकेंड की देरी की वजह से हमें क्या कुछ नहीं भुगतना पड़ा था । पर आम लोगों के लिए पच्चीस सैकेंड कोई खास अहमियत नहीं रखते मैं जानता हूं। खुद मेरी पत्नी के लिए किसी फंक्शन में आधा, एक घंटा लेट पहुंचना बहुत सामान्य सी बात है।

एक खाली टेबल देखकर मैं वहां बैठ गया । मैंने जेब से मोबाइल निकाला और सोचा उसे कॉल करूं । नहीं इस तरह मेरा नंबर उसके पास चला जाएगा ।  यह सिम मुझे ऑफिस के काम के लिए मिली है, जिसे शाम तक मुझे डेस्ट्रॉय कर देना है । मैं अभी यह सब सोच ही रहा था कि सलवार कमीज पहने एक महिला ठीक मेरे सामने आ खड़ी हुई । उसके दाएं कंधे पर पर्स टंगा हुआ था और उसी हाथ से उसने सब्जी का एक छोटा सा थैला पकड़ा हुआ था ।

”सॉरी मुझे आने में थोड़ी देर हो गई । वो रास्ते में सब्जियां लेनी थी। शायद पंद्रह-बीस मिनट ज्यादा हो गए।”

“जी आप मिस सुहाना।”

“हां जी।”

“ओह कोई बात नहीं, आइए बैठिए न।”

“पर आपने मुझे पहचाना कैसे?”

“आपकी वॉल पर आपकी फोटो है न, आप बहुत ज्यादा अलग नहीं लगते हैं उससे।”

“ओह, ओके” और मैंने हल्की मुस्कान के साथ अपने शक को झुठलाने की कोशिश की । वह एक बहुत साधारण महिला थी । दिन भर की थकान उसके चेहरे से झलक रही थी । बाल भी शायद उसने सुबह एक बार ही बनाए होंगे, तभी वे इस वक्त शाम को बिखरे हुए से थे । मेकअप भी लगभग फेड हो चुका था और लिप्स्टिक की हल्की उतरी हुई रंगत सी उसके होंठों पर अभी भी थी । साथ में सब्जी का थैला । इस थैले ने उसके बारे में मेरी कल्पना को बहुत बुरी तरह तोड़ा था । यह कोई खालिस गृहस्थिन थी। जिसकी मेमोरी में बहुत ज्यादा डाटा नहीं था । तभी इसके लिए मेरी तस्वीर को पहचान कर अपने माइंड में स्टोर कर पाना ज्यादा आसान था । जबकि इसकी तस्वीर देखने के बाद भी मेरे माइंड ने अपने डाटा स्टोर में इसे जगह देना जरूरी नहीं समझा था । मैं अभी तक कुछ और ही तसव्वुर किए बैठा था । ऐसा अभी तक कभी मेरे साथ नहीं हुआ था । आखिर लोगों को पहचानना, उनकी खोजबीन करना मेरे पेशे का हिस्सा है। अब इसके सामने आने के बाद से मेरे दिमाग ने इस पर काम करना शुरू कर दिया था। मुझे लगा इसकी प्रोफाइल पर जो तस्वीर है, वह ज्यादा नहीं तो पांच साल पुरानी तो होगी ही । जिसमें वह एक चुस्त-दुरस्त और तेज तर्रार महिला लगती है।

“क्या लेंगी आप?”

“कुछ खास नहीं।”

“मैं ऑर्डर करती हूं, आप कॉफी पीते हैं न?”

“विद ओर विदाउट शूगर?”

“जैसा आपको ठीक लगे।”

“आप बैठिए, मैं खुद लेकर आती हूं।”

मैं उसके एक-एक जेश्चर को बड़ी सूक्ष्मता से नोट कर रहा था । वह एक ट्रे में दो कॉफी और साथ में फ्रेंच फ्राईज भी ले आई थी ।

हमने अभी बातचीत शुरू भी नहीं की थी कि रेस्‍तरां में वेस्टर्न म्यूजिक चलने लगा । म्यूजिक कुछ लाउड था – 

“क्या हमें बाहर चलकर बैठना चाहिए? मुझसे अब जरा भी तेज आवाज बर्दाश्त नहीं होती । असल में चिल्ला चिल्ला कर मेरे सुनने की शक्ति भी लगता है कुछ गड़बड़ हो गई है।”

“जी श्योर, जैसा आपको ठीक लगे।”

“मैं यह ट्रे उठाती हूं, आप प्लीज ये थैला उठाएंगे?” उसने ऐसे अधिकार से कहा जैसे मेरी पत्नी मुझे कहती है।

“अरे आप छोडि़ए, मैं ट्रे उठा लेता हूं।”

हम अंदर वाले डायनिंग एरिया से उठकर बाहर की तरफ लॉन में आ गए थे।

“हां तो कहिए आप मुझसे क्यों मिलना चाहती थी?”

“आज सुबह सब्जी के लिए प्याज काट रही थी । अचानक नज़र पड़ी कि मैं छिलके प्लेट में रख रहीं हूं और प्याज कचरे में डालती जा रहीं हूं….ऐसे मेरे साथ अक्सर होता है । कोई नई बात नहीं है ।

खैर मैंने यह सब बताने के लिए आपको यहां नहीं बुलाया।

मैं भूमिका नहीं बनाऊंगी । सीधे बात करते हैं । मेरे पति ने मेरी जासूसी का काम आपको सौंपा है?”

“नहीं, ऐसा कुछ नहीं।

आपको गलत बताया गया है।”  मैं एकदम सकपका गया, फिर कुछ सहज होने की कोशिश की।

“मुझे ऐसा मालूम हुआ कि मेरी फेसबुक और व्हाट्सएप चैट आपने निकालकर उन्हें मेल की हैं।”

“ऐसा किसने कहा?”

“जी उन्होंने ही मुझे बताया।”

“ऐसा उन्होंने कहा?”

“हां, उन्होंने ही कहा । और जब से आपने उन्हें यह सब सौंपा है तब से वह हर बार, लगभग दिन में पांच-सात बार मुझे यही धमकी देते हैं, ‘निकालूं तुम्हारे चिट्ठे? किस-किस के साथ क्या-क्या गुल खिलाए हैं तुमने?’

“ओह, और क्या बताया?”

“अगर यह सब आपने नहीं किया होता तो मुझे आपका नाम कैसे मालूम होता । सच नहीं होता तो वह ऐसा क्यों कहेंगे? मैं तो आपको जानती ही नहीं थी कि आप कौन हैं? नाम से भी नहीं। उन्होंने ही मुझे यह सब बताया और यह भी कि ये सब काम आपने किया है।”

“मैं भी आपको कहां जानता था।”

“जी बिल्कुल।”

“ये तो आप ही ने बताया कि आप निर्मल की पत्नी हैं।”

“हां सही है।”

”निर्मल मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं। हम पिछले बीस सालों से एक-दूसरे को जानते हैं। हम दोनों एक-दूसरे को हेल्प करते हैं। ही इज अ गुड पर्सन।” 

“उन्होंने क्या कहकर ये डिटेल निकलवाई?”

“मुझे याद नहीं।

शायद दो-चार बार किया होगा।

वैसे मुझे नहीं लगता कि आपके कोई डिटेल्स लिए, उन्होंने।” – ये मैं कैसी अजीब सी बातें कर रहा हूं। अभी मैंने कहा कि मैंने दो-चार बार ऐसा किया है और फिर मैं कह रहा हूं कि ऐसा कुछ नहीं हुआ । क्या मैं भूलता जा रहा हूं कि मुझे क्या कहना चाहिए! उसकी आवाज से मैं फिर खुद से बाहर आया-

“नहीं होता तो क्यों कहते?”

“मुझे नहीं पता, मैं बस इतना जानता हूं कि ही इज अ गुड पर्सन।”

“शायद उन्हें लगा हो कि मैं आपसे कभी मिल नहीं पाऊंगी। और हां, उन्हें यह भी लगा कि आप पूरा काम ठीक से नहीं कर पाए हैं। इसलिए बचे हुए काम के लिए अब उन्होंने दिल्ली और मुंबई के दोस्तों से हेल्प ली है। वो देश भर से मेरे आशिक ढूंढ निकालेंगे।”, कहते हुए उसने जोर का ठहाका लगाया ।

उसके इस ठहाके से मेरा मन अजीब सा हो गया । क्या मुझे साधारण लोगों की साधारण हंसी की आदत नहीं रही है!

“आई थिंग ही इज ब्लफिंग।

डोन्ट वरी।

बाकी चिट्ठे सबके होते हैं।”

“ही इज अ गुड पर्सन, अभी आपने कहा । क्या अच्छे लोग पत्नी से ब्लफ करते हैं?”

“आई हेव नो आइडिया कि आपके बीच क्या है। मगर मैं उन्हें बहुत समय से जानता हूं। आई एम सरप्राइज्ड। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि हमें इस तरह मिलना होगा। और मुझे अपने दोस्त के बारे में इस तरह की बातें सुननी पड़ेंगी।”

”मैंने उस अच्छे इंसान के साथ पंद्रह साल रो रोकर काटे हैं । इन पंद्रह सालों में कौन सी तकलीफ है जो उन्होंने मुझे नहीं दी । दर-दर भटकी हूं एक पत्नी का हक पाने के लिए । उनके दिल में जरा सी जगह बनाने के लिए । इन पंद्रह सालों में तीन बार आत्महत्या की कोशिश की । हर बार बच गई । अब तय किया है कि मरूंगी नहीं । अपनी जिंदगी खुशी से जिऊंगी । सच पूछिए तो अब सुकून में हूं।

उनसे मनुहार करते जब बहुत थक गई तो एक दिन उन्हें अपने दिल से निकाल दिया। बस उस दिन से सुखी हूं।”

“आई एम सॉरी फोर देट , क्या आप दोनों एक साथ नहीं रहते?”

“मैंने उन्हें दिल से निकाला है, घर से नहीं । मैंने कहा न मैं बहुत मजबूत हो चुकी हूं । मैं आधी रात तक जिस आदमी का इंतजार करती थी वह शराब के नशे में धुत्त होकर घर लौटता था । क्योंकि उसके पास पिलाने वालों की कमी नहीं थी । पर मेरे पास मुझे सुनने वाले एक अदद इंसान की कमी थी । मुझे आज भी ऐसा लगता है कि मैं अपने पति के साथ नहीं सिर्फ एक थानेदार के साथ रह रही हूं। साहनी मर्डर केस याद है आपको? तब उन्होंने मुझे तीन रातों तक सोने नहीं दिया था । सारे सुबूत उनके पास थे । वे केस को सॉल्व कर प्रमोशन पा सकते थे और चाहते तो कुछ लोगों को बचाकर अपने दूसरे काम निकाल सकते थे । पर दिक्कत पॉलीटिकल कनेक्शन की वजह से खड़ी हो गई और उन्हें वह फाइल बंद कर देनी पड़ी। उस दौरान वे उन सभी का गुस्सा, अपनी बुद्धिमत्ता की कलगी, अपनी हार की हताशा सब मेरे सिर मढ़ते रहे थे । न उन्हें प्रमोशन मिल पाई, न ही वे कोई काम साध पाए । उल्टे उनके ऑफिसर्स ने पॉलीटिकली खूब फायदे लिए ।

इसके लिए भी वे मुझे ही कसूरवार मानते हैं। मैं बहुत गुड लुकिंग नहीं हूं। उनके साथ उनकी पार्टियों में शामिल नहीं हो पाती । उनके दोस्तों के लिए घर पर कॉकटेल आयोजित नहीं कर पाती । इससे उन्हें लगता है कि उनके जिन साथियों की पत्न्यिों ने इस तरह के काम किए वे उनसे आगे बढ़ गए हैं और बेहतर पोजीशन पर हैं। वरना उनमें काबलियत की कोई कमी नहीं है…..”

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उसकी बातें सुनते हुए मेरे सामने अपने दोस्त निर्मल का चेहरा आ गया । निर्मल वाकई बहुत ब्रेनी इंसान है । बड़ी से बड़ी गुत्थी वह चुटकी में हल कर सकता है। मैं और निर्मल स्कूल में एक साथ पढ़े हैं। बाद में वह पुलिस सर्विसेज में चला गया और मैं यहां इंटेलीजेंस में आ गया। मुझे याद है कुछ महीनों पहले उसने एक नंबर देकर मुझसे इसकी डिटेल निकालने को कहा था । एसएचओ चाहें थाने का मालिक होता है, पर थाने से बाहर उसकी कुछ खास नहीं चलती । पर जिस सिस्टम में मैं था, मेरे लिए यह बहुत छोटी सी बात थी । पिन, पैटर्न, पासवर्ड ये सभी बाहरी ताले हैं । हमारे पास ऐसी सुरंग है जिससे हम किसी के भी घर में दाखिल हो जाते हैं और सारी खोज खबर निकालकर ऐसे वापस आ जाते हैं कि उसे पता भी नहीं चलता । शुरू-शुरू में मुझे यह बहुत रोमांचक लगता था । पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, मुझे अब इसमें कोई खास लुत्फ नहीं आता । बस ऐसे ही बेमन से मैंने अपने दोस्त के दिए नंबर की डिटेल उसे चार-पांच बार लगातार ईमेल की थी । सोशल साइट्स ने हमारी सहुलियतें और बढ़ा दी हैं । यहां सब चुपके-चुपके खास बातें करते हैं और हम चुपके-चुपके इन खास बातों के खास डिब्बों में बड़े आराम से घुस जाते हैं। ऑनलाइन वर्ल्‍ड में आया कोई भी संदेश सुरक्षित नहीं है। हम किसी को, कभी भी क्रेक कर सकते हैं। किसी मैसेज को डिलीट करना हमारे लिए सबसे बचकाना शब्द है। हर फाइल की, हर संदेश की कई बैकअप फाइलें ऑटोमैटिक क्रिएट हो जाती हैं । जिन्हें हम कभी भी निकाल सकते हैं। रही बात सूचनाओं की, तो हमारे ज्यादातर पेज हमने सिर्फ सूचनाएं लीक करने के उद्देश्य से ही बनाएं हैं । ऐसी सूचनाएं जो दूसरों को भ्रम में डालने के लिए फैलाई जाती हैं। मैं जो ईमेल अपनी टीम को करता हूं उनमें से ज्यादातर ऐसी ही गाइडेड मिसाइल्स होती हैं, जो बस भेजने के लिए भेजी जाती हैं। जबकि असल सूचनाएं हम अपने अलग सिस्टम के इस्तेमाल से भेजते हैं। ओह, मैं फिर अपने बारे में बातें करने लगा। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए।

वह कुछ बोल रही है, मुझे उसकी बातों पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान देना चाहिए –

“अब जब मैंने जीना शुरू किया है, हंसना शुरू किया है, उन्हें तकलीफ होती है। वो मुझे परेशान करना चाहते हैं और मैं परेशान नहीं होती।”

“आप क्यों ख्वामखाह परेशान हो रहीं हैं । मुझे तो कुछ याद भी नहीं है कि था क्या, उस सबमें।”

“मैं भी तो यही जानना चाहती हूं कि आखिर मैंने ऐसा क्या गुनाह कर दिया, जिसकी वे मुझे लगातार धमकी दे रहे हैं?”

अब मुझे उसकी चैट का एक-एक शब्द याद आ रहा था । वह अपने किसी दोस्त के साथ खूब आत्‍मीयता से चैट किया करती है । उसे अपनी दिन भर की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बात सांझा कर रही थी । एक बार को मुझे भी लगा था कि दोनों के बीच काफी कुछ खास है। पर फिर मैंने कहा न, मुझे अब इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है। मैं अब सिर्फ किसी कसाई की तरह काम करता हूं। संवेदनाओं का ताला मैंने लगभग बंद कर दिया है।

“अगर वो आपके साथ ऐसा करते हैं तो यह बहुत गलत है….” यह मैं क्या बोल गया? आखिर मुझे बुरा क्यों लग रहा है। मैंने एक दोस्त होने के नाते अपने दोस्त का साथ दिया है । कल को मुझे कुछ जरूरत होगी, तो वह भी मेरा इसी तरह साथ देगा । बिना कुछ भी पूछे।

“नहीं नहीं, आप परेशान न हो । मैंने कहा न, अब मुझे कुछ बुरा नहीं लगता । बल्कि आदत हो गई है, उनके इन तानों, उलाहनों की।”

“फिर भी, आप परेशान न हों, छोटे-मोटे मन मुटाव होते रहते हैं, सबकी लाइफ में।”

“हां, जिनके आप जैसे मददगार हों, उनकी जिंदगी में मोटे-मोटे होते हैं।”

“हा, हा, हा” मैंने हंसते हुए माहौल को हल्का करने की कोशिश की । वह भी मुस्कुरा रही है, मुझे देखकर खुशी हुई।

“दोस्तों की मदद करना कुछ गलत तो नहीं।”

“अभी हंसते हुए आपको लगा कि मैं मुंह फाड़ के हंसती हूं?” उसने अप्रत्याशित सवाल किया।

“नहीं तो, मुझे तो ऐसा कुछ खास नहीं लगा।” असल में मुझे उसका खिलखिलाना अच्छा लगा था।

“अब देखिए न, आपकी जगह अगर मेरे सामने वो, यानी मेरे पति बैठे होते तो निश्चित ही मुझे डांट पड़ जाती, वो अक्सर कहते हैं कि मुझे हंसना नहीं आता, मैं बेशऊर हूं। पहले उनकी मां कहती थी कि मुझे खाना बनाना नहीं आता। उनके दोस्तों की पार्टियों से लौटकर मुझे सुनने को मिलता कि मुझमें ड्रेसिंग सेंस नहीं हैं। मैं हाईहिल पहनकर बिल्कुल नहीं चल पाती, इस पर भी कई बार बेइज्जत हुई हूं मैं। और अब देखिए न मैं बदचलन भी हो गई ….आपकी मदद से।”

ओह, अचानक जैसे किसी ने कोई सूईं चुभो दी हो, ऐसा अहसास हुआ मुझे और वह कितनी सहजता से इतनी बड़ी बात कह गई।

“सॉरी टू नो देट, अगर वो ऐसा सोचते हैं।”

“नहीं नहीं कोई बात नहीं, आप क्यों दिल छोटा करते हैं। मुझे तो इस सब की आदत हो चुकी है।”

“एनीवे आप ध्यान रखिए। जिंदगी में प्राथमिकताएं बदलती रहती हैं। जो कुछ हुआ, उसे भूल जाइए और बच्चों को देखिए।”

“जी शुक्रिया। पर नहीं, अब नहीं भूल पा रही हूं। मैं सब कुछ भुला कर दोबारा से अच्छे रिश्ते की शुरूआत कर रही थी, लेकिन आप दोनों के इस कृत्य ने भविष्य की अपार संभावनाओं को तहस-नहस कर दिया। बेडरूम में दी गई गालियां बुरी तो लगती हैं, पर इतनी बुरी नहीं लगती, जितना अब लग रहा है।

उनके दिमाग पर तो सनक सवार है। पर आपने क्या किया? आपने अपने संसाधनों और सुविधाओं का गलत इस्तेमाल किया है ।

जिंदगी के साधारण मसलों के लिए बहुत बड़े संसाधन इस्तेमाल नहीं करने चाहिए। जिस सबके लिए उन्होंने आपकी मदद ली, अगर साफ मन से कुछ दिन मेरे साथ बैठ जाते, तो क्या मैं न बता देती? क्या जरूरी है कि छोटे से प्रतिशोध के लिए हम अश्वात्थामा की तरह इतने आक्रोशित हो जाएं कि अपने विशेष गुणों को हथियारों की तरह इस्तेमाल कर जिंदगियां तहस-नहस कर दें? छोटी सी नोंक-झोंक को उन्होंने ऐसे घृणित मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया…. ।

जहां रिश्तों की उधड़ी सीवन के लिए स्‍नेह की सूईं की जरूरत थी, आप अश्वात्थामा की तरह ब्रह्मास्‍त्र चला बैठे…. बिना यह सोचे कि इसका अंजाम क्या होगा….

सुनंदा को जानते हैं न ? मेरी बहुत अच्छी दोस्त थी वो । आज भी अंकल जब किसी वीआईपी गाड़ी को देखते हैं तो पत्थर मारना शुरू कर देते हैं। वे अपनी जिद्दी बेटी की किसी भी मनमर्जी से इतने आहत नहीं हुए, जितने उसकी आत्महत्या से हुए । कसूरवार आप ही के जैसा कोई खास दोस्त था, जिसने अपने अधिकारों, सुविधाओं का गलत इस्तेमाल किया। कम से कम जिंदगी के साधारण मसलों में देश के असाधारण संसाधनों का इस्तेमाल आप लोगों को शोभा नहीं देता । मैं तो मजबूत हूं । सब कुछ झेल गई, आगे भी झेल जाऊगी । पर हर औरत मेरी तरह ढीठ या कहें कि मजबूत नहीं होती । किसी और औरत के साथ ऐसा मत कीजिएगा । अब मुझे चलना चाहिए । बेटी के कोचिंग से आने का वक्त हो गया। नमस्कार । ईश्वर आपको खूब तरक्की दे।”

जंगल में दरख्तों को बुरी तरह हिलाती हुई किसी तेज हवा की तरह उसके शब्‍दों ने मेरे पूरे वजूद को हिला दिया। और मैं तय नहीं कर पाया कि मैं दरख्त हूं या पूरा जंगल…. या फिर द्रौपदी के सामने बंधा पड़ा अश्वात्थामा । नहीं मुझे दुआ नहीं चाहिए…. मैं कहना चाहता था ।

“मैंने कुछ नहीं किया। मुझे तो याद भी नहीं….” और मैं बस इतना कह पाया ।

वह पर्स और थैला उठाकर उसी थकी हुई सी मद्धिम चाल से चलते हुए वहां से चली गई । उसकी दुआ ने जैसे मुझे निशस्त्र कर दिया । हजारों हजार बेडिय़ों में बंधा मैं जैसे जंगल में एकदम अकेला रह गया था। इससे कैसे निकलूं क्या मुझे बढ़कर माफी मांगनी चाहिए? क्या मैं माफी मांगना चाहता हूं? नहीं मेरी ड्यूटी कहती है कि मुझे मुकर जाना चाहिए । क्या मैं सचमुच मुकर जाना चाहता हूं कि मैंने कुछ नहीं किया?

कहानीकार- पत्रकार और लेखिका योगिता यादव ने दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और जी न्यूज के साथ काम किया है। पत्रकारिता और समसामयिक लेखों के साथ-साथ कविताएं व कहानियां लिखती हैं। अपने शिल्प और कहन के तरीके से आपने साहित्य जगत का ध्यान तेजी से अपनी ओर आकृष्ट किया है । आपकी कविताओं में जहां स्त्री की अन्तःचेतना विस्तार पाती है वहीं कहानियों में जीवन और उसके संघर्ष को शब्द मिलते हैं। ईमेल- yyvidyarthi@yahoo.co.in.

64 thoughts on “योगिता यादव की कहानी- अश्वत्थामा पुन: पुन:

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