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हिन्दी आलोचना में डॉ.रामविलास शर्मा का देय- अमन कुमार

हिन्दी आलोचना में डॉ.रामविलास शर्मा एक महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल की परम्परा का समृद्ध विकास उनकी आलोचना में है। रामविलास शर्मा ने अपने आलोचना के शस्त्र मार्क्सवाद से अवश्य लिए हैं लेकिन उसकी धार और उसकी मारक क्षमता उन्होंने स्वयं निर्मित की, जिसमें भारतीय साहित्य परम्परा की अविरल धारा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के ‘लोक-मंगल’ के अचल सिद्धांत के सहारे आलोचना की एक नयी जमीन उन्होंने हिन्दी साहित्य को प्रदान की। साहित्यिक आलोचना को लोक के सबसे अधिक निकट ले जाने में आपका योगदान अन्यतम है। तुलसीदास रामविलास शर्मा के सर्वाधिक प्रिय कवि हैं। आलोचना में उनके प्रतिमान आचार्य शुक्ल के काव्य-मानदण्डों के काफी निकट हैं। आचार्य शुक्ल रामविलास शर्मा के आदर्श आलोचक हैं। वहीं आधुनिक कवियों में निराला केदारनाथ अग्रवाल आपके पसंदीदा कवि हैं। कथा साहित्य में प्रेमचंद उनके प्रिय कथाकार हैं। भारतेंदु और महावीर प्रसाद द्विवेदी को रामविलास शर्मा ने नवजागरण के अग्रदूतों के रूप में प्रतिष्ठित किया है। डॉ. रामविलास शर्मा ने आलोचना में वही कार्य किया जो प्रेमचंद ने हिन्दी कथा साहित्य में किया यानी आलोचना को आम जनता के बहुत पास लेकर चले गये।

डॉ रामविलास शर्मा, लोकमंच पत्रिका
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रामविलास शर्मा ने अपनी विचारधारा को कभी अपनी आलोचना में बोझिल नहीं होने दिया बल्कि इन्होंने साहित्यिक आलोचना को पाठक के लिए सुगम बना दिया। रामविलास शर्मा की साहित्यिक मान्यताएँ जीवन से गृहीत है। उनके लिए वह मनुष्य के इन्द्रियबोध से बाहर की वस्तु नहीं है। कला के सम्बन्ध में उनकी स्पष्ट मान्यताएँ हैं कि मनुष्य का इन्द्रिय बोध, उसके भाव, उसके विचार उसका सौन्दर्यबोध कला की विशेषवस्तु है। रामविलास शर्मा ने अपने निबन्धों में साहित्य, कला सौन्दर्य और आलोचना सम्बन्धी विचार प्रस्तुत किये हैं। इन विचारों का सामंजस्य उनके द्वारा की गई व्यावहारिक आलोचना में दिखाई देता है।‘आस्था और सौन्दर्य’ में उन्होंने कला के सम्बन्ध में अपनी मान्यताएँ स्पष्ट की है। उनके अनुसार ‘कला की विषयवस्तु न वेदान्तियों का ब्रह्म है, न हेगल का निरपेक्ष विचार। मनुष्य का इन्द्रियबोध, उसके भाव उसके विचार, उसका सौन्दर्यबोध कला की विषयवस्तु है।’ सौन्दर्य और सौन्दर्यबोध की व्याख्या आलोचना के लिए अत्यंत जटिल विषय रहा है। चाहे भारतीय विद्वान हों या पाश्चात्य विद्वान सभी ने सौन्दर्य की व्याख्या अपने-अपने अनुसार की है परन्तु किसी एक निष्कर्ष पर सहमति अब तक नहीं बन पायी है।

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हिंदी आलोचना में आचार्य शुक्ल ने सौन्दर्य की वस्तुवादी व्याख्या की थी। इसी कार्य को डॉ. रामविलास शर्मा ने आगे बढ़ाया है। उन्होंने हिंदी आलोचना में ज्ञानकांड किया है। इतनी व्यापक और विस्तृत आलोचना हिंदी साहित्य में किसी ने नहीं की है। उन्होंने कई मामलों में आचार्य शुक्ल से भी बढ़कर हिंदी की सेवा की है। उन्होंने उन्हीं साहित्यकारों को महत्त्व दिया जिन्होंने जनता के दुःख दर्द और उसकी पक्षधरता की बात अपने साहित्य में की है- डॉ.रामविलास शर्मा की आलोचना में एक बात जो सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है वह यह है कि उन्होंने उसी साहित्यकार को महत्त्व दिया जिसकी रचना का स्वर जनवादी है और जिनकी रचनाओं में जनता का जातीय साहित्य बसता हो। भारतेन्दु-युग के रचनाकारों की प्रशंसा करते हुए उन्होंने लिखा-‘‘भारतेन्दु युग का साहित्य हिन्दी-भाषी जनता का जातीय साहित्य है, वह हमारे जातीय नवजागरण का साहित्य है। भारतेन्दु युग की जिन्दादिली, उसके व्यंग्य और हास्य, उसके सरल-सरस गद्य और लोक-संस्कृति से उसकी निकटता से सभी परिचित हैं। ये उसकी जातीय विशेषताएँ हैं। अंग्रेजी साम्राज्यवाद और अंग्रेजी साहित्य एक ही वस्तु नहीं है। भारतेन्दु युग के साहित्य ने न केवल अंग्रेजी से वरन् बँगला साहित्य से भी प्रेरणा पायी है। लेकिन उसके साहित्य की जड़ें इसी धरती में हैं और ऊपर बताई हुई उसकी जातीय विशेषताएँ उसकी अपनी हैं, मौलिक हैं।’’

रामविलास शर्मा के आलोचना-सिद्धांत

डॉ. रामविलास शर्मा ने प्राचीन समाज और साहित्य का मूल्यांकन करने की मार्क्सवादी पद्धति की व्याख्या करते हुए लिखा, ‘‘यह आवश्यक नहीं कि शोषक वर्ग ने जिन नैतिक अथवा कलात्मक मूल्यों का निर्माण किया है वे सभी शोषण मुक्त वर्ग के लिए अनुपयोगी हों — प्राचीन साहित्य के मूल्यांकन में हमें मार्क्सवाद से यह सहायता मिलती है कि हम उसकी विषयवस्तु और कलात्मक सौन्दर्य को ऐतिहासिक दृष्टि से देखकर उनका उचित मूल्यांकन कर सकते हैं।’’ आलोचक के रूप में डॉ.रामविलास शर्मा उसी रचना को महत्त्व देते हैं जो वस्तुवादी चिंतन पर आधारित हो। उनके अनुसार आलोचक वही है जिसने द्वंद्वात्मक पद्धति का सहारा लेकर विषयवस्तु का विश्लेषण किया हो। उसने रचनाकार की सीमाओं की भी पहचान की हो तथा वह रचना में प्रगतिशील और विकासमान तत्त्वों को पहचान कर उसे सामने ला सका हो। इन्हीं प्रतिमानों के कारण आचार्य शुक्ल उनके आदर्श आलोचक है। शुक्लजी की आलोचना पद्धति की प्रशंसा करते हुए डॉ. रामविलास शर्मा लिखते हैं-‘‘शुक्लजी की आलोचना गम्भीर है, इसलिए कि उसका आधार वस्तुवादी दृष्टिकोण है। शुक्लजी की गम्भीरता का दूसरा कारण उनकी तर्क और चिन्तन पद्धति है। इस पद्धति को हम द्वन्द्व नाम दें तो अनुचित न होगा। विरोधी लगने वाली वस्तुओं का सामंजस्य पहचानना, उन्हें गतिशील और विकासमान देखना, संसार के विभिन्न भौतिक और मानसिक व्यापारों का परस्पर सम्बन्ध स्थापित करके उनका अध्ययन करना इस पद्धति की विशेषताएँ हैं।’’ डॉ.रामविलास शर्मा के आदर्श आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल हैं।

आलोचक के रूप में डॉ.रामविलास शर्मा उसी रचना को महत्त्व देते हैं जो वस्तुवादी चिंतन पर आधारित हो। उनके अनुसार आलोचक वही है जिसने द्वंद्वात्मक पद्धति का सहारा लेकर विषयवस्तु का विश्लेषण किया हो। उसने रचनाकार की सीमाओं की भी पहचान की हो तथा वह रचना में प्रगतिशील और विकासमान तत्त्वों को पहचान कर उसे सामने ला सका हो। इन्हीं प्रतिमानों के कारण आचार्य शुक्ल उनके आदर्श आलोचक है।

रामविलास शर्मा ने ‘आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना’ नामक पुस्तक शुक्लजी को केन्द्र में रख कर लिखा है। इस पुस्तक के लिखने का एक बहुत बड़ा कारण शुक्लजी पर लगे आक्षेपों का मुहँतोड़ जबाव देना भी रहा है। क्योंकि इस पुस्तक में प्रकाशन से पहले शुक्लजी पर कुछ प्रगतिशील आलोचकों ने कड़े हमले किये थे। इस पुस्तक से ‘पूर्व तक हिन्दी में ऐसी हवा बह रही थी कि लोग पं. रामचन्द्र शुक्ल के विचारों का विरोध करना अपनी आलोचनात्मक प्रतिभा का परिचय देना समझते थे। इस दिशा में कई साहित्य सेवियों का उत्साह आवश्यकता से अधिक बढ़ गया था। दुर्भाग्यवश जो लोग अपने को शुक्लानुवर्ती कहते थे और शुक्लजी के विचारों का विरोध करने वालों का विरोध करते थे, वे शुक्लजी की साहित्य-सेवा की महत्ता को प्रकट करने में असमर्थ थे।’ जाहिर है कि शुक्लजी की विरासत का मूल्यांकन और उसकी रक्षा के लिए डॉ. रामविलास ने यह पुस्तक लिखी। रामविलास शर्मा की अन्य पुस्तकें ‘अपने क्षेत्र की अद्वितीय पुस्तके हैं। लेकिन उन पुस्तकों में भी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का स्थान बहुत ऊपर है। पूरी पुस्तक बहुत परिश्रम से और बहुत धैर्य से लिखी गई है। पूरे साहित्येतिहास का परिप्रेक्ष्य इसमें आता है।’ डॉ. रामविलास शर्मा ने इस पुस्तक के प्रथम संस्करण की भूमिका में शुक्लजी के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए लिखा-‘‘हिन्दी साहित्य में शुक्लजी का वही महत्त्व है जो उपन्यासकार प्रेमचन्द या कवि निराला का। उन्होंने आलोचना के माध्यम से उसी सामन्ती संस्कृति का विरोध किया जिसका उपन्यास और कविता के माध्यम से प्रेमचन्द और निराला ने। शुक्लजी न तो भारत के रूढ़िवाद को स्वीकार किया, न पश्चिम के व्यक्तिवाद को। उन्होंने बाह्यजगत् और मानव जीवन की वास्तविकता के आधार पर नये साहित्य-सिद्धांतों की स्थापना की और उनके आधार पर सामन्ती साहित्य का विरोध किया और देशभक्ति और जनतन्त्र की साहित्यिक परम्परा का समर्थन किया। उनका यह कार्य हर देशप्रेमी और जनवादी लेखक तथा पाठक के लिए दिलचस्प होना चाहिए। शुक्लजी पर पुस्तक लिखने का यही कारण है।’’

रामविलास शर्मा शुक्लजी को इतना महत्त्व इसलिए देते हैं कि ‘उन्होंने हिन्दी की सैद्धान्तिक आलोचना को ठोस दार्शनिक आधार दिया, रस की अलौकिकता का निषेध किया, जीवन और साहित्य के भावों में बुनियादी अन्तर स्वीकार नहीं किया, भावों को उनके आधार से अलग करके देखा, लोक-हृदय में लीन होने की दशा को रसदशा माना, रीति-ग्रंन्थों और उनकी सीमा में बंधे समीक्षकों का विरोध किया, ‘प्रेम’ की अपेक्षा ‘करुणा’ को अधिक महत्त्व दिया और लोक-रक्षा के विधान में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को पहचाना, साम्राज्यवादी उत्पीड़न का विरोध किया, अंग्रेजी साहित्य की व्यक्तिवादी एवं प्रगतिविरोधी प्रवृत्तियों से हिन्दी लेखकों को सावधान किया, काव्य में करुणा-प्रेरित प्रचण्ड भावों (क्रोध आदि) के विधान में भी सौन्दर्य देखा, परोक्ष सत्ता के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति करने वाले साम्प्रदायिक रहस्यवाद का विरोध किया, वस्तुओं और विचारों की गतिशीलता पर बल देते हुए सौन्दर्य एवं मंगल के गत्यात्मक स्वरूप को सहारा और इतिहास के अध्ययन की एक व्यवस्थित पद्धति कायम की।’ डॉ.रामविलास शर्मा आचार्य शुक्ल की तार्किक विवेचन शैली, उनकी भाषा-नीति और उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन करते हुए लिखते हैं-‘उनकी शैली तार्किक विवेचन के लिए उपयुक्त होने के साथ आवश्यकतानुसार आवेशपूर्ण और आलंकारिक भी है और उसकी एक विशेषता जीवन का संचित अनुभव प्रकट करने वाली वाक्यावली है। शब्द चयन में उर्दू के प्रचलित शब्दों से उन्हें परहेज नहीं है। उनका व्यक्तित्व एक सहृदय और विनोदी साहित्य-प्रेमी और संसार प्रेमी मनुष्य का है, पुस्तक-सेवी सन्यासी का नहीं। उनकी निर्भीकता, दृढ़ता, गहन अध्यवसाय और आत्मविश्वास के गुण उनके काव्य-सिद्धान्तों और साहित्यलोचन की ही तरह हिन्दी-प्रेमियों के लिए शिक्षाप्रद और प्रेरणादायक है।’’

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, लोकमंच पत्रिका
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, लोकमंच पत्रिका

हिंदी के अमर कथाकार मुंशी प्रेमचंद डॉ.रामविलास शर्मा के प्रिय लेखकों में से एक हैं। रामविलास शर्मा जी ने अपनी पहली आलोचनात्मक पुस्तक प्रेमचंद जी पर लिखी है।प्रेमचंद की महत्ता पर डॉ.रामविलास शर्मा लिखते हैं-‘तुलसीदास के बाद हिंदी में यह पहला इतना बड़ा कलाकार पैदा हुआ था जिसकी रचनाएँ अपनी ही भाषा के क्षेत्र में नहीं, सुदूर दक्षिण के गाँवों में भी पहुँच गई थी।’ प्रेमचंद के साहित्य का स्रोत जनता है। इस बात को रामविलास शर्मा ने रेखांकित किया और हिन्दी के अन्य आलोचकों ने इसी बात को नहीं सीखा। इस बात पर डॉ. रामविलास शर्मा ने टिप्पणी करते हैं-‘‘प्रेमचंद से जिस चीज़ को हिन्दी के इन दिग्गज आलोचकों और कलाकारों ने नहीं सीखा, वह यह कि जनता कला का स्रोत है और उससे अलग रहकर महान साहित्य की रचना नहीं की जा सकती।’’ प्रेमचंद से पूर्व हिन्दी में लाखों लाख की संख्या में ‘चंद्रकांता जैसे तिलिस्मी, ऐयारी और कौतूहल प्रधान उपन्यासों के पाठक थे। इन पाठकों को एक ऐसे पाठ की ओर उन्मुख कर देना जिसमें जनता के सामाजिक यथार्थ का चित्रण हो, प्रेमचंद द्वारा अत्यंत क्रांतिकारी कार्य सिद्ध हुआ। डॉ.विश्वनाथ त्रिपाठी इस संदर्भ में लिखते हैं कि- ‘प्रेमचंद के इस महत्त्व पर जहाँ तक मेरी जानकारी है सबसे पहले डॉ. शर्मा का ध्यान गया है।’ वैसे तो प्रेमचंद पर सैकड़ों किताबें लिखी गई हैं। हजारों उक्तियाँ प्रेमंचद के बारे में दी जाती हैं। परन्तु रामविलास शर्मा की तरह जनवादी प्रमाण किसी और ने शायद ही दिए हों। उन्होंने इस संदर्भ में लिखा-‘‘चन्द्रकान्ता’ और ‘तिलिस्म होशरुबा’ के पढ़ने वाले लाखों थे। प्रेमचन्द ने इन लाखों पाठकों को ‘सेवासदन’ का पाठक बनाया, यह उनका युगान्तकारी काम था। इन पाठकों की संख्या का अंदाज किताबों की बिक्री और संस्करणों से नहीं लगाया जा सकता। शहर या कस्बे के किसी पुस्तकालय में जाकर प्रेमचंद की किताबों की हालत देखिए। तरकारी काटने वाली स्त्रियों के हाथों से लेकर लाठी को तेल पिलानेवाले दरबानों की उंगलियों तक उनके सफे पलटे जाने से वे किस खस्ता हालत में दिखाई देती है। प्रेमचंद ने ‘चंद्रकान्ता’ के पाठकों को अपनी तरफ ही नहीं खींचा, ‘चंद्रकांता’ में अरुचि भी पैदा की, जन-रूचि के लिए उन्होंने नए मापदंड कायम किए और साहित्य के नए पाठक और पाठिकाएँ भी पैदा किए। यह उनकी जबरदस्त सफलता थी।’

रामविलास शर्मा ने वाल्मीकि, भवभूति, तुलसीदास की परंपरा का मूल्यांकन कर उन्हें जनवादी और मनुष्यता का पक्षधर साहित्यिकार घोषित किया है। रामविलास शर्मा ने मार्क्सवादी आलोचना पद्धति का सबसे बेहतर उपयोग किया है। उसे भारतीय परिस्थितियों और परिवेश के अनुसार बदला और परंपरा के महत्त्व को इस प्रकार प्रतिष्ठित किया कि हिंदी आलोचना में शुक्ल जी के बाद एक नया दृष्टिकोण विकसित हो गया। जिस प्रकार आचार्य शुक्ल ने भारतीय काव्यशास्त्र के ‘रसवाद’ को नवीन एवं लौकिक बनाकर अपनी सैद्धांतिक आलोचना की और व्यावहारिक आलोचना में अपने विकासवाद और वस्तुवादी वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिचय दिया। वह अतुलनीय और अभूतपूर्व था। ठीक वैसा ही डॉ.रामविलास शर्मा ने अपनी आलोचना में किया। अपने ‘विजेता मार्क्सवाद’ के सहारे यानी मार्क्सवाद और परम्परा का मूल्यांकन दोनों एक साथ। हिंदी जाति की एकता उनका वह सपना था जिसकी पूर्ति के लिए उन्होंने तुलसीदास से लेकर भारतेन्दु, प्रेमचंद, निराला, आचार्य शुक्ल सभी को एक कड़ी में जोड़ा और हिंदी भाषी जनता को एक करने का हौसला बुलंद किया। ‘भारतीय सौन्दर्य बोध और तुलसीदास’ उनके ज्ञानकांड का अंतिम सोपान है जहाँ उनके जीवन भर का ज्ञान इस पुस्तक के पृष्ठों में संचित होकर हिंदी आलोचना की एक अमूल्य निधि बन गया है। इस पुस्तक में डॉ.रामविलास शर्मा ने वैदिक कवियों के सौन्दर्य-बोध से लेकर भारतीय दर्शन और सौन्दर्य-बोध, नगर सभ्यता और कलाओं का विकास, कला इतिहास, कलाओं के इतिहास की समस्याएँ तक की यात्र अपने ज्ञान के आलोक में की है।

इस ज्ञान यात्रा का अंतिम सोपान तुलसी के सौन्दर्यबोध पर आकर समाप्त हो गया और साथ में समाप्त हो गई हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष की ज्ञानवाणी। तुलसीदास पर वैदिक काल से लेकर कालिदास तक का कैसा गहरा प्रभाव था यही ‘भारतीय सौन्दर्य बोध और तुलसीदास’ पुस्तक का सार है । डॉ.रामविलास शर्मा ने सर्वप्रथम तुलसीदास के भक्ति और सौन्दर्य सम्बन्धी रचनाओं का अलग-अलग विश्लेषण किया। जैसे- ‘रामललानहछू’ और ‘पार्वती मंगल’ को उन्होंने सौन्दर्य प्रधान रचना माना है। ‘रामचरितमानस’ को वे भक्ति प्रधान रचना मानते हैं परन्तु उनका कहना है कि यहाँ (रामचरितमानस) भी सौन्दर्य से नाता तोड़ा नहीं गया है। तुलसीदास के सौन्दर्यबोध के सम्बन्ध में उनकी प्रमुख स्थापना है कि तुलसीदास नारी सौन्दर्य का वर्णन करते समय नारी के नेत्रों पर विशेष ध्यान देते हैं। तुलसीदास के यहाँ उपमाओं की असमर्थता देख रामविलास शर्मा ने इस समस्या को कालिदास से जोड़कर देखा, और बताया कि तुलसीदास ने सौन्दर्य-बोध की प्रेरणा कालिदास से ली है। तुलसीदास के सौन्दर्य-बोध के बाद इस पुस्तक के परिशिष्ट में रामविलास शर्मा के तीन प्रमुख निबंधों को संकलित किया गया है जो तुलसीदास पर ही केन्द्रित हैं।

रामविलास शर्मा ने ‘तुलसी की भक्ति’ नामक लेख में तुलसी की भक्ति को उनके ज्ञान से जोड़ कर देखा। तुलसीदास को वे भक्ति-दर्शन का परम ज्ञानी मानते हैं। रामविलास जी के अनुसार तुलसी न विशुद्ध सगुणवादी हैं न विशुद्ध निर्गुणवादी। तुलसी के जीवन के संघर्षों को वे उनकी भक्ति से जोड़ कर देखते हैं तथा तुलसीदास को भक्ति आंदोलन का सबसे बड़ा नायक मानते हैं जिन्होंने सभी के लिए सुगम भक्ति का प्रतिपादन किया। ‘तुलसी के सामंत-विरोधी मूल्य’ नामक लेख में तुलसी को वर्णाश्रम व्यवस्था का स्वयं पीड़ित बता कर ‘कवितावली’ से पंक्तियाँ उद्धृत कर, उन्होंने रामचरितमानस में आये हुए वर्णाश्रम समर्थित पंक्तियों का जवाब देने की कोशिश की है। नारी संवेदना की पंक्ति ‘कत बिधि सृजि नारि जग माहीं’ को उद्धृत कर उन्होंने तुलसीदास के वाङ्ग्मय में आये सम्पूर्ण नारी विरोधी बातों पर प्रतिकार करने वाला मान लिया है। हालाँकि पार्वती-मंगल और जानकी मंगल में भी ऐसी नारी के प्रति संवेदना व्यक्त करने वाली पंक्ति आयी हैं जिसका उन्होंने ‘तुलसीदास का सौन्दर्य-बोध’ नामक लेख में उल्लेख कर सुन्दर टिप्पणी की है। डॉ.रामविलास शर्मा ने तुलसी के साहित्य को आज के समाज में मौजूद विभिन्न प्रकार की चुनौतियों से लड़ने और उनसे संघर्ष करने की प्रेरणा देने वाला साहित्य माना है। इस संदर्भ में उन्होने लिखा है – ‘तुलसी हमारे जातीय जन-जागरण के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। उनकी कविता की आधारशिला जनता की एकता है। मिथिला से लेकर अवध और ब्रज तक चार सौ साल से तुलसी की सरस वाणी नगरों और गाँवों में गूँजती रही है। हमारी जातीय एकता और उसके पुनर्जीवन का काम अभी अधूरा है। साम्राज्यवादी सामन्ती अवशेष और बड़े पूंजीपतियों के शोषण से हिन्दी भाषी जनता को मुक्त करके उसकी जातीय संस्कृति को विकसित करना है। हमारे जातीय संगठन के मार्ग में साम्प्रदायिकता, ऊँच-नीच के भेद-भाव, नारी के प्रति सामन्ती शासक का रूख आदि अनेक बाधाएँ हैं। तुलसी का साहित्य हमें इनसे संघर्ष करना सिखाता है। तुलसी का मूल संदेश है, मानव-प्रेम। मानव-प्रेम को सक्रिय रूप देना, सहानुभूति की व्यवहार में परिणत करके जनता के मुक्ति-संघर्ष में योग देना हमारा कर्तव्य है।’

आगे वे तुलसी के साहित्य को ‘साहित्य कला की शिक्षा देने वाला अक्षय निधि मानते हैं। इस संदर्भ में उनकी टिप्पणी हैं- ‘‘तुलसी का साहित्य कला की शिक्षा देने के लिए अक्षय निधि है। उनसे हमें बार-बार सीखना चाहिए, कैसे उनकी वाणी जनता को इतनी गहराई से आन्दोलित कर सकी। उनसे हमें गम्भीर मानव-सहानुभूति और उच्च विचारों की शिक्षा लेनी चाहिए जिनसे साहित्य महान होता है।’’ अक्सर हम तुलसीदास के ऐतिहासिक सीमाओं का उल्लेख कर माफी माँगने लगते हैं। रामविलास शर्मा इस बात का प्रतिवाद करते हैं। वे लिखते हैं-‘‘तुलसी की ऐतिहासिक सीमाओं की बात करके माफी माँगने की जरूरत नहीं है। जरूरत है तुलसी पर गर्व करने की, इस बात पर दृढ़ विश्वास करने की कि जिस जाति ने तुलसी को जन्म दिया है वह अजेय है, इस बात पर रोष करने की कि तुलसी की संतान आज संसार की सबसे पिछड़ी हुई, बिखरी हुई, निर्धन और दलित जातियों में से है। जिस सामन्ती व्यवस्था ने तुलसी जैसे सहृदय कवि को अपार कष्ट दिये थे, उसकी तरफ कभी तटस्थ न रहना चाहिए। जनता की एकता हमारा अस्त्र हो, संघर्ष हमारा मार्ग और ऐसा समाज हमारा लक्ष्य हो जिसमें पीड़ित और अपमानित मनुष्य को हताश होकर रहस्यमय दैव की तरफ फिर हाथ न उठाना पड़े। इस कार्य में एक चिरन्तन प्रेरणा की तरह तुलसीदास हमेशा हमारे साथ रहेंगे।’’

डॉ.रामविलास शर्मा ने तुलसी की महत्ता प्रतिपादित करते हुए लिखा था- ‘तुलसी को निकालकर हिन्दी साहित्य की परम्परा से जोड़ना असम्भव है। इस परम्परा में जो कुछ मूल्यवान है, जो कुछ महत्त्वपूर्ण है, जो कुछ सदा के लिए संग्रह करने योग्य है, वह तुलसी में सुरक्षित है और बहुत बड़ी मात्र में सुरक्षित है। यह तथ्य तुलसीदास की अपराजेय प्रतिभा का द्योतक है कि उन्हें त्याग कर कोई भी युगप्रवर्तक कवि नहीं हो सकता। ’डॉ.रामविलास शर्मा के तर्ज पर ही उन पर कुछ निवेदन प्रस्तुत कर उनके सम्बन्ध में अपनी बात यहाँ खत्म कर रहा हूँ- रामविलास शर्मा को निकालकर हिन्दी आलोचना की परम्परा बनाना असम्भव है। आचार्य शुक्ल से शुरू होने वाली विशुद्ध हिन्दी आलोचना की परम्परा में जो कुछ मूल्यवान है, जो कुछ महत्त्वपूर्ण है जो कुछ सदा के लिए संग्रह करने योग्य है, वह रामविलास शर्मा की आलोचना में सुरक्षित है और अत्यंत व्यापक मात्रा में सुरक्षित है।

लेखक- अमन कुमार, सहायक प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय।

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