लोकमंच पत्रिका

लोकचेतना को समर्पित
धरती आबा : बिरसा मुंडा की जीवन गाथा- उर्वशी

कथाकार, नाटककार, रंग-चिंतक हृषीकेष सुलभ की आरम्भिक शिक्षा गाँव में हुई और अपने गाँव के रंगमंच से ही उन्होंने रंग संस्कार ग्रहण किया। कथा-लेखन, नाट्य-लेखन, रंगकर्म के साथ-साथ हृषीकेष सुलभ सांस्कृतिक आन्दोलनों में भी सक्रिय रहे हैं। शायद यही वजह रही होगी बिरसा मुंडा की जीवनी पर रचना रचने की । इनकी कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित और अनूदित हो चुकी हैं। हृषीकेष सुलभ रंगमंच से गहरे जुड़ाव के कारण कथा लेखन के साथ-साथ नाट्य लेखन की ओर उन्मुख हुए और भिखारी ठाकुर की प्रसिद्ध नाट्यशैली ‘बिदेसिया’ की रंगयुक्तियों का आधुनिक हिन्दी रंगमंच के लिए पहली बार अपने नाट्यालेखों में सृजनात्मक प्रयोग किया। बिदेशिया लोकनाट्य शैली हिंदी क्षेत्र में काफी लोकप्रिय है। बसंत के हत्यारे, तूती की आवाज , बँधा है काल, वधस्थल से छलाँग और पत्थरकट हृषीकेष सुलभ के कथा संकलन हैं। बटोही, धरती आबा, अमली, माटीगाड़ी ( शूद्रक रचित मृच्छकटिकम् की पुनर्रचना ), दालिया ( टैगोर की कहानी पर आधारित नाटक) और मैला आँचल ( फणीष्वरनाथ रेणु के उपन्यास का नाट्यांतर ) इनके नाटक है। रंगमंच का जनतंत्र और रंग अरंग नाट़यचिंतन ग्रंथ है। कथा-लेखन के लिए वर्ष 2010 के लिए कथा यूके, लंदन का इंदु शर्मा कथा सम्मान और नाट्य-लेखन एवं नाट्य चिंतन के लिए डा. सिद्धनाथ कुमार स्मृति सम्मान और रामवृक्ष बेनीपुरी सम्मान से हृषीकेष सुलभ को सम्मानित किया गया है।

धरती आबा , लोकमंच पत्रिका

आदिवासियों को अपने जल, जंगल और जमीन से प्यार करने वाले समाज पर बाहरी लोगों ने जमकर अत्याचार किया। अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासियों के संघर्ष के प्रमुख नायक थे बिरसा मुंडा ‘धरती आबा‘ कहे जाने वाले बिरसा मुंडा के जीवन संघर्षों को केंद्र में रखकर लिखा गया नाटक है ‘धरती आबा’। इस नाटक में दिखाया गया है कि अंग्रेजों के द्वारा आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार और भेदभाव को देखकर बिरसा मुंडा विद्रोह करते हैं। भगवान बिरसा मुंडा स्कूल में हो रहे भेदभाव से क्रांति की ओर उन्मुख होते हैं। वह मुंडाओं के प्रति अपमानजनक टिप्पणियों का विरोध करते हैं और स्कूल छोड़ देते हैं। स्वयं जागरूक होकर उन्होंने यह जागरूकता पूरे समाज में फैलाने की कोशिश की। वह मुंडाओं के भीतर गुलामी से लड़ने के लिए साहस पैदा करते हैं। वह आंदोलन को विदेशी शासन से मुक्ति के संघर्ष में बदल देते हैं। वंचितों के न्याय के प्रति जागरूकता, सूखा, अकाल, भूख और महामारी से जूझते हुए ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौति देनेवाले मुंडाओं के नायक बिरसा की मृत्यु जेल में होती है।

‘धरती आबा’ नाटक बिरसा मुंडा के व्यक्तित्व और उलगुलान आंदोलन के माध्यम से हमारे स्वतंत्रता संग्राम के पन्नों को खोलता है। उनके उलगुलान और बलिदान ने उन्हें ‘भगवान’ बना दिया। हालात आज भी वैसे ही हैं जैसे बिरसा मुंडा के वक्त थे। परिस्थितियां काफी कुछ बदल गई हैं लेकिन कहीं भी कभी भी माहौल वही है। अपने मूल स्थान से आज भी आदिवासी खदेड़े जा रहे हैं, दिकू अब भी हैं। जंगलों के संसाधन तब भी असली दावेदारों के नहीं थे और अब भी नहीं हैं।

कठोर जीवन जीने वाले और अपने आप में संतुष्ट आदिवासियों का संघर्ष अट्ठारहवीं शताब्दी से चला आ रहा है। 1766 के पहाड़िया-विद्रोह से लेकर 1857 के ग़दर के बाद भी आदिवासी संघर्षरत रहे। संघर्ष इनके खून में बसा है।सन 1895 से 1900 तक बिरसा मुंडा का महाविद्रोह ‘ऊलगुलान’ चला।आदिवासियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए बिरसा मुंडा ने काफी कोशिश की। आदिवासियों को लगातार जल-जंगल-ज़मीन और उनके प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल किया जाता रहा था और वे इसके खिलाफ आवाज उठाते रहे। 1895 में बिरसा ने अंग्रेजों की लागू की गयी ज़मींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई के साथ-साथ जंगल-ज़मीन की लड़ाई छेड़ी थी। बिरसा ने सूदखोर महाजनों के ख़िलाफ़ भी जंग का ऐलान किया था। ये महाजन, जिन्हें वे दिकू कहते थे, क़र्ज़ के बदले उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लेते थे। यह मात्र विद्रोह नहीं था। यह आदिवासी अस्मिता, स्वायतत्ता और संस्कृति को बचाने के लिए संग्राम था। बिरसा ने इस संग्राम को क्रांति का रूप दिया।

बिरसा मुंडा का जन्म 1875 में रांची जिले के उलीहातु नामक स्थान में 15 नवम्बर 1875 को हुआ। बिरसा मुंडा के सम्मान में ही झारखंड का स्थापना दिवस 15 नवंबर को मनाया जाता है। बिरसा ‘मुंडा’ समाज से थे, जो कि भारत की सबसे बड़ी जनजातियों में से एक है। बिरसा के पिता सुगना मुंडा कृषक थे और उनका बचपन गरीबी और अभाव में बीता। अभाव में पले बढ़े बिरसा अपनी जाति के दुख दर्द से वाकिफ थे इसलिए क्रांति के लिए उन्हें विशेष प्रेरणा की आवश्यकता नहीं पड़ी। पिता के पास अर्थ के अभाव के कारण वह अपने चाचा के साथ अयूभाटू गाँव में पले बढ़े। बिरसा ने प्रारंभिक शिक्षा सलगा में स्थित जयपाल नाग द्वारा चलाये जा रहे स्कूल से की। पढ़ाई में तेज होने के कारण जयपाल नाग ने उन्हें जर्मन लुथेरन मिशन स्कूल, चाईबासा में डालने की सिफारिश की। पढ़ाई में तेज होना यह दर्शाता है कि उनका उर्वर मस्तिष्क कितना जागरूक था। नए विद्यालय में नामांकन के साथ उनका ईसाई धर्म में परिवर्तन हुआ और उन्हें ‘बिरसा डेविड’ नाम मिला जो बाद में ‘बिरसा दौद पूर्ती’ के नाम से जाने जाने लगे।

इसी विद्यालय में मिले भेदभाव के कारण कुछ वर्ष पढ़ाई करने के बाद, उन्होंने जर्मन मिशन स्कूल छोड़ दिया। कहा जाता है कि बिरसा ने यह कहकर कि ‘साहेब साहेब एक टोपी है’ स्कूल से नाता तोड़ लिया। 1890 के आसपास बिरसा वैष्णव धर्म की ओर मुड गए। जो आदिवासी किसी महामारी को दैवीय प्रकोप मानते थे उनको वे महामारी से बचने के उपाय समझाते। मुंडा आदिवासी हैजा, चेचक, सांप के काटने बाघ के खाए जाने को ईश्वर की मर्ज़ी मानते, बिरसा उन्हें सिखाते कि चेचक-हैजा से कैसे लड़ा जाता है। धीरे-धीरे बिरसा का ध्यान मुंडा समुदाय की ग़रीबी की ओर गया। आदिवासियों का जीवन तब अभावों से भरा हुआ था। न खाने को रोटी थी न पहनने को कपड़े। अनमोल बहुत समस्याओं से जूझते हुए लोगों को अपने प्राणों से प्रिय जंगल जमीन से भी बेदखल किया जाने लगा। एक तरफ ग़रीबी थी और दूसरी तरफ ‘इंडियन फारेस्ट एक्ट’ 1882 ने उनके जंगल छीन लिए थे। जो जंगल के दावेदार थे, वही जंगलों से बेदख़ल कर दिए गए। यह देख बिरसा ने हथियार उठा लिए और इस तरह उलगुलान शुरू हो गया था।

ईसाई धर्म त्यागने के बाद बिरसा ने सांस्कृतिक लोकाचार बनाये रखने और बोंगा (पुरखा देवताओं) को पूजने पर जोर दिया और अपने मूल संस्कृति की ओर लौट गए। लोगों में बढ़ रहे असंतोष ने आदिवासी रीति रिवाजों और प्रथाओं को भी प्रभावित किया, जिसे मूल मानकर बिरसा ने आन्दोलन की शुरुआत की। और इसके लिए एक नए पंथ की शुरुआत की, जिसका मूल उद्देश्य  दिकुओं, जमींदारों और अंग्रेजी शासन को चुनौती देना था। आज बिरसा मुंडा को इसी पंथ की वजह से जाना जाता है। इस पंथ को ‘बिरसाइट’ के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने खुद को भगवान घोषित किया और लोगों को उनका खोया राज्य लौटाने का आश्वासन दिया। साथ ही उन्होंने यह घोषणा की कि मुंडा राज का शासन शुरू हो गया है।

धरती आबा नाटक का यह अंश देखें :- “इतने दिन बीत गए और मैं आज तक मुंडाओं को उनका राज नहीं दिला सका। गुलामी का अँधेरा उनके ऊपर पहले की तरह ही छाया हुआ है। …पर कुछ दरवाज़े तो खुले हैं।…थोड़ी उजास तो आ रही है। मैंने उनके कई बन्धनों को खोल दिया है। अब वे असुरों की पूजा नहीं करते। अब वे प्रेतों से नहीं डरते। अब उन्होंने पहानों- ओझाओं को भेंट चढ़ाना बंद कर दिया है। …पर मैंने यह कैसी राह चुन ली। इतनी कठिन राह। क्या वे सब इस राह पर चल सकेंगे ? जानता हूँ मैं, यह एक कठिन राह है। जब पैर बढ़ाओ, तब काँटे। पर यही एक राह है जिस पर चलकर मुंडा गोरे साहबों के डर और पकड़ से आज़ाद हो सकते हैं। यह जो कुछ हो रहा है, क्या यह सब मैं कर रहा हूँ ? नहीं, मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता। …मैं तो बस उनकी साँसों में…उनके मन में …उनकी आत्माओं में…उनकी नसों में एक तेज़ तूफ़ान की तरह रहना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे अपना पिता कहा और मैंने उनका पिता बनना स्वीकार किया। वे गुलामी के बंधन से छूटना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें भरोसा चाहिए, और उन्होंने उस भरोसे को मेरे भीतर पाया…उन्हें एक भगवान चाहिए, वे धर्म के बिना न तो जी सकते हैं और न ही मर सकते हैं। जनम-जनम से वे सिंबोड़ा को पूजते रहे, पर सिंबोड़ा ने उनकी सुधि नहीं ली। मेरे ऊपर उनके भरोसे ने उन्हें मेरे भीतर भगवान दिखाया।

उन्होंने मुझे अपना भगवान माना और मुझे उनका भगवान बनना पड़ा।
क्या करता मैं ? उनके भरोसे को कैसे तोड़ता ? मैं जानता हूँ दिकुओं, ज़मींदारों, साहेबों की ताक़त को पर बिना लड़े कुछ नहीं हो सकता। हार के डर से लड़ने को रोका नहीं जा सकता। मैं जानता हूँ बन्दूक की ताक़त। मालूम है मुझे कि संथाल हूल में हारे, कोल, खरुआ और सरदार हारे, पर लड़ाई सिरफ हार-जीत नहीं होती। …मुझे अपना अंत मालूम है, पर मैं जानता हूँ कि उनकी जीत उनके भरोसे में ही छिपी है। ..हाँ मैं आबा हूँ इस धरती का …भगवान हूँ मुंडाओं का…। मैंने मिशन में प्रभु यीशु की प्रशंसा में सुना था कि एक रोटी में उन्होंने हज़ारों हज़ार लोगों की भूख मिटाई थी। आनंद पांडे के घर सुना था कि भक्त प्रह्लाद के लिए भगवान ने सिंह का रूप धरा और खम्भा से निकलकर उसके मामा को मार डाला। मैं भी उन्हीं की तरह हूँ। लँगोटी पहने, तीर धनुही लिये, भूखे पेट मुंडाओं को मैंने निडर किया है। आज हर मुंडा निडर है और दुनिया पर राज करनेवाले साहेबों के सामने छाती ताने खड़ा है।”

बिरसा एक दूरदर्शी थे, जिनका इतिहास आने वाले समय में आज़ादी और स्वायत्ता की कहानी के रूप में जाना जायेगा। ब्रिटिश सरकार के दौरान गैर आदिवासी (दिकु), आदिवासियों की जमीन हड़प रहे थे और आदिवासियों को खुद की जमीन पर बेगारी मजदूर बनने पर मजबूर होना पड रहा था।बिरसा मुंडा के समय में उपस्थित परिस्थितियां बहुत कुछ आज भी वर्तमान है। 1895 के दौरान अकाल की स्थिति में उन्होंने बकाया वन राशि को लेकर अपना पहला आन्दोलन शुरू किया।  मुंडा समाज को ऐसे ही मसीहा का इंतजार था. उनकी महानता और उपलब्धियों के कारण सभी उन्हें “धरती आबा” यानि ‘पृथ्वी के पिता’ के नाम से जानते थे। लोगों का यह भी मानना था कि बिरसा के पास अद्भुत शक्तियां हैं जिनसे वे लोगों की परेशानियों का समाधान कर सकते हैं। अपनी बीमारियों के निवारण के लिए मुंडा, उरांव, खरिया समाज के लोग बिरसा के दर्शन के लिए ‘चलकड़’ आने लगे। भारतीय समाज की यह विशेषता है कि यहां की जनता हर विशिष्ट व्यक्ति को भगवान मान लेती है। कई चमत्कार इन महान आत्माओं के साथ जोड़ दिए जाते हैं। बिरसा मुंडा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।  पलामू जिले के बरवारी और छेछारी तक आदिवासी बिरसाइट – यानि बिरसा के अनुयायी बन गए। 

बिरसा मुंडाओं के प्रति अपमानजनक टिप्पणियों के कारण ही मिशन स्कूल नहीं छोड़ देते, बल्कि जनजातीय देवताओं और प्रचलित हिंदू देवताओं से संबंधित कर्मकांडों के प्रति अनास्था भी प्रकट करते हैं। वह धर्म के महत्व और स्वरुप की अपनी निजी व्याख्या करते हैं और एक ऐसे धर्म की स्थापना करते हैं, जहाँ भय नहीं विस्वास है और साथ ही नए स्वतंत्र जीवन की चाहत है। लोक गीतों में लोगों पर बिरसा के गहरे प्रभाव का वर्णन मिलता है और लोग ‘धरती आबा’ के नाम से आज भी उनका स्मरण करते हैं।

महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘जंगल के दावेदार’ का एक अंश है : सवेरे आठ बजे बिरसा मुंडा खून की उलटी कर, अचेत हो गया. बिरसा मुंडा- सुगना मुंडा का बेटा; उम्र पच्चीस वर्ष-विचाराधीन बंदी। तीसरी फ़रवरी को बिरसा पकड़ा गया था, किन्तु उस मास के अंतिम सप्ताह तक बिरसा और अन्य मुंडाओं के विरुद्ध केस तैयार नहीं हुआ था….क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की बहुत सी धाराओं में मुंडा पकड़ा गया था, लेकिन बिरसा जानता था उसे सज़ा नहीं होगी,’ डॉक्टर को बुलाया गया उसने मुंडा की नाड़ी देखी। वो बंद हो चुकी थी। बिरसा मुंडा नहीं मरा था, आदिवासी मुंडाओं का ‘भगवान’ मर चुका था। रमणिका गुप्ता अपनी किताब ‘आदिवासी अस्मिता का संकट’ में लिखती हैं, ‘आदिवासी इलाकों के जंगलों और ज़मीनों पर, राजा-नवाब या अंग्रेजों का नहीं जनता का कब्ज़ा था। राजा-नवाब थे तो ज़रूर, वे उन्हें लूटते भी थे, पर वे उनकी संस्कृति और व्यवस्था में दखल नहीं देते थे। अंग्रेज़ भी शुरू में वहां जा नहीं पाए थे। रेलों के विस्तार के लिए, जब उन्होंने पुराने मानभूम और दामिन-ई-कोह (वर्तमान में संथाल परगना) के इलाकों के जंगले काटने शुरू कर दिए और बड़े पैमाने पर आदिवासी विस्थापित होने लगे, आदिवासी चौंके और मंत्रणा शुरू हुई।’ वे आगे लिखती हैं, ‘अंग्रेजों ने ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर आदिवासियों के वे गांव, जहां व सामूहिक खेती किया करते थे, ज़मींदारों, दलालों में बांटकर, राजस्व की नयी व्यवस्था लागू कर दी। इसके विरुद्ध बड़े पैमाने पर लोग आंदोलित हुए और उस व्यवस्था के ख़िलाफ़ विद्रोह शुरू कर दिए।’

संख्या और संसाधन कम होने की वजह से बिरसा मुंडा ने छापामार लड़ाई का सहारा लिया। लेकिन यह उनके निष्ठा का ही प्रभाव था कि रांची और उसके आसपास के इलाकों में पुलिस उनसे आतंकित थी। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए पांच सौ रुपये का इनाम रखा था जो उस समय के लिए बहुत बड़ी रकम थी। बिरसा मुंडा और अंग्रेजों के बीच अंतिम और निर्णायक लड़ाई 1900 में रांची के पास दूम्बरी पहाड़ी पर हुई थी। हज़ारों की संख्या में मुंडा आदिवासी बिरसा के नेतृत्व में लड़े थे। आदिवासियों के तीर-कमान और भाले अंग्रेजों के अत्याधुनिक बंदूकों और तोपों का सामना आखिर किस प्रकार करते? बहुत सारे आदिवासी बेरहमी से मार दिए गए। 25 जनवरी, 1900 के स्टेट्समैन अखबार के मुताबिक इस लड़ाई में 400 लोग मारे गए थे। अंग्रेज़ जीते तो सही पर बिरसा मुंडा हाथ नहीं आए। लेकिन जहां बंदूकें और तोपें काम नहीं आईं वहां पांच सौ रुपये ने काम कर दिया। बिरसा की ही जाति के लोगों ने ₹500 के लालच में उन्हें पकड़वा दिया। यह उनकी जाति की बेबसी भी थी जिसे महाश्वेता देवी अपने महान कालजयी उपन्यास ‘जंगल के दावेदार’ में लिखती हैं, ‘अगर उसे उसकी धरती पर दो वक़्त दो थाली घाटो, बरस में चार मोटे कपड़े, जाड़े में पुआल-भरे थैले का आराम, महाजन के हाथों छुटकारा, रौशनी करने के लिए महुआ का तेल, घाटो खाने के लिए काला नमक, जंगल की जड़ें और शहद, जंगल के हिरन और खरगोश-चिड़ियों आदि का मांस-ये सब मिल जाते तो बीरसा मुंडा शायद भगवान न बनता।’

‘उलगुलान’ के रुमानीवाद को साहित्य और जंगल से निकलकर साम्यवाद के हाथों में लाने वाले थे चारू मजुमदार, कनु सान्याल और जगत संथाल है।  इन्होंने इसे नक्सलवाद का रंग दे दिया। ‘नक्सलवाद’ शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से हुई है। साम्यवाद के सिद्धान्त से फ़ौरी तौर पर समानता रखने वाला आदिवासी आंदोलन कई मायनों में अलग भी था और एक भी यही उलगुलान बाद में माओवाद से जोड़ दिया गया। ऐसे में कवि भुजंग मेश्राम की पंक्तियां हैं :

‘बिरसा तुम्हें कहीं से भी आना होगा

घास काटती दराती हो या लकड़ी काटती कुल्हाड़ी

यहां-वहां से, पूरब-पश्चिम, उत्तर दक्षिण से

कहीं से भी आ मेरे बिरसा

खेतों की बयार बनकर

लोग तेरी बाट जोहते.’

“धरती आबा” का यह संवाद लगता है जैसे इसी कविता का जवाब है:- “लौटकर आऊंगा मैं..जल्द ही लौटूंगा मैं अपने जंगलों में, अपने पहाड़ों पर…मुंडा लोगों के बीच फिर आऊंगा मैं। तुम्हें मेरे कारण दुःख न सहना पड़े इसलिए माटी बदल रहा हूँ मैं…उलगुलान ख़त्म नहीं होगा। आदिम खून है हमारा। …काले लोगों का खून है यह। भूख… लांछन… अपमान… दुःख… पीड़ा ने मिल-जुलकर बनाया है इस खून को। इसी खून से जली है उलगुलान की आग। यह आग कभी नहीं बुझेगी…कभी नहीं।…. जल्दी ही लौटकर आऊंगा मैं” बिरसा मुंडा का यह संवाद नाटक धरती आबा का मुख्य कथ्य है।

छोटानागपुर के जंगलों में मुंडा, हो, उराँव, संथाल आदि जनजातियाँ युगों से निवास करती रही हैं। ये प्रकृति के सहचर रहे हैं तथा प्रकृति से इनके आत्मीय संबंध ने इनके जीवन-बोध को निश्छल मानवीय संवेदनाओं से भर दिया है। अपनी परम्पराओं, विश्वासों, आस्थाओं और अपनी सहज-सरल जीवन-पद्धति के कारण आदिवासियों ने धरती को, जल को, जंगल को माँ की तरह देवी देवता की तरह पूजा है और धरती की सम्पदा की हर संभव रक्षा की है। आदिवासियों के सरनेम किसी न किसी जीव जंतु के नाम पर होते हैं और वह उन जीव जंतुओं के संरक्षक होते हैं। इसके बावजूद इन्हें लगातार तथाकथित सभ्य समाज के प्रपंचों का शिकार होना पड़ा है। प्रपंचों से दूर यह समाज तथाकथित सभ्य समाज के स्वार्थ की पूर्ति के लिए जीवन की निजता को नष्ट होता देख रहा है । इस अन्याय के विरुद्ध सिधु-कानू, तिलका मांझी और बिरसा मुंडा जैसे नायकों ने संघर्ष किया और अपनी जातीय चेतना, परम्परा, धरती और मनुष्य की गरिमा को स्थापित किया। वर्गीय चेतना के जागृत हुए बिना क्रांति संभव नहीं है इसलिए सर्वप्रथम उन लोगों ने जातीय चेतना जगाई।

“धरती आबा” नाटक बिरसा मुंडा के व्यक्तित्व और उलगुलान आंदोलन के माध्यम से हमारे स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के कई ऐसे पन्नों को खोलता है, जिनमें समाज के अंतिम कतार में खड़े मनुष्य की चेतना शामिल है। बिरसा के संघर्ष भरे जीवन में मुंडाओं के लिए स्वप्न हैं। जनजातीय समाज के नायक बिरसा मुंडा पूरे भारतीय समाज के नायक के रूप में उभरते हैं और गुलामी के कठिन जीवन से मुक्ति के लिए आंदोलन आरम्भ करते हैं। वह मुंडाओं को संगठित करते हैं और नई सामाजिक व्यवस्था तथा आज़ादी के लिए लड़ते हैं। पहली बार की गिरफ्तारी और जेल की सज़ा काट कर लौटने के बाद वह मुंडाओं को नए सिरे से संगठित कर आंदोलन करते हैं।

कर्मी बिरसा की माँ है, पर वह धरती का प्रतीक बन जाती है। भगवान और धरती के आबा (पिता) के रूप में उनका संघर्ष आज भी हमारे जीवन को प्रेरित करता है। बिरसा मुंडा का नायकत्व मनुष्य के मुक्ति-संघर्ष का धवल प्रतीक है। धरती आबा नाटक में तत्कालीन शासन और अंग्रेजों द्वारा बिरसा के सन्दर्भ में फैलाई तथा सरकारी अभिलेखों में दर्ज की गई रूढ़ियों से परे जाकर भी बहुत कुछ रचने का प्रयास किया गया है।

धरती आबा बिरसा मुंडा आम आदिवासियों के दिलों में आज भी जिंदा है़ं कठिनाइयों से संघर्ष के दौर में उनका नाम उन्हें संबल व ऊर्जा देता है़ पर ज्यादातर यह मानते हैं कि भगवान बिरसा का सपना पूरी तरह साकार नहीं हुआ है़ उन्होंने अपने हिस्से की लड़ाई लड़ी और भावी पीढ़ी को यह प्रेरणा दिया कि अन्याय के खिलाफ ईमानदारी और प्रतिबद्धता से लड़ेंगे, तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है़। जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के प्राध्यापक प्रो हरि उरांव कहते हैं कि बिरसा मुंडा पूरे झारखंडी आदिवासी समाज के प्रतीक हैं, पर आज उनके नाम का राजनैतिक और व्यावसायिक उपयोग ज्यादा हो रहा है़ उन्होंने आदिवासी समाज के लिए जो सपना देखा था, वह अब तक पूरी तरह साकार नहीं हुआ है़ उन्होंने सशक्त, विकसित व शोषण मुक्त आदिवासी समाज की परिकल्पना की थी़ उन्होंने हमें राह दिखायी है और अब यह हमारा कर्तव्य है कि उनकी तरह हर अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध करे़ं।

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के शिक्षक महेश भगत  कहते हैं कि बिरसा मुंडा आदिवासियत के प्रतीक है़ं उनका सपना अब तक पूरा नहीं हुआ है़ यदि आज वह हमारे बीच होते, तो लोगों की स्थिति और बेहतर होती या उनका प्रतिकार जारी रहता़ उन्होंने जिस भावना के साथ अन्याय व शोषण के खिलाफ संघर्ष किया था, वह भावना आज कम दिखती है़ यदि हालात सुधारना चाहते हैं, तो उनकी तरह ईमानदारी और प्रतिबद्धता की जरूरत है़ कई लोग उनका नाम सिर्फ मजबूरी या औपचारिकतावश लेते हैं, जो नहीं होना चाहिए़ उनकी भावना को आत्मसात करने की आवश्यकता है़। भगवान बिरसा हमारे मार्गदर्शक है़ं उन्होंने युवाओं को आदिवासी समाज के लिए कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी का सबक दिया है़ आम लोगों की खुशहाली का सपना देखना सिखाया है़ जरूरी है कि आज के युवा उनकी तरह सपना देखना और संकल्प के साथ आगे बढ़ना सीखे़ं।

आज के ज्यादातर युवाओं में उनकी तरह सोच और नि:स्वार्थ भावना नजर नहीं आती़ यदि उनकी सोच पर चलेंगे तो पूरा आदिवासी समाज, पूरा झारखंड खुशहाल हो सकता है़ उन्होंने समाज के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया़ उनके कार्यों को आगे बढ़ाने की जरूरत है़ वह आदिवासी युवाओं के प्रेरणा के स्रोत है़ं। बिरसा मुंडा ने अंगरेज सरकार और जमींदारों के शोषण के खिलाफ संघर्ष किया़ लोगों को बचाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं की़ शोषितों की आवाज बने़ झारखंड के निर्माण में और यहां के लोगों को हक-अधिकार दिलाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है़ पर उनका सपना पूरी तरह साकार नहीं हुआ है़ ।उन्होंने जल, जंगल व जमीन की लड़ाई लड़ी और इसमें अपने प्राणों की आहूति दे दी़ आज भी वह अपनी संस्कृति व धरोहरों की रक्षा और शोषण के खिलाफ लड़ाई में हमारे प्रेरणा स्रोत है़ं वे आम आदिवासी के दिल में आज भी जिंदा है़ं।
यदि एक कोई नाम है जिसे भारत के सभी आदिवासी समुदायों ने आदर्श और प्रेरणा के रूप में स्वीकारा है, तो वह हैं “धरती आबा बिरसा मुंडा”। ब्रिटिश राज, जमींदारों, दिकुओं के खिलाफ बिरसा के विद्रोह ने स्वायत्ता और स्वशासन की मांग की। बिरसा मुंडा के संघर्ष के फलस्वरूप ही छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट, 1908 (CNT) इस क्षेत्र में लागू हुआ जो आज तक कायम है। यह एक्ट आदिवासी जमीन को गैर आदिवासी में हस्तांतरित करने में प्रतिबन्ध लगाता है और साथ ही आदिवासियों के मूल अधिकारों की रक्षा करता है।  
ब्रिटिश काल में सरकार की नीतियों के कारण आदिवासी कृषि व्यवस्था, सामंती व्यवस्था में बदल रही थी। चूंकि आदिवासी कृषि प्रणाली अतिरिक्त या ‘सरप्लस’ उत्पादन करने के काबिल नहीं थी, सरकार ने गैर आदिवासियों को कृषि के लिए आमंत्रित करना शुरू कर दिया। इस प्रकार आदिवासियों की जमीन छीनने लगी. यह गैर आदिवासी वर्ग, लोगों का शोषण कर केवल अपनी संपत्ति बनाए में उत्सुक थे।

मुंडा जनजाति छोटा नागपुर क्षेत्र में आदिकाल से रह रहे थे और वहां के मूल निवासी थे। इसके बावजूद अंग्रेजी सरकार के आने पर आदिवासियों पर अनेक प्रकार के टैक्स लागू किये जाते थे। इस बीच जमींदार आदिवासियों और ब्रिटिश सरकार के बीच मध्यस्त का काम करने लगे और आदिवासिओं पर शोषण बढ़ने लगा। जैसे ही ब्रिटिश सरकार आदिवासी इलाकों में अपनी पकड़ बनाने लगी, साथ ही हिन्दू धर्म के लोगों का प्रभाव इन क्षेत्रों में बढ़ने लगा। न्याय नहीं मिल पाने के कारण आदिवासियों के पास केवल खुद से संघर्ष करने का रास्ता मिला। बिरसा ने नारा दिया कि “महारानी राज तुंदु जाना ओरो अबुआ राज एते जाना” अर्थात ‘(ब्रिटिश) महारानी का राज खत्म हो और हमारा राज स्थापित हो’। इस तरह बिरसा ने आदिवासी स्वायत्ता, स्वशासन पर बल दिया। आदिवासी समाज भूमिहीन होता जा रहा था और मजदूरी करने पर विवश हो चुका था। इस कारण बिरसा के आन्दोलन ने ब्रिटिश सरकार को आदिवासी हित के लिए कानून लाने पर मजबूर किया और साथ ही आदिवासियों का विश्वास जगाया की ‘दिकुओं’ के खिलाफ वे खुद अपनी लड़ाई लड़ने के काबिल हैं. बिरसा ने लोगों को एकजुट करने के लिए चयनित एवं गुप्त स्थानों में सभा करवाई, प्रार्थनाओं को रचा और अंग्रेजी शासन के अंत के लिए अनुष्ठान कराए।

आदिवासी जीवन की समस्याओं पर झारखंड के मशहूर कथाकार रणेन्द्र ने भी “ग्लोबल गांव के देवता” और “गायब होता देश” जैसी रचनाएं रची है। आज के समय में बिरसा मुंडा आदिवासी आन्दोलनों के लिए एक प्रेरणा स्रोत हैं। लेकिन साथ ही मौजूदा हिंदी साहित्य हमारे सामने कई सवाल भी खड़े करता है। जहाँ एक तरफ भारत सरकार बिरसा को एक ‘स्वतंत्रता सेनानी’ और ‘देशभक्त’ के रूप में मानती है, दूसरी आजादी के 70 वर्षों के बाद भी आज अगर आदिवासी समाज को समान नागरिक की तरह नहीं माना जा रहा है आज आदिवासी समाज सभी आंकड़ों में उपनिवेशवाद का शिकार है, “गायब होता देश” उपन्यास इस तथ्य की विस्तृत विवेचना करता है। जहाँ केवल ब्रिटिश सरकार के बदले, देश और राज्यों की सरकार आदिवासियों के दमन की नीतियाँ अपना रही है। 

बहरहाल बिरसा मुंडा के संगठनात्मक कौशल ने लोगों को प्रेरित किया और उन्हें जमींदारों, ठेकेदारों के चंगुल से बचाया और साथ ही आदिवासी जमीन पर पूर्ण स्वामित्व की बात रखी।  बिरसा मुंडा के इतिहास से हमें आज के संघर्ष के लिए अनेकों सीख मिलती है। जिस तरह आज आदिवासियों पर अत्याचार बढ़ रहे हैं और उपनिवेशवादी नीतियाँ सरकारी नीतियाँ बन रही हैं, बिरसा का इतिहास और उनके  सिद्धांत भविष्य के आदिवासी आन्दोलनों के लिए एक ऐतिहासिक उदाहरण पेश करता रहेगा।

लेखक – डॉ उर्वशी रांची विमेंस कॉलेज के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

Leave comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *.