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बिहार के गांधी : ध्वजा प्रसाद साहू

श्री ध्वजा प्रसाद साहू मुज़फ़्फ़रपुर के प्रसिद्ध स्वत्रंत्रता सेनानी, गांधी और खादी के सच्चे साधक और अनगनित प्रतिभाओं के एक ऐसे धनी व्यक्ति थे जिन्होंने अपने विपरीत जीवन परिस्थितियों में भी एक ऐसी मिसाल कायम की जो देश और समाज को सालों साल प्रेरित करता रहेगा। पढ़ें, प्रसिद्ध गाँधीवादी लेखक सतीश कुमार का लेख-

मुज़फ़्फ़रपुर के राम खेतारी गांव के एक गरीब किसान परिवार में पैदा हुए ध्वजा बाबू के बचपन में ही पिता का साया उठ गयाथा। सांप काटने से उनकी मौत हो गई थी। बड़े भाई श्री मटुक साहू ने उन्हें गांव के हाट पर अनाज के बदले नगदी का छोटा मोटा काम करके उन्हें आगे बढने और पढ़ने केलिए प्रेरित किया। विलक्षण प्रतिभा के धनी होने केकारण उन्हें सरकारी वजीफा मिलने लगा और लैंप पोस्ट के नीचे पढ़ कर वकालत तक की पढ़ाई पूरी की पर देश प्रेम का जज्बा उन्हें राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की ओर खींच ले गया। मुजफ्फरपुर में उस वक्त खुदी राम बोस का जलवा नौजवानों को देश पर बलिदान होने को प्रेरित कर रहा था। खुद ध्वजा बाबू ने शनिवार ११ अगस्त १९६२ के दिन की डायरी में लिखा था खुदीराम बोस निर्भीकता के प्रतीक थे। उन्हें पता था कि एक अंग्रेज की हत्या से अंग्रेज़ देश छोड़कर नहीं भागेंगे पर अंग्रेजों के जुल्म और ज्यादती पर इस धमाके का असर जरूर होगा और लोगो के बीच आजादी का जज़्बा जागेगा। दिल्ली स्थित नेहरू स्मारक पुस्तकालय के तत्कालीन निदेशक स्व. हरिदेव शर्मा को दिए साक्षात्कार में खुदीराम बोस की फांसी से उपजे हालात के बारे में ध्वजा बाबू कहते हैं “छोटी उम्र के बाबजूद खुदी राम बोस द्वारा बम फेंके जाने का असर हम सब पर खूब पड़ा। जिला स्कूल के रास्ते जब खुदीराम बोस को कचहरी के जाया जाता, उत्सुकता से हम सब उन्हें निहारते रहते।”

ध्वजा प्रसाद साहू, लोकमंच पत्रिका

खुदीराम बोस की निर्भीकता के बारे में वे आगे कहते हैं “जब खुदीराम बोस मुजफ्फरपुर के जेल में बंद थे उस समय अस्सिटेंट डिस्ट्रिक्ट सुपरिटेंडेंट एक सिविल सर्जन था जो बंगाली था। वो खुदीराम बोस के खाने के लिए आम ले गए। तब तक खुदीराम बोस को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी थी। खुदीराम बोस ने आम तो खा लिया पर उसका छिलका ऐसे उतारा मानो आम साबुत ही पड़ा हो। अगले दिन अस्सिटेंट सिविल सर्जन जब आया तो उसने खुदीराम बोस से आम न खाने का कारण पूछते हुए आम को उठाया तो देखा कि आम खाया हुआ है, हाथ में जाते ही आम का छिलका बिखर गया, खुदीराम जी की हंसी छूट गई। तब उन्होंने कहा कि “कल तुमको फांसी होने वाली है पर मजाक की आदत तुम्हारी नहीं गई।” तब खुदीराम बोस ने अस्सिटेंट सिविल सर्जन को कहा कि फांसी और मजाक का कोई संबंध नहीं है। फांसी होनी है तो होगी लेकिन खुशी के पल यूहीं नहीं जाने देते” इतने निर्भीक और बेपरवाह इंसान थे खुदीराम बोस। ध्वजा बाबू के जीवन पर खुदीराम बोस की शदाहत का गहरा असर था और वे अनुशीलन पार्टी जो बंगाल के क्रांतिकारियों के गर्म दल था उसमें शामिल हो गए। पटना से प्रकाशित सर्च लाइट अख़बार के संपादकीय विभाग में 25 रुपए की नौकरी करते हुए वे पटना में क्रांतिकारियों के संगठन को और मजबूत करने में लग गए। बाद में पुलिस की नजरों से बचने केलिए उन्हें भागलपुर जाना पड़ा और वहां भी संगठन का काम करने लगे ।।

ध्वजा बाबू और जय प्रकाश नारायण , लोकमंच पत्रिका
ध्वजा बाबू और जय प्रकाश नारायण , लोकमंच पत्रिका

महात्मा गांधी चंपारण में शुरू हुए सत्याग्रह में भाग लेने अप्रैल 1917 में चंपारण पहुंचे थे। उस वक्त ध्वजा बाबू मुज़फ़्फ़रपुर के लंगट सिंह कॉलेजके विद्यार्थी थे। जहाँ महान राष्ट्रभक्त जे बी कृपलानी जैसे प्रोफेसर का उन्हें सान्निध्य प्राप्त था। गांधीजी जब मुज़फ़्फ़रपुर आए तो जिस बघ्घी में स्टेशन से उन्हें कॉलेज लाया गया, विद्यार्थियों ने उसके घोड़े खोलकर खुद के कंधों से उस बघ्घी को खींच कर उन्हें हॉस्टल तक लाया था। ध्वजा बाबू भी उनमें से एक थे। गांधीजी से यह उनकी पहली भेंट थी जो धीरे-धीरे और भी प्रगाढ़ होती गई। गरम दल को त्याग कर गाँधी के चंपारण के अहिंसात्मक आंदोलन के साथ वे गहरे जुड़ते गए। चंपारण सत्याग्रह के जरिये गांधीजी ने किसानों को अंग्रेजों के शोषण से मुक्त करने के लिए पहली बार सत्याग्रह आन्दोलन का रास्ता अपनाया, जो अब वैश्विक इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज है।

ध्वजा बाबू और विनोबा भावे, लोकमंच पत्रिका
ध्वजा बाबू और विनोबा भावे, लोकमंच पत्रिका

इसी अभियान के साथ किसानों का मुद्दा भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का अभिन्न अंग बना। इससे शुरू हुई प्रक्रिया जमींदारी उन्मूलन तक गयी। इसी आंदोलन ने मोहनदास करमचंद गाँधी को महात्मा गाँधी बनाया। चंपारण सत्याग्रह के दौरान ही गाँधीजी ने आम भारतीय किसान की तरह का लिबास अपनाया और वंचित तबकों से खुद से जोड़ने की कोशिश शुरु की। इससे आम भारतीयों के मन में उनके लिए जगह बनी। चंपारण सत्याग्रह की प्रथम पाठशाला में दीक्षित होने के बाद ध्वजा बाबू गांधी जी के कार्यक्रमों में ऐसे रच बस गए कि उनकी जिंदगी की दिशा और दशा दोनों बदल गई। गाँधी जी द्वारा भारत में पहले सत्याग्रह आन्दोलन का शंखनाद चंपारण से शुरु हुआ। यहाँ किसानों के बच्चों को शिक्षित करने के लिए ग्रामीण विद्यालय खोले गये। लोगों को साफ-सफाई से रहने का तरीका सिखाया गया। सारी गतिविधियाँ गांधीजी के आचरण से मेल खाती थीं। स्वयंसेवकों ने मैला ढोने, धुलाई, झाडू-बुहारी तक का काम किया। इसके साथ ही गांधीजी का राजनीतिक कद और बढ़ा।
गांधीजी का जीवन किसी नदी की भांति था जिसमें कई धाराएं मौजूद थीं। उनके अपने जीवन में शायद ही ऐसी कोई बात रही हो जिन पर उनका ध्यान नहीं गया हो या फिर उन्होंने उस पर अपने विचारों को प्रकट नहीं किया हो।

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चंपारण के किसानो की समस्या को सुलझाने में गाँधी जी को बाबू राजेन्द्र प्रसाद, आर्चाय जे. बी. कृपलानी, बाबू बृजकिशोर प्रसाद तथा मौलाना मजरुल हक और ध्वजा बाबू जैसे विशिष्ट लोगों का सहयोग भी मिला। इस सफल सत्याग्रह से चंपारण के किसानों में आत्मविश्वास जगा और अन्याय के प्रति लङने के लिये उनमें एक नई शक्ति का संचार हुआ। चंपारण सत्याग्रह भारत का प्रथम अहिंसात्मक सफल आन्दोलन था। गाँधी जी द्वारा यहाँ किसानों के बच्चों को शिक्षित करने के लिए ग्रामीण विद्यालय खोले गये। लोगों को साफ-सफाई से रहने का तरीका सिखाया गया। 1925 में चरखा संघ की स्थापना के साथ ही गांधीजी ने खादी ग्रामोद्योग कार्यक्रम को संस्थागत स्वरूप प्रदर्शन करने का काम किया। कृपलानी जी की प्रेरणा और सहयोग से ध्वजा बाबू ने गांधी कुटीर नामक संस्था की स्थापना की और बाद में उत्तर प्रदेश में श्री गांधी आश्रम की स्थापना हुई और ग्राम निर्माण में खादी ग्रामोद्योग महत्व को गांधीजी ने प्रति स्थापित किया। एक सच्चे और समर्पित सेवक की भांति ध्वजा बाबू गाँधी के साथ एकाकार हो गए और गरीब गुरबो के कल्याण केलिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। गांधीजी रचनात्मक कार्यक्रमों को सच्चे स्वराज्य की कुंजी मानते थे।

आचार्य जे बी कृपलानी बाए बीच में ध्वजा बाबू एवम परिवार के अन्य सदस्य
आचार्य जे बी कृपलानी बाए बीच में ध्वजा बाबू एवम परिवार के अन्य सदस्य, लोकमंच पत्रिका

“गांधीजी ऐसा स्वराज चाहते थे, जिसमें समाज का अंतिम व्यक्ति यह महसूस करे कि वह आजाद है और देश के विकास में उसका महत्वपूर्ण योगदान है।” गांधीजी के इस सूत्र को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर ध्वजा बाबू जीवन पर्यन्त उस सच्चे स्वराज्य की प्राप्ति के लिए निरंतर गतिशील और ऊर्जावान बने रहे। उनकी निष्ठा की इससे बड़ी मिसाल क्या हो सकती है कि आजादी के बाद जब 1952 में पहला लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई तब खुद जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें सीतामढ़ी लोकसभा सीट से कांग्रेस का टिकट दिया था पर उन्होंने यह कहकर कि गांधीजी ने उन्हें रचनात्मक कार्यों का भार सौंपा है इसलिये वे चुनावी राजनीति में नही जाना चाहते और विनम्रतापूर्वक टिकट लेने से इंकार कर दिया। वे अपनी पूरी निष्ठा के साथ खादी ग्रामोद्योग और रचनात्मक कार्यों के माध्यम से देश और ग्रामीण जीवन के उत्थान कार्योंमें लगे रहे।

आजादी के बाद जब 1952 में पहला लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई तब खुद जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें सीतामढ़ी लोकसभा सीट से कांग्रेस का टिकट दिया था पर उन्होंने यह कहकर कि गांधीजी ने उन्हें रचनात्मक कार्यों का भार सौंपा है इसलिये वे चुनावी राजनीति में नही जाना चाहते और विनम्रतापूर्वक टिकट लेने से इंकार कर दिया।

गाँधीजी के बाद भूमिहीनों की समस्या के अहिंसक समाधान के लिए बाबा विनोबा का भूदान यज्ञ के व्यापक कार्यक्रम की घोषणा 1952 में हुई। ध्वजा बाबू अपने दलबल के साथ इस कार्यक्रम से न केवल जुड़े बल्कि पूरा बिहार खादी ग्रामोद्योग संघ जो बिहार की सभी खादी संस्थाओं की मातृ संस्था है, इस कार्यक्रम की सफलता के लिए झोंक दिया। भूदान, ग्रामदान की जो धारा तेलंगाना से प्रारंभ हुई थी, बिहार में वो क्रांति की मिसाल बन गई।

देश को आजाद हुए कुछ वर्ष ही हुए थे कि 1962 में चीन ने देश पर आक्रमण कर दिया। देश की सीमा सुरक्षा को लेकर जवाहरलाल नेहरू ने एक विस्तृत कार्य योजना के संदर्भ में बाबा विनोबा, जय प्रकाश नारायण, वैकुण्ठ लाल मेहता, यू एन ढेबर और ध्वजा बाबू सरीखे रचनात्मक जगत से आव्हान किया ताकि सीमा से जुड़े गाँवों में भारत के प्रति स्नेह की धारा बनी रहे और उन्हें मुख्य धारा में लाया जा सके। उस समय ढेबर भाई खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष थे और ध्वजा बाबू सक्रिय सदस्य। खादी ग्रामोद्योग आयोग, बिहार खादी ग्रामोद्योग संघ और सर्वोदय की शीर्ष संस्था सर्व सेवा संघ ने मिलकर अरुणाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों में खादी ग्रामोद्योग के माध्यम से गाँव गाँव मे रचनात्मक कार्यों का जाल बिछाया जो ध्वजा बाबू की स्मृति का आज भी गवाह है।

गांधी ने शिक्षा पर काफी जोर दिया था, उनके सपने के बुनियादी विद्यालयों की स्थापना में बिहार ने महती भूमिका निभाई थी। सर्वोदय ग्राम में स्थापित नई तालीम विद्यालय उनकी कृति का साक्षी है, जिसमें शिक्षा ग्रहण का सौभाग्य मुझे (लेखक को) भी प्राप्त हुआ है। आज भले ही हालत बिहार में काफी बदतर है। पारंपरिक रूप से जो छवि हमें मिली है, वह है मातृभूमि की जो ‘सुजलाम् सुफलाम् मलयज शीतलाम् है, शस्य श्यामलाम् है’ जिसका हम नमन करते हैं। लेकिन आज पूंजीवादी व्यवस्था में यह तहस-नहस हो गई है। गांधी के विचारों और सपनों को अब तक आई सभी सरकारों ने अपने लिए भुनाया है, मगर उनके सपनों के भारत को वे पीछे छोड़ते चले गए। गांधीजी ने आज़ादी की लड़ाई के साथ-साथ छुआछूत उन्मूलन, हिंदू-मुस्लिम एकता, चरखा और खादी को बढ़ावा, ग्राम स्वराज का प्रसार, प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा और परंपरागत चिकित्सीय ज्ञान के उपयोग सहित तमाम दूसरे उद्देश्यों पर काम करना ध्वजा बाबू ने जीवन पर्यन्त जारी रखा ।

एक बात और जो बहुत महत्व की है। कुछ अज्ञानी लोग ध्वजा बाबू , लक्ष्मी बाबू और रामदेव बाबू के बीच एक दूसरे को बड़ा छोटा करने की दलील देने से नही थकते। सच में बिहार की इस त्रिमूर्ति को सादर वंदन का समय है। बिहार के लिए लक्ष्मी बाबू विष्णु रूप, ध्वजा बाबू शिव रूप और रामदेव बाबू ब्रह्मा रूप की तरह याद किये जाते हैं। लक्ष्मी बाबू बिहार को ही अपनी कर्मभूमि मानते थे जबकि ध्वज बाबू को उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर हमेशा भेजा ताकि बिहार में भी खादी ग्रामोद्योग के तकनीकी विकास का लाभ मिल सके।
ध्वजा बाबू का यह अद्भुत आकर्षण था कि उन्हें जानने भर से या फिर महज़ एक बार मिलने भर से कई लोगों ने अपनी पूरी ज़िंदगी उनके सिद्धांतों को अपनाने में लगा दी। हर दौर में, इंसान अपनी मूर्खताओं और कमज़ोरियों के साथ जैसा है मोटे तौर पर वैसा ही बना रहता है. लेकिन गांधी जी के दौर में, उनकी प्रेरणा और उनकी क़द्दावर शख्सियत के असर से बड़े पैमाने पर लोग अपने बुरे तत्वों को दूर रखने और अपने अच्छे तत्वों को बाहर निकालने में कामयाब रहे। ध्वजा बाबू उन्हीं सरीखे एक अतुलनीय व्यक्ति थे।

आज की राजनीति एकदम अलग तरीक़े की हो गई है जहां घृणा और असुरक्षा की भावना को बढ़ावा देकर उसे जीने का रास्ता बना दिया गया है। जबकि गांधीजी और ध्वजा बाबू भयमुक्त समाज के निर्माण की दिशा में लगे रहे। गांधीजी को मौत से कभी डर नहीं लगा और ना ही उनमें सत्ता की भूख थी। भारत के लिए ही नहीं बल्कि दुनिया भर के लिए उन्होंने लोगों को घृणा नहीं करना सिखाया। उन्होंने प्यार से संघर्ष करना और निराश हुए बिना संघर्ष करना सिखाया। ध्वजा बाबू के जीवन की राह मानवता, सहअस्तित्व, दृढ़ मनोबल से अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़ने की रही। उनकी पुण्यतिथि पर उनकी स्मृति को भावपूर्ण नमन!

लेखक सतीश कुमार, प्रसिद्ध गाँधीवादी विचारक व लेखक हैं। सम्पर्क – skrsat@gmail.com

40 thoughts on “बिहार के गांधी : ध्वजा प्रसाद साहू

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