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पहली ट्रेन का चलना और चार्ली चैप्लिन का जन्म- तेजस पूनियां

आज 16 अप्रैल को महान कलाकार चार्ली चैप्लिन का जन्म दिन है। चार्ली अंग्रेजी के हास्य कलाकार, फिल्म निर्माता और संगीतकार थे। अपने दमदार अभिनय और हास्य कला के बल पर चार्ली ने पूरे विश्व में लोकप्रियता हासिल की थी। आज उनके जन्मदिन पर फिल्म समीक्षक तेजस पूनियां ने अपने लेख के माध्यम से याद किया है।

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आज भले ही सुपरफास्ट, बुलेट ट्रेन का जमाना हो, लेकिन भारतीय रेलवे के इतिहास में 16 अप्रैल के दिन की खास अहमियत है और हमेशा रहेगी। दरअसल 1853 को 16 अप्रैल के दिन देश में पहली रेल चली थी। साल का यह 106वां दिन एक और कारण से भी सदा याद किया जाएगा। दूसरे विश्व युद्ध की त्रासदी के बीच दुनिया को हंसाने वाले चार्ली चैपलिन का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था। 

चार्ली चैपलिन का नाम आते ही दिमाग में एक कॉमिक छवि उभरती है। शायद ही कोई ऐसा होगा जो चार्ली चैप्लिन की अदाकारी पर नहीं हंसा होगा। लेकिन सभी को हंसाने वाले इस चेहरे के पीछे कई गम छिपे थे। आज चार्ली चैपलिन का 132 वां जन्मदिन है। और बड़ा दुःखद उयाय गूगल उन जैसी महान शख्सियत पर आज डूडल पेश नहीं कर पाया।  16 अप्रैल, 1889 को लंदन में जन्मे इस कॉमिक एक्टर और फिल्ममेकर ने पूरी जिंदगी लोगों को हंसाने में ही गुजार दी थी। वह मूक फिल्मों के बेहतरीन कलाकार थे। दुनियाभर में मशहूर इस कलाकार ने जिंदगी की त्रासदियों से भी हंसाने की कला को रुपहले पर्दे पर बखूबी उकेरा।

लंदन में चार्ली चैप्लिन की प्रतिमा , लोकमंच पत्रिका
लंदन में चार्ली चैप्लिन की प्रतिमा , लोकमंच पत्रिका

चैप्लिन का परिवार बेहद गरीब था और 9 साल की उम्र से पहले ही उन्हें अपना पेट पालने के लिए काम करना पड़ा। चार्ली के माता-पिता उनके बचपन में ही अलग हो गए थे। और चार्ली के बचपन में ही उनकी मां ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया था। 13 साल की उम्र में चार्ली की पढ़ाई भी छूट गई थी। बताया जाता है कि  बेहद कम उम्र में उन्‍होंने स्टेज एक्टर और कॉमेडियन के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था। 19 साल की उम्र तक आते आते चार्ली को एक अमेरिकन कंपनी ने साइन कर लिया और वे अमेरिका चले गए। और अमेरिका से चार्ली ने फिल्‍मी करियर की शुरुआत की। 

उनकी पहली फिल्म 1914 में आई ‘मेकिंग अ लिविंग’ थी, जो एक साइलेंट फिल्म थी। और पहली फुल लेंग्थ फीचर फिल्म 1921 में आई ‘द किड’ थी। चार्ली ने अपने जीवन में दोनों वर्ल्ड वॉर देखे थे और जिस समय दुनिया युद्ध की विभीषिका झेल रही थी, तब वे लोगों को हंसा रहे थे। चार्ली  ने एक बार कहा था, ‘मेरा दर्द किसी के हंसने की वजह हो सकता है, पर मेरी हंसी कभी भी किसी के दर्द की वजह नहीं होनी चाहिए।’ चार्ली ने ‘अ वुमन ऑफ पैरिस’, ‘द गोल्ड रश’, ‘द सर्कस’, ‘सिटी लाइट्स’, ‘मॉर्डन टाइम्स’ जैसी बेहद मशहूर और सफल फिल्मों में काम किया। इन फिल्मों को आज भी बहुत पसंद किया जाता है। 

चार्ली का विवादों से भी काफी नाता रहा। साल 1940 में आई उनकी फिल्म ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ काफी विवादों में रही। इसमें चार्ली ने अडोल्फ हिटलर का किरदार निभाया था। बाद में अमेरिका में उनके ऊपर कम्युनिस्ट होने के आरोप भी लगाए गए और उनके ऊपर एफबीआई की जांच बैठा दी गई। इसके बाद चार्ली ने अमेरिका छोड़ दिया और स्विट्जरलैंड में जाकर बस गए। चार्ली ने अपने निजी जीवन में भी काफी उथल-पुथल देखी थी। उन्होंने 4 शादियां की थीं। चारों पत्नियों से उनके 11 बच्चे थे। पहली शादी 1918 में मिल्ड्रेड हैरिस से की थी, यह शादी सिर्फ 2 साल चली। इसके बाद उन्होंने लिटा ग्रे, पॉलेट गॉडर्ड और 1943 में 18 साल की उना ओनील से शादी की। उस समय चार्ली 54 साल के थे। चार्ली की ये शादियां काफी विवादों में भी रही।

चार्ली  ने एक बार कहा था, ‘मेरा दर्द किसी के हंसने की वजह हो सकता है, पर मेरी हंसी कभी भी किसी के दर्द की वजह नहीं होनी चाहिए।’

1977 में चार्ली की मौत के बाद उनके परिवार से फिरौती मांगने के उद्देश्‍य से उनका शव चुरा लिया गया था। हालांकि, बाद में शव बरामद हुआ और चोरी से बचाने के लिए उसे 6 फीट कंक्रीट के नीचे दफनाया गया। मशहूर साइंटिस्ट अल्बर्ट आइंस्‍टीन और ब्रिटेन की महारानी तक चार्ली  के प्रशंसक थे। कहा जाता है कि मगर चार्ली भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी की भूमिका से काफी प्रभावित थे। वे महात्मा गांधी का बहुत सम्मान करते थे। 

सर चा‌र्ल्स स्पेंसर चैपलिन को हम सभी चार्ली चैपलिन के नाम से ज्यादा जानते हैं। फिल्म जगत में यह एक ऐसा नाम है, जिसे पर्दे पर देखनेभर से किसी के भी चेहरे पर बरबस मुस्कुराहट आ जाती है। 1940 में चार्ली ने हिटलर पर फिल्‍म द ग्रेट डिक्टेटर बनाई थी। इसमें उन्‍होंने स्‍वयं हिटलर का किरदार निभाया था। इस फिल्‍म के जरिए उन्‍होंने हिटलर को कॉमिक रूप में पेशकर वाहवाही बटोरी थी। फिल्‍म में हिटलर का मजाक बनाए जाने पर कुछ लोगों ने उनकी सराहना की थी, जबकि कुछ लोग उनके खिलाफ उतर आए थे। अपने शानदार अभिनय के जरिए लोगों को हंसने के लिए मजबूर करने वाले चार्ली को 1973 में अभिनय जगत के सबसे बड़े पुरस्‍कार यानी ऑस्‍कर अवार्ड से नवाजा गया। इसके अलावा भी उन्‍हें कई पुरस्‍कार दिए गए। 

चार्ली चैप्लिन, लोकमंच पत्रिका
चार्ली चैप्लिन, लोकमंच पत्रिका

88 साल की उम्र में उनका 25 दिसंबर 1977 को देहावसान हो गया, मगर अब भी उनकी बातें और जीवन को जीने की कला हमें मुसीबत में भी मुस्कुराने की वजह देती है। जब समूची दुनिया कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रही है, तब उनका जीवन दर्शन और भी प्रासंगिक हो जाता है। आइए उनके 132 वें जन्मदिन पर कोरोना जैसी महामारी के बीच हम भी मुस्कुराएं और ख्यातिनाम लोगों से उनके बारे में कुछ जानें। 

भोपाल के वरिष्‍ठ माइम आर्टिस्ट के मनोज नायर ने का कि चार्ली के अभिनय को देखें तो समझ में आता है कि वे हर हाल में सकारात्मक रुख रखते थे। चाहे जैसी परिस्थिति हों, हमें खुश रहना चाहिए और दूसरों को भी खुश रखना चाहिए। कोरोना संकट में भी हम भारतीयों ने कई सकारात्मक परिवर्तन देखे हैं। हम सीमित संसाधनों में काम चला ले रहे हैं। संकट का समय जरूर है, लेकिन यह भी कुछ अच्छे के लिए हो रहा है। यही सीख उनसे मिलती थी।
भोपाल के वरिष्‍ठ नाट्यकर्मी अशोक बुलानी ने कहा कि चार्ली का मानना था कि मेरा दर्द किसी के हंसने का कारण हो सकता है, लेकिन मेरी हंसी किसी के दर्द का सबब नहीं बननी चाहिए। कोरोना जैसी बीमारी के दौर में जीवन का यह बड़ा सूत्र है। ऐसी मुसीबत में भी चेहरे पर मुस्कुराहट रखिए। आप मुस्कुराएंगे तो दुनिया मुस्कुराएगी। 

भोपाल के वरिष्‍ठ नाट्यकर्मी केजी त्रिवेदी ने कहा कि चार्ली का निजी जीवन बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा था। वे अपने जीवन से काफी हताश थे, लेकिन इसका असर उन्होंने अपने काम पर नहीं पड़ने दिया। उन्होंने अपने आप को हमेशा सामान्य रखा। यह भी कह सकते हैं कि उन्होंने निजी जीवन की परेशानियों को अभिनय में ताकत के रूप में इस्तेमाल किया। यह सिखाता है कि चाहे जो मजबूरी हो, हमारे काम पर असर नहीं पड़ना चाहिए। 

चार्ली चैप्लिन और महात्मा गांधी, लोकमंच पत्रिका

वरिष्ठ रंगकर्मी और मप्र स्कूल ऑफ ड्रामा के पूर्व निदेशक संजय उपाध्याय ने कहा कि चार्ली अभिनय को एक पूर्ण विश्राम की स्थिति मानते थे। ऐसा करना हर किसी के बस की बात नहीं है। सभी को उनकी आत्मकथा पढ़नी चाहिए।  
चार्ली का जीवन दर्शन हमें उनकी इन बातों में ढूंढना चाहिए। 

आप जिस दिन हंसते नहीं हैं, वह दिन बेकार हो जाता है। 

मैं सिर्फ मसखरा बनकर जीना चाहता हूं। 

मेरी जिंदगी में बेशुमार दिक्कतें हैं, मगर मेरे होंठ यह बात नहीं जानते। उन्हें तो केवल मुस्कुराना आता है। 

हम लोग सोचते बहुत हैं, मगर महसूस बहुत कम करते हैं। 

आईना मेरा सबसे अच्छा दोस्त है, क्योंकि जब मैं रोता हूं तो वह कभी नहीं हंसता।

इस दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है, यहां तक कि मुश्किलें और मुसीबतें भी नहीं। 

इंसान का असली चरित्र तभी सामने आता है, जब वह नशे में होता है। 

मुझे बारिश में चलना पसंद है, क्योंकि उसमें कोई भी मेरे आंसू नहीं देख सकता। 

पास से देखने पर जिंदगी ट्रेजडी लगती है और दूर से देखने पर कॉमेडी।

तेजस पुनिया , फिल्म समीक्षक, लोकमंच पत्रिका
तेजस पुनिया , फिल्म समीक्षक, लोकमंच पत्रिका

तेजस पूनियां फिल्म समीक्षक व लेखक हैं। इनके लेख लगातार हिन्दी की प्रसिद्ध पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। सम्पर्क – 177 गणगौर नगर, गली नँबर 3,नजदीक आर एल जी गेस्ट हाउस। मो.- 9166373652
ईमेल – tejaspoonia@gmail.com

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