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रामनारायण शुक्ल: एक क्रांतिकारी की उत्तर-कथा- शशांक शुक्ला

स्मृति आलेख- 4

मैं ब्रह्मराक्षस का सजल- उर शिष्य

होना चाहता

जिससे कि उसका वह अधूरा कार्य,

उसकी वेदना का स्रोत

संगत, पूर्ण निष्कर्षों तलक

पहुंचा सकूँ। ” ( ब्रह्मराक्षस – मुक्तिबोध )

काशी हिंदू विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग

रामनारायण शुक्ल (1995-2021)

उत्तर चेतना में अतीत का आख्यान

व्यक्तित्व का पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध

प्रश्न है कि किसी व्यक्तित्व के पूर्वार्द्ध और उसके उत्तरार्द्ध में किस प्रकार का संबंध निर्धारित किया जा सकता है? क्या इस संबंध में किसी गणितीय संबंध स्थापित किया जा सकता है? एक व्यक्ति के जीवन को रेखीय ढंग से नहीं देखा जा सकता। एक मार्क्सवादी कवि या चिंतक भी एक सीधी रेखा पर नहीं चला करता। कई बार वैचारिक ढंग से किसी बिंदु का विस्तार पूरे जीवन काल चलता रहता है, किन्तु उसी रूप में नहीं। जटिल, संश्लिष्ट रूप में । बहुधा होता है कि किसी व्यक्तित्व का जीवन एकबारगी दूसरी दिशा की तरफ़ मुड़ जाता है। मार्क्स से ऐंगल्स की मुलाकात…श्री अरविंद का क्रांतिकारी से आध्यात्मिक धारा की ओर मुड़ना…या इसी तरह के अन्य उदाहरण। इसी प्रकार एक लेखक का पूर्वार्द्ध और उसका उत्तरार्द्ध भी होता है। कई बार कोई लेखक अपने बीज बिंदुओं का ही विस्तार करता चलता है तो कभी दूसरे विषयों से कथ्य को आच्छादित कर लेता है। परंपरावादी लेखक बीज बिंदुओं का विस्तार करते हैं तो रोमांटिक या क्रांतिकारी लेखक नए-नए कथ्यों को जोड़ते चलते हैं। वैचारिक रूप से दृष्टि अन्तरव्याप्त चेतना है। किसी व्यक्तित्व के जीवन में आकस्मिक रूप से कोई ऐसी घटना घट जाती है कि वह अपने जीवन को एक नए धरातल पर पाता है।

रामनारायण शुक्ल का पूर्वार्द्ध शास्त्र और परंपरा पर केंद्रित रहा है। किंतु उत्तरार्द्ध प्रगतिशील जीवन दृष्टि पर केंद्रित। इस बदलाव में एक वैचारिकता, एक दृष्टि की भूमिका कार्य कर रही थी। वस्तुतः इस संदर्भ में क्या कोई सिद्धांत निर्धारित किया जा सकता है? हर व्यक्तित्व का एक मूल बिंदु होता है। हर व्यक्तित्व को एक मूल कार्य से अपने को जोड़ना पड़ता है। हर व्यक्तित्व एक मूल चेतना से संचालित होता है। समस्या यह होती है कि कई व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को व्यवसाय और भौतिक धरातल तक ही पकड़ पाते हैं; किन्तु चेतना के स्व का निर्धारण कर लेने पर व्यक्ति अपने लक्ष्य को पा लेता है।

गति का ठहराव अर्थात उत्तर-कथा

सन 1994-95 तक रामनारायण शुक्ल के जीवन का सर्वोत्तम रूप अभिव्यक्त हो चुका था। नाटक-रंगमंच का मंचन समाप्त हो चुका था। साहित्यिक-राजनीतिक संगठन छूट चुके थे। अध्यापक-संघ की राजनीति पीछे की बात हो चली थी। शरीर अब थकने लगा था। हालांकि ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल शोध संस्थान’ में आपकी सक्रियता 92 से 95 तक अति तीव्र रूप में रही है। संस्थान की पत्रिका ‘नया मानदण्ड’ के आप सहायक संपादक तो थे ही, साथ कार्यक्रमों में भी आपकी विशिष्ट भूमिका थी। सन 1995 के बाद संस्थान में आप की सक्रियता में कमी आ गई थी। क्रांतिधर्मी चेतना में आवेग अधिक होता है। ऊर्जा का आवेग एक सीमा के बाद मंथर पड़ने लगता है। मोतियाबिंद ने अध्ययन को प्रभावित करना प्रारंभ कर दिया था। पारिवारिक उत्तरदायित्व भी बढ़ चले थे। क्रांतिधर्मी चेतना अपने आवेग में मद्धिम पड़ने लगी थी। इन सब के बीच एक चीज़ अभी भी बचा रह गया था-आपका अध्यापक रूप…अध्यापक व्यक्तित्व। सन 1999 तक यानी ब्रेन हैमरेज होने तक आपका अध्यापन रूप भाश्वर होता रहा। कक्षा में कथ्य और विषय के साथ आपकी आंखों में एक चमक आ जाती। यह चमक बुझे हुए जीवन स्वप्नों के कारण आती। छात्र पाठ्यक्रम से बाहर झांकने लगता। आप ख़ुद अपने जीवनानुभूति से कथ्य को जोड़ते चलते। एक कौंध सी दिखती, और गायब हो जाती। यह कौंध एक ‘वैचारिक सत्य’ से ज़्यादा ‘स्वप्न’ की होती।

रामनारायण शुक्ल छात्रों के बीच पहले भी लोकप्रिय थे, किन्तु तब उनके अध्यापन रूप के साथ उनका संगठनकर्ता व्यक्तित्व, आंदोलनकारी रूप, संस्कृतिकर्मी रूप भी साथ-साथ चलते। किन्तु अब अध्यापक रूप ही बचा था। रामनारायण शुक्ल के उत्तरार्द्ध जीवन के छात्र केवल उनके अध्यापक रूप से परिचित थे…और संतुष्ट थे। इस बीच छात्र आपके संगठनकर्ता व्यक्तित्व, आंदोलनकारी रूप की आभा तो पाते, किन्तु वे उसे अनुभूत न कर पाते। उन छात्रों को यह विश्वास करना कठिन था कि छात्रों के बीच आत्मीय भाव से रहने वाला उनका यह अध्यापक एक समय विभाग में क्रांति की मशाल लिए हुए चला करता था। वे उस रूप से सर्वथा अनजान थे।

विभागीय राजनीति का उफ़ान थम चुका था। पुराने लोग प्रायः सेवानिवृत्त हो चुके थे। ‘रसूख’ की दृष्टि से सेवानिवृत्त मठाधीशों का वर्चस्व कम न हुआ था। रामनारायण शुक्ल के परिवार के लड़कों की नियुक्ति न हो पाए, इस हेतु विभाग के कुछ अध्यापक संयुक्त बैठक करते, योजना बनाते, फ़ोन करके नाम कटवाते, साक्षात्कार में जाकर नियुक्ति में बाधा बनते…आदि। इन सब नकारात्मक माहौल के बीच भी विभाग के सदस्यों के प्रति आपके मन में ‘भीतरी कटुता’ न थी। विभाग और विभागीय सदस्य आपके लिए पहली प्राथमिकता रहते, परिवार के विस्तार रूप में। यहां एक घटना का उल्लेख करना उचित होगा। आपके लड़के का विवाह समारोह था। विवाह की तैयारियां चल रही थीं। विवाह के आमंत्रण पत्र छप कर आ गए थे। प्रश्न उठा कि सबसे पहले किसका नाम लिखा जाए, कहाँ से शुरू किया जाए? रामनारायण शुक्ल ने कहा कि-” विभाग के लोगों का नाम सबसे पहले लिखो…विभागीय सदस्यों को सबसे पहले आमंत्रण पत्र देना है। …….विभाग परिवार है”। घर से किसी ने कहा कि -” जिस विभाग के लिए आप ऐसा सोचते हैं, वही विभाग आपके लड़कों के पीछे पड़ा है…आपके पीछे पड़ा रहा…।” इस बात पर आप कुछ देर सोचते रहे और फ़िर बड़े दार्शनिक अंदाज़ में कहा-” देखो! इसी विभाग ने मान-प्रतिष्ठा, पहचान भी दी है… फ़िर दूसरों के लिए अपने ‘मूल चरित्र’ को कभी बदलना नहीं चाहिए…।” मुझे लगा कि जैसे जीवन को कोई सूत्र मिल गया-” दूसरों के लिए अपने मूल चरित्र को मत बदलो…”। विभागीय अंतर्विरोध, वैचारिक अंतर्विरोध से ‘मन की मृदुता’ कम नहीं होनी चाहिए।

सन 1999 रामनारायण शुक्ल जी के जीवन के लिए ‘राहु’ बनकर आया। 2 जनवरी 1999 की रात आपको ब्रेन हैमरेज हुआ। तब आप विश्वविद्यालय परिसर में रहते थे। 12 घंटे तक आप कोमा में रहे और 20 दिन तक अस्पताल में । तब मैं एमए प्रथम वर्ष का छात्र था। यह मेरा दुर्भाग्य था कि मैं उनके अध्यापन के स्वर्णिम काल को कुछ महीने ही देख सका था। ब्रेन हैमरेज ने आपकी ‘स्मृति’ और अध्यापन को गहरे स्तर तक प्रभावित किया। एकाध साल लग गए, स्मृति के पूर्व रूप आने में। फिर भी उनमें वह प्रवाह न था। संस्कृत साहित्य के आपके गहन ज्ञान की सूक्तियां बीच-बीच में आकर पूर्व रूप की झलक दे जातीं। मेरे लिए यह देखना बहुत कष्टकारी था। बीच-बीच में मैं उनसे साहित्यिक चर्चाएं करता। पश्चिमी साहित्य और क्लासिक लिटरेचर के आपके ज्ञान से मैं विमुग्ध होता, हालांकि यह आपके ‘जीवन का अवसान काल’ था, फिर भी ऐसा बहुत कुछ सूत्र था, जिसे मैं अपनी चेतना में आत्मसात कर सकता था।

मस्तिष्क आघात ( ब्रेन हैमरेज ) के 2-3 वर्ष रामनारायण शुक्ल की मानसिक संरचना की दृष्टि से उथल-पुथल का था। समय के साथ स्मृति संयोजन तो हो गया, किन्तु उसमें पूर्व की गति न आ पाई। व्यक्तित्व अब ‘वर्तमान’ से विमुख होकर ‘अतीत’ पर केंद्रित हो चला था। अतीत अब ‘आलंबन’ था। वर्तमान अब ‘उद्दीपन’ था। दृष्टि और विचारधारा अभी भी वही। आलोचना में दृढ़ता भी वही थी और कथन भंगिमा में भी वही ध्वनि…। वे पूछते मुक्तिबोध को कौन पढ़ा रहा है? मेरा उत्तर सुनकर वे निराश भाव में कहते-” मुक्तिबोध को बिना मार्क्सवादी हुए नहीं समझा जा सकता…।” इसी प्रकार मीर, ग़ालिब की कविता को रीतिकालीन हिंदी कवियों से श्रेष्ठ बताते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी करना हो या संस्कृत कवियों के जीवन बोध को प्रगतिशील ढंग से देखने के बिंदु बताना, यह सब स्फुट ढंग से आप बताते रहते। डॉ देवराज ने 1967 में लिखे एक पत्र में रामनारायण शुक्ल की आलोचना दृष्टि की विशेषता ‘संस्कृत साहित्य का गहन ज्ञान’ बताया था, एक महत्वपूर्ण उपलब्धि। ‘वस्तुवादी परिप्रेक्ष्य और प्राचीन साहित्य’ पुस्तक डॉ देवराज जी की टिप्पणी का विस्तार है। आपकी ‘वस्तुवादी परिप्रेक्ष्य और प्राचीन साहित्य’ पुस्तक हिंदी आलोचना में संस्कृत कविता को वस्तुवादी ढंग से देखने का पहला व्यवस्थित कार्य है.. हिंदी आलोचना का अपने ढंग का अनूठा कार्य। यह समय आपके वैचारिकता के आवर्त्तन, आवृत्ति का था। पुराने विचार ही जीवनानुभूति से रंग कर नए रूप में सामने आ जाते। वे विचार एक ‘कौंध’ की तरह आते…। डॉ रामनारायण शुक्ल मानते थे कि-” आलोचना के दो मुख्य रूप होते हैं। एक, आलोचना वह होती है जो किसी ऊंचाई पर पहुंच कर निसृत होती है और दूसरी आलोचना वह होती है, जो अपनी आलोचना के बीच ही स्फुलिंग निसृत करती चलती है…एक कौंध के समान।”। रामनारायण शुक्ल की आलोचना दूसरे प्रकार की आलोचना थी।

लोकमंच-पत्रिका-पोस्टर
लोकमंच-पत्रिका-पोस्टर

सन 2002 तक आपका सेवाकाल रहा। सत्र लाभ की दृष्टि से 2003 तक। इस बीच हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष के दायित्व का निर्वहन भी आपने किया। सेवानिवृत्ति के पश्चात आपका पढ़ना-लिखना छूट चुका था। लेकिन साहित्य की गतिविधियों के प्रति आप हमेशा जागरूक रहते। हिंदी विभाग में कोई संगोष्ठी होती तो वे जिज्ञासा प्रकट करते-” कौन-कौन आया है…किसने क्या बोला..” और फिर अपनी टिप्पणी…। मैं जब कोई पत्रिका लाता तो पूछते किसके लेख हैं? कुछ प्रमुख लेखकों के लेख वे मुझसे पढ़वाते। फिर उस पर टिप्पणी करते। ये टिप्पणियां बहुत मूल्यवान होतीं। एक बार उन्होंने मुझसे ‘बोध’ और ‘दृष्टि’ का अंतर समझाया था। इसी प्रकार इतिहास, ऐतिहासिक, इतिहासाश्रित शब्दों का अंतर बताया था। रामचंद्र शुक्ल और हज़ारी प्रसाद द्विवेदी विवाद पर वे कहते कि;” देखो शुक्ल जी आलोचक बड़े हैं और द्विवेदी जी शोधकर्त्ता बड़े हैं…..द्विवेदी जी का रचनाकार रूप बड़ा है”। कई बार अचानक से आपको कुछ सूत्र याद आ जाते। तब उर्ध्वबाहु हो कुछ सूत्रात्मक टिप्पणियां करते। मुझे लगता जैसे कोई संस्कृत का ऋषि वेद मंत्रों का वाचन कर रहा हो। मैं आधी बात समझता और आधी न समझ पाता। मुझे लगा कि मैंने उनके जीवन का श्रेष्ठ रूप खो दिया है। तब मैं ‘अबोध’ था। साहित्य की गहनता न समझ सका। हां कहीं चेतना के गहरे, भीतरी रूप में वे मेरे साथ हैं। मैं अपने को उनकी ‘उत्तरार्द्ध चेतना का प्रतिरूप’ मानता हूँ। एक गुरु से जो भी मिले, वह एक शिष्य के लिए ‘मूल्यवान’ होता है। चेतना को शब्द-अर्थ देने की जिम्मेदारी शिष्य की होती है।

“मैंने तो विचार बोये थे…”

21 वीं सदी का प्रथम दशक था। अपने मध्य ताप में जैसे सूर्य प्रखर हो जाता है, वैसे ही काल का मध्य ताप भी होता है। व्यक्तित्व का भी। प्राकृतिक नियमों में विस्तार और संकुचन चलता ही रहता है। भौतिक जगत में अवसान के नियम स्पष्ट हैं, किन्तु वैचारिक जगत में, चेतना जगत में विस्तार-अवसान के नियम सपाट नहीं होते। चेतना में अमूर्तता होती है…और सूक्ष्मता भी…। उसका प्रसार काल की स्थूलता का अतिक्रमण कर जाता है। कभी-कभी रामनारायण शुक्ल को लगता कि -” मेरे कार्य, योजनाएं, स्वप्न अधूरे राह गए…नुक्कड़ नाटक, रंगमंच…शिष्य बिखर गए…”। अंतिम दिनों में निराला ने भी अपने को इसी तरह याद किया है-

“स्नेह निर्झर बाह गया है

रेत सा ज्यों तन रह गया है

आम की यह डाल जो सूखी दिखी,

कह रही है-” अब यहां पिक या शिखी

नहीं आते; पंक्ति में वह हूँ लिखी

नहीं जिसका अर्थ-

जीवन दाह गया है …. में अलक्षित हूँ; यही

कवि कह गया है”। ( निराला )।

प्रश्न है कि क्या इतिहास में कोई विचार पूरी तरह समाप्त होता है? इतिहास और विज्ञान में रूपांतरण होता है- विचार और पदार्थ का। वसंत महिला महाविद्यालय में साक्षात्कार की तिथि तय हो गई थी। हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास लिखने के दम्भ से ग्रस्त एक आलोचक के नेतृत्व में एक मीटिंग हुई। तय किया गया कि शशांक का अपॉइंटमेंट नहीं होने देंगे। निश्चित तिथि को साक्षात्कार की प्रक्रिया सम्पन्न हुई। एक्सपर्ट के रूप में दिल्ली की एक प्रतिष्ठित आलोचिका का आगमन। साक्षात्कार का परिणाम प्रतिकूल रहा, यह तो सामान्य तथ्य हुआ; किन्तु जब यह मालूम चला कि आलोचिका ने उद्घोष किया था कि -“शुक्ला जी के घर के लड़के का चयन नहीं होने दूंगी… ” तो बड़ा आश्चर्य हुआ। रामनारायण शुक्ल को आलोचिका से अपनी शत्रुता का इलहाम तक न था। मेरे एक अत्यंत सुहृद आचार्य ने रहस्योद्घाटन किया-” शुक्ल जी ने एक बार मंच से आलोचिका का विरोध किया था…लगता है वही बात उनके मन में अभी तक चुभी हुई है…”। मेरे लिए यह कोई आश्चर्य न था। हिंदी जगत इस प्रकार की राजनीति से ग्रस्त है, इस बात का एहसास मुझे पहले से था। घर में आपकी पत्नी को मालूम चला था वे बिफ़र पड़ीं-” आप ने कितना कांटा बोया है…आपके बोये कांटे घर के लड़कों को कब तक चुभेंगे….”।

रामनारायण शुक्ल ने एक गहरी सांस ली, अतीत की कोई विशिष्ट बात बोलने से पूर्व प्रायः वे ऐसा करते थे, और कहा- “…मैंने तो विचार बोये थे…. चाहता था कि गलत का प्रतिरोध करने की चेतना निर्मित कर दूं….; लेकिन लगता है ये तथाकथित बड़े लोग सच नहीं सुनना चाहते…बस अपने अनुकूल बात सुनना चाहते थे…”। मुझसे तब आपने एक सीख दी-” देखो! सक्षम होकर भी कभी ‘प्रतिकार’ न लेना…बड़े लोग माफ़ कर देते हैं…मेरा विरोध वैचारिक था, व्यक्तिगत न था; अफ़सोस इस बात का है कि उन्होंने इसे ‘व्यक्तिगत’ समझा….”। एक पूर्व के प्रसंग को बताते हुए उन्होंने कहा था- ” एक संत साहित्य के मर्मज्ञ ने एक बार मुझसे कहा था कि -“शुक्ल जी, हम लोग जानबूझकर आपको भड़काते है.. जिससे आप उत्तेजित हो जाएं…आप गुस्से में ही अपनी योजना बता देते और हम उसी के अनुसार अपनी रणनीति बनाते…”। हिंदी विभाग में इस प्रकार की राजनीति ने बहुत से लोगों की प्रतिभा को , उनकी ऊर्जा को व्यर्थ किया है।

सन 2008 के प्रारंभिक महीनों में ही मैं हैदराबाद आ गया। अब घर जाने की अवधि वर्षों में हो चली थी। जब भी घर जाता तो उनके निकट जाकर लेट जाता। घंटो आस-पास निःशब्द रहना भी एक कष्टकारी प्रक्रिया थी। मौन का भी एक तनाव होता ही है। आपको कोई मानसिक कष्ट न हो, इसलिए साहित्यिक चर्चा से मैं प्रायः बचने का प्रयास करता। सोते-सोते आप अचानक बैठ जाते और कभी वाल्मीकि रामायण के श्लोक बोलने लगते, कभी महाभारत के तो कभी कालिदास, भवभूति के। इसी प्रकार पश्चिमी साहित्य के दुर्लभ प्रसंगों को भी अनायास मूर्त कर देते। मुझे तब आप ब्रह्मराक्षस की तरह दिखते, जो अभी भी शिष्य को देने के लिए तड़प रहा हो। हार्वड फ़ास्ट के स्पार्टकस की याद करते हुए कहने लगते-” जीवन मुख्य है…जीवन होगा तभी तो संघर्ष करेंगे….” । उन्हें जैसे एक-एक संवाद याद था। एक-एक अनुभूति को जीना…स्मृतिबद्ध करना…। घंटो आप किसी साहित्यिक प्रसंगों की चर्चा करते रहते। मैं मौन भाव से सुनता रहता। यदि यह कहा जाए कि आपके अंतिम 20 वर्ष ज्ञान-दान की तड़प में गुजरे हों तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। इन 10 वर्षों में मेरे घर जाने की अवधि भी कम होती चली गई। उम्र और बिमारी ने आपको निरंतर कमज़ोर किया। आपको देखकर लगता कि ‘कोई तपस्वी लेटा है’। बाद के समय में हाल-चाल पूछते। उर्ध्वबाहु हो आशीर्वाद देते। स्थूल चेतना के रूप में ढल कर सूक्ष्म रूप धारण कर लेता है। इस सूक्ष्म में काल का विस्तार और वृत्तियों की सार्वभौमिकता समाहित हो जाती है। गुरु और शिष्य ऐसे ही कालप्रसारी घटक हैं।

डॉ शशांक शुक्ल, लोकमंच पत्रिका
डॉ शशांक शुक्ल, लोकमंच पत्रिका

लेखक- डॉ शशांक शुक्ला, एसोसिएट प्रोफ़ेसर, हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय, सांबा, जम्मू और कश्मीर। ईमेल- parmita.shukla@gmail.com, मो- 9917157035, 6006966505

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