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लोकचेतना को समर्पित
रामनारायण शुक्ल: एक अध्यापक का सांस्कृतिक प्रयाण

स्मृति आलेख-3

काशी हिंदू विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग ( 1984-1994 )

नुक्कड़ नाटक से रंगमंच की ओर- लोक और क्लासिक का संयुक्त समवाय

यह स्मृति आलेख सन 1983 के बाद के घटना क्रमों को अपने भीतर समेटे हुए है। इन घटनाओं के केंद्र में काशी हिंदू विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग और रामनारायण शुक्ल हैं। राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा के केंद्र में नुक्कड़ नाटक थे। नुक्कड़ नाटक जन -जागरूकता के कारगर हथियार थे। कारण यह कि यह सीधे-सीधे जनता को संबोधित होते हैं। कथ्य में भी और पद्धति में भी। रामनारायण शुक्ल ने इसीलिए नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से जन जागरूकता के अभियान प्रारंभ किये थे। इन नुक्कड़ नाटकों में कुछ व्यंग्यात्मक नाटक भी थे और कुछ सत्ता व्यवस्था के अंतर्विरोध तथा मध्यमवर्ग के अंतर्विरोध पर आधारित नाटक भी। सन 1977 में चेख़व के नाटक ‘गिरगिट’ का मंचन किया गया, सन 1982 में ब्रेख्त के ‘लाइफ ऑफ गैलीलियो’ का बड़े स्तर पर मंचन हुआ। इन नाटकों का मंचन एकाधिक बार किया गया। राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा में नाटक, रंगमंच, जनगीत आदि केंद्रीय रूप में संचालित हो रहे थे। मोर्चे के लालबहादुर वर्मा बड़े इतिहासकार तो थे ही, कुशल अभिनेता और प्रतिबद्ध संस्कृतिकर्मी भी थे। रामनारायण शुक्ल के साथ लालबहादुर वर्मा जी ने कई नाटकों के मंचन में भाग लिया। जैसे 10-11 जून, 1982 को मालवीय भवन में आयोजित ‘लाइफ़ ऑफ गैलेलियो’ एवं 12-13 दिसंबर 1983 को कला संकाय प्रेक्षागृह में आयोजित ‘तबला बाजे धीन-धीन’।

रामनारायण शुक्ल अध्यापन के साथ रंगमंच को भी साथ लेकर चल रहे थे। इस प्रकार अध्यापन और संस्कृति के संयुक्त रूप बाद के दिनों में स्थायी रूप बन सके थे। सन 1983 तक मोर्चे के बिखराव के बाद रामनारायण शुक्ल कुछ दिनों तक शून्य की स्थिति में रहे। इसी बीच इक़बाल नारायण के बाद आर पी रस्तोगी विश्वविद्यालय के नए कुलपति नियुक्त हुए। रस्तोगी जी सांस्कृतिक अभिरुचि के प्रशासक थे। उन्होंने विश्वविद्यालय स्तर पर ऐसे व्यक्तित्व की खोज़ प्रारंभ कर दी, जो सांस्कृतिक कार्यक्रमों का व्यापक संयोजन कर सके। कई लोगों की एक ही सलाह थी-‘ इस कार्य के लिए एक ही अध्यापक उपयुक्त हैं- रामनारायण शुक्ल’। लिहाज़ा रामनारायण शुक्ल को काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ‘कल्चरल कमेटी’ का चेयरमैन बना दिया गया। इसी कल्चरल कमेटी के तत्वावधान में अगले एक दशक तक दर्ज़नों बड़े नाटक मंचित हुए। बाणभट्ट की आत्मकथा, आधे-अधूरे, गिरगिट, लाइफ़ ऑफ़ गैलीलियो, एक और द्रोणाचार्य, आषाढ़ का एक दिन…आदि अनेकों नाटक। कुछ नाटक तो एकाधिक बार मंचित हुए।

यहां कुछ नाटकों का नामोल्लेख करना उचित होगा। एक और द्रोणाचार्य नाटक वैसे तो प्रथम बार 24 फरवरी, 1982 को कला संकाय में मंचित हुआ था, किन्तु बाद के दिनों में उसकी कई प्रस्तुतियां हुईं। 1988 में स्वतंत्रता भवन में एक और द्रोणाचार्य की पंचम प्रस्तुति हुई थी। बाणभट्ट की आत्मकथा का मंचन 1986 ई में महिला महाविद्यालय में हुआ। मोहन राकेश के प्रसिद्ध नाटक आधे-अधूरे का मंचन कला संकाय प्रेक्षागृह में 1984 में हुआ था। इसकी अन्य प्रस्तुति भी बाद के दिनों में हुई थी। शंकर शेष के कोमल गंधार की प्रस्तुति स्वतंत्रता भवन में 1988 में हुई। जॉर्ज बर्नाड शा के नाटक मेजर बारबर का मंचन स्वतंत्रता भवन में 1989 में हुआ था। विश्वविद्यालय के कुलपति सम्मेलन में जयंत दलवी के नाटक ‘संध्या छाया’ का मंचन 1988 में स्वतंत्रता भवन में हुआ था। ऋत्विक घटक के ‘ज्वाला’ नाटक का मंचन मालवीय भवन में 1989 में हुआ था। इन नाटकों की एकाधिक प्रस्तुतियां हुईं। इन नाटकों में शुक्ल जी ख़ुद अभिनय भी करते और उनका संयोजन भी। इन नाटकों में कुछ नाटकों का निर्देशन इरावती जी ने किया था।

रामनारायण शुक्ल नाटक की एक-एक छोटी-छोटी बातों का ख़्याल रखते। अभिनेताओं के चयन से लेकर वेश-भूषा तक। नाटकों के अभिनय, निर्देशन, संयोजन की इन प्रक्रियाओं में महीनों लगते। दिन में कक्षाएँ लेते और शाम में नाटक की रिहर्सल देखते। इसी बीच में राजनीतिक भागीदारी और साहित्यिक लेखन का कार्य…ये सब एक साथ चलते रहते। रामनारायण शुक्ल कुशल संगठनकर्ता थे। पात्र के व्यक्तित्व के अनुरूप अभिनेताओं का चयन आपकी प्रतिभा सहज ही पहचान लेती। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में बाणभट्ट के रोल के लिए आपने डॉ के के त्रिपाठी का चयन किया था। खुद उस नाटक में आपने अघोर भैरव का अभिनय किया था। ‘कवि-दरबार’ में धूमिल की भूमिका भी आपकी अभिनय क्षमता का उत्तम उदाहरण है। शिवशंकर मिश्र की अभिनय क्षमता और स्वर-साधने को किस ढंग से इस्तेमाल करना है, इसे लाल बहादुर वर्मा और रामनारायण शुक्ल ने समझा था।

यहां हिंदी विभाग द्वारा आयोजित ‘कवि-दरबार’ नाटक का उल्लेख करना उचित होगा। ‘कवि-दरबार’ नाटक हिंदी विभाग का विशिष्ट प्रयोग था। भारतेंदु हरिश्चंद्र की शत वार्षिकी पर तय किया गया कि एक नाटक हिंदी के विभिन्न कवियों के ऊपर आयोजित हो। हिंदी के 24 कवियों को इस नाट्य मंचन में शामिल किया गया। यह नाटक मालवीय भवन में मंचित हुआ। यह तय किया गया कि 24 कवियों का अभिनय 24 व्यक्ति करेंगे। कार्यक्रम का संयोजन डॉ त्रिभुवन सिंह और डॉ शुकदेव सिंह कर रहे थे। कार्यक्रम के आंतरिक संयोजक के रूप में डॉ रामनारायण शुक्ल की विशिष्ट भूमिका थी। कुछ प्रमुख भूमिकाओं का उल्लेख करना उचित होगा। विद्यापति की भूमिका में अरुण कुमार, कबीर की भूमिका में भारत सिंह आज़ाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र की भूमिका में शिवशंकर मिश्र, जयशंकर प्रसाद की भूमिका में क्षमाशंकर पांडेय, निराला की भूमिका में आनंद नारायण पांडेय, मुक्तिबोध की भूमिका में अजय शुक्ल एवं धूमिल की भूमिका में रामनारायण शुक्ल ने काव्य पाठ किया था। धूमिल की भूमिका में आपने धूमिल को जीवंत रूप में प्रस्तुत कर दिया था। धूमिल आपके निकटस्थ थे। इस कारण भी आपका अभिनय जीवंत बन सका था।

रामनारायण शुक्ल की सांस्कृतिक यात्रा वैयक्तिक न थी। उनके साथ उनके शिष्य, अध्यापक तो सहयात्री थे ही, साथ परिवार के सदस्य भी इस आयोजन में सहभागी थे। ‘लाइफ़ ऑफ़ गैलेलियो’ में आपके लड़के अजय शुक्ल और सुपुत्री अलका शुक्ला ( अब त्रिपाठी ) की महत्वपूर्ण प्रतिभागिता थी। ‘आधे-अधूरे’ में राकेश के अभिनय के लिए अजय शुक्ल का चयन भी कम महत्वपूर्ण न था। ‘एक और द्रोणाचार्य’ में अश्वत्थामा के छोटे रूप के लिए अमित शुक्ल और बड़े रूप के लिए अजय शुक्ल का चयन भी रामनारायण शुक्ल की दूर-दर्शिता का परिचायक समझना चाहिए। ‘कवि दरबार’ में मुक्तिबोध के अभिनय में अजय शुक्ल का चुनाव हो या ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद’ नाटक में सिपाही की भूमिका में अजय शुक्ल का चयन…। आपकी इस यात्रा में पूरा परिवार जैसे सहयात्री हो गया हो। एक नुक्कड़ नाटक में तो आपकी धर्मपत्नी प्रभावती भी इंकलाबी गीत की तख्तियाँ लिए हुए नज़र आईं। क्रांति और संस्कृति की यात्रा का प्रस्थान ख़ुद से और अपने परिवार से ही होगा, आपकी जैसे दृढ़ मान्यता हो गई हो।

प्रश्न है कि साहित्य और रंगमंच का क्या रिश्ता है? एक अध्यापक जब नाटक और रंगमंच के माध्यम से या अपने अध्यापन के बीच इन तत्वों को शामिल करता है तो इसके क्या मायने होते हैं? साहित्य के भीतर रंगमंच और नाटक की शास्त्रीय और व्यावहारिक जानकारी पढ़ाई ही जाती हैं, किन्तु नाटक यदि प्रदर्शित न हो तो ? रामनारायण शुक्ल नाटकों के माध्यम से छात्रों के ‘बौद्धिक- परिष्कार’ को कर रहे थे। हिंदी विभागों में नाटकों का मंचन प्रायः मनोरंजन या शौकिया रूप में ही हुआ करता है। रामनारायण शुक्ल ने इसे ‘बौद्धिक प्रतिबद्धता’ या ‘संस्कार’ बनाया। रामनारायण शुक्ल के बाद हिंदी विभाग में एकाध नाटकों की प्रस्तुतियां ही सम्भव हो पाईं। इस बात से, तथ्य से रामनारायण शुक्ल के कार्य को , उनके महत्व को समझा जा सकता है।

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अध्यापक संघ और अध्यापन राजनीति

रामनारायण शुक्ल छात्रों के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे। इस लोकप्रियता का कारण आपका लोकतांत्रिक व्यवहार था, जिसमें छात्रों को बहस और असहमति की खुली छूट थी। असहमत होने वाले छात्रों को भी आप उसी भाव से स्नेह देते, यह आपके व्यक्तित्व के बड़प्पन का सूचक है। छात्रों को मित्रवत समझना, स्नेह देना और उनके भीतर जीवन के बड़े सपने निर्मित करना आपके अध्यापन के हिस्से बनते चले गए। अलग-स्लग पीढ़ी के छात्रों के आप समान रुप से प्रिय अध्यापक थे। कई छात्रों के विवाह कराने से लेकर जीवन को निर्देशित करने तक आप अपने गुरुतर रूप का निर्वाह करते रहे। अध्यापन आपका मूल व्यक्तित्व था। सन 1983 तक राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चे के बिखर जाने के बाद रामनारायण शुक्ल अकेले पड़ गए थे। कुछ दिन का शून्य…। इस बीच विभागीय राजनीति तीव्र हो चली थी। कई बार तो पाठ्यक्रम में अपनी पुस्तकों को लगवाने के लिए संघर्ष होता, विवाद होता…और कभी अपने शोध छात्र को अध्यापक बनवाने के लिए। कहने का अर्थ है कि विवाद की वजह बहुत बौद्धिक न थी। हां बौद्धिक चर्चाओं में असहमति के बिंदु कम न थे। छात्रों के बीच आप लोकप्रिय थे ही साथ ही अध्यापक साथियों के बीच भी आप एक उम्मीद थे। कुछ मित्रों ने अध्यापक राजनीति से जुड़ने का सुझाव दिया। महासचिव के पद पर आप विजयी हुए। विश्वविद्यालय की अध्यापक राजनीति से व्यावहारिक जुड़ाव का आपका यह अनुभव आप के लिए बहुत फायदेमंद न रहा, हां बहुत से दूसरे लोगों ने आपका फ़ायदा जरुर उठाया। विभागीय सहयोगी बलिराज पांडेय इसे कुंठित मध्यमवर्गीय व्यक्तियों द्वारा लाभ लेना कहते हैं। रामनारायण शुक्ल के शिष्य ओमप्रकाश द्विवेदी की टिप्पणी है कि -” शुक्ला जी सबसे ज़्यादा ईमानदार थे…समझदार भी बहुत थे …किन्तु दुनियादार न थे…”। अध्यापक संघ की राजनीति सैद्धांतिक संगठनकर्ता की भूमिका की मांग न करती थी, बल्कि इसमें व्यावहारिकता की मांग आधारभूत थी।

राम नारायण शुक्ल, लोकमंच पत्रिका
रामनारायण शुक्ल, लोकमंच पत्रिका

रामनारायण शुक्ल इससे पूर्व जनवादी मोर्चे के संगठनकर्ता की भूमिका का निर्वाह कर चुके थे। किंतु उस मोर्चे में एक स्वप्न था। यहां केवल संयोजन था- मध्यमवर्गीय मनोवृत्तियों का। बहुत से लोगों की व्यावहारिक मदद को ही अध्यापक संघ के योगदान के रूप में देखा जाए तो अलग बात है। हालांकि कुछ अध्यापक नेता आपको अध्यापक राजनीति का ‘भीष्म पितामह’ कहने लगे थे। जिसमें वैयक्तिक स्वार्थ कुछ न था। राजनीति की अपनी सीमाएं भी होती हैं। अध्यक्ष पद के निराशाजनक परिणाम ने आपको अध्यापक संघ की राजनीति से तो दूर किया, किन्तु आपकी अध्यापकीय प्रतिबद्धताओं से नहीं। रामनारायण शुक्ल मानते थे कि राजनीतिक समझ हर अध्यापक या लेखक के लिए अनिवार्य है। प्रतिबद्ध साहित्य में राजनीतिक समझ कुछ ज़्यादा ही अनिवार्य हो जाती है। कारण यह कि सत्ता और व्यवस्था के अंतर्विरोध, जटिलताएं बिना गहरी राजनीतिक समझ के पहचान में नहीं आ पातीं। रामनारायण शक्ल के व्यक्तित्व का एक रूप संगठनकर्ता का भी था। संगठनकर्ता व्यक्तित्व विभिन्न अंतर्विरोध को एक साथ संयोजित करता है। संयोजन क्रम में कई बार जटिलता उत्पन्न हो जाती है। अध्यापक संघ में राजनीतिक संयोजन एक व्यावहारिक प्रयोग था। प्रश्न यह भी है कि क्या विभागीय राजनीति की तीव्रता ने रामनारायण शुक्ल को अध्यापक संघ की राजनीति की ओर मुड़ने के लिए अभिप्रेरित किया? इसका सही जवाब तो यही हो सकता है कि ‘सैद्धांतिक राजनीति’ का एक सिरा ‘व्यावहारिक राजनीति’ के साथ ही पूर्ण हो सकता था।

रामनारायण शुक्ल मानते थे कि राजनीतिक समझ हर अध्यापक या लेखक के लिए अनिवार्य है। प्रतिबद्ध साहित्य में राजनीतिक समझ कुछ ज़्यादा ही अनिवार्य हो जाती है। कारण यह कि सत्ता और व्यवस्था के अंतर्विरोध, जटिलताएं बिना गहरी राजनीतिक समझ के पहचान में नहीं आ पातीं।

जसम- जन संस्कृति मंच

सन 1985 में जन संस्कृति मंच की स्थापना हुई। रामनारायण शुक्ल भी इसमें शामिल हुए। मंच द्वारा गुरुशरण सिंह को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया। अध्यक्ष के अतिरिक्त पूरे देश के स्तर पर पांच (05) उपाध्यक्ष भी चुने गए। रामनारायण शुक्ल भी राष्ट्रीय उपाध्यक्षों में से एक थे। इसी क्रम में सन 1986 में मंच की उत्तर प्रदेश इकाई का पहला सम्मेलन हुआ था। रामनारायण शुक्ल को उत्तर प्रदेश इकाई का अध्यक्ष चुना गया। जन संस्कृति मंच, राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा के बाद दूसरा ऐसा वैचारिक संगठन था, जिससे रामनारायण शुक्ल जुड़े रहे। ये वर्ष रामनारायण शुक्ल की वैचारिकता की परिपक्वता के थे। इन वर्षों में ही जनवादी लेखक संघ, वस्तुवादी परिप्रेक्ष्य और संस्कृत साहित्य जैसी कृतियाँ प्रकाशित हुईं। जसम एक वैचारिक संगठन था, किन्तु इस वैचारिकता में संस्कृति का योग कम न था। दूसरे वैचारिक संगठनों में लेखन की प्रतिबद्धता, पक्षधरता की बात तो होती थी, किन्तु उसमें संस्कृति और क्रियात्मक पक्षों की न्यूनता थी। प्रश्न है कि लेखक की वैचारिकता के लिए संगठन की अनिवार्यता क्यों हैं? प्रगतिशील आंदोलन के बाद संगठनात्मक कार्य व व्यवहार पर बल दिया जाने लगा था। लेखक की वैचारिकता को जैसे संगठनात्मक मज़बूरी ने आ घेरा हो।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल शोध संस्थान और आलोचक-रूप

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पौत्री कुसुम चतुर्वेदी जी ने ‘आचार्य रामचन्द्र शुक्ल शोध संस्थान’ की स्थापना रविन्द्रपुरी, वाराणसी में की थी। इस शोध संस्थान का उद्देश्य रामचंद्र शुक्ल के ऊपर नवीनतम शोध कार्य तो था ही, साथ ही साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन, साहित्यिक पुरस्कारों का आयोजन एवं साहित्यिक परिवेश का निर्माण करना भी था। सन 1982 ई में नामवर सिंह की दूसरी परंपरा की खोज़ पुस्तक प्रकाशित हुई थी। नामवर सिंह ने आचार्य शुक्ल को जिस प्रकार सामंती मनोवृत्ति में डालकर मूल्यांकन किया था, वह दुर्भाग्यपूर्ण था। ऐसे में लगा कि आचार्य शक्ल की आलोचना और उनकी जन-दृष्टि पर व्यवस्थित कार्य किये जाने की आवश्यकता है। कुसुम चतुर्वेदी जी के आग्रह पर रामनारायण शुक्ल शोध संस्थान से जुड़ गए। संस्थान की पत्रिका ‘नया मानदण्ड’ में साहित्यिक कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग भी होती थी और महत्वपूर्ण लेखों का प्रकाशन भी। इस पत्रिका में रामनारायण शुक्ल के कई महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुए।रामनारायण शुक्ल को आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना में ‘वस्तु-पक्ष’ की केन्द्रीयता दिखी। रामचंद्र शुक्ल बड़े आलोचक थे। किंतु नामवर सिंह जैसे आलोचकों ने ‘दूसरी परंपरा की खोज़’ में उन्हें प्रतिगामी आलोचक सिद्ध करने की असफ़ल कोशिश की। रामनारायण शुक्ल मानते थे कि आचार्य शुक्ल आलोचक बड़े हैं तथा द्विवेदी जी शोधकर्त्ता बड़े हैं। द्विवेदी जी के व्यक्तित्व में ‘भाववादी रुझान’ बहुत थे। संभवतः इसी कारण आलोचक के रूप में रामचंद्र शुक्ल के प्रति आपका आग्रह अधिक था। एक आलोचक अपने मत के प्रति दृढ़ होता है। आचार्य द्विवेदी कि आलोचना भाषा ‘संभावित निष्कर्षों’ को लिए हुए है। आलोचक की दृष्टि से यह उपयुक्त नहीं हैं। नामवर सिंह की पुस्तक में सरलीकरण का मार्ग पकड़ा गया है। रामनारायण शुक्ल मार्क्सवादी आलोचक हैं । वे मार्क्सवाद को जीवन बदलाव की पद्धति के रूप में देखते थे। नुक्कड़ नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के संचालन-निर्देशन के बीच आपकी आलोचना भी चलती रही। आलोचना व्यवस्थित जीवन की मांग करती विधा है। “जीवन के पार्श्व और निष्कर्ष की तलाश की साहित्यिक विधा”।

प्रश्न है कि क्या एक्टिविस्ट का व्यक्तित्व आलोचना के लिए बाधक है? आंदोलन, साहित्यकार और आलोचक को दृष्टि देते हैं। यह दृष्टि कोरी अकादमिक नहीं होती, अपितु गहन रूप में रचनात्मक होती है। हिंदी के बड़े साहित्यकार किसी-न-किसी आंदोलन और पत्रिका से जुड़े रहे हैं। इसलिए आंदोलन, आलोचना की गहनता के बोधक -रूप हैं। 1990 के पूर्व तक आपकी 6 स्वतंत्र पुस्तकें और एक संपादित पुस्तक प्रकाशित होती है। पत्रिका संपादन करते हैं और विभिन्न कार्यक्रमों का संयोजन। इसके साथ ही सैकड़ों लेख। यदि अंतिम बीस वर्ष आपकी रचनात्मकता निरंतर सक्रिय होती तो, हिंदी जगत को कुछ और श्रेष्ठ पुस्तकें प्राप्त होतीं। मुक्तिबोध आपके प्रिय कवि थे। ‘अंधेरे में’ कविता की मूल समस्या व्यक्तितवान्तरण बोध की समस्या है, यह स्थापना करने वाले आप हिंदी के पहले आलोचक हैं। मुक्तिबोध पर रामविलास शर्मा और नामवर सिंह के निष्कर्ष आपको असंगतिपूर्ण लगते रहे। ‘अंधेरे में’ कविता की महानता यह नहीं कि उसमें सत्ता के यथार्थ चित्रित हुए हैं, अपितु यह है कि किसी हिंदी कवि ने क्रांति के स्वप्न को लेकर पहली बार महाकाव्यात्मक वितान रचा है।

जनवाद आपकी आलोचना का आधार रहा है। निराला और आचार्य शुक्ल के भीतर आपको ‘जनवाद का वस्तुवादी रूप’ दिखा। धूमिल की कविता जितनी तीख़ी है, तल्ख़ है, अपने ‘निष्कर्षों में उतनी ही कमज़ोर’। रचना अपने भीतर के वैश्विक दृष्टि से महान बनती है। संस्कृत कवियों को वस्तुवादी परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास आपकी विशिष्ट आलोचना उपलब्धि है। इस ढंग से ‘संस्कृत कवियों का वस्तुवादी परिप्रेक्ष्य’ पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण है। ‘रूप और वस्तु’ पुस्तक सैद्धांतिक पुस्तक है। सैद्धांतिक आलोचना की पुस्तक के रूप में इसे पढ़ा जा सकता है। आपकी आलोचना के सैद्धांतिक आधारों के बिंदु इस पुस्तक में देखे जा सकते हैं। ‘भक्तिकालीन कविता और काव्य रूप’ एक शोध कार्य है। अपने ढंग का अकेला कार्य। आपकी हर आलोचना पुस्तक मौलिक है। ‘आंदोलनकारी -आलोचक’ मौलिक चेतना से युक्त होता है। समाज की परिवर्तनकामी शक्तियों की पहचान और उन्हें संगठित-संयोजित करने की छटपटाहट आपकी आलोचना के मूल में है। ‘जनवादी समझ और साहित्य’ पुस्तक जनवादी आलोचना की प्रस्तावना है। जनवाद की सैद्धांतिक-पीठिका। आपके सैकड़ों अप्रकाशित लेख यत्र-तंत्र बिखरे पड़े हैं। इनके प्रकाशन से आपकी आलोचना के नए आयाम सामने आएंगे। इतिहास में कुछ भी अंतिम कहाँ होता है। “इतिहास अपने को पुनर्रचित करने वाला चेतस कैनवास” है। इतिहास में पार्श्व कभी मुख्यांश बन जाया करता है। आंदोलन और रचना प्रेरणा का भी ऐतिहासिक महत्व होता ही है।

रामनारायण शुक्ल की आलोचना दृष्टि की विशेषता उनकी निर्भ्रांत दृष्टि में निहित है। वे अतिवाद या सरलीकरण करने के पक्षधर आलोचक नहीं हैं। कबीर की जीवन दृष्टि उन्हें आकर्षित करती है तो तुलसी का जीवन बोध। तुलसी जीवन बोध के बड़े कवि हैं। केवल विचारधारा के आधार पर तुलसी को ‘जड़वादी कवि’ मान लेना संतुलित दृष्टि नहीं है। नामवर सिंह व्यक्तिगत जीवन में तुलसी और अज्ञेय की पंक्तियां गाहे-बगाये उद्घृत करते रहते, किन्तु अपनी आलोचना में वे इन्हें प्रतिगामी सिद्ध करते रहते। ‘आलोचना का यह अवसरवाद’ नामवर सिंह की आलोचना को अप्रामाणिक बना देता है। रामनारायण शुक्ल रचनाकार के अंतर्विरोधों पर पर्दा नहीं डालते। तुलसी का जीवन बोध उन्हें पसंद है तो कबीर की प्रगतिशील जनवादी दृष्टि। रामनारायण शुक्ल की आलोचना में स्पष्टता है, कोई दुहराव या जटिलता नहीं। मुक्तिबोध, निराला, प्रेमचंद, धूमिल जैसे रचनाकार आपको पसंद हैं। इतिहास के गति क्रम में आधार और अधिरचना का द्वंद्व हमेशा चलता रहता है। बिना इस द्वंद्व पहचान के आलोचना प्रामाणिक नहीं बनती।

रामनारायण शुक्ल विचारधारा और जीवन बोध को संयुक्त करने वाले आलोचक है। बिना जीवन बोध के विचारधारा स्थायी नहीं हो सकती। इसीलिए भारतीय रसवाद, भारतीय साहित्य और पश्चिमी साहित्य के प्रति आप समान भाव से ऊर्जा ग्रहण करते हैं तथा अपनी आलोचना में आप समान रूप से उपयोग करते हैं। 20 वीं सदी का अंतिम दशक आपके लेखन की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा है। पुस्तक प्रकाशन के अतिरिक्त इसी समय में आपके कई महत्वपूर्ण आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे। यहां कुछ आलेखों का उल्लेख करना उचित होगा। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और दूसरी परंपरा की खोज़ के अंतर्विरोध, दस्तावेज़ पत्रिका में 1984 में प्रकाशित, कथा साहित्य, यथार्थ और आचार्य शुक्ल की लेखकीय संरचना, सं अरविंद कुमार, प्रकाशन , आचार्य रामचंद्र शुक्ल-सही परंपरा की खोज़, काशिका, सं शिवप्रसाद सिंह, 1985 में प्रकाशित, प्रगतिशील लेखक संघ के पचास वर्ष, जनसंस्कृति पत्रिका, सं अवधेश प्रधान, संत कबीर का समत्ववाद और आधुनिक साम्यवादी दृष्टि, श्री कबीर शांति संदेश, सं श्याम दास शास्त्री, प्रकाशन 1988, समकालीन रचनाशीलता की समस्याएं और चुनोतियाँ , कतार पत्रिका, सं बृजनंदन शर्मा, 1988-89, जनवादी गीतों की परंपरा, जनसंस्कृति पत्रिका में प्रकाशित, 1989 में प्रकाशन, मुक्तिबोध:काव्य प्रक्रिया और काव्य सर्जना, समकालीन हिंदी कविता का संघर्ष में संग्रहित, प्रकाशन 1990, नाटककार प्रसाद, नाट्य विधान और नाट्य भाषा, लेखन 1990, महाकवि प्रसाद कद अध्ययन के वस्तुगत आधार, लेखन 1990, छायावादोत्तर कविता, लेखन 1990, महाप्रस्थान और कवि नरेश मेहता, लेखन 1990, आधुनिक हिंदी कविता, लेखन 1990, आलोचक रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना, लेखन 1990, साठोत्तरी हिंदी कविता और धूमिल, लेखन 1990, हिंदी प्रेमकाव्य और कनुप्रिया, लेखन 1990, प्रेमचंद बड़े रचनाकारों के बीच में , जुलाई 1989, दैनिक जागरण में प्रकाशित, प्रसाद काव्य के वस्तुवादी मूल्यांकन की दृष्टि, लेखन 1991, महाकवि कालिदास और प्रसाद, मानदंड पत्रिका 1992, आचार्य शुक्ल और मुंडेश्वरी के समीक्षा सिद्धांत, लेखन 1994। इसके अतिरिक्त ढेरों अप्रकाशित लेख, व्याख्यान।

अध्यापन की सिद्धावस्था

1980 से 1990 के बीच में रामनारायण शुक्ल के अध्यापन के सिद्धावस्था के काल के रूप में देखना उचित होगा। अध्यापन के बीच आप इतने तन्मय हो जाते कि कथ्य के बीच से विचारों की श्रृंखला बनती चलती। भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन के बीच आवाजाही करती आपकी वक्तृत्व कला एक कौंध उत्पन्न कर देती। मुक्तिबोध, प्रेमचंद या किसी भी विषय पर आप बहुत मौलिकता के साथ अध्यापन करते। मुक्तिबोध पर विशेषज्ञ के रूप में आपकी ख्याति इतनी फ़ैल गयी कि इलाहाबाद और दिल्ली से सिविल की तैयारी करने वाले छात्र मुक्तिबोध को समझने आपके पास आते। दस-पंद्रह दिन का अध्यापन …निस्वार्थ…। सच्चा अध्यापक निस्वार्थ ही होता है, प्रतिदान की आकांक्षा से मुक्त।

रामनारायण शुक्ल जब कक्षा से निकलते तो छात्र-छात्राओं के झुण्ड आपको घेर लेते। घंटों की बहसें, तर्क-वितर्क। असहमति का स्वागत करने वाले अध्यापक। जो छात्र आपसे असहमति व्यक्त करते, वे ज़्यादा प्रिय होते। संवाद और तर्क-वितर्क को प्रोत्साहित करने वाले आप अनूठे अध्यापक थे। छात्र की अभिरुचि के अनुसार किसी छात्र को आप अपने सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जोड़ लेते तो किसी को अकादमिक कार्य से। शिवशंकर मिश्र की नाट्य प्रतिभा को आपने एकबारगी ही महसूस कर लिया था। हर छात्र को लगता कि आप उसे ज़्यादा स्नेह करते हैं, प्रेम करते हैं। वस्तुतः आप हर ‘छात्र की संभावनाओं से प्रेम’ करने वाले अध्यापक थे। इसीलिए आप हर छात्र से प्रेम करते। न केबल अपने शोधार्थियों से, अपितु दूसरे शिक्षकों के शोधार्थियों से भी। शोभाकांत गुप्त, अवधेश प्रधान, रामकली सर्राफ, श्रीकांत पांडेय, ओमप्रकाश द्विवेदी, जलेश्वर, आनंदवर्द्धन शर्मा, गोपाल प्रधान, पुष्प शिवशंकर मिश्र, रामप्रकाश कुशवाहा, पुष्पा अवस्थी, शिवकुमार पराग, देवेंद्र, दिनेश कुशवाहा, जंगबहादुर सिंह, अरुण कुमार, भूरेलाल मिश्रा, उमापति दीक्षित, नंदकिशोर पांडेय, विनय मिश्र, सुरेश्वर त्रिपाठी, गायत्री माहेश्वरी , दिनेश प्रताप सिंह, अनुराग कुमार, हितेंद्र मिश्र, मनोज सिंह, कृष्णा श्रीवास्तव, सुनीता द्विवेदी, संतोष यादव आनंद कुमार पांडेय, उमेश सिंह, रविन्द्र सिंह, स्मृति श्रीवास्तव, राकेश रंजन, अजय बिहारी पाठक, बृजकिशोर पांडेय, वृजेश पांडेय, अमरेंद्र त्रिपाठी, रामअवध यादव, चंद्रभान यादव , प्रीति श्रीवास्तव आदि कितनी पीढ़ियों के छात्र आपसे प्रभावित थे। यह सूची बहुत लंबी है। यहां कुछ नाम संकेत रूप में लिखे गए हैं।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग अपनी राजनीतिक गतिविधियों, साहित्यिक गतिविधियों के कारण तो चर्चित रहा ही है। किंतु 1975 से लेकर 1993-94 तक जब भी हिंदी विभाग द्वारा राजनीतिक आंदोलन, संगठनात्मक कार्यक्रम चलाने, सांस्कृतिक कार्यक्रमों यथा नुक्कड़ नाटकों व रंगमंचीय विधाओं के साथ अध्यापन को जोड़ने की दृष्टि से बात होगी, तब काशी हिंदू विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग और रामनारायण शुक्ल हमेशा उल्लिखित किये जायेंगे। एक अध्यापक की भूमिका बंद कमरे से बाहर भी होती है, छात्र की निजी समस्या में भी होती है। इसके जीते-जागते उदाहरण रामनारायण शुक्ल थे। कई छात्रों के विवाह कराने से लेकर जीवन में भौतिक मदद करने तक आप सदैव छात्रों के साथ खड़े दिखे। सन 1987 तक आप के जीवन में कई महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों का पदार्पण होता है। यह एक ऐसा समय था, जब आपने व्यावहारिक जीवन के लिए अपनी ऊर्जा का सर्वोत्तम दे दिया था।

वैचारिक रूप से आप मार्क्सवादी थे, जो अपने अंतिम दिनों तक बने रहे। शारीरिक रूप से अस्वस्थ होने के बावजूद आप वस्तुवादी बने रहे। हां, अब वैचारिक कट्टरता कम हो चली थी। जीवन के नैराश्य और कड़वी यादों ने आपको निष्चेष्ट करना प्रारंभ कर दिया था। आंख में मोतियाबिंद होने के कारण पढ़ना-लिखना भी कम हो चला था। यह काल आपके “अनुभव-प्रकाश के प्रकीर्णन” का था। सिद्धावस्था का काल।

एक क्रांतिकारी की उत्तर-कथा

प्रश्न है कि एक क्रांतिकारी की उत्तर कथा किस ढंग से बढ़ती है? एक ‘उत्तर-कथा’ अपने पूर्व कथा का विस्तार होती है, किन्तु क्रांतिकारी की उत्तर-कथा अपने पूर्व के जीवन का विस्तार हो, यह आवश्यक नहीं; हां वह पूर्व कथा का प्रभाव अवश्य धारण करती है। एक क्रांतिकारी की उत्तर कथा कई बार योग की ओर ले जाती है। श्री अरविंद इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं। श्री अरविंद का क्रांतिधर्मी व्यक्तित्व ‘योग के महाविराट बिम्ब में रूपांतरित’ हो जाता है। क्रांतिधर्मी चेतना से मोहभंग के बाद एक निरवैयतिक्ता का आवरण इतना प्रगाढ़ हो जाता है…इतना आकर्षित करता है कि सामान्य रूप से व्यक्ति के लिए योग मार्ग या अध्यात्म एक उचित मार्ग बन जाता है। किंतु हर क्रांतिकारी आध्यात्मिक बन जाए, हो जाये; यह आवश्यक नहीं। कुछ क्रांतिकारी उस प्रभाव में जीते हैं… उसके हर कर्म, व्यवसाय, क्रिया उसी क्रांति के विस्तार होते हैं। एक क्रांतिकारी की उत्तर -कथा एक टूटे हुए स्वप्न की मर्मान्तक पीड़ा भी होती है। डॉ रामनारायण शुक्ल की उत्तर-कथा एक स्वप्न के टूटन-पीड़ा की आख्या है।

डॉ शशांक शुक्ल, लोकमंच पत्रिका
डॉ शशांक शुक्ल, लोकमंच पत्रिका

लेखक- डॉ शशांक शुक्ल, एसोसिएट प्रोफेसर एवं समन्वयक, हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय, सांबा, जम्मू और कश्मीर। ईमेल-parmita.shukla@gmail.com, मोबाइल- 9917157035, 6006966505.

66 thoughts on “रामनारायण शुक्ल: एक अध्यापक का सांस्कृतिक प्रयाण

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  5. I don’t know if it’s just me or if everybody else experiencing issues with your site. It appears as though some of the written text on your content are running off the screen. Can someone else please provide feedback and let me know if this is happening to them as well? This could be a problem with my web browser because I’ve had this happen before. Appreciate it

  6. I have to thank you for the efforts you have put in penning this blog. I really hope to see the same high-grade blog posts by you in the future as well. In truth, your creative writing abilities has inspired me to get my own blog now 😉

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  12. Good whatever time of day it is where you are!

    Organic growth of behavioural factors.
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    Factors influencing consumer behaviour are certain actions of users on the web page, such as:
    logging in to the internet resource, viewing pages, time spent on the online resource, link clicks, returns to the website.

    UTO:
    Widespread placement of your ads on the web in order to attract potential customers.
    Organic growth of factors influencing consumer behaviour occurs by the large-scale placement of your ads without specifying the address of your online resource, but with the indication of other features identifying only your company according to which you directly become №1 in the top. These features can include a phone, a unique name of the website or company, an identifier (product code, number, services, promotions), a physical address of the organisation and etc.

    MAIN AIM:
    The large-scale attraction of customers to your internet resource, products and services.
    Organic growth of behavioural factors.

    BENEFIT:
    An increase in internet resource visitors who will find your online resource directly from ads using search as well as through additional results of search engines themselves related to a the widest range of internet queries on your subject.

    ADVANTAGES OF THIS AD:
    1. Mass promotion.
    2. High-speed placement.
    3. Price.
    4. Topic orientated.
    5. Wide reach.
    6. Targeting.
    7. Growth of behavioural factors.

    REASONS TO ORDER MASS ADS PLACEMENT ON THE INTERNET ДЛЯ GROWTH OF FACTORS INFLUENCING CONSUMER BEHAVIOUR:

    1.Large-scale attraction of customers to your services and products through direct access from ads.
    2.Organic promotion of your internet resource, due to search beginning to additionally show it for a large range of internet queries based on your subject.
    3. The absence of “bans” and “filters” of search, due to ads being published without an indication of an active link to the internet resource.
    4. An increase in internet resource traffic, which leads to an increase in orders and an expansion of the customer base.
    5. “Warm traffic”, since only engaged users visit the internet resource.
    6. Attraction of legal entities and individuals.
    7. Analysis of demand for goods and services.
    8.Publication of your ads in different countries around the world.

    WHERE ADS ARE PUBLISHED:

    Ads are placed: on billboards, in guest books, on forums, in comments, in catalogues.
    Ads are placed on your: landing pages,websites, phones, YouTube videos, social media accounts , and on links to your other ads.

    SEARCH ENGINE SANCTIONS:
    In this type of ad a ban by search engine is not possible, since ads are published without specifying an URL to the internet resource.

    Working method:
    You send us the text of the ad, where your unique name and identifier is indicated at the end of the message, according to which an interested visitor can easily find your online resource in search results in order to get more information about your service.
    To do this, a unique name or identifier must be published in the appropriate section of your online resource и easily and quickly be found in search results.

    Macros:
    Randomisation of ads is done according to the formula, which is commonly accepted by many programs. As a result of randomisation, a lot of unique ads are obtained from one ad variant.

    This is achieved by physically synomising the ad text, while the meaning of the messages does not change and remains understandable.

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  13. Dear sir!

    Sending newsletters via forms of Your offers into the “Contact us” section to the sites of business organizations via all countries and domain zones of the world.

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    WHAT IS THE MAILING OF SITES BY FEEDBACK FORMS?
    This is a type of mailing using the contact forms that are located in the contact section of the website and filled by our programme in a preset mode with a rate of a few thousand contact forms per 1 minute, while the alphanumeric code from the pictures (captcha) is also solved.
    After that, the letters including your offers are sent to the mailboxes of businesses.
    When sending mailing by contact feedback forms, it turns out that each website sends an e-mail to its own e-mail and, therefore, all messages arrive in the inbox folder of the exact e-mail in which the organisation receives the business information.

    Unique Trade Offer:
    Fast one hundred % notification of firms and website owners about new business offers.
    Search of new customers that other advertisements cannot find.

    THE MAIN AIM:
    Finding customers that cannot be found through other advertisements.

    Benefits:
    1.100-percent delivery of business letters.
    2.Expansion of the customer base.
    3. Increase of the your market share.
    4.Mailings based on regionality and topics.
    5. Sending information to company officials.
    6. Demand study.
    7. Conducting marketing research.
    8. Studying public opinion and conducting surveys.
    9. Quick notification.
    10. Price.
    11. Entering the international markets.

    Undeniable advantages:
    1.When sending mailing by contact forms, all letters arrive in the inbox. When sending bulk e-mails, this can reach up to five percent.

    2.When sending mailing by feedback forms it is possible to send a few million e-mails per day to inboxes. When sending mass e-mails a few thousands arrive in the inbox folders, all the remaining ones often either are not delivered or fill the junk.

    3. When sending mailing by contact forms a letter does not get blocked by mail services because it is sent from different sites. When sending e-newsletters it is possible to send a few thousands of those but nevertheless all the IP addresses from which the mailing is done will be blocked.

    4. When sending mailing by contact forms the minimum of macro-synonims is used to form headings and text of the letter. When sending e-mail newsletters, it is necessary to use synonyms («macros») for each phrase and create thousands different headings.

    5. Many businesses try to hide their electronic address and only leave a contact form for contacting with them.

    6. When sending e-mail newsletters, your commercial offer is delivered to every employee of the organisation, (which causes irritation) compared to mailing by contact forms where the message is received at the e-mail specifically set up for business offers.

    7.1/2 part of corporate e-mails are placed on free e-mail servers, they are badly “searchable” by mailbox, but when sending mailing by feedback forms through these e-mail servers, all letters are 100% delivered to the recipients.

    8. Only thirty-forty percent of businesses get into the directories within two-three years, and all the rest are already located in our VOIS databases and are waiting for your business offers.
    It turns out that that mailboxes of organisations from directories are spammed, which means that they will not have such result as when sending mailing by contact forms using our always new VOIS databases.

    9. Any kind of stop words in the body or headings of the message can be sent through contact forms. When sending mass e-mails, such letters either do not reach the recipient or end up in spam.
    The list of stop words of mails includes almost all words and phrases that encourage recipients to take actions.

    Application:

    1. Increasing the customer base.
    2. Quick informing of marketplaces about new offers.
    3. Accessing company officials.
    4.Testing the demand for products and services.
    5. Conducting tenders.
    6.Conducting marketing research.
    7.Studying public opinion and conducting surveys.
    8. Searching for customers abroad.
    Reasons for ordering this service:

    1. 100-percent delivery of your e-mails and cooperation offers to millions of businesses all over the globe.
    Every site sends a letter to itself so all filters of mail systems are bypassed.

    2.Mailing by feedback forms is an ideal way in in terms of conducting all sorts of researches of marketing, studies and surveys of public opinion on any kind ofdirection and type of activity.
    When sending mailing by feedback forms, you will definitely know that your message has been delivered to 100-percent of consumers of your product and service and if a product or service is “poorly promoted”, then the potential problem lies in other things, for example in price.
    At the same time, within 7 days you will see real demand for your services and products, you will not need to spend money on rent and other more time-consuming and expensive marketing activities.

    3.Mailing by feedback forms is the quickest and the most economical way to get your product or service to the international markets.

    4. Mailing by feedback forms is a tool for conducting all sorts of tenders.

    5.Daily update of the databases, as more than one hundred and fifty thousand new sites, are registered all over the globe daily, and you, get potentially new customers.

    6. Full geographical scope for all countries of the world.

    7. We offer customers that you will not find through other types of advertisement.
    When sending mailing by contact forms, you will be able to get to that part of your potential customers, that is impossible to “break through” automatically in another way.
    For instance, you will be able to deliver a business offer to those potential clients that were earlier unavailable due to e-mail filters while sending e-newsletters.
    Now, there is a very paradoxical situation: businesses that got into the directories are completely filled with spam with all sorts of business offers while very little or no e-mails are sent to the remaining ones.

    8. Unique technology of decrypting the captcha.
    There are special services for decoding numeric and alphabetic code (captcha/CAPTCHA). It costs one dollar to solve thousand CAPTCHAs.
    It turns out that, processing one million websites the program unravels 1 million CAPTCHAs, which costs thousand $ only to decrypt captcha/CAPTCHA, and we provide this free for you!

    9. By ordering mailing by feedback forms, you are promoting your service or product not to separate people, but to organisations, for instance domain zone .com, where more than one hundred and fifty million business firms from all countries are collected (we have samples of them from all international zones for every state).

    10. Mailing by feedback forms is also a subtype of text mailing
    E-mail address that is linked to the feedback form is the main electronic address of organisations through which orders and cooperation offers are sent. This e-mail is also set up for phones as it is necessary to respond to the messages instantly so as not to lose the order or the relevance of the cooperation offer.

    11. The base of countries also includes all joint companies from all countries closely related to or working with this country, for instance, diasporas and national communities.
    Sanctions of mail systems and search engines?
    These mailings are an alternative to sending bulk e-mails, therefore search engine sanctions and “Ban” do not apply to them.
    The mail system delivers the data of messages to the inbox folder, as it moves through the “warm e-mail channel” from the new IP address of the site to the corporate e-mail of the same website.
    Simply speaking, these mailings “live in letters” and e-mail filters do not respond to them, because mails have a great level of trust in communication channels between sites and corporate emails.

    OUR DATABASES:
    You can buy our databases separately from the mailing by sending us a request by contact form.

    MORE THAN 2000 VOIS DATABASES BY DOMAINS AND COUNTRIES.

    COLLECTIONS OF DATABASES BY THE MAIN CONTINENTS OF THE WORLD.

    SELECTIONS OF DATABASES BY THE MAIN WORLD LANGUAGES.

    SELECTIONS OF DATABASES BY THE MAIN CMS.

    SELECTIONS BY THE MAIN COUNTRIES OF THE WORLD.

    HOW TO MAKE AN ORDER FOR MAILING BY CONTACT FORMS:
    The simplest text of the message + a few headings, the main goal is to interest the potential client, and they will read the rest on your website.
    Most likely, all ads on your subject are already on the Internet, enter the necessary search requests and choose the most successful ones.
    The headings are substituted randomly from text file.
    Only text messages are sent, links are inserted without problems, they are active. If the potential customer needs pictures or more detailed information, then you should forward the potential customer to visit your internet resource.

    In the letter:
    Text without pictures, since pictures do not pass through the feedback form.
    Your contact details:
    Site address:

    Fields to fill in:
    Name:
    Country:
    City:
    Site:
    Several headings:
    Electronic address for autoresponces:

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