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‘खान सर’ को समझें फिर करें विरोध – अरुण कुमार


सोशल मीडिया पर बिहार के पटना वाले ‘खान सर’ पर विवाद बढ़ गया है। यहाँ उनके समर्थकों और विरोधियों के दो गुट बन गए हैं। ठेठ भदेस या बिहारी अंदाज में ‘सामान्य अध्ययन’ और समसामयिक मुद्दों की गूढ़ बातों को समझाने वाले ‘खान सर’ के सोशल मीडिया पर प्रशंसकों की संख्या लगभग एक करोड़ है। ‘खान जीएस रिसर्च सेंटर’ नाम का जो इनका यूट्यूब चैनल है उसके सब्सक्राइबर्स की संख्या 93 लाख से अधिक है। ‘खान सर’ द्वारा अपलोड की गई एक वीडियो को 65 लाख तक लोग देखते हैं। ठेठ भदेस या कहें बिहारी अंदाज़ में समसामयिक विषयों को पढ़ाने का इनका तरीका इतना बेहतरीन है कि कम पढा-लिखा व्यक्ति भी बहुत आसानी से समझ जाता है। ‘खान सर’ समसामयिक महत्व के मुद्दों को पढ़ाते समय जीवन और जगत से ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि सुनने वाला हंसते-हंसते गंभीर विषयों को भी बहुत आसानी से समझ जाता है। 

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वर्तमान विवाद का कारण है ‘खान सर’ के द्वारा अपने यूट्यूब चैनल पर 24 अप्रैल 2021 को डाली गई एक वीडियो। इस वीडियो में ‘खान सर’ फ्रांस में हो रहे सामाजिक-धार्मिक उथल-पुथल के बारे में बता रहे हैं। उक्त विषय पर बात करते हुए वे फ्रांस के खिलाफ पाकिस्तान में हो रहे एक प्रदर्शन की तस्वीर दिखाते हैं। इस तस्वीर में एक पोस्टर के आगे कई छोटे-छोटे बच्चे जिनकी उम्र सात-आठ साल होगी, खड़े हैं और जो फ्रांस के खिलाफ नारे लगा रहे हैं। ‘खान सर’ उस बच्चे को इंगित करते हुए कहते हैं कि ‘ई रैली में ये बेचारा बचवा है, इसको क्या पता कि राजदूत क्या चीज़ होता है, कोई पता नहीं है। ये फ्रांस के राजदूत को बाहर भेजेंगे। इनको कुछ पता नहीं है। बाबू लोग! तुम लोग पढ़ लो, अब्बा के कहने पर मत जाओ। अब्बा तो पंचर साट ही रहे हैं। ऐसा ही तुम लोग भी करेगा तो बड़ा होकर तुम लोग भी पंचर साटेगा। तो पंचर मत साटो वरना तुमको तो पता ही है कि कुछ नहीं होगा तो चौराहा पर बैठकर मीट काटेगा तुम लोग। बकलोल कहीं के। बताइए ये उमर है बच्चों को यहां पर लाने का? ‘खान सर’ के इसी वीडियो पर विवाद बढ़ गया है। खान सर को लक्ष्य कर लगातार वीडियो बनाए जा रहे हैं, उन्हें बेवकूफ, जाहिल और न जाने क्या-क्या साबित किया जा रहा है। कुछ मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथी उनके इस कथन को इस्लाम या मुसलमान विरोधी साबित कर रहे हैं। ट्वीटर पर #reportkhansir ट्रेंड कराया जा रहा है ताकि उनके यूट्यूब चैनल को बंद कराया जा सके। ‘खान सर’ की तीखी आलोचना करने वाले कई वीडियो तो पाकिस्तान से भी अपलोड किए गए हैं। ट्वीटर पर कई लोगों ने तो यह भी लिखा है कि ‘यह मुस्लिम नहीं है बल्कि संघी अमित सिंह है।

‘खान सर’ के जिस कथन को इस्लाम विरोधी या मुसलमान विरोधी साबित किया जा रहा है यदि उसे अच्छी तरह सुनें तो वह एक शिक्षक की पीड़ा अभिव्यक्त करने वाला कथन है। यह ‘खान सर’ की पीड़ा है जिसमें उन्होंने अपने उस दुख को व्यक्त किया है कि पढ़ने-लिखने की उम्र में बच्चों को इस तरह के धार्मिक कट्टरपंथी आंदोलन में शामिल किया जा रहा है। खान सर का दुख यह है कि जब एक बच्चे की मस्तिष्क का विकास हो रहा होता है उसी समय फ्रांस विरोधी आंदोलनों में उन्हें शामिल करने का क्या लाभ। वे मुस्लिम समाज की बदहाली बताना चाहते हैं और अपने कथन के माध्यम से उस बदहाली का कारण बताते हैं। एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों को पढ़ाते समय इस तरह के उदाहरण देता है। हम सबने अपने शिक्षकों से ऐसी बातें सुनीं होंगी। हमारे प्राथमिक स्कूल के शिक्षक डांटते हुए हमेशा कहते थे कि- रे बकलोलवा पढ़ न लो नहीं तो भीख मांगना पड़ेगा। अफसोस! खान सर की शिक्षाओं पर कम और उनके उन उद्धरणों पर अधिक चर्चा की जा रही है जो उन्होंने अपने विद्यार्थियों को सरल भाषा में समझाने के उद्देश्य से कहें हैं।

खान सर, लोकमंच पत्रिका
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‘जाति न पूछो साधु की’

‘खान सर’ पर विवाद बढ़ा तो लोग उनकी जाति और उनके धर्म का पता लगाने लगे। ‘खान सर’ नाम से ही यह पता चल रहा है कि वे मुसलमान हो सकते हैं। अब तक उनकी आलोचना उनके मुस्लिम पहचान को लेकर हो रही थी लेकिन एक वीडियो में उन्होंने अपना नाम अमित सिंह बता दिया। कुछ लोगों को जैसे ही उनके हिन्दू पहचान का पता चला उन्होंने प्रचारित करना शुरू कर दिया और अब आलोचना का ढंग पूरी तरह से बदल गया। उन्हें इस्लाम विरोधी, आरएसएस का एजेंट, भाजपा का एजेंडा फैलाने वाला साबित किया जाने लगा। अब देश के वामपंथी बुद्धिजीवी भी उनकी आलोचना करने लगे।

‘खान सर’ ने शीघ्र ही एक वीडियो अपलोड कर लोगों को उनकी जातिगत या धार्मिक पहचान से बचने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि- नाम से किसी को नहीं जानना चाहिए। बस इतना समझना चाहिए कि मेरा नाम क्या है। वह अलग बात है कि लोग हमें क्या कहकर बुलाते हैं, वह अलग है। नेल्सन मंडेला को अफ्रीका का गांधी कहा जाता है, लेकिन इस आधार पर आप यह नहीं कह सकते कि वे गांधी हैं। मुझे क्या कहा जाता है , इसके ऊपर मैं बहुत अधिक ध्यान नहीं देता हूं। कुछ लोग मुझे कई नामों से बुलाते हैं जिसमें एक नाम अमित सिंह भी है। खान सर बस एक टाइटिल है। मेरा मूल नाम नहीं है। मैंने अपना पूरा नाम कभी नहीं बताया। टाइम आएगा तो सबको पता चल ही जायेगा। नाम में कोई बहुत बड़ा रहस्य नहीं छुपा है। लेकिन एक ट्रेंड है तो उसे चलना दिया जाए।” उक्त बातें कहकर ‘खान सर’ ने उनकी जाति या धर्म खोजने वालों को एक तरह से फिर भ्रमित कर दिया है। अब कुछ लोग उनकी शिक्षण शैली और उनके द्वारा प्रयुक्त शब्दों पर ही सवाल उठा रहे हैं।

‘खान सर’ की कहानी मध्यकालीन संत कवि कबीर से मिलती है। कबीर जीवन भर कहते रहे कि ‘जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान’ लेकिन कुछ लोग कहाँ मानने वाले थे। हिन्दू कहता कि हिन्दू हैं, मुसलमान कहता कि मुसलमान। ‘खान सर’ के साथ भी यही है। सभी अपनी-अपनी सुविधानुसार उन्हें हिन्दू या मुसलमान साबित करने पर तुले हुए थे। जाति या धर्म का पता लगाने वालों से अलग कबीर की भी और खान सर की भी प्रशंसकों की बहुत बड़ी संख्या है जिनको कोई मतलब नहीं कि उनका धर्म या फिर उनकी जाति क्या है? दोनों के प्रशंसकों की संख्या दिनों-दिन बढ़ ही रही है।

बहरहाल, ‘खान सर’ का विश्लेषण उनके द्वारा दी गई शिक्षाओं के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने अपनी वीडियो के माध्यम से प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने वाले विद्यार्थियों के लिए उपयोगी सामग्री तो उपलब्ध कराई ही है साथ ही साधारण जनता की भी समसामयिक मुद्दों पर रुचि और जानकारी दोनों बढ़ाई है। उनके यूट्यूब चैनल पर प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल हो रहे विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगी जानकारियां हैं। ये विद्यार्थी बिना किसी विवाद में खुद को शामिल किए, इन जानकारियों का लाभ ले सकते हैं।

लेखक- पूर्व पत्रकार डॉ अरुण कुमार भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली में सीनियर फेलो रहे हैं। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। सम्पर्क – arunlbc26@gmail.com, 8178055172, 9999445502.

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