लोकमंच पत्रिका

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पूनम मानकर पिसे द्वारा अनूदित कविता महाजन की तीन मराठी कविताएँ

कवयित्री डॉ पूनम मानकर पिसे ने मराठी भाषा की प्रसिद्ध कवयित्री कविता महाजन की तीन कविताओं ‘चित्र’,’दुपार’ और ‘पाखरु’ का हिन्दी में अनुवाद किया है। आप भी पढ़ें-

शीर्षक – चित्र , मराठी शीर्षक – चित्र

बहुत दिनों से

मुझे रंगना है एक चित्र

माचिस की डिब्बी में रखीं

तितली का

माचिस की डिब्बी के नीले

जामुनी,

गहरे काले अंधेरे में

कैद, घुटती..

पीले पंखों पर काले धब्बों

वाली तितली..

फीकी पड़ी हुई पीली

मखमल

किसी की चिमटी से लगने से

उड़ा हुआ रंग..

परंतु काले धब्बे वैसे ही

पक्के कायम

ना पोछें जाने वाले पाप

कृत्यों जैसे

धड़कती इत्ती-सी काया

और सूक्ष्म थरथराहट पंखों में

शायद आखिरी..

माचिस की डिब्बी में

सर्रर्र से जलने वाली तीलियों

की जगह रखी हुई कोमल

तितली..

कभी नहीं जलेगा

उसके पंखों का जिलेटिन..

अब सर्द पड़ रही है

माचिस की डिब्बी भी

जमीन के नीचे दफन ताबूत

की तरह..

ऐसा चित्र मुझे

रंगना है मुझे बहुत दिनों से

उंगलियाँ अकड़ने से पहले..

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शीर्षक – पखेरू मराठी शीर्षक – ‘पाखरु’

पखेरू मारने लगा चोंच

देखकर आईने में दूसरा पखेरू

उसके जैसा

उन्होंने धर दबोच लिया मुट्ठी में..

वह मुट्ठी भर, भूरा पखेरू..

सुर्ख लाल आंखों वाला..

ना फड़फड़ा सका

ना ही चीख़ सका

ना समझ पाया

कब निकली आखिरी सांँस..

फिर उन्होंने मुट्ठी खोल

रख दियपर उसे एक पारदर्शी कांच पर

छोटे-छोटे पैने हथियारों से

सफाई से छीला

डूबोया रसायन में

भूसा भर के सीया, सजाया

आईने पर आहिस्ते, तिरछा बिठा दिया.

किसी भी पल चोंच मारने की मुद्रा में वह स्थिर

बैठा, भूरा,

सुर्ख लाल आंखों वाला,

मुट्ठी भर पखेरू..

देखते हुए उनके हाथ

फिर से मचलते हैं

उसे मुट्ठी में धर दबोच ने को

लेकिन खाली लौट आते हैं

पखेरू बिना..

केवल एक बार हारने के बाद

जीत रहा है पखेरू

अब हर बार..

मराठी कवयित्री कविता महाजन

शीर्षक- दोपहर , मराठी शीर्षक – दुपार

मैं रिसीवर उठा कर देखती हूंँ

फोन शुरू है इस बात की

फिर से पुष्टि कर लेती हूंँ

पंखा घूम रहा है

मतलब

बिजली खेल रही है

वायर्स के जरिए

फिर भी

एक बार खोल कर दरवाजा

मैं डोअरबेल बजा कर देखती हूंँ

निहारती हूं लेटर बॉक्स

बहुत जगह है उसमें

छोटे बड़े खतों के अलावा

एक-आध पत्रिका भी समा जाए

खिड़की खोलकर

बाहर देखते हुए सोचतीं हूँ

इतनी भी तेज नहीं है धूप

कि एक-आध पंछी भी न आए इधर

दूर से आवाजें आ रही है सुनाई

मतलब शुरू है लोकल्स्

घूम रहे हैं ऑटो

किसी बंद कि नहीं है संभावना

या दंगे फसाद ही कहीं

मैं लगाती हूंँ चक्कर

हॉल से किचन तक

किचन से बेडरूम तक

फिर से बेडरूम से हॉल

रिसीवर उठा कर देखती हूंँ..

डॉ पूनम मानकर पिसे, लोकमंच पत्रिका
डॉ पूनम मानकर पिसे, लोकमंच पत्रिका

अनुवादक – डॉ पूनम मानकर पिसे प्रसिद्ध कवयित्री हैं और अकोला महाराष्ट्र में रहती हैं।

2,808 thoughts on “पूनम मानकर पिसे द्वारा अनूदित कविता महाजन की तीन मराठी कविताएँ

  1. Remove card ivermectina purgante para que sirve “It also suggests that social stability is a good way of mitigating disease spread. So if you can intervene in a system and maintain social stability that’s likely to be the best of both worlds.”