लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
सुजाता प्रसाद की कविता : शुद्ध थाली, हवा और पानी

पर्यावरण को देख के

धरती ने कहा हवा से

बहुत याद आएंगे ये आलम हमें भी

जब सब पल अच्छे गुज़र जाएंगे

अतीत के सुखद क्षण मुरझा जाएंगे

हवा ने फिर कहा धरती से, अफसोस

जब मैं घट जाऊंगी घट घट के बेहिसा

तब कैसे लोग जी पाएंगे घुट घुट कर।

तब ना जाने वह दिन कब आ पाएगा

धरती की कटोरी में हवा के चम्मच से

खुशियों भरा जलतरंग कब तरंगित हो पाएगा

थिरकता हर नक्शे की उंगली पर धुन सरगम

कब जन गण मन हरियाली गुनगुना पाएगा।

धरती बोली हंसते हंसते

बादल के गेशुओं से पानी बरस

हरी दूब और पात पर ओस टपके

अम्लीय वर्षा छोड़ दे अपनी अगुवानी

मानव जो छोड़ दे अपनी मनमानी,

ग्रीनहाउस एफेक्ट हो जाए प्रभावहीन

ग्लोबल वार्मिंग हो जाएगा दीन ही

जल संरक्षण, वृक्षारोपण की जो लें ये जिम्मेदारी

हाथ आएगी शुद्ध थाली, हवा और पानी,

प्रकृति के कैनवास पर तब खिलखिलाएगी

बहती नदिया,ठहरे पर्वत, हंसते जंगल की कहानी।

सुजाता प्रसाद

सुजाता प्रसाद, नई दिल्ली, भारत, ईमेल : sansriti.sujata@gmail.com

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