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शहंशाह इडिपस-(सोफोक्लीज) एक ग्रीक त्रासदी- शशांक शुक्ला

सोफोक्लीज यूनान के प्रसिद्ध लेखक एवं दार्शनिक हैं। सोफोक्लीज का समय 497-494 ईसा पूर्व से लेकर 400 ईसा पूर्व तक माना जाता है। सोफोक्लीज ने 23 नाटक लिखे थे।  अभी 23 नाटकों में से 7 नाटक उपलब्ध हैं- फिलोक्टटीज, एन्टीगोने, इडिपस टिरेन्स, इडिपस एट कोनोनस, एजैक्स, इलेक्ट्रा और ट्राचीनिमाई। अपने पिता की हत्या और अपनी ही माँ से विवाह’ शहंशाह इडिपस की सबसे बड़ी त्रासदी है। पढ़ें, डॉ शशांक शुक्ला का आलेख-


‘इडिपस’ सोफोक्लीज की 429 ईसा पूर्व में लिखित एक ग्रीक ट्रेजडी है। यूरिपिडीज, सोफोक्लीज तथा अन्य ग्रीक ट्रेजडी लेखकों की कृतियों से गुज़रते हुए यह एहसास होना सहज़ ही है कि इतनी समृद्ध त्रासदी रचना परंपरा के होते हुए यदि पश्चिम में (ग्रीक में ) “त्रासदी सिद्धांत” का निरूपण हुआ तो कोई आश्चर्य का विषय नहीं। यह स्वाभाविक था कि ग्रीक साहित्य परंपरा में ही त्रासदी का ‘साहित्य-सिद्धांत’ निरूपित होता। स्मरण रहे कि भारतीय साहित्य परम्परा के मूल में भी ‘करुणा’ रही है। क्या ‘करुणा’ और ‘त्रासदी’ के मध्य किसी प्रकार की साम्यता-असाम्यता का निर्धारण किया जा सकता है? ‘करुणा रस’ के मूल में भी त्रासद जीवन स्थितियां होती हैं, किन्तु उनका लक्ष्य केवल ‘त्रासद जीवन स्थिति’ का निरूपण करना नहीं होता; अपितु उन त्रासद जीवन स्थिति के प्रति एक कारुणिक जीवन दशा का निर्माण करना भी होता है। इस प्रकार “कारुणिक जीवन दशा”, “त्रासदी पूर्ण जीवन दशा” से ऊपर उठकर एक ‘दार्शनिक स्थिति’ प्राप्त कर लेता है। ‘रामायण’ एवं ‘महाभारत’ के अंत को क्रमशः ‘करुणा’ एवं ‘निर्वेद’ के रूप में देखा गया है। ‘रामायण’ में सीता के भूमि में चले जाने की स्थिति राम के लिए व्यक्तिगत स्तर पर ‘त्रासदी’ है, किन्तु सम्पूर्ण कथा-योजना में राम के कर्तव्य निर्वाह  ( लव-कुश एवं राज्य की देखभाल, संचालन ) के भविष्यकालिक संकेत लिए हुए भी हैं। इस प्रकार कारुणिक दृश्य, दुःखपूर्ण जीवन स्थिति को भी दार्शनिक रूप में ढाल देता है। यहां करुणा ‘हृदय का विस्तार’ कर देता है और ‘भोक्ता’ तथा ‘पाठक’ अपने भीतर संकुचित ‘बद्ध’ धारणाओं से व्यापक चेतना का अनुभव महसूस करता है।

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‘शहंशाह इडिपस’ मूल रूप से “जीवन की विडंबना पूर्ण स्थिति का संकेत करने वाली त्रासदी” है; किन्तु इस त्रासदी में विडम्बना मनुष्य और देवता के द्वंद्व को भी अपने भीतर समेट लेती है। नाटक के अंत में कोरस द्वारा कही गई पंक्ति-“याद रखो! इन्सान को,  कभी अपना अन्जाम नहीं भूलना चाहिए, और कोई भी शख़्श; तब तक खुशकिस्मत नहीं कहा जा सकता, जब तक, वो अपनी ख़ुशियों को क़ब्र तक साथ न ले जाए।” इस तथ्य को पुष्ट करती है कि मानवीय जीवन नियति ( देव ) द्वारा संचालित है और अपने आप में निरुपाय भी…। सम्पूर्ण त्रासदी में जिस प्रकार ‘देवता के फ़ैसले का इंतज़ार ‘ पात्र करते हैं, उससे यह बात और पुष्ट ही होती है। जैसा कि हम जानते हैं कि यह त्रासदी ईसा पूर्व 429 में रचित है। उस समय तक मनुष्य दैव-विधान द्वारा अपनी चेतना को संचालित करे, तो क्या आश्चर्य ?

कहानी का सार यह है कि – ग्रीस के थीब्स के महाराज की मृत्यु के पश्चात थीब्स का राजकाज संभालने वाले क्रिओन ने स्फिंग्स महामारी  का सफ़ाया करने वाले इडिपस को थीब्स का राज्य और अपनी विधवा बहन देकर पुरस्कृत किया। उसके पूर्व  इडिपस  अज्ञानतावश अपने पिता का वध लुटेरा समझकर कर चुका है। इडिपस परिस्थिवश और अज्ञानता में अपनी  मां एपिकास्टे ( जोकास्टा ) से शादी कर लेता है। माँ को जब इडिपस की वास्तविकता पता चलती है, तब वह आत्महत्या कर लेती है। इडिपस अपनी आंखें फोड़ लेता है और अज्ञातवास को चला जाता है।  तत्पश्चात क्रियान थीब्स का राज्याधिकार ग्रहण करता है। उसके पूर्व की घटना इस नाटक के केंद्र में नहीं है। यूनान में फैली मौखिक कहानियों के एक अंश को आधार बनाकर सोफोक्लीज ने यह नाटक लिखा है। 

‘शहंशाह इडिपस’ नाटक इडिपस के राजा बनने के पश्चात की घटनाओं से प्रारंभ होता है। कथानक प्रारंभ होता है- ग्रीब्स शहर से। ग्रीब्स शहर महामारी की चपेट में है। देववाणी का प्रत्यादेश है कि डेल्फी लायस ( राजा ) के अदण्डित हत्यारे को दंड देने पर महामारी रुकेगी। बीच-बीच में कोरस और नेत्रहीन भविष्यवक्ता टायरेसिथस  का कथन है- ” भविष्य का वह पूर्व-ज्ञान कितना करुण होता है जो जानने वाले के लिए अशुभ हो।”  भी चलते रहते हैं। इडिपस जब अपने पिता के हत्यारे को खोजते हुए भविष्यद्रष्टा के पास पहुंचता है, तब उसका जवाब -” तुम जिस क़ातिल को खोज़ रहे हो, वह तुम ख़ुद हो”। टायरेथियस, इडियस के लिए भयावह विनाश की भविष्यवाणी करता है।

इडिपस का अपना जीवन विचित्र घुमावों और पेचीन्दगी लिए हुए है। शाह पोलिब्स की मृत्यु के पश्चात इडिपस उसका उत्तराधिकारी बनाया जाता है। इडिपस पोलिब्स का पालित पुत्र है। नवजात इडिपस को लायस के एक गड़ेरिये ने शाह पोलिब्स को सौंप दिया था। इडिपस को श्राप है कि वह अपने पिता की हत्या करेगा और अपनी मां से विवाह करेगा। श्राप से बचने के लिए वह राज्य से भाग जाता है, किन्तु अपनी नियति से नहीं भाग पाता। जिस मां की कोख़ से वह जन्मा है, उसी कोख़ से बच्चे पैदा करता है। इन्हीं घुमावों-मोड़ों को नाटक में पकड़ा गया है।

नाटककार का संकेत है कि इडिपस को उसके ‘ज्ञान-गर्व’ ने मिटा दिया। ‘मनुष्य समस्या और निदान स्वयं ही है। पाप बहिर्गत समस्या नहीं, यह तो एक आंतरिक रहस्य है और यह उसके अपने घर से ही शुरू होता है।” इस दृष्टि से इडिपस मनुष्य के भौतिक ज्ञान के प्रतीक रूप में आता है। टायरेसियस दैवी ज्ञान या नियत/नियति ज्ञान के प्रतीक रूप में आया है। जीवन में ‘भौतिक ज्ञान’ और ‘नियत ज्ञान’ में संघर्ष होता है। यह त्रासदी नैतिकता और विडंबनाओं के ताने-बाने से बुनी गई है। फील पांवों वाले उडियास जीवन के शोध पथ का परिचायक है। नाटक के अंत में सोफोक्लीज की टिप्पणी है-” दे ते फ़ेबुल ” अर्थात ” यह तुम्हारी अपनी ही कथा है”।

ग्रीक ट्रेजडी में ‘कोरस’ का महत्वपूर्ण स्थान होता है। भारतीय नाटकों में जिस प्रकार ‘सूत्रधार’ और ‘नट-नटी’ का प्रयोग उद्बोधन और नाटकीय मोड़ों की सूचना देते हैं, उसी प्रकार पश्चिम में ‘कोरस’ भी करते हैं। ग्रीक त्रासदियों में कोरस नियति की विडम्बनाओं के संकेतक रूप में भी आते हैं। सोफोक्लीज ने कोरस का उपयोग जनचेतस रूप में भी किया है। इडिपस की गर्वोक्ति -” सल्तनतें दौलत और इन्सानों के जोर पर जीती जाती हैं” के समानांतर कोरस का कथन-” ऐ शहंशाह! जिंदा इन्सानों का शहंशाह बन, वीरानों का नहीं”, अपने आप में एक प्रतिरोध रचती हैं।

नाटक के अंत में पात्रों के माध्यम से कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां कराई गई हैं। क्रियान का कथन देखें-” एक बेगुनाह इन्सान को मुज़रिम समझना और एक बुरे इन्सान को अच्छा समझना , बज़ान-ए-ख़ुद एक संगीन ज़ुर्म है। एक वफ़ादार दोस्त को दुतकारना, अपनी ज़िंदगी को दुत्कारने के बराबर है”। इडिपस का कथन देखें-” आवारा ख़्यालात ज़्यादा कारगर नहीं होते”। कोरस -” चंद बेमानी अल्फ़ाज़ के लिए, एक दोस्त को छोड़ देना अच्छी बात नहीं।” क्रि यान -“बिलावजह गुस्सा और मजबूर होकर रहम करने वाला इन्सान, मुश्किलात में ही पड़ता है”। कोरस-” गरूर ज़ालिम इंसान का हथियार-ए-ख़ास होता है। लेकिन ये गरूर आसमान जैसी बुलन्दियों से ज़्यादा ही तबाही की गहराइयों में आकर गिरता है।” कोरस-” वक्त के धारे वक़्त-वेवक्त सबको उछालते हैं”। कोरस -” याद रखो! इन्सान को , कभी अपना अंज़ाम नहीं भूलना चाहिए, और कोई भी शख़्श; तब तक खुशकिस्मत नहीं कहा जा सकता, जब तक, वो अपनी खुशियों को कब्र तक साथ न ले जाए”। इसी प्रकार ढेरों उक्तियाँ नैतिक और विडम्बनापूर्ण जीवन पर गहनता पूर्वक टिप्पणी करती हैं।

‘शहंशाह इडिपस’ नाटक जीवन की नियति और पेंचीदगी का आख्यान है। यूनान के ट्रैजिक नाटकों में यह ट्रैजिक नाटक अपनी विडम्बनापूर्ण स्थिति के कारण विशिष्ट स्थान रखता है। पश्चिम की ट्रेजडी में परिस्थितियों और नियति के दासत्व का विधान किया गया है। इस प्रकार का चित्रण अर्थात ‘नियति के दासत्व’ का विधान भारतीय कृतियों में नहीं मिलता। भारतीय महाकाव्यों में ‘नियति और परिस्थितियों के भोक्ता’ के रूप में पात्रों का विधान किया गया है। भोग में दासत्व नहीं, बाध्यता होती है। राम, युधिष्ठिर का वनगमन करुणा में ढल जाता है। “करुणा वैयक्तिक नहीं, सामूहिक होती है”। पश्चिम में त्रासदी वैयक्तिक स्तर पर घटित होती है। “करुणा व्यक्तिगत होकर भी  अपने चरित्र में सामूहिक” होती है।

पश्चिम में “नैतिकता और विडम्बना” का द्वंद्व रच गया है। ‘शहंशाह इडिपस’ नाटक में “नैतिकता और विडम्बना का ही द्वंद्व” रचा गया है। डी एच लारेंस का ‘संस एंड लवर्स’ हो या शेक्सपियर के ट्रैजिक नाटकों में “नैतिकता और विडम्बना का द्वंद्व” ही क्रियाशील है। इस प्रकार सोफोक्लीज प्रारंभिक प्रस्तावक के रूप में हमारे सामने आते हैं। भारत में यह द्वंद्व “नैतिकता और अनैतिकता” के बीच रचा गया है। विडम्बना में अनैतिकता के लिए परिस्थितियों का बहाना कारक हो जाया करता है, किन्तु अनैतिकता का भोक्ता पात्र-चरित्र ही होते हैं; और वहीं उसके लिए जिम्मेदार होते हैं। ‘द्रौपदी का चीरहरण’ विडंबनात्मक कृत्य नहीं है, अनैतिक कृत्य है।

अतियथार्थवादी आंदोलन जब उग्र हुआ तो विडम्बना का स्थान मनोवृत्ति-अवचेतन आदि तत्वों ने ले लिया है। विडम्बना का दोषारोपण परिस्थिति पर किया जा सकता है, किन्तु ‘वृत्ति का दोषारोपण’ विडंबनात्मक खाँचे में नहीं डाला जा सकता। ‘Oedipus the king’ फ़िल्म 1967 में फिलिप साविले के निर्देशन में रिलीज़ हुई थी। फिल्म काफ़ी प्रभावी बनी है। नाटक और फिल्म की तुलना करें तो फिल्म ज़्यादा प्रभावी दिखती है। ट्रैजिक जीवन को पढ़ कर नहीं, देखकर ज़्यादा समझा जाता है। यह सुखद संयोग है कि ट्रैजिक कृतियों की विधा पश्चिम में प्रमुख रूप से नाटक रहे हैं। एक और बात समझने ही यह है कि पश्चिम की हर क्लासिक कृति ‘अपूर्ण’ या ‘अधूरी’ होती है। भारतीय परंपरा में हर कृति को ‘पूर्ण’ रूप में प्रस्तुत करने पर बल है, किन्तु ऐसा पश्चिम में नहीं है।

‘इलियड’, ‘ओडिसी’ महाकाव्य को ही देखें, वे कितने ‘अपूर्ण’ हैं। शेक्सपियर के दुखान्त नाटक कितने ‘अपूर्ण’ हैं। पश्चिमी परम्परा में एक बड़ी जनश्रुति ( या इतिहास ?) को आधार बना कर अलग-अलग कोणों से ढेरों रचनाएं लिखी गईं। ये रचनाएं अलग-अलग पक्ष को उभारती हैं।  पश्चिम में अपूर्ण जीवन का सौंदर्यशास्त्र रचा गया है। एक ही  कथा पर वहां ढेरों कोणों से बात कहने की कोशिश की गई है। ढेर सारे कथानक- उपकथानक, लोक कथाएं, फ़िल्में एक ही थीम पर बनी हैं….और अपने आप में सभी पूर्ण हैं….और अपूर्ण भी…। विरोधाभास-सा दिखने वाला यह तथ्य इस बात का संकेत करता है कि मनुष्य अपूर्णता में  पूर्णता तलाश कर रहा है। ट्रेजडी की यह खासियत होती है कि वह जीवन के एक पक्ष को ही उठा सकती है। ट्रेजडी का अंश सम्पूर्ण जीवन नहीं बन सकता, ट्रेजडी का सिरा एक ख़ास अंश पर सघन होता है, जैसे कमरे को एक जगह ले जाकर रख देना होता है।

इस प्रश्न को भी समझा जाना चाहिए कि भारत में कथानक और पात्रों का सहअस्तित्व साथ-साथ चलता है। इतिहास विचित्र ढंग से यहां मिथक में रूपांतरित हो जाता है। पश्चिमी लेखन परंपरा में ‘मिथ को इतिहास’ बनाने की चिंता है। भारतीय लेखन परंपरा की चिंता ‘इतिहास को मिथ’ बनाने की समस्या है…। इतिहास अपने आप में नैतिक-अनैतिक स्थूलताओं से मुक्त होता है। आप चाहें तो इसे नैतिक खाँचे में फिट कर दें, यह आपकी समस्या है। “इतिहास, कर्ता और कर्म के बीच क्रिया की विडंबना” है। पश्चिम की लेखन परम्परा में इस विडम्बना को पकड़ा गया। भारत में इतिहास, “क्रिया और कर्म के बीच कर्ता की सचेतन उपस्थिति” है। इस मार्ग और प्रक्रिया को समझ लेने पर बहुत से प्रश्न उत्तरित हो उठते हैं। वैसे इतिहास सीधे-सीधे उत्तर नहीं देता, बस उत्तर-संकेत करता है।

सभ्यता के प्रसार-क्रम में विडम्बनाएं मनुष्य केंद्रित होने लगी हैं। आज ‘आर्टिफिशियल इंटेलीजेंश’ यानी ‘कृत्रिम बुद्धि’ तक कि मनुष्य की यात्रा में परिस्थितियों की बनावट से ज़्यादा मनुष्य की बुद्धि द्वारा निर्मित परिस्थितियों द्वारा व्यक्ति ज़्यादा पीड़ित है। आज का मनुष्य अपने व्यक्तित्व द्वारा विघटन की स्थितियां निर्मित कर चुका है। विज्ञान और तकनीकी प्रगति ने मनुष्य को बौद्धिक रूप से इतना सक्षम बना दिया है कि अब वह अपने को परिस्थितियों और नियति का दास नहीं समझता। अब वह अपने को परिस्थितियों का नियंता समझता है। भौतिक और वैज्ञानिक प्रगति ने आज के मनुष्य को तकनीकी सक्षमता तो प्रदान कर दी है, किन्तु मानसिक रूप से दुर्बल और अक्षम भी बना दिया है। आज के जीवन की विडंबनात्मक स्थितियां नियति द्वारा संचालित नहीं है, अपितु वह मनुष्य के व्यक्तित्व-विघटन के कारण है। इस दृष्टि से आलोच्य नाटक  को पढ़ा जा सकता है।

लेखक- डॉ शशांक शुक्ला, एसोसिएट प्रोफेसर एवं समन्वयक, हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय, सांबा, जम्मू और कश्मीर। ईमेल-parmita.shukla@gmail.com, मोबाइल- 9917157035, 6006966505

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