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पुस्तक समीक्षा: भारिया देवलोक – लेखक : धर्मेंद्र पारे

भारत सरकार ने विशेष रूप से जिन जातियों को अति पिछड़ा समुदाय में अंकित किया है पातालकोट के भारिया भी उसमें शामिल है। आर्थिक रूप से यह लगभग विपन्न है साक्षरता भी बहुत कम है । छोटे छोटे से खेत और वनोपज ही इनकी आजीविका का साधन है। इन्हीं भारिया जन जाति की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थितियों पर धर्मेन्द्र पारे ने भारिया देवलोक शीर्षक से पुस्तक लिखी है। डॉ विभा ठाकुर ने इस पुस्तक की समीक्षा लिखी है। आप भी पढ़ें –

प्राचीन भारतीय समाज, संस्कृति और लोकजीवन के संबध में हम शहरी लोग बहुत कम जानते हैं। आज भी मुख्यधारा से अलग हाशिये पर स्थित अधिकांश भारतीय जनजातीय समाज के लोग वनों में  निवास करतें है तथा प्रकृति पूजक होने के साथ वन्य प्राकृतिक साधनों पर ही निर्भर करते हैं। इनके हर्ष विषाद प्रकृति से शुरू होकर प्रकृति पर ही खत्म होते हैं । लोक-संस्कृति से अनुराग रखनेवाले डॉ धर्मेंद्र पारे जी ने सात वर्षों के अथक परिश्रम के साथ अपनी पुस्तक ‘भारिया देवलोक’ में  भारिया जनजाति के लोकजीवन व वैशिष्ट्य को उजागर करने का स्तुत्य प्रयास किया हैं I इस भगीरथ प्रयास के लिए उनकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है। अपने आनुभाविक विश्लेषणपरक शोध के आधार पर इन्होंने ने लोक संस्कृति की समृद्ध विरासत के साझेदार भारिया जनजाति  को अंधकार से  प्रकाश में लाकर विलुप्ति  की कगार पर  पहुंचे इस समुदाय की ओर सबका ध्यान आकर्षित करने का महत्ती कार्य किया है । यह  पुस्तक लोक संस्कृति के अध्येताओं के लिए एक अमूल्य संग्रहणीय पुस्तक कही जा सकती है। अपसंस्कृति और आधुनिकता के स्थान पर अपनी पारंपरिक संस्कृति को संजोए  इन जन जातियों के गहन प्रामाणिक अध्ययन आज  की  अनिवार्य आवश्यकता है । मानवीय मूल्यों और प्रकृति दोहन के प्रति जागरूकता के साथ मिथ्या अभिजात्य के विरूद्ध एक मुहिम चलाने के लिए ऐसी शोधात्मक पुस्तकें सूत्रधार का काम कर सकती हैं । श्रमपूर्वक लिखी गई  इस प्रकार की पुस्तकें  ही लोक संस्कृति को विनिष्ट करने वाले कुचक्रो को विफल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। तथाअपनी जड़ो को पहचानने, उसे सुरक्षित रखने की प्रेरणा देतीं है।

भारिया देवलोक, लोकमंच पत्रिका
धर्मेन्द्र पारे की पुस्तक भारिया देवलोक, लोकमंच पत्रिका

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश –

मैंने देखा इनकी अपनी जीवन पद्धति है । इनका अपना जीवन राग है । कोई भारिया विरक्त नहीं,कोई भारिया कुंठित नहीं। कोई भारिया इन दुर्गम स्थितियों के बाद भी गांव छोड़ने की इच्छा नहीं रखता ।इनकी अपनी चिकित्सा पद्धति है, इनका अपना खाद्यान्न है । किसी पर निर्भर नहीं है ये । बड़ी स्वायत्त है इनकी दुनिया । पृ.28  आगे लिखते है – “60- 65 वर्ष पूर्व कोई स्कूल था भी नहीं । किंतु वे शिवपुराण पढ़ लेते हैं । अब मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था । उनसे पूछा कैसे सीखा पढ़ना ? उन्होंने बड़ी सहजता से बताया कि उनके बड़े भाई आधारसिंह पटेल बचपन में तीसरी कक्षा तक पढ़े थे। उनको देखकर वे पढ़ना सीख गये । उन्होंने यह भी बताया कि वे सिर्फ शिवपुराण ही पढ़ सकते हैं , दूसरा कुछ नहीं। मैंने जिज्ञासा से पूछा ऐसा क्यों, तो वे बोले मैंने पूरी पुराण को चित्र की तरह रट लिया है । अक्षरों को जोड़ना समझना मुझे नहीं आता । मैं अचंभित था । आगे जाकर महसूस हुआ लकड़ियों पर अंकन की कला में भारिया इसलिए दक्ष होते हैं । वे कथाओं को चित्रालिपि में समझकर अपने मानस में संरक्षित कर लेते हैं । पृ.30 

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‘भारिया अपने परिवेश में पेड़ पौधों, वनस्पति ,सरोवरों का जितना ज्ञान रखते हैं उतना किसी भू या वनस्पति शास्त्री को ही हो सकता है । यह पृथ्वी ,पृथ्वी पर स्थित वृक्ष , वनस्पति, झरने ,जीव सब के सब उसके गण चिह्न हैं। वे भारियाओं के देवता हैं । आधुनिक विज्ञानवादी धारा देवता को स्थूल चरित्र मानकर इसका उपहास करती है । देवता का बहुत ही सरल अर्थ यह भी है कि जो देता है वह देवता । ‘ पृ. 32

स्मृति आधारित ज्ञान परंपरा को संरक्षित रखते हुए भारिया जनजाति के पास सीमित संसाधनों में भी प्रसन्न और संतुष्ट रहने के रहस्य तथाकथित सभ्य नागरी लोगों को सीखने की आवश्यकता है। वनवासी समाज प्रकृति पूजक है। प्रकृति उनका परिवेश, अवलंबन , उद्दीपन है। प्रकृति के साहचर्य में यह सभी जनजातियां अपना जीवनयापन करती हैं ।इनके त्योंहार भी प्रकृति से जुड़े हुए हैं । प्रकृति से लेना और उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना इनका नैसर्गिक स्वभाव है । “मध्य प्रदेश की समस्त जनजातियों में भारिया और बैगा दो ऐसी जनजातियां हैं जिनका वनस्पतिक और जड़ी बूटियों का पारंपरिक ज्ञान अपेक्षाकृत ज्यादा है। ऐसा इनके जीवन और भू परिस्थिति के कारण भी है ।बैगा जिस बैगाचक में रहते हैं ,वह अमरकंटक के आसपास का क्षेत्र है । प्राकृतिक रूप से वन संपदा कंदमूल यहां बहुतायत में हैं। इसी प्रकार पातालकोट की जलवायु और पंचमढ़ी से लगा हुआ भू क्षेत्र होने से प्रकृति ने यहां दुर्लभ प्रकार की जड़ी बूटियों का वरदान दे रखा है ।कई आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने वाले संस्थान इसलिए इन स्थानों को सर्वोच्च प्राथमिकता में रखते हैं। भारिया इन प्राकृतिक उपा- दानों के लिए आयुर्विज्ञान की शब्दावली से अनभिज्ञ हैं ।किंतु बहुत सी जड़ी बूटियों के उनके अपने नाम हैं। वे इनके गुण और उपयोग से भी परिचित हैं। यह अलग बात है कि अब पताललोक जाने के रास्ते भी बन गए हैं किंतु इसके पहले भारियाओं का ऊपर समतल पर आना और अन्य लोगों का वहां तक पहुंचना आसान नहीं था । ऐसी स्थिति में भारिया अपने आस-पास उपलब्ध जड़ी बूटियों से ही अपना और अपने पशुओं का उपचार करते रहे हैं । भारियाओं की अपने वनों में उपलब्ध जड़ी बूटियों कंदमूल पर बड़ी आस्था है। वे इनके वाणिज्यिक उपयोग की कभी कल्पना भी नहीं करते थे। आजकल आयुर्वेदिक संस्थान जिस मात्रा में उनका दोहन लाभ लोभ के चलते कर रही हैं वे बहुत चिंताजनक है । एक भारिया अपने उपयोग के लिए आवश्यकता से अधिक कभी भी किसी कंद और जड़ी को नहीं उखाड़ता । वह भी विशेष तिथि, विशेष दिन, विशेष मुहूर्त में ।भारिया पहले उस जड़ी की पूजा करते हैं उस पेड़ पौधे वनस्पति से उसे लेने के लिए प्रार्थना करते हैं फिर उसे उखाड़ते खोदते अथवा काटते चुनते थे । क्या आयुर्वेदिक संस्थाएं इस उच्च नैतिकता का पालन करती होंगी ? पृ. 200

“भारत सरकार ने विशेष रूप से जिन जातियों को अति पिछड़ा समुदाय में अंकित किया है पातालकोट के भारिया भी उसमें शामिल है। आर्थिक रूप से यह लगभग विपन्न है साक्षरता भी बहुत कम है । छोटे छोटे से खेत और वनोपज ही इनकी आजीविका का साधन है। पातालकोट के भारिया छोटे-छोटे गांव में निवास करते हैं । यह एक ठंडी जलवायु वाला क्षेत्र है पिछले दशक को छोड़ दें तो यहां के लगभग सभी घर कच्चे और हस्त निर्मित होते थे ।भारिया अपने मकानों को कतार में बनाते हैं घरों की दीवारें प्राय मिट्टी की होती है। भारिया लोगों में कई लोग कास्ट पर खुदाई में माहिर माने जाते हैं उनसे ही घर की चौखट दरवाजे बनाए जाते हैं। पृ.41

लेखक धर्मेन्द्र पारे का परिचय

“जनजातियों की अपनी प्रकृति समावेशी होती है भारिया जनजाति को इसका अग्रणी उदाहरण कह सकते है। भारिया लोगों को यदि सर्व समावेशी जनजाति काहे तो अत्युक्ति नहीं होगी ।उसके देवलोक में आर्य ,द्रविड़ आगनेय जैसे नस्लें ही नहीं सभी जातियों और कुलों यहां तक कि अन्य आंचलिक देवताओं का भी समावेश हुआ है ।ऐसे में भारिया को जो लोग एक नस्ल में बांधते हैं वह तर्कसंगत नहीं । कई जगह उन्हें द्रविड़ बताया गया है। न  उनके देवताओं में द्रविड़ बहुलता है न उनकी भाषा में कोई द्रविड़ शब्दावली है। कुल मिलाकर आज के भारिया को किसी एक परंपरा में परिगणित करना न्यायसंगत नहीं है । दरअसल अब वे बहुतेरी परंपराओं ,नस्लों ,जातियों का एक संपुंज है । इसके पीछे उनकी बदहाली या गरीबी अथवा उदारता को कारण समझा जा सकता है । यह स्थिति आज के भारिया  समुदाय को देखकर नहीं कही जा रही है । भारियाओं के  सर्व समावेशी स्वभाव को एक सदी से कहीं अधिक पहले ही अध्येताओं ने जान लिया था । सन 1916 में आर. व्हीं रसेल और हीरालाल की बहुचर्चित पुस्तक प्रकाशित हुई थी । उसमें भी उन्हें भारियाओं के संदर्भ में महसूस हुआ था कि इनकी सामाजिक सोच उदार होने से दूसरी जनजातियों के लोग भी इनमें शामिल होते गये । साथ ही दूसरी जनजातियों में शादी ब्याह होने से भारिया एक मिश्रित समाज बनता चला गया। जनजातियों के पारंपरिक देवताओं का समुच्चय ही भारिया देवलोक हैं। इसमें द्रविड़ परंपरा से आए गोंडों के देवता है, तो आग्नेय कुल की मुंडा प्रजाति के देवता भी पर्याप्त मात्रा में है । इनसे  इत्तर आंचलिक देवता और अन्य हिंदू जातियों में मान्य देवता भी इनके उतने ही आराध्य हैं । जनजातीय परंपरा से चले आ रहे देवता सूर्य, चंद्रमा ,नक्षत्र, नदी पर्वत, वनस्पति, पशु-पक्षी जगत का बहुदेववाद तो है ही, आर्यकुल के हिंदू देवी देवता भी सर्वपूज्य हैं …भारियाओं का देवलोक वृहद है इसमें घर के देवता है कुल के देवता है, गांव के देवता है  तो कुछ जागतिक प्रकृति के भी देव है तो बड़ी संख्या में देवियां भी । प्रकृतिपरकता इनका अपना वैशिष्ट्य है । भारिया जनजाति के पास अपनी जातीय स्मृति में ज्यादा कुछ शेष नहीं है। ‘ पृ.142

भारिया जनजाति की सांस्कृतिक विशेषता व विरासत को खंगालती यह एक अनुसंधानात्मक पुस्तक है। यह जनजाति मध्यप्रदेश के जबलपुर ,छिंदवाड़ा ,शहडोल सीधी नरसिंहपुर ,मंडला, सिवनी और छत्तीसगढ़ के सरगुजा, बिलासपुर, रायगढ़ आदि जिलों में निवास करती है। पतालकोट में रहने वाले इस जनजाति के देवलोक का विस्तृत अध्ययन करती हुई यह पुस्तक इस जनजाति के इतिहास को संरक्षित रखने की महत्वपूर्ण भूमिका में दिखाई देती है।

समीक्षक, डॉ विभा ठाकुर, हिन्दी विभाग, कालिंदी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय।

पुस्तक – भारिया देवलोक , लेखक- धर्मेंद्र पारे

प्रकाशन – आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद्

प्रकाशन वर्ष – 2020

39 thoughts on “पुस्तक समीक्षा: भारिया देवलोक – लेखक : धर्मेंद्र पारे

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