लोकमंच पत्रिका

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कोरोना काल में उपजते ‘आरोपजीवी’- वेदप्रकाश

‘आरोपजीवी’ आंदोलनजीवियो का नया वैरियंट है। यह वैरियंट मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए संगठित हैं। कांग्रेस,समूचा विपक्षी कुनबा और इनके विभिन्न अनुयायी टूलकिट के जरिए पूरी तरह सक्रिय हैं। कोरोना की दूसरी लहर अपने चरम पर है। इस आपदा ने भारत सहित समूचे विश्व को आर्थिक क्षति के साथ-साथ सामाजिक क्षति भी पहुंचाई है। संक्रमण के बढ़ते प्रभाव के चलते सामाजिक ताना-बाना प्रभावित हुआ है, विकास की गति धीमी हुई है, किंतु फिर भी समूचे विश्व में इस महामारी के विरुद्ध एकजुटता दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री मोदी, प्रशासनिक व्यवस्थाएं और जन सामान्य इस अदृश्य शत्रु से हर एक जिंदगी को बचाने की लडाई लड रहे हैं। भारतवर्ष में कोरोना संकट का विस्तार और उससे निकलने की गति काफी तेज है। वैश्विक आंकड़ों की दृष्टि से संक्रमण की तुलना में ठीक होने वालों का आंकड़ा बेहतर प्रबंधन के संकेत देता है।  कोरोना संकट से निबटने में भारतवर्ष की महत्वपूर्ण रणनीति अथवा प्रयासों की सराहना समूचे विश्व में हो रही है, किंतु हमारी भीतरी स्वार्थपूर्ण राजनीति के चलते समूचा विपक्ष और कुछ लोग आधारहीन आरोपों और बयानबाजियो में जुटे हैं। ये संकट में साथ देने की बजाय  उपहास उड़ा रहे हैं।

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भारत एकमात्र ऐसा देश है जो संकट की इस घड़ी में  गरीब, मजदूर, किसान, वृद्ध, महिलाएं, लघु उद्योग आदि सभी के लिए सहायता योजनाएं चला रहा है। अन्य देशों के साथ साथ  शुरू हुआ हमारा वैक्सीन का उत्पादन और टीकाकरण अभियान  आज शिखर पर है, समस्या से निबटने के लिए तमाम गतिरोधो को समय पर दूर करने का प्रयास किया जा रहा है, शासन- प्रशासन में बेहतर संतुलन बनाने का प्रयास भी जारी है, राहत कार्यों एवं प्रभावी योजनाओं की जानकारी अनेक मंचों पर साझा की जा रही है,  प्रधानमंत्री स्वयं समय-समय पर जन सामान्य के साथ संवाद कर उनकी हिम्मत बढ़ा रहे हैं, बीमारी से लड़ने और जीतने की बात कर रहे हैं, जन सामान्य की पीड़ा को महसूस करते हुए काम कर रहे हैं, किंतु विडंबना है कि समूचा विपक्ष भिन्न-भिन्न तरीकों से इस संकट काल में साथ देने के बजाय भ्रम और भय का वातावरण बना रहा है। ऐसा लगता है कि यह कोरोना के साथ उपजता एक वर्ग है जो आरोपजीवी है। यह वर्ग सवाल पूछने, पत्र लिखने,सुझाव देने और आरोप-प्रत्यारोपों आदि के जरिए ही जिंदा रहना चाहता है, आरोपों से ही इनकी आजीविका चलती है। सेवा भाव से इनके द्वारा कोई काम कहीं नहीं  दिखाई देता। ये लोग अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अनुचित टीका-टिप्पणी एवं प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद की गरिमा को धूमिल करने का कार्य कर रहे हैं।

वर्ष 2014 में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद से ही ये लोग निरंतर अवसर पाकर दुष्प्रचार में लगे हैं और अब इन्हें कोरोना का डमरू हाथ लग गया है। इनके द्वारा सरकार को घेरने का निरंतर प्रयास हो रहा है। केंद्र सरकार को नाकारा साबित कैसे किया जाए यह चिंतन शिखर पर है। दुष्प्रचार हेतु ये और इनके अनुयायी टि्वटर, फेसबुक, व्हाट्सएप और अब पोस्टर आदि साधनों का भरपूर प्रयोग कर रहे हैं। बडे बडे आरोपजीवी टूलकिट के द्वारा तय रणनीति के तहत सक्रिय हैं। विभिन्न संवेदनशील विषयों पर स्टेटस के जरिए दुष्प्रचार करने और विद्वेष फैलाने का कार्य जारी है। कभी तो ये कोरोना वैक्सीन को मोदी वैक्सीन, घातक वैक्सीन, काउ वैक्सीन बताते हैं, कभी सीधे सादे किसानों को सरकार के विरुद्ध डटे रहने का संदेश देते हैं, कभी सरकार को नाकारा बताते हैं, कभी केंद्र सरकार पर सहयोग न करने, कभी ऑक्सीजन न देने,कभी आवश्यक दवाइयां ने देने, कभी राजधानी दिल्ली में पोस्टरों के जरिए प्रधानमंत्री से बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेजी ऐसा पूछते हैं, एक सांसद महोदय प्रधानमंत्री को बहुरूपिया कहते हैं, अजीबोगरीब चित्रों को ट्विटर पर डालते हैं, पैनल डिस्कशन में आधारहीन आरोप लगाते हैं। भ्रम फैलाने और आरोप-प्रत्यारोपों का यह सिलसिला जारी है। पूर्वाग्रहों से ग्रसित ये आरोपजीवी जाति, क्षेत्र और संप्रदाय के लोगों को उकसाने का भी काम करते हैं,उन्हें मोहरा बना रहे हैं।

विभिन्न संवेदनशील विषयों पर स्टेटस के जरिए दुष्प्रचार करने और विद्वेष फैलाने का कार्य जारी है। कभी तो ये कोरोना वैक्सीन को मोदी वैक्सीन, घातक वैक्सीन, काउ वैक्सीन बताते हैं, कभी सीधे सादे किसानों को सरकार के विरुद्ध डटे रहने का संदेश देते हैं, कभी सरकार को नाकारा बताते हैं, कभी केंद्र सरकार पर सहयोग न करने, कभी ऑक्सीजन न देने,कभी आवश्यक दवाइयां ने देने, कभी राजधानी दिल्ली में पोस्टरों के जरिए प्रधानमंत्री से बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेजी ऐसा पूछते हैं,

मोदी सरकार के द्वारा मीडिया को खरीद लिया गया है- ऐसे आरोप और गोदी मीडिया की संकल्पना देने वाले विराट मीडियाकर्मी भी चुप हैं। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना से अन्न पाने वाले एक सामान्य व्यक्ति को भी यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि यह सुविधा मोदी सरकार नहीं दे रही है, मोदी तो केवल विदेशों में घूमते हैं। इनके झूठे प्रचार के अनेक उदाहरण हैं। गूगल जैसे बड़े-बड़े प्लेटफार्म का प्रयोग भ्रम और भय फैलाने के लिए किया जा रहा है। यह अभिव्यक्ति की कैसी स्वतंत्रता है, जिसमें देश के प्रधानमंत्री और महामारी से जूझ रहे जन जन की चिंता से हटकर भ्रम और भय फैलाया जा रहा है। किसी व्यक्ति के प्रति ईर्ष्या और उपहास का भाव क्या एक अच्छे नागरिक चरित्र का द्योतक है? आज यह भी चिंता और चिंतन का विषय है कि क्या ऐसे आरोपजीवी जनसेवी भी हो सकते हैं? अपने निहित राजनीतिक स्वार्थों के लिए जनता में सत्तारूढ़ सरकार और प्रधानमंत्री के प्रति अविश्वास पैदा करना क्या अपराध की श्रेणी में नहीं आता? यह भी सर्वविदित है कि इतनी बड़ी आपदा से निपटने के लिए शासन- प्रशासन के पास संसाधनों की कमी पड़ जाती है, किंतु सीमित संसाधनों में भी बेहतर प्रयासों पर बार-बार उंगली उठाना, दोषारोपण करना, झूठा प्रचार तंत्र खड़ा करना, क्या सामाजिक और राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने वाला नहीं है? आज जब विश्व के अनेक देश आपदा में भारत की मदद के लिए आगे आ रहे हैं, वहीं भारत में बैठे कुछ आरोपजीवी जनता को भ्रम,भय, ईर्ष्या और उन्माद की अग्नि में धकेल रहे हैं, भारतवर्ष की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं पर प्रहार कर रहे हैं, यह घातक है। ए.सी. कमरों में बैठकर प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए ये आरोपजीवी उन लोगों की हिम्मत तोड़ रहे हैं जो अपनी कठिन परिश्रम की कमाई से सेवा कार्यों में जुटे हैं, जो घंटों पसीनो में नहाए पीपीई किट पहनकर प्रत्येक जीवन को बचाने का प्रयास कर रहे हैं।

संकट के समय दुष्प्रचार से यह कैसा दायित्व निर्वाह है, कैसा मानव धर्म है? समझ से परे है। सरकार के कार्यों की आलोचना सर्वथा अनुचित नहीं है, किंतु  आलोचना कब, आलोचना का स्तर  और उसकी सार्थकता आदि का ध्यान नहीं रखना चाहिए? संकटकाल में तो शत्रु भी मित्रता का भाव रखकर मदद करता है, फिर इन आरोपजीवियो को किस श्रेणी में रखना चाहिए? यह समझने की आवश्यकता है। विश्व के अनेक देशों में पक्ष- विपक्ष एकजुट होकर  संकट से निकलने में मदद कर रहे हैं, एक सामान्य व्यक्ति भी राशन किट व दवाओं की किट से मदद कर रहा है, किंतु विडंबना है कि भारतीय लोकतंत्र में टूलकिट के द्वारा भ्रम, भय और आरोप-प्रत्यारोपों  का वातावरण बनाकर आरोपजीवी दुष्प्रचार का प्रयास कर रहे हैं।

लेखक- डॉ. वेदप्रकाश, असिस्टेंट प्रोफेसर, हंसराज कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय। सम्पर्क- 9818194438

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