लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
‘राष्ट्रीय जनवादी-सांस्कृतिक मोर्चा’ और रामनारायण शुक्ल- शशांक शुक्ला

स्मृति आलेख – 2

काशी हिंदू विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग (1977-1983 ) – अलिखित दस्तावेज

नक्सलवाड़ी आंदोलन और जनवाद –

बंगाल के नक्सलवाड़ी में जनता का एक आंदोलन हुआ। यह स्वतंत्र भारत का पहला आंदोलन था। इस आंदोलन की विशेषता यह थी कि सत्ता और व्यवस्था के प्रति, उसके प्रतिरोध में यह निर्मित हुआ था। स्वतंत्रता से पूर्व विरोध का स्वर ‘औपनिवेशिक’ था। किन्तु इसमें अपनी ही व्यवस्था के प्रति आक्रोश, विरोध। कुछ लोग ‘भूख से तनी मुट्ठी को नक्सलवाड़ी’ समझते हैं (धूमिल), किन्तु इसके मूल में ‘भूख’ तो थी ही, साथ ही ‘वैचारिकता’ भी थी। जनता की भागीदारी को, उसकी सचेतता को मज़बूत करना भी इसका उद्देश्य बना। इसीलिए नक्सलवाड़ी आंदोलन में नुक्कड़ नाटकों का प्रचलन बढ़ा। व्यवस्था के प्रति जनता की जागरूकता और आंदोलन इसके केंद्र बने। नक्सलवाड़ी साहित्यिक आंदोलन न था, राजनीतिक व सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन था। बावजूद इसने साहित्य को सर्वाधिक प्रभावित किया। हिंदी की एक पूरी पीढ़ी राजकमल चौधरी से लेकर धूमिल तक इस आंदोलन से ऊर्जा ग्रहण करती है।

हालांकि अराजकता के स्वर राजकमल में भी हैं और धूमिल में भी। इसके कतिपय कारण थे। राजकमल पर ‘बीट’ कवि एलेन गिलनस्वर्ग का प्रभाव भी कम नहीं हैं। धूमिल तक आते-आते यह प्रभाव कम हो गया है। बावजूद हिंदी कविता पर नक्सलवाड़ी आंदोलन का प्रभाव स्थायी रूप से पड़ा। यहां एक बात स्पष्ट रूप से समझने की है कि नक्सलवाड़ी और नक्सलवादी हू-ब-हू एक ही नहीं हैं, जैसा कि कुछ लोग समझ लेते हैं। यह भ्रम इसलिए भी हुआ कि नक्सलवाड़ी आंदोलन से निकले कुछ लोग नक्सलवादी आंदोलन की ओर गए। नक्सली आंदोलन के केंद्र में हिंसा और व्यवस्था है। किंतु नक्सलवाड़ी आंदोलन एक ‘वैचारिक आंदोलन’ था। हां, बाद के दिनों में यह वैचारिकता कहीं कमज़ोर जरूर पड़ी।

जनवाद –

प्रश्न है कि जनवादी दृष्टि क्या है? हर सचेत साहित्य जनता की बात करता है। किंतु यह जनवादी मोर्चा जनता के भीतर चेतना जागृत करने का क्रियाशील माध्यम है। जनवाद अब लेखक के स्तर से व्याख्यायित करने की चीज़ नहीं रह गई, अपितु वह जनता के बोध के स्तर पर लाने की चेतना है। जनवाद एक दृष्टि है, जिसके मूल में वैश्विक गति है। रामनारायण शुक्ल ने लिखा है- ” जनवादी दृष्टि अतीत की अपेक्षा वर्तमान को अधिक महत्व देती है और निश्चित निर्देश में युग को बदलने के प्रति कटिबद्ध होती है।”। यानी वर्तमान केंद्रित दृष्टि और युग को बदलना। प्रगतिशील आंदोलन के केंद्र में वैचारिक दृष्टि थी। जनवाद के केंद्र में जनजागरण। प्रगतिशील आंदोलन में जनता उद्दीपन है, जनवाद के केंद्र में जनता ‘आलंबन’…और कुछ स्थितियों में ‘आश्रय’। जनवाद के केंद्र में इसीलिए जनता के बीच जाना, उन्हें जागरूक करना और उनकी संवेदना के आलोक में साहित्यिक-सांस्कृतिक सौंदर्यबोध को जाग्रत करना मुख्य होता है। नक्सलवाड़ी आंदोलन ने इसीलिए जनवाद को अपना मुख्य आधार बनाया।

राष्ट्रीय जनवादी-सांस्कृतिक मोर्चा और रामनारायण शुक्ल –

नक्सलवाड़ी आंदोलन टूट चुका था। उसके कुछ सदस्य देश के इधर-उधर बिखर चुके थे। व्यवस्था का विरोध वैचारिक तो था, किन्तु उस विरोध में आकोश बहुत था। यह विरोध स्वाभाविक था। नक्सलवाड़ी आंदोलन परिस्थितियों की मांग थी। राष्ट्रीय स्तर पर यह महसूस किया जाने लगा था कि एक ऐसा संगठन बने, जो जनजागरण को सांस्कृतिक रूप में उठाए। ‘कम्युनिस्ट लीग ऑफ इंडिया’ इस संदर्भ में प्रयत्नशील था। यह राष्ट्रीय मोर्चा देश के किस हिस्से में बने, यह प्रश्न एक व्यक्तित्व पर केंद्रित होता चला गया। यह व्यक्तित्व रामनारायण शुक्ल थे।

रामनारायण शुक्ल, लोकमंच पत्रिका
रामनारायण शुक्ल, लोकमंच पत्रिका

रामनारायण शुक्ल अपने अध्यापन और छात्र केंद्रित दृष्टि के कारण बलिया में काफ़ी लोकप्रिय हो चुके थे। हिंदी विभाग के लिए रामनारायण शुक्ल एक नईं उम्मीद बन रहे थे। एक अध्यापक जो छात्र को अपना लगने लगा था। यहां गुरु-शिष्य के वैयक्तिक संबंध या आत्मिक संबंध का प्रश्न अब केंद्रित न रह गया था, अपितु छात्रों को ‘सामूहिक मुक्ति की आकांक्षा’ से जोड़ने का प्रश्न मुख्य था। बलिया रहते हुए ही रामनारायण शुक्ल मार्क्सवाद के प्रति आकृष्ट हो चुके थे। छात्रों के भीतर ‘सामूहिक मुक्ति की आकांक्षा’ पैदा करने का उनका प्रयोग सफ़ल हो चुका था। साहित्य का छात्र पाठ्य पुस्तक से बाहर जाकर जन-गीत और जन-संवेदना के आलोक में जीवन को देखने का प्रयास करने लगा था। यही काम गोरख पांडेय अपने जनगीतों के माध्यम से कर रहे थे।

हिंदी की साहित्यिक दुनिया पाठ्यक्रम तक सीमित थी। बनारस में इस साहित्यिक दुनिया को चौराहों और नुक्कड़ तक ले जाने वाले पहले क्रान्तिपुरुष रामनारायण शुक्ल थे। हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में 1974 में जब आप आए, तब विभाग पुराने ढंग से, शास्त्रीय, अकादमिक ढंग से चल रहा था। आपके आते ही हिंदी विभाग के मठाधीशों में खलबली मच गई। मठाधीशों के बीच प्रचलित तीन प्रकार की कुंठाएं थीं। अपराध-कुंठा, राज-कुंठा और काम-कुंठा । उन्हें जैसे एक चुनौती मिल गयी हो। अध्यापन का अर्थ पाठ्यक्रम पूरा करना या प्रेम भरी बातें या शेरो-शायरी का उपयोग करना एक प्रिय शग़ल बन रहा था। ऐसे में किसी अध्यापक द्वारा नुक्कड़ नाटकों का संचालन करना उन पुराने लोगों के लिए साहित्येत्तर कार्य थे। साहित्य का कार्य संवेदित करना है। वे यहां तक तो सोच पाते थे, किन्तु साहित्य बदलाव और जन-जागरण का हेतु भी बन सकता था, वे इस ओर नहीं सोच पाते थे। दूसरी बात यह थी कि वैयक्तिक होकर ‘क्रांति के स्वप्न ‘ नहीं देखे जा सकते। ‘अपनी मुक्ति को सामूहिक मुक्ति’ के संदर्भ में व्याख्यायित करने की जरूरत होती है। अपनी अकादमिक महत्वकांक्षा, उपलब्धियों को ‘द्वितीयक’ बनाना पड़ेगा। यह आसान नहीं होता। पैसे-रुपये के मोह को छोड़कर संगठन को समर्पित करना तथा साथियों के लिए ‘व्यक्ति सुख को छोड़ देना’…। यह एक कठिन कार्य है, असुविधा पूर्ण।

मठाधीशों के बीच प्रचलित तीन प्रकार की कुंठाएं थीं। अपराध-कुंठा, राज-कुंठा और काम-कुंठा । उन्हें जैसे एक चुनौती मिल गयी हो। अध्यापन का अर्थ पाठ्यक्रम पूरा करना या प्रेम भरी बातें या शेरो-शायरी का उपयोग करना एक प्रिय शग़ल बन रहा था। ऐसे में किसी अध्यापक द्वारा नुक्कड़ नाटकों का संचालन करना उन पुराने लोगों के लिए साहित्येत्तर कार्य थे।

हिंदी का लेखक जनवाद की बात तो करता है, किन्तु जनता के बीच जाना जरूरी नहीं समझता। उसे लगता है कि उसका कार्य जनता पर लिखना है। रामनारायण शुक्ल छात्रों के साथ नुक्कड़ नाटकों के मंचन के कार्य को सफलता पूर्वक कर चुके थे। धीरे-धीरे जनता की भागीदारी बढ़ने लगी थी। 1977 तक आते-आते आप इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि विभाग में सभी प्राध्यापक की यश-कीर्ति कागज़ी दिखने लगी थी। इसी बीच दिल्ली में ‘राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चे’ के अंतरिम संगठन का एक प्रयास किया गया। यहीं लालबहादुर वर्मा को इससे जोड़ा गया। सन 1977 से लेकर 1980 तक यह अंतरिम संगठन कार्य करता रहा। रामनारायण शुक्ल इस संगठन की धुरी थे। राष्ट्रीय अध्यक्ष। सन 1980 में प्रेमचंद जयंती की शतवार्षिकी के अवसर पर तय किया गया कि ‘राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा’ को व्यवस्थित रूप में संगठित किया जाए। यह तय हुआ कि प्रेमचंद के गांव लमही में संगठन को मूर्त रूप दिया जाए। यह भी तय हुआ कि यह पूरा संगठन जनता के लिए है तो क्यों न उनकी मदद से उन्हीं के बीच इसका निर्माण किया जाए। देश भर के संस्कृतिकर्मी लमही में जुटने लगे थे। यह तय हुआ कि इस अवसर पर ‘गोदान’ का नाट्य रूपांतरण भी मंचित हो।

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रामनारायण शुक्ल और उनके साथी गांव-गांव जाते, अनाज इकट्ठा करते, लोगों को अपनी योजनाओं को समझाते और राष्ट्र-संस्कृति के नए पाठ रचते। 31 जुलाई 1980 को ‘गोदान’ के मंचन के साथ तथा जनता की भारी भीड़ के बीच ‘राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चे’ का विधिवत गठन हुआ। रामनारायण शुक्ल इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए। संगठन के अन्य प्रमुख दायित्वों में शमशुल इस्लाम को उपाध्यक्ष, लाल बहादुर वर्मा को महासचिव बनाया गया। इसके अतिरिक्त कलकते से परशुराम और पंचदेव की भी इस संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस संगठन के आरंभिक लोगों में श्रीकांत पांडेय, जलेश्वर उर्फ़ टुन्ना, ओम प्रकाश द्विवेदी आदि प्रमुख थे। राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा के गठन ने युवाओं के भीतर एक आग पैदा कर दी थी। इसी बीच एक घटना घटी ,जिसने इस संगठन को और लोकप्रिय कर दिया । प्रेमचंद शत वार्षिकी के कार्यक्रम में महादेवी वर्मा अध्यक्षता करने आई थीं। कार्यक्रम क्लार्क होटल में था। रामनारायण शुक्ल अपने साथियों के साथ होटल पहुंचे और कार्यक्रम का विरोध करने लगे। उन्होंने महादेवी वर्मा जी से कहा-” आप हिंदी साहित्य की महीयसी हैं। आप पूंजीपतियों द्वारा आयोजित कार्यक्रम में प्रतिभागिता कैसे कर सकती हैं?”। महादेवी वर्मा जी ने यह कार्यक्रम छोड़ दिया। मठाधीशों के लिए यह एक बड़ा झटका था। तत्कालीन अध्यक्ष प्रो विजयपाल सिंह जी ने महादेवी वर्मा जी का कार्यक्रम काशी हिंदू विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग में रखवाया। किन्तु उस कार्यक्रम में कोई नहीं गया…और कार्यक्रम रद्द करना पड़ा।

रामनारायण शुक्ल, लोकमंच पत्रिका
रामनारायण शुक्ल, लोकमंच पत्रिका

इतिहास की जटिल परिस्थितियां ही कई बार इतिहास का निर्माण कर दिया करती हैं। इन्हीं जटिल परिस्थितियों में रामनारायण शुक्ल एक मिथ गढ़ रहे थे। ‘राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चे’ के गठन हो चुका था। संगठन इतनी तेजी से लोकप्रिय हो रहा था कि विभागीय मठाधीशों ने इसे अपने अस्तित्व संकट के रूप में लेना शुरू कर दिया था। शुक्ल जी पर ‘नक्सली’ होने का आरोप लगाए जाने लगा। यह आरोप इतना संक्रामक था कि 2008 में कलकत्ते में हिंदी के एक प्रसिद्ध आलोचक जब मुझे मिले, तब रामनारायण शुक्ल का ज़िक्र आने पर उन्होंने टिप्पणी की – “शुक्ला जी तो नक्सली थे।”। यह एक रूढ़ धारणा विभाग के लोगों द्वारा फैलाई जा रही थी। किसी व्यक्ति को अपने पूरे जीवन में एक थप्पड़ न मारने वाले व्यक्ति को ‘नक्सली’ कहने वाले अपने जीवन में कितने लोगों के करियर की हत्या कर चुके हैं, इसका हिसाब होना अभी बाक़ी है।

‘राष्ट्रीय जनवादी-सांस्कृतिक मोर्चा’ अपनी तीव्र गति से दौड़ा चला जा रहा था। लड़के-लड़कियों के झुंड क्रांति के स्वप्न देखते, शहर और विश्वविद्यालय में घूमते रहते। सन 1980 में लोकसभा का चुनाव हो रहा था। संगठन की इच्छा थी कि रामनारायण शुक्ल लोकसभा का चुनाव लड़ें। चुनाव की तैयारी होने लगी। शहर में चुनाव-प्रचार। निर्दलीय के रूप में आपने चुनाव लड़ा। चुनाव लड़ने के लिए जितना धन या तैयारी चाहिए थी, वह न थी। केवल विचारधारा के नाम पर वोट मिलने की आशा थी। चुनाव परिणाम प्रतिकूल रहा। फ़िर भी 2700 के लगभग वोट मिले। ये वोट विचारधारा के नाम पर मिले थे। 2700 लोग परिवर्तन के स्वप्न को देख सके थे, यह कम महत्वपूर्ण न था।

राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा के सदस्य राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा ‘राष्ट्रीय आकांक्षा की प्रतिध्वनि’ था। आंदोलन के टूटने पर इसके कई सदस्य इधर-उधर बिखर गए। उन्हीं लोगों में से कुछ ने इस आंदोलन को ‘वैचारिकता की अति-कल्पना’ के रूप में देखा है। संभवतः यह उनका अपराधबोध है, जो वे अपने पलायन को तार्किक आधार देने का प्रयास कर रहे हैं। अकारण नहीं कि कुछ लोगों के लिए ‘अंधेरे में’ कविता का ‘क्रांति स्वप्न’ अतिरेक है। उन भोले लोगों को यह नहीं मालूम कि इतिहास में 50 साल कुछ नहीं होते। ‘राष्ट्रीय जनवादी-सांस्कृतिक मोर्चा’ के गठन में ‘कम्युनिस्ट लीग ऑफ इंडिया’ की भी अपनी भूमिका थी।

रामनारायण शुक्ल के लोकप्रिय रूप, नुक्कड़ नाटकों के व्यापक प्रयोग ने राष्ट्रीय स्तर पर एक चेतना का निर्माण कर दिया था। शमशुल इस्लाम (दिल्ली), लालबहादुर वर्मा (गोरखपुर), परशुराम व पंचदेव (कलकत्ता) तो इसके निर्माणकर्ता थे ही। साथ ही उपमहासचिव के रूप में अवधेश प्रधान भी थे। इसके अतिरिक्त ज्वालामुखी (आंध्रप्रदेश ), गुरुशरण सिंह (पंजाब), अमित चटर्जी (कलकत्ता, कानू सान्याल के क़रीबी ), रामनाथ जी, संतोष राणा आदि की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। श्रीकांत पांडेय, ओमप्रकाश द्विवेदी , जलेश्वर उर्फ टुन्ना, शशि प्रकाश, जंगबहादुर सिंह, अरविंद चतुर्वेद, जगदीश उपाध्याय, ब्रजमोहन ( गीतकार ), राघवेंद्र पांडेय, रमेशचंद्र राय, अमरेंद्र राय, अवधेश राय, रामाज्ञा तिवारी, कौशल उपाध्याय, नरेंद्र, शेषनाथ, श्रीराम , शील पांडेय, आनंद क्रांतिमोहन, भूरेलाल मिश्रा, पुष्पा अवस्थी, देवव्रत सेन, पार्थ चक्रवर्ती, सुभाष दताड़े ( इंजीनियरिंग छात्र ), प्रशांत राय, बलराम ( बाद में सांसद ) आदि मूल रूप से जुड़े हुए थे। इसके अतिरिक्त विभाग के देवेंद्र, दिनेश कुशवाहा जैसे सम्भवनाशील छात्र भी थे, जो इस आंदोलन से प्रभावित थे। हालांकि बाद में आप दोनों ‘काशीनाथ सिंह की वैचारिकी’ और रचनाकार व्यक्तित्व से जुड़ गए। किन्तु अपनी वैचारिकी के गठन निर्माण का श्रेय आप दोनों रामनारायण शुक्ल को ही देते रहे।

रामनारायण शुक्ल के सांस्कृतिक मोर्चे के द्वितीय चरण में रंगमंच और नाटकों की प्रस्तुति, अभिनय आदि मुख्य थे, जिसमें आनंदवर्द्धन, शिवशंकर मिश्र, अरुण कुमार, कौशलेंद्र पांडेय आदि मुख्य थे। राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा के मूल में नुक्कड़ नाटक और सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा थी। किन्तु मध्यमवर्ग के अपने वर्गीय अंतर्विरोध कम नहीं होते। बुद्धिजीवियों को एक साथ रखने को मार्क्स ‘तराजू पर मेढक तौलने’ की संज्ञा देता है। सन 1983 तक यह संगठन तीव्र गति से चलता रहा, किन्तु उसके बाद अंदरूनी मतभेद तीव्र होने लगे थे। बाद के दिनों में संगठन तीन भागों में विभक्त हो गया। रामनारायण शुक्ल के लिए यह एक बड़ा आघात था। क्रांति के स्वप्न जैसे अधूरे ही रह गए। विभागीय राजनीति चरम रूप में थी। कुंठित मठाधीश अपने ‘युवाकाल की काम- कुंठा के साथ’ जिस प्रकार जीने के लिए बाध्य थे, वैसे ही शुक्ल जी ‘अपनी अधूरी इच्छा के साथ’।

इतिहास और रामनारायण शुक्ल-

रामनारायण शुक्ल इतिहास की उपज थे। सभी ‘इतिहास की उपज’ नहीं होते। प्रायः लोग इतिहास में पैदा होते। इतिहास में जीना हमारी नियति है, हमारा ‘चयन’ नहीं है। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो इतिहास में अपने ‘चयन की स्वतंत्रता’ प्राप्त कर पाते हैं। रामनारायण शुक्ल ने ‘अपने इतिहास का चयन’ किया था। ‘चयन की स्वतंत्रता’ और ‘इतिहास में किसी निष्कर्ष की प्राप्ति’ ये दो तथ्य हुए। ‘इतिहास के निष्कर्ष’ कभी किसी तात्कालिक घटना तक सीमित होते हैं, किन्तु कई बार वे किसी घटना में सीमित नहीं हो पाते। ‘राष्ट्रीय जनवादी-सांस्कृतिक मोर्चा’ घटना की दृष्टि से तात्कालिक रूप से असफ़ल कहा जा सकता है, किन्तु इतिहास में कोई भी चीज़ इतनी सरल, सीधी और सपाट नहीं होती। प्रश्न है कि क्या रामनारायण शुक्ल इतिहास द्वारा सौपें गये दायित्व का निर्वहन करने में चूक गए? यह मोर्चा 6-7 वर्ष में ही विभाजित हो गया, बिखर गया। क्या यह ऐतिहासिक आकांक्षा का बिखराव था?

‘राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा’ में पूरे देश के संस्कृतिकर्मी जुड़े हुए थे। कुछ साल में ही यह संगठन पूरे भारत के मानचित्र पर छा गया था। शुक्ल जी की लोकप्रियता ऐसी कि उनके साथ सैकड़ों जनवादी संस्कृतिकर्मी क्रांति के गीत गाते, नुक्कड़ नाटक खेलते ..यानी युवाओं का बड़ा समूह। आस-पास के ज़िलों से कई छात्र एम ए, पीएचडी करने हिंदी विभाग में आने लगे थे। इन वर्षों में काशी हिंदू विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग भारत का सर्वाधिक रचनात्मक विभाग था। यह रचनात्मकता ‘सामूहिक आकांक्षा का परिणाम’ थी। संगठन के सदस्यों में कुछ का मोहभंग हुआ, कुछ पलायित हुए…और कुछ ‘अवसरवाद की खोह’ में छिप गये। ” वे ख़तरनाक लोग थे। वे जिसकी पीठ ठोकते, उसकी रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती।”यह संगठन ‘जन-आंदोलन’ और ‘क्रांति के स्वप्न’ को लेकर चल रहा था, किन्तु यह ‘खूनी-क्रांति का आंदोलन’ न था। विभाग के कई मठाधीशों ने प्रचारित किया कि शुक्ल जी ‘नक्सली’ हैं। शुक्ल जी की कक्षाओं में गुप्तचर विभाग के सदस्य छात्र बनकर बैठने लगे थे। उन पर नज़र रखी जाने लगी थी। शहर के सभापति और विभाग के कुंठित मठाधीशों की योजनाएं सफ़ल होने लगी थीं। वे एक साथ काम कर रहे थे। एक ओर वे शुक्ल जी को बदनाम करने की कोशिश कर रहे थे तो दूसरी ओर ‘राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा’ के सदस्यों के कंधे-पीठ ठोककर उनकी रीढ़ झुकाने का ‘व्यावहारिक खेल’ खेल रहे थे। वे बहुत ख़तरनाक लोग थे। “वे जिसकी पीठ ठोकते, उसकी रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती”।

उनकी संख्या ज़्यादा थी और रसूख़ भी। उन्होंने प्रचारित करना शुरू कर दिया कि शुक्ला जी के साथ लाभ नहीं मिलेगा। आजीविका का लालच दिया गया। मध्यमवर्ग के अपने अंतर्विरोध होते हैं। मध्यमवर्ग जल्द टूट जाता है। मध्यमवर्ग विचित्र प्रकार के अंतर्विरोधों से ग्रस्त प्राणी है। स्वार्थ और अवसरवाद के स्नायु-तंत्र से संचालित। यह वर्ग सिद्धांत और व्यवहार की तुला पर झूलता रहता है। कोरे जनवाद से आजीविका कैसे चलेगी? बहुत-से लोगों ने शुक्ल जी से किनारा करना शुरू कर दिया। वे शाम-रात में इधर-उधर ‘अवसर की तलाश’ करने लगे थे। रामनारायण शुक्ल से वैचारिक-ऊर्जा ग्रहण कर भी उन्होंने ‘व्यावहारिक खेल में सिद्धस्त’ मठाधीशों के साथ जाना उचित समझा। यहां न ‘वैचारिक दृढ़ता की मांग’ थी और न ‘आजीविका की समस्या’। ‘जनवादी-सांस्कृतिक मोर्चे के साथ रामनारायण शुक्ल अकेले पड़ चुके थे।

रामनारायण शुक्ल का ‘क्रांति स्वप्न’ अधूरा रह गया, आंदोलन बिखर गया; किन्तु इतिहास में किसी कार्य का मूल्यांकन सफ़लता-असफ़लता के फौरी मानक के आधार पर नहीं किया जाता। असफ़लता कई बार सफ़लता से ज़्यादा क़ीमती होती है, ज़्यादा सार्थक होती है। “इतिहास 20-50 वर्षों में मूल्यांकित नहीं होता। “इतिहास अपनी संभावना का विस्तार करता महारूपक” है। “घटनाएं इतिहास में स्थूल होती हैं और चेतनाएं सूक्ष्म”। चेतना-निर्माण की प्रक्रिया में इतिहास ‘स्थूल यथार्थ’ को कई बार किनारे कर देता है। ‘राष्ट्रीय जनवादी- सांस्कृतिक मोर्चा’ यदि 10 साल और चला होता तो हिंदी समाज-संस्कृति-साहित्य की धारा कुछ और होती। हिंदी क्षेत्र, जाति थोड़ा और समृद्ध होती। किन्तु इतिहास में किन्तु, परन्तु जैसे शब्द मात्र संयोग होते हैं। ‘इतिहास में संभावना’ तो होती है, किन्तु इतिहास स्वयं संभावना से मूल्यांकित नहीं होता। इतिहास में घटित हर घटना का अपना तर्क और समय होता है। कई बार घटनाएं समय से पूर्व घटित हो जाती हैं। एक प्रस्तावना या पृष्ठभूमि की तरह…। रामनारायण शुक्ल एक ऐसी ही पृष्ठभूमि निर्मित कर गए हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा संचालित यह अंतिम जन आंदोलन सिद्ध हुआ। अभी तक दूसरा कोई आंदोलन खड़ा न हो पाया, किन्तु इतिहास में कोई चीज़ समाप्त नहीं होती। रामनारायण शुक्ल की चेतना दूसरे रूप में रूपांतरित हो जाएगी। इतिहास ऐसे ही गतिशील होता है।

पुनश्च: राष्ट्रीय जनवादी- सांस्कृतिक मोर्चा के बाद ‘जन संस्कृति मंच’ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष का दायित्व निर्वहन। आचार्य रामचंद्र शुक्ल शोध संस्थान को गतिशील करना, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की कल्चरल कमेटी के चैयरमैन के रूप में 17 बड़े नाटकों का मंचन एवं अध्यापक संघ की राजनीति में महासचिव पद का दायित्व निर्वहन सन 1983 के बाद के कार्य विस्तार थे। इस पर चर्चा बाद में।

डॉ शशांक शुक्ल

लेखक- डॉ शशांक शुक्ला, एसोसिएट प्रोफ़ेसर एवं समन्वयक, हिंदी विभाग,जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय, जम्मू। ईमेल- parmita.shukla@gmail.com, मो- 9917157035, 6006966505

251 thoughts on “‘राष्ट्रीय जनवादी-सांस्कृतिक मोर्चा’ और रामनारायण शुक्ल- शशांक शुक्ला

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