लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
सुरेन्द्र प्रजापति की कविताएं

नींद

दिनभर

पीड़ा और थकान से

बेसुध लड़की

जानना चाहती है, स्वयं को

अपने नीले संसार का

आश्चर्यजनक विस्तार

कुछ रोना चाहती है

ताकि अपनी पीड़ाओं को

कुछ कम कर सके

रात्रि के सघन अंधेरे में

जल्द ही पहुंचना चाहती है

विस्तर में बुलाती है नींद

सपनों को फुसलाती है

आओ मेरी हसीन ख्वाबों

मेरे बदबूदार शरीर में

समा जाओ

ताकि देख सकूँ कुछ

खुशबूदार हरियाली….

किस्से-कहानियों के जंगल में

और सदा के लिए

गुम हो जाऊं

उसके छायादार वृक्षों में

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कहीं भी होता हूं

मैं कभी भी, कहीं भी होता हूँ   

जिम्मेवारियों के साथ होता हूँ         

बच्चों की जरूरतें, गृहस्थी का बोझ,  

चाहे जहाँ भी होता हूँ,      

उत्तरदायित्वों के साथ होता हूँ।    

पसीना बहाते, खेतों में।                  

गीत गाते, खलिहानों में                    

सरिता के तट पर , 

या उदासी लिपे, रेगिस्तानों में।

आश्चर्य ये कि…वहां–

जीवन के तमाम लिपि के बावजूद 

कविता  नहीं  होती जैसे—

राम राज्याभिषेक के समय, सीता नहीं होती।

हाँ उस वक्त…

जब, मैं भी नहीं होता हूँ, वहाँ पर 

कहीं भी नहीं, 

न घर-न बाहर, गांव, न नगर 

जब मैं कविता लिखता हूँ, 

एक एक शब्दों से लड़ता, झगड़ता,  

जीवन के अर्थ ढूंढता  

कलाबाजियां करता, कभी पिटता 

मैं यदा, कदा मुस्कुरा पड़ता हूँ     

जब मैं कविता के शूक्ष्म तारों को छूता  

कहीं और ही होता हूँ 

अक्षरों की गलबाहीं करता, 

अभ्यस्त होता हूँ….

एक आदत की फितरत में दम  भरता

मैं जाना चाहता हूँ…

एक ही समय में अंतरिक्ष तक, विचित्र ग्रहों पर 

सागर की अनन्त गहराइयो में 

ज्वालामुखी के वृहत खाइयों में  

फिर मैं अपने में लौटता हूँ 

एक साथ सबमें लौटता हूँ 

जैसे लाल, नीले ग्रहों से छूकर लौटती है, 

जीवन की तरंग, 

कई कई सम्भावनाओं के संग……..

जीवन का कर्ज

संध्या समय में, जब घर लौटा

थकान, दर्द से विलाप करते

कुछ टुटे स्वप्नों, निराशाओं से हाथ मलते

निढाल ढोते निर्बल शरीर के साथ

अपनी साँसों को नियंत्रित कर रहा था

आसमान में पूरी चन्द्रमा

अपनी स्निग्ध शीतलता उड़ेल रही थी

मैं, उसके चंचल उजाले में बैठ

शीतल सुधामय वायु के साथ

अपने जख्मों को लगाना चाहा मलहम

ताकि प्राण लहरियों में फिर से

हरियाली आ जा सके

तभी, दरवाजे पर दस्तक हुआ

और मैं उस ओर थम कर देखने लगा

उस महाजन को, जिसका मैं कर्जदार था

वह मुझे ऐसे घुर रहा था जैसे

उसके सबसे अनमोल धरोहर पर

मैं किसी घिनौने जीव की भांति

घात लगाए बैठा हूँ

मेरी आँखों में व्याप्त कातरता

उसके चेहरे पर उत्पन्न भर्त्सना में

थोड़ी सी मोहलत और याचना के

निर्बल, निःशब्द गुहार लगा रही थी

उसने तीखे शब्दों का प्रहार किया

मेरी विवशता थी, उसे स्वीकार किया

उसने अपशब्दों, कुशब्दों का चाबुक फेंका

मेरी दीनता थी, उसे मुक सुनता रहा

निर्लजों की तरह, पुरी हया को भुलकर

उसने कहा ‘कामचोर’

और मेरा कठोर श्रम

संघर्षों में ईमानदार पसीना बहाते

लहूलुहान होकर बिखर गया

मेरी वफादारी, मेरी विनम्रता

मेरी ही आत्मा से सवाल करने लगा

उद्धार हो जाओ,

साहूकार से, बेचारी किस्मत से

जिंदगी भी एक साहुकार है

उसका भी कर्ज चुकाने होंगे, बन्धु !

गरीबों के लिए

कानून में लिखा गया, हर नियम

सिर्फ गरीबों के लिए होता है

अमीरों के लिए तो ये खिलवाड़ है

समाज का हर कहर, 

बर्बरता का नाद

निर्बलों, वंचितों, असहायों पर 

बिजली बनकर गिरता है

और पूरा का पूरा घर जलाकर

राख कर देता है ।

अमीरों के लिए तो 

ये बज्र की किवाड़ है

संसार की सारी घृणाएँ

अपशब्द, कुतर्को की पोटली

मिथ्या आरोप, झुठा मुकदमा

भयभीत कर देनेवाली यातनाएँ

सन्तप्त वेदना की अनुगूंज पुकार

बजबजाती, दम तोड़ती याचनाएँ

सिर्फ असहायों, वंचितों, 

मलिन बस्तियों में रहने वाले, 

कमजोर प्राणियों पर ही

क्यों कहर ढाता है, क्यों ?

जब तब उन बदनसीबों को

हिंसा प्रतिहिंसा की धधकती हुई

भठ्ठी में झोंक दिया जाता है

क्या ? इस प्रश्न का उत्तर है

तेरे बीमार तंत्र के पास

बताओ, सत्ता पर आसीन आकाओं         

आँख का स्वप्न                                            

आँख सिर्फ आँसू बहाने के लिए

कहाँ होती है ?

वह स्वप्न भी देखती है, चमकदार

उसके जबड़े होते हैं, शिल्पगत कारगर

हाथ जुड़ते हैं, दाता के सामने

तो बंदूक भी सम्हालते हैं

आतिशबाजियां करनेवाली अंगुलियाँ

स्वतंत्र शब्द भी रचती है

नसों में बहने वाली लहू

क्या जमीन को नहीं रंगती ?

सुमनों की चंचल सुरभि से

मुग्ध होने वाले मस्तिष्क में

क्या विचारों की चिंगारी नही उड़ती ?

दाता कहने वाला मुख

अपना भाग्य विधाता भी कहता है

स्थिर जल में कंकड़ डालो तुम

उसमें, तरंगे फुफकरता है 

लपकता है, लहलहाते आग की तरह

तिस पर मैं एक मनुष्य हूँ

क्रिया करता हूँ 

तो क्या प्रतिक्रिया करने का

अधिकार नहीं है मेरा ?

मुक्त बहती हवाएँ

अविरल बहती जलधारा

किसने रोका कभी

फिर तुम मुझे जंजीरों में बाँधोगे,

हरियाली को सींचती बाग

बगैर, रक्तरंजित होते रह सका है

किसी युग, किसी काल में

अपमान, घृणा और जिल्लत भरी

कसमसाती जिंदगी की आँखों मे झाँको

मुक्ति का बवंडर चलेगा वहाँ भी

और हिला देगा तुम्हारी

स्याह में डूबी सता को

और मैं अपने कविता की

एक-एक पंक्ति की 

प्रत्येक शब्द की तरह

अपने एक-एक कतरे खून को

न्योछावर कर दूँगा

मैं दिनकर के प्रचंड ताप पर

और तपाउँगा अपनी महत्वाकांक्षा को

अपने जीवन की उर्बर मिट्टी पर

मानव नद के निर्मल तटों पर

हरियाली का मौसम

जल के लाल कणों में ही सींचेग्गे       

ग्राम-जीवन

मैं मलिन बस्तियों में गया

सड़ांध और बदबूदार 

रोशनी को देखा

और जी भर कर रोया

वहाँ जीवन कैसे रचता है

अपना कौतुक?

उत्सुकता से ठहर कर 

जानना चाहा

वहाँ गांव का गंवईपन

निर्लिप्त उज्ज्डता

गंवार और भोले-भाले 

लोगों की आत्मीयता

कि वे रात्रि के पिछले प्रहर से ही

करते हैं, ईश्वर भजन

साझा करते हैं 

एक दूसरे के सुख-दुःख

मिट्टी की सुगंध लिए

वायु की आत्ममुग्धता में

अपने हृदय की व्यथा को धोया

और मीठे स्वप्न में

मैं नींद भर सोया।

अलाना फलाना जिंदाबाद

वो बोलता है

अलाना फलाना जिंदाबाद

तुम बोलते हो

इंकलाब जिंदाबाद

वो कहता है

देश की जनता भूखी है

तुम कहते हो

हमारी अमर संस्कृति सूखी है

वो कहता है

ये दिल्ली की है सरकार

खूब पनपता भ्र्ष्टाचार

देश की सत्ता मुर्दाबाद

अफसरशाही मुर्दाबाद

तुम कहते हो

घर-घर से आई आवाज

जनता को दो न्याय

दो अधिकार तख्त ताज

लेकिन जनतंत्र की भीड़ में

जो कल एक बेसहारा 

गरीब को रौंद डाला था

जो खुलेआम कत्लेआम किया

जो मासूम जिंदगी के साथ 

हवस की चाशनी लगाकर खेला

ताज्जुब है वो आज

किसका मुर्दाबाद कहता है?

खून पसीने से निकली उष्णता

लू उमस ठिठुरन और 

भीगते अरमान से जिसने

धरती महकाया, 

किया कठोर परिश्रम का

सस्वर पाठ, शिल्प रचा

नंगे पांव चलकर 

बनाया राजमार्ग….

सड़कों पर आंदोलन

वे सड़कों पर हैं

आप महलों में हो

वे आंदोलन कर रहे हैं

बता रहे हैं, 

मिट्टी में बहाए गए

अपने बदबूदार पसीने की

व्यथा-कथा

खपा दी गई अपनी ऊर्जा,

संघर्ष की, विनम्र श्रधांजलि

बेदम दिनचर्चाओ के साथ

अपने विश्राम को स्वाहा करता

अपना स्वप्निल बसंत
भूख प्यास को होम करता

आज वह मांगता है कीमत

वाजिब हक, अपना अधिकार

तुम दे रहे हो तिरस्कार,

घृणा, त्रासदी का

सुरेन्द्र प्रजापति
सुरेन्द्र प्रजापति

कवि- सुरेन्द्र प्रजापति, सम्पर्क:-ग्राम- असनी, पोस्ट- बलिया, थाना- गुरारू, जिला- गया, बिहार- 824205, जन्म- 8 अप्रैल 1985, शिक्षा- मैट्रिक, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन, ‘सूरज क्षितिज में’ कहानी संग्रह प्रकाशित, शौक- साहित्य पढ़ना, कविता-कहानी लिखना।

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