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सोशल मीडिया: कड़े कानूनों की दरकार- वेदप्रकाश

अब जब सोशल मीडिया भिन्न-भिन्न रूपों में धड़ल्ले से विकृति फैलाने का जरिया बन रहा है, तब उस पर कडे कानून क्यों न लगें? हाल ही में सरकार की बार-बार चेतावनी के बावजूद इंटरनेट मीडिया के नए नियमों का पालन नहीं करने पर टि्वटर का इंटरमीडियरी दर्जा खत्म किया गया है। सोशल मीडिया मूलतः एक ऐसी संकल्पना है, जिसमें समाज अपने विचारों, सूचनाओं, फोटो,ऑडियो, वीडियो अथवा संदेशों का संप्रेषण स्वयं करता है। यह व्यक्ति एवं समाज को आपस में जोड़ने का माध्यम है, जो इंटरनेट से चालित होता है। इसके अंतर्गत फेसबुक, यूट्यूब, व्हाट्सएप, ट्विटर, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, जियो चैट, मैसेंजर आदि प्लेटफार्म विद्यमान है। बड़ा प्रश्न है कि क्या सभ्य और शिक्षित समाज में निरंकुश संप्रेषण उचित है? क्या इससे अव्यवस्था नहीं फैलेगी? पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म विशेष रुप से फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप के साथ सरकार की तकरार जारी है।

विगत महीनों में कृषि कानूनों के विरोध में हिंसक प्रदर्शन, स्वीडन की पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग की ओर से शेयर किया गया टूलकिट, ट्विटर द्वारा लद्दाख के कुछ हिस्से को चीन के नक्शे में दिखाया जाना, ट्विटर पर कोरोना एवं  वैक्सीन को लेकर भ्रम और भय फैलाने वाली बातें और इसी प्रकार जाति संप्रदाय एवं क्षेत्र विशेष के आधार पर इन विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तरह-तरह के संदेश प्रसारित हो रहे हैं। शासन- प्रशासन द्वारा इस तरह के संदेशों पर कार्यवाही करने के लिए बार-बार निर्देश दिए गए, किंतु ये सभी प्लेटफार्म चुप हैं। इस प्रकार के संदेशों और कुछ अन्य महत्वपूर्ण  चिंताओं को देखते हुए हाल ही में केंद्र सरकार ने नए आईटी नियमों ( इन्फार्मेशन टेक्नोलॉजी इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल एथिक्स कोड रूल्स 2021) को लागू किया है। इन नए नियमों के अनुसार सभी इंटरमीडियरी को अपनी वेबसाइट और एप्प दोनों पर शिकायत अधिकारी का नाम, उसके संपर्क का विवरण और शिकायत करने का तंत्र प्रमुखता से प्रकाशित करना होगा। शिकायत अधिकारी 24 घंटे के भीतर संदेश प्राप्ति के स्रोत की पुष्टि करेगा और 15 दिनों में शिकायत का निपटारा करेगा, इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म को 36 घंटों में इंगित की गई सामग्री और इंगित  की गई अश्लील सामग्री को 24 घंटे में हटाना होगा आदि। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म निरंतर निजता के अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे की दुहाई दे रहा है एवं कहीं न कहीं मनमाने ढंग से अपनी सेवाएं जारी रखे हुए है। पूर्व में भी माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि मूलभूत अधिकार की भी एक सीमा होती है। अगर इसका टकराव कानून व्यवस्था, सामाजिक शांति और देश की संप्रभुता से होने लगे तो वैसे मामले में अधिकार सीमित हो जाते हैं। वैसे भी जरूरी होने पर पोस्ट के मूल सृजनकर्ता की जानकारी साझा करने का प्रविधान कई देशों में है।

हाल ही में केंद्र सरकार ने नए आईटी नियमों ( इन्फार्मेशन टेक्नोलॉजी इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल एथिक्स कोड रूल्स 2021) को लागू किया है। इन नए नियमों के अनुसार सभी इंटरमीडियरी को अपनी वेबसाइट और एप्प दोनों पर शिकायत अधिकारी का नाम, उसके संपर्क का विवरण और शिकायत करने का तंत्र प्रमुखता से प्रकाशित करना होगा। शिकायत अधिकारी 24 घंटे के भीतर संदेश प्राप्ति के स्रोत की पुष्टि करेगा और 15 दिनों में शिकायत का निपटारा करेगा, इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म को 36 घंटों में इंगित की गई सामग्री और इंगित  की गई अश्लील सामग्री को 24 घंटे में हटाना होगा आदि।

निश्चित रूप से भारतवर्ष में पिछले कुछ वर्षों से लगातार अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर सामाजिक शांति और देश की संप्रभुता के लिए खतरा पैदा किया जा रहा है। यह भी सर्वविदित है कि संदेश के मूल सृजनकर्ता की जानकारी साझा करने का निर्देश अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे देशों में कानूनन आवश्यक हो चुका है, फिर व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर को भारत में इन नियमों को मानने में परहेज क्यों हो रहा है? सोशल मीडिया के इतिहास पर विचार करें तो फेसबुक वर्ष 2004, यूट्यूब 2005, ट्विटर 2006, व्हाट्सएप 2009, इंस्टाग्राम 2010 और स्नैपचैट 2011 से अस्तित्व में आए, किंतु देखते ही देखते इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने विकसित देशों की बजाए विकासशील देशों को बहुत तेजी से अपनी चपेट में लिया। आज दुनियाभर में इनका अरबों डॉलर का व्यापार है। आज दुनियाभर में सोशल मीडिया उपभोक्ताओं की संख्या करीब 3.20 अरब है, जिसमें 21 फीसद हिस्सेदारी के साथ चीन सबसे आगे है। भारत हिस्सेदारी में 12 फीसद के साथ दूसरे स्थान पर है। भारत में सोशल मीडिया उपभोक्ताओं की अनुमानित संख्या करोड़ों में है- व्हाट्सएप के 54 करोड़, फेसबुक के 53 करोड़, यूट्यूब के 41 करोड़, इंस्टाग्राम के 21 करोड़, टि्वटर के 3 करोड़ और स्नैपचैट के 6 करोड़ उपभोक्ता  हैं। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन आफ इंडिया व केंटर क्यूब की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2025 तक यह आंकड़ा लगभग 90 करोड़ पर पहुंच जाएगा,  इसमें अहम बात यह भी है कि शहरों की तुलना में ग्रामीण भारत में यूजर्स की संख्या ज्यादा हो जाने का अनुमान है। एक समाचार पत्र में छपे आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 10 एक्टिव इंटरनेट यूजर्स में से 9 हर दिन इंटरनेट का उपयोग करते हैं, प्रतिदिन प्रत्येक एक्टिव यूजर 107 मिनट यानी 1.8 घंटे इंटरनेट पर बिताता है, वर्ष 2020 में 62.2 करोड़ एक्टिव इंटरनेट यूजर्स थे। विचारणीय यह भी है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अधिकांशतः निशुल्क दिए जाते हैं, जबकि इंटरनेट डाटा के लिए उपभोक्ता को अच्छा खासा भुगतान करना पड़ता है। इसके मूल में एक बड़ा बाजार एवं पूंजीवादी सोच काम कर रही है। 1848 में कार्ल मार्क्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र में लिखा था- अपने उत्पादों के बाजार की तलाश बुर्जुआ को पूरे भूमंडल में दौड़ाती है। इसे अपना नीड सर्वत्र बनाना है, इसे हर जगह बसना है, इसे अपना संबंध सर्वत्र फैलाना है। आज पूंजीपति देशों के  उन्मुक्त व्यापार और उदारीकरण की भावना का मूल बाजारीकरण बन चुका है।

आज इंटरनेट मीडिया, सोशल मीडिया के सहारे गांव गांव, गली गली एक समृद्ध बाजार विकसित कर चुका है। जब इंटरनेट मीडिया बाजार है तो फिर उस पर कड़े नियम-कानून क्यों नहीं? यह भी सत्य है कि सकारात्मक ढंग से सोशल मीडिया का प्रयोग बहुत प्रभावित हो सकता है, कुछ लोग अपनी प्रतिभा एवं कैरियर के लिए इसमें खूब संभावनाएं बना रहे हैं, लेकिन भारत जैसे देश में इसका नकारात्मक प्रयोग करने वालों और व्यर्थ में समय गंवाने वालों की संख्या अधिक दिखाई दे रही है, सही जानकारी कम और भ्रम, भय और उन्माद फैलाने के लिए व्हाट्सएपी, फेसबुकी और टि्वटरी योद्धा दिन प्रतिदिन जन्म ले रहे हैं।

लोकमंच पत्रिका, संपादक, डॉ अरुण कुमार
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युवा आबादी भारत की असली ताकत है, जिस पर विकसित देशों की भी नजर है, कहीं यह सोशल मीडिया का जाल उसे उलझाए रखने के लिए तो नहीं है, यह चिंतनीय है। सरकार द्वारा लागू किए गए नए नियमों को समूचा विपक्ष अभिव्यक्ति और निजता के अधिकार पर हमला बता रहा है, यह भी आज गंभीर चिंतन का विषय है। विगत वर्षों में देश के नेतृत्व, विभिन्न महत्वपूर्ण सरकारी योजनाओं, देश की आवश्यकताओं के अनुरूप नए कानूनों, सामाजिक एकता, सांप्रदायिक सद्भाव आदि  विभिन्न प्रयासों में सोशल मीडिया की नकारात्मक भूमिका निभाई है। कुछ लोग सोशल मीडिया के जरिए निरंतर देश की छवि खराब करने का  काम कर रहे हैं, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उनके विरुद्ध कार्यवाही क्यों नहीं करता? ऐसे में आवश्यक है- सोशल मीडिया को लेकर कड़े कानून बनाए जाएं।  सोशल मीडिया के लिए कड़े कानून बनाने से जहां नागरिकों के अधिकारों की रक्षा होगी, वहीं सोशल मीडिया के सहारे फैलाई जा रही अशांति, भ्रम,भय, उन्माद आदि से व्यक्ति समाज एवं राष्ट्र को बचाया जा सकेगा।

लेखक- डॉ. वेदप्रकाश, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।  

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